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Awadh Prahari समाज जागरण का शंखनाद 'अवध प्रहरी' (पाक्षिक) Awadh Prahari

24/07/2026

देवप्रयाग का मनोरम दृश्य

24/07/2026

गौ माता सिर्फ एक पशु नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति का मूल आधार और हमारी राष्ट्र माता हैं।

मोहनलालगंज : ग्रामीणों और हिन्दूवादी संगठन का हंगामा, लालच, धमकी और घरेलू सामान देकर ईसाई धर्म में परिवर्तित कराता था तम...
24/07/2026

मोहनलालगंज : ग्रामीणों और हिन्दूवादी संगठन का हंगामा, लालच, धमकी और घरेलू सामान देकर ईसाई धर्म में परिवर्तित कराता था तमिलनाडु निवासी आरोपी चन्द्रभान कुशवाहा...

छानबीन में खुलासा 6 वर्ष में 50 से ज्यादा लोगों का कराया धर्म परिवर्तन

24/07/2026

नीट (NEET) मामले पर सरकार और शिक्षा मंत्री से सवाल पूछना आपका पूरा अधिकार है, लेकिन हर समस्या के लिए सीधे तौर पर RSS को ज़िम्मेदार ठहराना सिर्फ एक प्रोपेगैंडा है।

लखनऊ : बीबीएयू के विज्ञानियों ने खोजी जीवन रक्षक दवाएँ बनाने की हरित तकनीक ।जीवनरक्षक दवाओं और कृषि रसायनों के निर्माण म...
24/07/2026

लखनऊ : बीबीएयू के विज्ञानियों ने खोजी जीवन रक्षक दवाएँ बनाने की हरित तकनीक ।

जीवनरक्षक दवाओं और कृषि रसायनों के निर्माण में कच्चे माल के रूप में होगा इसका उपयोग।

बुन्देलखण्ड में मियावाकी पद्धति से हरियाली की नई उम्मीद :बुन्देलखण्ड लम्बे समय से जल संकट, भीषण गर्मी और घटते भू-जल स्तर...
24/07/2026

बुन्देलखण्ड में मियावाकी पद्धति से हरियाली की नई उम्मीद :

बुन्देलखण्ड लम्बे समय से जल संकट, भीषण गर्मी और घटते भू-जल स्तर जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे में पर्यावरण सन्तुलन बहाल करने और स्थानीय जैव विविधता को बढ़ावा देने के लिये मियावाकी पद्धति से घने जंगल विकसित किये जा रहे हैं। यह जापान के प्रसिद्ध वनस्पति वैज्ञानिक अकीरा मियावाकी द्वारा विकसित तकनीक है, जिसमें स्थानीय प्रजातियों के पौधों को अत्यधिक घनत्व के साथ लगाया जाता है। इससे कम समय में प्राकृतिक जंगल जैसा वातावरण तैयार हो जाता है।

क्या है मियावाकी पद्धति ?

इस तकनीक में एक वर्ग मीटर क्षेत्र में तीन से चार पौधे लगाये जाते हैं। पौधों का चयन स्थानीय जलवायु और मिट्टी के अनुसार किया जाता है। झाड़ियाँ, छोटे पेड़, मध्यम ऊँचाई वाले वृक्ष और बड़े छायादार पेड़ों की विभिन्न परतें तैयार की जाती हैं, जिससे प्राकृतिक जंगल जैसी संरचना विकसित होती है। शुरुआती दो से तीन वर्षों तक नियमित सिंचाई और देखभाल की आवश्यकता होती है, इसके बाद जंगल काफी हद तक स्वयं विकसित होने लगता है।

बुन्देलखण्ड को इसकी जरूरत ?

बुन्देलखण्ड का बड़ा हिस्सा अर्ध-शुष्क (सेमी एरिड) क्षेत्र है, जहाँ वर्षा कम होती है और गर्मियों में तापमान काफी अधिक पहुँच जाता है। ऐसे क्षेत्रों में मियावाकी जंगल मिट्टी में नमी बनाये रखने, भू-जल पुनर्भरण में सहायता करने, तापमान कम करने और धूल व प्रदूषण को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। घने वृक्ष पक्षियों, तितलियों, मधुमक्खियों और अन्य जीवों के लिये भी सुरक्षित आवास उपलब्ध कराते हैं, जिससे जैव-विविधता को बढ़ावा मिलता है।

#मियावाकी #वृक्षारोपण #पर्यावरण

धर्मांतरण की गतिविधियों को रोकने के लिए समाज में जागरूकता, एकता, समरसता और सेवा कार्यों को बढ़ाने पर जोर दिया जाए।— दत्त...
24/07/2026

धर्मांतरण की गतिविधियों को रोकने के लिए समाज में जागरूकता, एकता, समरसता और सेवा कार्यों को बढ़ाने पर जोर दिया जाए।

— दत्तात्रेय होसबाले
सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

24/07/2026

शिक्षा वह है, जो संस्कार भी दे।

23/07/2026

क्या है भारत की पहचान ?

