Raksha shambhavi

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*1. नीलामी का वो आईना*मुंबई, कोलाबा। मॉनसून की पहली बारिश। मैं, काव्या मेहरा, 26 साल की आर्ट क्यूरेटर, एक पुरानी एंटीक श...
08/06/2026

*1. नीलामी का वो आईना*

मुंबई, कोलाबा। मॉनसून की पहली बारिश।

मैं, काव्या मेहरा, 26 साल की आर्ट क्यूरेटर, एक पुरानी एंटीक शॉप में खड़ी थी। "विंटेज वॉल्ट"। बाहर बोर्ड: "एस्टेट सेल - 200 साल पुरानी हवेलियों का सामान।"

मुझे अपने नए आर्ट कैफे के लिए कुछ यूनिक चाहिए था। तभी मेरी नजर उस पर पड़ी।

एक आईना।

7 फुट ऊंचा। चौखट शीशम की, उस पर हाथी, मोर, अप्सराएं तराशी हुईं। पर कांच... कांच काला था। जैसे धुआं जमा हो अंदर।

दुकानदार रुस्तम चाचा बोले, "बेटा, ये मत लो। मनहूस है।"

"क्यों चाचा?"

"200 साल पुराना है। लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह के महल का। कहते हैं, नवाब ने इसे फ्रांस से मंगवाया था। पर जिसने भी इसमें देखा, वो पागल हो गया।"

मैं हंसी। "चाचा, मैं आर्टिस्ट हूं। मुझे हॉन्टेड चीजें पसंद हैं। कितने का है?"

"50 हजार। पर मैं 5 हजार में दे दूंगा। बस ले जाओ।"

डील हो गई। शक हुआ, पर आर्ट के लिए रिस्क तो लेना पड़ता है।

मजदूरों ने आईना मेरे बांद्रा वाले फ्लैट में लगाया। लिविंग रूम की दीवार पर।

शाम 6 बजे। मैंने पहली बार उसमें देखा।

और मेरी दुनिया बदल गई।

*2. पहली झलक - मेरी असली सूरत*

काले कांच में पहले तो कुछ नहीं दिखा। फिर धुंध छटी।

मैं दिखी। पर... ये मैं नहीं थी।

मेरे चेहरे पर मासूमियत नहीं थी। आंखों में लालच था। होंठों पर झूठी मुस्कान। और मेरे सिर पर... सींग। छोटे-छोटे।

मैं चीखी और पीछे हटी।

सामने वाला नॉर्मल आईना चेक किया। उसमें मैं नॉर्मल थी। सुंदर, कॉन्फिडेंट काव्या।

फिर काले आईने में देखा।

अब वहां एक लड़की थी। गोद में स्केचबुक। आंखों में सपने। पर उसके हाथ... उसके हाथ खून से सने थे। और पैरों में बेड़ियां।

तभी आईने के कोने पर शब्द उभरे। सोने के अक्षरों में:

_"आत्मा-दर्पण: जो है, वो दिखाता है। जो दिखता है, वो है नहीं।"_

मैं कांप गई। ये क्या है?

तभी डोरबेल। मेरी रूममेट निशा।

"काव्या! ये क्या चिपका दिया दीवार पर? कितना क्रिपी है!"

निशा आईने के सामने आई।

और मैं जम गई।

*3. निशा - बेस्ट फ्रेंड या...?*

नॉर्मल आईने में निशा - 25 साल, क्यूट, बॉब कट, हमेशा हंसने वाली। मेरी बेस्ट फ्रेंड 5 साल से।

पर आत्मा-दर्पण में...

निशा का चेहरा सड़ रहा था। आंखों की जगह खाली गड्ढे। मुंह से कीड़े निकल रहे थे। और उसके हाथ में एक छुरा। छुरे पर लिखा था: "काव्या"।

मेरे मुंह से निकला, "निशा... तू..."

"क्या हुआ? मैं बुरी लग रही हूं?" निशा हंसी। "ये आईना गंदा है। साफ कर दे।"

उसने कपड़ा लिया और काला कांच पोंछा।

जैसे ही उसका हाथ कांच को छुआ, आईना दहाड़ा। सच में दहाड़ा। शेर जैसी आवाज।

निशा उछलकर पीछे गिरी। "ये क्या था!"

आईने में अब निशा के पीछे सैकड़ों चेहरे थे। सब लड़कियों के। रोते हुए। और सबकी गर्दन कटी हुई।

नीचे लिखा आया: _"विश्वासघात - 7, ईर्ष्या - 100%, हत्या की इच्छा - सक्रिय"_

मैं समझ गई। ये आईना आत्मा दिखाता है। असली रूप।

निशा... मेरी बेस्ट फ्रेंड... मुझे मारना चाहती है? क्यों?