RSS की चारदीवारी के चार चक्रधरों की रोचक कहानियां ~ संघ के कुछ प्रचारक थे जो सर्वोच्च पदों तक तो नहीं पहुंचे लेकिन सरसंघ...
23/07/2026

RSS की चारदीवारी के चार चक्रधरों की रोचक कहानियां ~

संघ के कुछ प्रचारक थे जो सर्वोच्च पदों तक तो नहीं पहुंचे लेकिन सरसंघचालक उनकी उपयोगिता और योग्यता के चलते उन्हें दूर भी नहीं भेजना चाहते थे। आज आप ऐसे चार स्वयंसेवकों/प्रचारकों की दिलचस्प कहानी जानेंगे। सभी सरसंघचालकों से जुड़ी निजी और दिलचस्प कहानियां जो आप अलग अलग किताबों, लेखों में पढ़ते हैं, वो ज्यादातर इन चारों की वजह से सामने आ पाईं।

कई बार संगठन के शीर्ष पर बैठे लोगों को किसी स्वयंसेवक या प्रचारक की योग्यता या जरूरत ऐसी लगती है कि वो उन्हें किसी दुर्गम क्षेत्र में भेजने के बजाय संघ मुख्यालय पर ही रखना चाहते हैं। जैसे डॉ हेडगेवार ने गुरु गोलवलकर को पहले नागपुर की जिम्मेदारी दी, फिर संघ शिक्षा वर्ग का सर्वाधिकारी बनाया और फिर एक महीने के लिए बंगाल भी भेजा, लेकिन उन्हें लगता था कि इतने योग्य व्यक्ति को दूसरा सरसंघचालक होना चाहिए, इसलिए उन्हें सरकार्यवाह बनाकर उनका केन्द्र नागपुर ही कर दिया। गुरु गोलवलकर ने भी बालासाहब देवरस को नागपुर बुलाकर फिर कहीं नहीं भेजा क्योंकि उन्हें पता था कि संगठन को डॉ हेडगेवार के बाद अगर कोई सबसे ज्यादा समझता है तो वो हैं बालासाहब देवरस। लेकिन कुछ और भी लोग इन शुरुआती दशकों में से थे, जो सर्वोच्च पदों तक तो नहीं पहुंचे लेकिन सरसंघचालक उनकी उपयोगिता और योग्यता के चलते उन्हें दूर भी नहीं भेजना चाहते थे। आज आप ऐसे ही चार स्वयंसेवकों/प्रचारकों की दिलचस्प कहानी जानेंगे। सभी सरसंघचालकों से जुड़ी निजी और दिलचस्प कहानियां जो आप अलग अलग किताबों, लेखों में पढ़ते हैं, वो ज्यादातर इन चारों की वजह से सामने आ पाईं।

गुरु गोलवलकर की परछाईं बनकर रहते थे आबाजी थत्ते ~

“एक उच्च ध्येय वाले कार्यकर्ता को विश्राम देने की सामर्थ्य तीन अक्षर के शब्द ‘मृत्यु’ में ही है”, सोचिए इन पंक्तियों के लेखक का चरित्र और सोच कैसी रही होगी। वासुदेव केशव थत्ते नाम था उनका, चाहते तो एमबीबीएस कर ही चुके थे, वो भी आजादी से पहले। प्रैक्टिस भी कर ही रहे थे। तब देश में डॉक्टर ही कितने थे, चाहते तो अच्छा करियर बना सकते थे, लेकिन उन्होंने संघ को अपनाया और अपना पूरा जीवन संघ कार्य़ में ही लगा दिया। उन्हें गुरु गोलवलकर की परछाईं या छाया कहा जाता था। बालासाहब ने उनकी प्रतिभा और लगन को शुरू में ही पहचान लिया था, वो उन्हें बड़ी जिम्मेदारी देना चाहते थे लेकिन ये भी चाहते थे कि जान लें कि एक प्रचारक अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में कितनी कठिनाइयों का सामना करता है। उन्हें बंगाल के शिवपुर में प्रचारक बनाकर भेजा गया।

लेकिन वासदेव केशल थत्ते यानी आबाजी थत्ते अलग ही मिट्टी के बने थे, अगले कुछ महीनों में तो उन्होंने शिवपुर से भी प्रचारक निकालना शुरू कर दिया। बालासाहब को लगा कि केशव लगन से काम करते हैं तो उनको गुरु गोसवलकर की सेवा में लगा दिया। अब गोलवलकर जो कहते या करते, वैसा ही आबाजी थत्ते करते। गुरु गोलवलकर प्रवास में निकलते तो हर समय उनके साथ आबाजी होते। उन्होंने लम्बे समय तक गुरु गोलवलकर के साथ देश भर में प्रवास किए, उनको गोलवलकर के साथ की इतनी घटनाएं पता थीं, इतनी बातें पता थीं, लेकिन उन्होंने किसी को नहीं बताईं, कहीं ना लिखीं ना कहीं, हां अपनी डायरी में जरूर कुछ ना कुछ लिखते थे। इन घटनाओं में कराची से बम कांड में फंसे स्वयंसेवकों की सुरक्षित रिहाई हो या बंटवारे के समय लगातार जान पर खेलकर गुरु गोलवलकर का पीड़ितों से मिलने जाना हो, हर जगह आबाजी थत्ते उपस्थित थे।

गुरु गोलवलकर के साथ काम करते देखकर उनके कभी कभी चित्र भी बना लिया करते थे, वो भी उनकी डायरी में हैं। एक बार उनसे कहा भी गया कि आपके पास तो गुरु गोलवलकर के साथ रहने का सबसे ज्यादा अनुभव हैं, तमाम किस्से कहानियां हैं, आप एक किताब क्यों नहीं लिख देते, तो उनका कहना था कि श्रीराम के साथ हुनुमान लम्बे समय तक रहे थे लेकिन श्रीराम का चरित्र महर्षि वाल्मीकि ने लिखा था हनुमान ने नहीं। पूछने वाला भी निरुत्तर रह गया था।

लेकिन उनके पास जो अनुभव के नाम पर सम्पर्कों का खजाना पूरे देश में इकट्ठा हुआ, वो बाद में अगले संघ प्रमुख बालासाहब देवरस के बहुत काम आया। संघ प्रमुख का दायित्व मिलने के बाद जब बालासाहब ने देश भर में प्रवास शुरू किए तो आबाजी उनके साथ ही रहते थे, देश भर के प्रमुख कार्यकर्ताओं से उन्होंने बालासाहब को भी मिलवाया और मुलाकातों से पहले वो उस शहर के सभी प्रमुख कार्यकर्ताओं, स्वयंसेवकों के बारे में बता दिया करते थे और ये भी कि गुरूजी उनके बारे में क्या सोचते थे। इससे बालासाहब का काम काफी आसान हो जाता था। इसका दूसरा लाभ संघ के उन संगठनों को भी मिला, जो बाद में शुरू हुए, चूंकि उन्हें बाद में अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख बना दिया गया था, और ग्राहक पंचायत, सहकार भारती।, राष्ट्र सेविका समिति तथा अन्य महिला संगठनों से समन्वय की जिम्मेदारी भी दे दी गई थी, सो उन्हें अपने पुराने सम्पर्कों का खूब लाभ यहां भी मिला।

वासुदेव केशव थत्ते यानी आबाजी का जन्म 1918 में बम्बई (अब मुंबई) में हुआ था, उनके बड़े भाई ने ही उनका पालन पोषण किया था, सो 1939 में उन्हीं की प्रेरणा से शिवाजी पार्क में लगने वाली संघ शाखा में जाने लगे थे। शाखा में जाते जाते भी उन्होंने एमबीबीएस कर लिया था, पढ़ाई पूरी करते ही प्रचारक बनने की मांग संघ से करने लगे तो बालासाहब ने उन्हें समझाकर बम्बई के बड़कस चौक में डॉ पांडे के साथ काम करने के लिए भेज दिया। फिर पश्चिम बंगाल में प्रचारक बनाया गया और उसके बाद गुरु गोलवलकर की सेवा में भेज दिया गया था। 1995 में उन्होंने देह त्याग किया।

गुरु गोलवलकर के लिखे 11000 पत्रों की हस्तलिखित प्रतिलिपि बनाने वाले स्वयंसेवक ~

बाबूराव चौथाईवाले के साथ ये बड़ा रोचक तथ्य है कि वे 6 भाई थे, और उनमें से तीन तो संघ के पूर्णकालिक प्रचारक बन गए थे और चौथे खुद बाबूराव 2 साल विस्तारक रहे और फिर जिंदगी भर प्रचारक ना होते हुए भी संघ की सेवा में रहे, सीधे सरसंघचालकों के साथ जुड़े रहे। उनको सरसंघचालकों का पत्र लेखक कहा जाता था। प्रचारक बनने वाले उनके तीनों भाइयों के नाम थे, शरदराव, शशिकांत तथा अरविन्द चौथाईवाले।