निशा उठी। "पागल आईना है। फेंक दे इसे।"

वो किचन में चली गई।

मैं आईने के सामने खड़ी रही। मेरी वाली सूरत अब बदल गई थी। अब मेरे चेहरे पर डर था। और पीठ पर एक छुरा घोंपा हुआ था।

आईना फुसफुसाया। आवाज आईने से नहीं, मेरे दिमाग में:

_"सावधान। 7 दिन। सात सच। या सात मौत।"_

*4. दिन 1 - बॉयफ्रेंड आदर्श*

*दिन 1, सुबह 9 बजे।*

आदर्श आया। मेरा बॉयफ्रेंड। 6 महीने से रिलेशन में। हैंडसम, रिच, केयरिंग। शादी की बात चल रही थी।

"बेब, ये क्या नया डेकोर?" वो आईने के सामने खड़ा हुआ।

मैंने सांस रोक ली।

आत्मा-दर्पण में आदर्श...

उसका चेहरा नहीं था। मुखौटा था। प्लास्टिक का। मुखौटा हटाया तो नीचे... कुछ नहीं। खाली। सिर्फ अंधेरा।

और उसके शरीर से दर्जनों हाथ निकले हुए थे। हर हाथ में एक लड़की का पर्स। लिपस्टिक। अंगूठी।

नीचे लिखा: _"झूठ - 99%, प्रेम - 0%, शिकार - 24"_

24? 24 लड़कियां?

आदर्श हंसा। "क्रिपी है यार। पर तेरे कैफे के लिए परफेक्ट। आर्टिस्टिक।"

उसने मुझे हग किया। आईने में दिखा - उसके हाथ मेरी पीठ पर नहीं, मेरी जेब में थे। मेरा वॉलेट टटोल रहा था।

मैं पीछे हट गई। "आदर्श, तू... तू मुझसे प्यार करता है?"

"पागल है क्या? कल तेरे पापा से मिलने जा रहा हूं ना रिश्ता लेकर।"

आईने में शब्द बदले: _"अगला शिकार - काव्या मेहरा। समय - 6 दिन"_

मैंने बहाना बनाया। "सिर दर्द है। तू जा।"

वो गया। जाते-जाते आईने को देखकर आंख मारी।

आईने ने जवाब दिया। उसमें आदर्श की परछाई रुकी रही। और मुझे देखकर उंगली से गला काटने का इशारा किया।

*5. रुस्तम चाचा का सच - 200 साल का श्राप*

मैं भागकर विंटेज वॉल्ट गई।

"चाचा! ये आईना क्या है!"

रुस्तम चाचा का चेहरा सफेद। "देख लिया ना? अब फेंक भी दो तो पीछा नहीं छोड़ेगा।"

"बताओ सच!"

चाचा ने शटर गिराया। एक डायरी निकाली।

"1823। लखनऊ। नवाब वाजिद अली शाह को एक फ्रांसीसी तांत्रिक ने तोहफा दिया। 'आत्मा-दर्पण'। बोला, 'इसमें जो देखेगा, उसकी रूह नंगी हो जाएगी। आप जान जाओगे कौन वफादार, कौन गद्दार।'"

"नवाब खुश हुआ। दरबार में लगाया। पहले दिन 12 वजीरों का सिर कलम कर दिया। क्योंकि आईने में वो गद्दार दिखे।"

"फिर?"

"फिर नवाब ने बेगम को देखा। बेगम की आत्मा में एक सांप था। डसने वाला। नवाब ने बेगम को जिंदा दीवार में चुनवा दिया।"

मैं कांप गई।

"पर श्राप ये था चाचा: आईना हर 100 साल में जागता है। 7 दिन के लिए। 7 लोगों की असली सूरत दिखाता है। अगर 7वें दिन तक तूने 7 सच स्वीकार नहीं किए, तो आईना तुझे खा जाता है। तेरी आत्मा भी इसमें कैद हो जाती है।"

"7 सच? कौन से सच?"

"कि तेरे आसपास सब झूठे हैं। कि तू अकेली है। कि दुनिया बुरी है। जब तू ये मान लेगी, आईना जीत जाएगा। तेरी आत्मा उसकी हो जाएगी। 1923 में ये मुंबई के एक पारसी सेठ के पास था। वो 7वें दिन पागल होकर कूद गया। 1823 में नवाब के बाद उसकी बेटी ने खुद को जला लिया।"

"और अगर मैं सच स्वीकार ना करूं?"