जिन दिनों वे कक्षा नौ में पढ़ते थे, तब कलमेश्वर में डा। हेडगेवार आये। उन्होंने सबसे संघ की प्रतिज्ञा लेने को कहा। बाबूराव ने इसके लिए पिताजी से पूछा। पिताजी हालांकि स्वयंसेवक नहीं थे; पर डा। हेडगेवार तथा वीर सावरकर के प्रति उनके मन में बहुत श्रद्धा थी, अतः उन्होंने सहर्ष अनुमति दे दी। कक्षा 12 के बाद बाबूराव दो वर्ष छिन्दवाड़ा में विस्तारक भी रहे। इसके बाद नागपुर में अध्यापन करते हुए बीए, बीएड तथा एमए किया। छात्र जीवन में ही वे संघ शिक्षा वर्ग का तृतीय वर्ष कर चुके थे। यानी प्रचारक बनने की योग्यता पा चुके थे। पुणे, तुम्कूर तथा फगवाड़ा के संघ शिक्षा वर्गों में वे मुख्य शिक्षक होकर भी गये। 1948 के प्रतिबंध में बाबूराव ने भूमिगत रहते हुए सत्याग्रह का संचालन किया। 1975 में प्रतिबंध लगते ही उन्होंने गुरु गोलवलकर के व्यक्तिगत सामान (पत्र, कमंडल आदि) को सुरक्षित रखने की व्यवस्था की। इसके बाद वे जेल गये और प्रतिबंध समाप्ति तक मीसा में बंद रहे।

श्री कृष्णराव एवं श्रीमती इंदिरा के सबसे बड़े पुत्र मुरलीधर कृष्णराव (बाबूराव) चौथाईवाले का जन्म 27 जुलाई, 1922 को बारसी (जिला सोलापुर, महाराष्ट्र) में हुआ था। यह परिवार मूलतः यहीं का निवासी था; पर बाबूराव के पिता पहले कलमेश्वर और फिर नागपुर में अध्यापक रहे। बाबूराव का घर नागपुर में महाल संघ कार्यालय के पास ही था। गुरु गोलवलकर और फिर बालासाहब के नागपुर निवास के समय वे कार्यालय से ही विद्यालय आते-जाते थे। बाकी दिनों में भी वे विद्यालय से सीधे कार्यालय आकर रात में ही घर जाते थे। गुरु गोलवलकर उनके घर को अपना दूसरा घर मानते थे। जब उन्हें कुछ विशेष चीज खाने की इच्छा होती थी, तो वे सूचना देकर उनके घर पर वह बनवा लेते थे। इस प्रकार बाबूराव की गुरु गोलवलकर के बीच की हिचक गायब ही हो गई थी।

1954 से वे सरसंघचालक गुरु गोलवलकर के पत्र-व्यवहार संभालने लगे। वे आने वाले हर पत्र पर दिनांक डालकर प्राप्ति की सूचना देते थे। गोलवलकर जो भी पत्र लिखते, बाबूराव एक रजिस्टर में उसकी हस्त-प्रतिलिपि तैयार करते थे। ऐसे लगभग 11,000 पत्रों की प्रतिलिपि से ‘पत्ररूप श्री गुरुजी’ ग्रन्थ बनाया गया। जहां गुरु गोलवलकर हर पत्र का उत्तर स्वयं लिखते थे, वहीं तीसरे सरसंघचालक बालासाहब देवरस बाबूराव को उसका उत्तर बता देते थे। फिर बाबूराव ही उसे लिखते थे। बालासाहब विजयादशमी या अन्य महत्वपूर्ण भाषणों की विषय वस्तु भी उन्हें बताते थे। बाबूराव उसे भी लिखकर उन्हें दे देते थे। दरअसल बालासाहब को पत्र लिखने में बड़ी कोफ्त सी महसूस होती थी, बाबराव चौथाईवाले गुरु

गोलवलकर के बाद बने नए सरसंघचालक की अलग आदतों के बारे में ज्यादा विस्तार से बताते हैं कि, “वर्ष 1973 के पूर्व सभी पत्रों का उत्तर गुरुजी स्वयं लिखते थे। डॉ। आबाजी थट्टे और कृष्णराव मोहर्रिर भी पत्रों के उत्तर लिखते थे। अतः संघ से संबंधित पत्र लिखने का काम बालासाहब को नहीं करना पड़ता था। आवश्यकता पड़ने पर डॉ। आबाजी या कृष्णराव को पत्र लिखने के लिए वे कह देते थे।”

अपने हाथ से पत्र लिखने का अभ्यास न रहने के संदर्भ में तत्कालीन कार्यालय प्रमुख पांडुरंग पंत क्षीरसागर ने एक किस्सा बताया था। बालासाहब सरकार्यवाह थे। अखिल भारतीय बैठक के पत्र पांडुरंग पंत तैयार करते थे और सरकार्यवाह हस्ताक्षर करते थे। ऐसे ही एक पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए बालासाहब को एक अच्छा सा फाउंटेन पेन दिया गया था। हस्ताक्षर करने के लिए बालासाहब ने पेन खोला तो उसकी स्याही सूख चुकी थी। इसलिए उन्होंने पांडुरंग पंत से पेन मांगा। पंत ने हंसते-हंसते कहा, “प्रतिदिन कुछ लिखने पर स्याही सूखेगी नहीं और ऐसा प्रसंग नहीं आएगा।” “इस पर बालासाहब ने पूछा, “हर रोज क्या लिखूं?” पंत ने कहा, "राम नाम लिखा करिए" बालासाहब कहने लगे, “बाबू ने मुझे संध्या - वंदन करने को कहा, अब तुम राम नाम लिखने को कह रहे हो”, वहां बैठे हुए हम सभी लोग ठहाका मारकर हंस पड़े।

कितना सम्मान गुरु गोलवलकर का बालासाहब देवरस करते थे, इसका जिक्र उनके निजी सचिव बाबूराव चौथाई वाले ने एक घटना में किया है। दरअसल गुरु गोलवलकर बीमार थे, और उनके देहावसान से 15 दिन पहले अचानक अपने गांव में बालासाहब फूड प्वॉइजनिंग की वजह से बेहोश होकर गिर गए। जब उनके देहावसान के बाद बालासाहब को पता चला कि उनका नाम अंतिम पत्र में गुरु गोलवलकर ने सरसंघचालक के लिए लिखा है तो उनका पहला ही सवाल था कि “मेरे स्वास्थ्य के बारे में गुरुजी को जानकारी थी ना?” यूं वो पत्र सबके लिए बालासाहब भिड़े ने पढ़ा था, लेकिन बाद में जब खुद उन्होंने पढ़ा था तो पढ़ते पढ़ते वो काफी भावुक हो गए थे। ऐसी प्रेरणा देनी वाली कहानियां बाबूराव जैसे लोगों की वजह से ही आम स्वयंसेवक तक पहुंच पाईं हैं।

डॉ। आबाजी थत्ते की बीमारी के दौरान भी चौथाईवाले ने कुछ समय गुरु गोलवलकर के साथ प्रवास भी किया था। बालासाहब के देहांत के बाद उन्होंने ‘मेरे देखे हुए श्री बालासाहब देवरस’ पुस्तक लिखी। सबकी इच्छा थी कि वे गुरु गोलवलकर पर भी एक पुस्तक लिखें। अतः उन्होंने प्रवास कर बहुत सी महत्वपूर्ण सामग्री एकत्र की। पर जब वे अपने पुत्र के घर संभाजीनगर (औरंगाबाद) में इसे लिखने बैठे, तो दो अध्याय लिखने के बाद उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया और चार फरवरी, 1996 को वे चल बसे। आगे चलकर जब रंगाहरि ने गुरु गोलवलकर की जीवनी लिखी तो उसमें बाबूराव द्वारा इकट्ठी कई गई शोध सामग्री का भरपूर उपयोग किया।

नागपुर कार्य़ालय प्रभारी की जान वहीं बसी थी, बाहर गए तो जान गई ~

उनका नाम था पांडुरंग क्षीरसागर। लगता है उनका घर और बाद में नागपुर का संघ कार्य़ालय ही उनका क्षीरसागर था, वहां से ज्यादा दिनों के लिए निकलना उन पर हमेशा ही भारी पड़ा था। यूं तो पांडुरंग वर्धा के रहने वाले थे, बालपन में ही स्थानीय शाखा में जाने लगे। आगामी शिक्षा के लिए नागपुर आकर वे इतवारी शाखा के स्वयंसेवक बने, जो संख्या, कार्यक्रम तथा वैचारिक रूप से बहुत प्रभावी थी। बालासाहब देवरस उस शाखा के कार्यवाह थे। शीघ्र ही वे बालासाहब जी के विश्वस्त मित्र बन गये। उनकी प्रेरणा से पांडुरंग जी ने आजीवन संघ कार्य करने का निश्चय कर लिया। तो उनको बंगाल भेजा गया।

बंगाल उन दिनों संघ के लिए एक कठिन प्रांत माना जाता था, पर उनके प्रयास से कुछ स्थानीय युवक प्रचारक बने। उन्होंने चार-पांच साल वहां काम किया। इस बीच उन्हें ‘फ्लुरसी’ रोग हो गया। बंगाल के इलाज से उन्हें कुछ लाभ नहीं हुआ, अतः वर्ष 1946 में उन्हें महाराष्ट्र के वाई गांव में तीन वर्ष तक चिकित्सा के लिए रखा गया। वहां से स्वास्थ्य लाभ कर उन्हें वर्ष 1950 में नागपुर कार्यालय प्रमुख का काम दिया गया। उन दिनों सब केन्द्रीय कार्यकर्ताओं का केन्द्र नागपुर ही था। सभी केन्द्रीय बैठकें भी वहीं होती थीं। इनकी व्यवस्था बहुत कुशलता से पांडुरंग जी करने लगे।

वर्ष 1955 में उन्हें अखिल भारतीय व्यवस्था प्रमुख की जिम्मेदारी दी गयी। वे अन्य कामों की तरह हिसाब-किताब भी बहुत व्यवस्थित ढंग से रखते थे। आपातकाल में पुलिस ने संघ कार्यालय का सब साहित्य जब्त कर लिया। वह संघ को बदनाम करना चाहती थी। अतः हिसाब-किताब बहुत बारीकी से जांचा गया, पर वह इतना व्यवस्थित था कि शासन कहीं आपत्ति नहीं कर सका। आपातकाल के बाद वे बहियां वापस करते हुए सरकारी अधिकारियों ने कहा कि सार्वजनिक संस्थाओं का हिसाब कैसा हो, यह संघ से सीखना चाहिए।

गांधी हत्या के बाद जब संघ पर प्रतिबंध लगा तो कांग्रेसी नेताओं ने उसके बहाने व्यक्तिगत खुन्नस निकालने का भी काम किया था, आम लोगों को भड़काया और संघ कार्यालय पर हमला बोल दिया। गुरु गोलवलकर के आवास का भी घेराव किया और डॉ हेडगेवार की समाधि पर भी आक्रोश उतारा। उस समाधि पर उन्होंने जमकर तोड़फोड़ की। संघ ने भी उसको सही करवाने की जल्दी नहीं की। वर्ष 1962 में स्मृति मंदिर का निर्माण कार्य प्रारम्भ हुआ तो समिति के प्रभारी खुद गुरु गोलवलकर थे, उसकी डिजाइन बनाने के लिए भले ही उन्होंने विशेषज्ञों का सहारा लिया, मुंबई के जाने माने आर्किटेक्ट गोविंद वासुदेव दीक्षित को प्रस्तावित स्मृति मंदिर की डिजाइन तैयार करने के लिए कहा और खुद भी कुछ रेखाचित्र बनाए।

स्मृति मंदिर के सारे निर्माण कार्य के देखरेख की जिम्मेदारी पांडुरंग क्षीरसागर पर ही थी। काम भले ही पूरी तैयारी के साथ मई 1959 में शुरू हुआ था, लेकिन नींव भरने का काम अगस्त तक पूरा कर दिया गया। जनवरी 1960 तक पहली मंजिल का काम लगभग पूरा हो चुका था। पत्थरों का काम राजस्थान के हाकिम भाई की अगुवाई में बड़ी तेजी से चल रहा था, उनके अपने 22 मुस्लिम मजदूर भी प्रोजेक्ट पर दिन रात काम कर रहे थे कि पास के शहर जबलपुर में दंगा भड़क उठा, जो वहां से बस 272 किमी ही दूर था। ऐसे में नागपुर के मुसलमानों ने कारीगरों से कहा कि संघ वाले तुम्हें नहीं छोड़ेंगे, मुस्लिम मजदूरों, कारीगरों ने काम बंद कर दिया। ऐसे में मुस्लिम मजदूरों के तो हाथ पांव फूल गए कि वो तो खुद हिंदुओं के सबसे बड़े संगठन के मुख्यालय में काम कर रहे हैं, कल को कुछ हो गया तो कौन बचाएगा? कुछ तो समझाने के बावजूद भाग गए। उनकी ये बेचैनी देखकर पांडुरंग पंत क्षीरसागर ने उन्हें काफी समझाया बुझाया, उनकी सुऱक्षा का आश्वासन भी दिया और ज्यादा आश्वासन के लिए गुरु गोलवलकर से भी मिलवाया। गुरु गोलवलकर ने इस तरह समझाया कि वो रुक गए।

यूं तो पांडुरंग क्षीरसागर को समय ही नहीं मिलता था कि नागपुर छोड़कर वो किसी और शहर में जा पाएं लेकिन आपातकाल में जब उनकी गिरफ्तारी हुई तो उनको ठाणे जेल में रखा गया। इस तरह वो ना चाहते हुए भी अपने शहर और संघ कार्यालय से बाहर आ चुके थे। वहां अन्य दलों के लोग भी थे। उन सबसे पांडुरंग जी ने बहुत आत्मीय संबंध बना लिये। ठाणे का मौसम उनके लिए अनुकूल नहीं था, अतः उनका ‘फ्लुरसी’ का रोग फिर उभर आया। उन्होंने शासन को अपना स्थान बदलने का आवेदन दिया, जो अंग्रेजों ने मानने से साफ इनकार कर दिया और अंततः 23 मार्च, 1976 को उसी जेल में उनका देहांत हो गया। ये वही दिन था, जिस दिन भगत सिंह को भी फांसी दी गई थी।

पांडुरंग जी का अंतिम संस्कार नागपुर में ही किया गया। आपातकाल के बावजूद हजारों लोग उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हुए। इस प्रकार शासन की निर्ममता ने एक वरिष्ठ कार्यकर्ता के प्राण ले लिये। सब वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को उन पर दृढ़ विश्वास था। इसीलिए सरसंघचालक गुरु गोलवलकर ने अपने वे अंतिम तीन पत्र उनके पास रखे थे, जिनमें नए सरसंघचालक का भी नाम था, जो उनके देहांत के बाद ही खोले गये। उनकी स्मृति में रेशीम बाग में बने एक भवन का नाम ‘पांडुरंग भवन’ रखा गया है। सालों तक वो कार्यकर्ता उन्हें याद करते रहे, जो कभी इलाज को तो कभी संघ कार्य से नागपुर मुख्यालय जाते थे और पांडुरंग क्षीरसागर ए अभिभावक की तरह उनकी हर जरूरत का वहां ध्यान रखते थे।

मॉरीशस के राष्ट्रपति ने जिनके लिए अपने बेटे के विवाह में देरी कर दी ~

आजादी का अमृत महोत्सव चल रहा था, इसी दौरान अगस्त 2021 में उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने सरदार वल्लभ भाई पटेल कांफ्रेंस हॉल, 6, मौलाना आजाद रोड, नई दिल्ली में एक सार्वजनिक समारोह में देश के एक गुमनाम नायक पर स्मृति डाक टिकट जारी किया, जिस पर नाम लिखा था 'माननीय चमन लाल'। इस दौरान केन्द्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने चमन लाल से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा बताया कि मॉरीशस के राष्ट्रपति अनिरुद्ध जगन्नाथ ने अपने पुत्र के विवाह में उन्हें राजकीय अतिथि के रूप में पोर्ट लुई बुलवाया था और शादी में तब तक देरी की, जब तक चमन लाल वहां पहुंच नहीं गए। इतना सम्मान विदेश में पाने वाले आम भारतीय विरले ही होंगे।

इस मौके पर जारी प्रेस रिलीज में पीआईबी ने चमन लाल के बारे में लिखा कि, “सियालकोट (अब पाकिस्तान में) में 25 मार्च, 1920 को जन्मे माननीय चमन लाल कम उम्र से ही लोगों के कल्याण के लिए काम करने के लिए उत्साहित थे। यद्यपि वह स्वर्ण पदक विजेता थे और उन्हें कई नौकरियों के प्रस्‍ताव भी मिले थे, लेकिन उन्होंने भारत विभाजन के पीड़ित लोगों की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने के काम को चुना। अपनी लगन, जुनून और कड़ी मेहनत के बल पर उन्होंने विदेशों में बसे भारतीयों की मदद के लिए एक संस्थागत व्यवस्था की और भारत की विदेश नीति के विभिन्न रणनीतिक लक्ष्यों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई”।

आपके मन में सवाल उठ रहे होंगे कि आखिर कौन थे ये चमन लाल और उनका संघ से क्या रिश्ता था? दुनिया भर में फैले स्वयंसेवकों को एक सूत्र में जोड़ने वाले चमनलाल जी का जन्म 25 मार्च, 1920 को ग्राम सल्ली (स्यालकोट, वर्तमान पाकिस्तान) में जमीनों का लेनदेन करने वाले धनी व्यापारी बुलाकीराम गोरोवाड़ा जी के घर में हुआ था। वे मेधावी छात्र और कबड्डी तथा खो-खो के उत्कृष्ट खिलाड़ी थे। गणित में उनकी प्रतिभा का लोहा पूरा शहर मानता था। वर्ष 1942 में उन्होंने लाहौर से स्वर्ण पदक के साथ वनस्पति शास्त्र में एमएससी की डिग्री हासिल की।

चाहते तो चमन लाल विदेश पढ़ने चले जाते, या किसी भी बिजनेस में किस्मत आजमाकर देश की प्रमुख हस्तियों में शामिल हो जाते लेकिन उनका मन तो देश सेवा का था। सो पहले संघ शाखा से जुड़े, ये 1936 की बात है। बीच में मन भटका तो गांधीजी के भी शिष्य बनने चले गए। 1940-41 में वे गांधी जी के वर्धा स्थित सेवाग्राम आश्रम में भी रहे, पर वहां उनका मन नहीं लगा। विभाजन के उस नाजुक वातावरण में 1942 में लाहौर से चमनलाल जी सहित 52 युवक प्रचारक बने। उन्हें सर्वप्रथम मंडी (वर्तमान हिमाचल) में भेजा गया। वहां सैकड़ों किमी की यात्रा पैदल की, और दुर्गम क्षेत्रों तक संपर्क कर संघ को पहुंचाया। काफी स्थानों पर शाखाएं शुरू कीं। वर्ष 1946 में उन्हें लाहौर बुला लिया गया। विभाजन के भय से हिन्दू गांव छोड़कर शहरों में आ रहे थे। चमनलाल जी ने वहां सब व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से संभाला। अपनी डायरी में वे हर दिन की घटना लिखते रहते थे। उनकी यही डायरियां अब संघ इतिहास लिखने वालों के लिए प्रमुख सूचना और संदर्भ श्रोत बन गई हैं।

तब उनको क्या पता था कि जिन गांधीजी के आश्रम में वो रहने आए हैं, एक दिन उन्हीं की हत्या के आरोप में 4 महीने जेल में रहना पड़ेगा। हालांकि उन पर सीधा हत्या का आरोप नहीं था, लेकिन चूंकि संघ पर प्रतिबंध लगा था, सो उनको भी 4 महीने के लिए अम्बाला जेल भेज दिया गया था। 1947 के बाद वे लाहौर से जालंधर और 1950 में दिल्ली आ गये। उस समय कार्यालय के नाम पर वहां एक खपरैल का कमरा ही था। चमनलाल जी झाड़ू लगाने से लेकर आगंतुकों के लिए चाय आदि स्वयं ही बनाते थे। धीरे-धीरे कार्यालय का स्वरूप वो सुधारते चले गए और एक दिन संघ के दिल्ली कार्यालय यानी झंडेवाला कार्यालय को उनके नाम से जाना जाने लगा। आज अगर वो जीवित होते तो उस कार्यालय के नए, भव्य और विशाल रूप को देखकर हैरान ही रह जाते। विदेश में बस गये स्वयंसेवक प्रायः दिल्ली आते थे। उनके नाम, पते, फोन नंबर आदि चमनलाल के पास सुरक्षित रहते थे। इस प्रकार वे दुनिया में स्वयंसेवकों के बीच संपर्क सेतु बन गये। उन्होंने कई देशों का प्रवास कर इस सूत्र को सबल बनाया।

विदेश जाते समय सब उनसे वहां के पते लेकर जाते थे। वे उनके पहुंचने से पहले ही पत्र एवं फोन द्वारा सब व्यवस्था करा देते थे। विश्व भर से कब, कहां से, किसका फोन आ जाए, कहना कठिन था। इसलिए वे बेतार फोन को सदा पास में रखते थे। लोग हंसी में उसे उनका बेटा कहते थे। झंडेवाला कार्यालय में गुरु गोलवलकर से मिलने कई प्रमुख लोग आते थे। चमनलाल जी उस बातचीत के बिन्दु उसी तरह लिख लेते थे, जैसे आज मीटिंग के मिनट्स लिख लिए जाते हैं। कम ही लोगों को पता है कि कश्मीर आंदोलन के समय गुरु गोलवलकर ने चमनलाल के हाथ एक पत्र भेजकर डॉ। मुखर्जी को सावधान किया था।

संघ के इतिहास में उनका कुछ योगदान तो वाकई में बहुत अहम है। संघ के प्रमुख प्रकाशन, पत्र, पत्रिकाएं, बैठकों में पारित प्रस्ताव आदि वे सुरक्षित रखते थे। इसमें से ही संघ का अभिलेखागार और कई महत्वपूर्ण पुस्तकें बनीं। कपड़े स्वयं धोकर, बिना निचोड़े सुखाने और बिना प्रेस किये पहनने वाले चमनलाल जी का जीवन इतना सादा था कि 1975 में जब पुलिस संघ कार्यालय पर आई, तो वे उनके सामने ही बाहर निकल गये। पुलिस वाले उन्हें पहचान ही नहीं सके।

संघ कार्यालय दिल्ली में रहकर भी उन्होंने पूरी दुनियां में जो सम्पर्क बनाए थे, उनका एक फायदा आपात काल में भी मिला। अपनी छोटी टाइपिंग मशीन पर वो भारत में आपातकाल के दौरान हो रहे अत्याचारों की सूचनाएं, समाचार लिखकर दुनियां भर के अखबारों, एजेंसियों के दफ्तरों में भेज दिया करते थे। जाहिर है कई बार उनका असर भी होता था। फरवरी 2003 में बीमारी के चलते उन्होंने देह त्याग दी थी। लेकिन उनकी मेहनत आज भी संघ पर शोध करने वालों के बहुत काम आ रही है।

लेखक : विष्णु शर्मा
सोर्स : आज तक

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