चाचा हंसे। कड़वी हंसी। "तो आईना तुझे तोड़ देगा। तेरे अपनों से। एक-एक करके। फिर भी तू अकेली हो जाएगी।"

मैंने डायरी ली। भागी।

*6. दिन 2 से 4 - परिवार, बॉस, अजनबी*

*दिन 2: मम्मी-पापा*
वीडियो कॉल किया। मम्मी-पापा स्क्रीन पर। मैंने फोन आईने के सामने किया।

आईने में मम्मी - चेहरे पर ममता, पर आंखों में हिसाब। "कितना खर्चा किया इस महीने?"
पापा - सिर झुका हुआ, कंधे पर बोझ। "बेटी के कैफे के लिए लोन लिया है। चुकाना है।"

नीचे लिखा: _"प्रेम - 60%, बोझ - 40%, छुपाया सच - लोन"_
मुझे पता नहीं था पापा ने लोन लिया है। वो कहते थे सेविंग से कर रहे हैं।

मेरा दिल टूटा। पहला सच।

*दिन 3: बॉस राहुल सर*
कैफे का इन्वेस्टर। आईने के सामने लाई।

आत्मा-दर्पण में राहुल सर - सूटेड-बूटेड, पर शरीर आधा गिद्ध का। पंजों में मेरी कैफे की फाइल। चोंच से मेरे कॉन्ट्रैक्ट पर साइन कर रहा था।

लिखा: _"लालच - 100%, प्लान - कैफे हड़पना, तरीका - काव्या को बदनाम करना"_
दूसरा सच।

*दिन 4: बिल्ली*
हां, बिल्ली। गली की बिल्ली जो मेरे घर आती थी। उसे आईने के सामने किया।

आईने में बिल्ली - नहीं। एक बूढ़ी औरत। सफेद साड़ी। आंखों में ममता। वो मेरी दादी थी। 10 साल पहले गुजर गईं।

लिखा: _"रक्षक - 100%, रूप - बिल्ली, मिशन - काव्या को बचाना"_
मैं रो पड़ी। तीसरा सच - कोई तो है जो निस्वार्थ है।

पर आईना चिल्लाया: _"3 सच कबूल। 4 बाकी। 3 दिन बाकी।"_
कांच पर दरार आई। पहली।

*7. दिन 5 - निशा का हमला*

रात 12:03।

मैं सो रही थी। गले पर ठंडा अहसास।

आंख खुली। निशा। ऊपर बैठी। हाथ में छुरा। वही, जो आईने में दिखा था।

"सॉरी काव्या," वो रो रही थी। "मुझे करना पड़ेगा।"

"क्यों निशा? 5 साल की दोस्ती..."

"क्योंकि तू जीत जाती है हमेशा। आर्ट कॉलेज में तुझे अवॉर्ड, मुझे कुछ नहीं। बॉयफ्रेंड तुझे हैंडसम मिला, मुझे चीटर। कैफे तेरा चला, मेरा स्टार्टअप डूब गया। आदर्श... आदर्श ने मुझसे कहा, अगर मैं तुझे मार दूं, तो वो मुझसे शादी करेगा।"

आईना लिविंग रूम से दहाड़ा।

मैं चिल्लाई। बिल्ली-दादी कूद पड़ी निशा पर। निशा गिरी। छुरा छूटा।

मैं भागी। लिविंग रूम।

आत्मा-दर्पण में अब निशा दिख रही थी। पर वो रो रही थी। उसके पीछे वाली कटी गर्दनें अब जुड़ रही थीं।

लिखा: _"ईर्ष्या - 100%, पर दोस्ती - 1% बाकी। मौका दो।"_

निशा उठकर आई। हाथ में छुरा नहीं। "काव्या... मैं... मैं क्या करने वाली थी..."

वो टूट गई। "मुझे माफ कर दे। आईना... आईने ने मुझे सच दिखाया। मैं राक्षस बन गई थी।"

मैंने उसे गले लगा लिया।

आईने में हमारी सूरत बदली। निशा के चेहरे का सड़ना कम हुआ। 50%। मेरे पीठ का छुरा गायब।

लिखा: _"चौथा सच - माफी। 3 बाकी। 2 दिन बाकी।"_
कांच की दूसरी दरार।

*8. दिन 6 - आदर्श का अंत और पांचवां सच*

आदर्श आया। "सुना निशा ने ड्रामा किया?"

मैंने उसे आईने के सामने खींचा। "देख इसे। ये तू है।"

आदर्श ने देखा। उसका मुखौटा गिरा। खाली चेहरा चीखा। "ये क्या बकवास है!"

"24 लड़कियां आदर्श। कहां हैं वो?"

आदर्श का चेहरा बदल गया। "तू ज्यादा स्मार्ट बन रही है।"

उसने मेरा गला पकड़ा। "कैफे मेरे नाम कर दे। वरना..."

तभी आईना फटा। कांच नहीं, आवाज।

आईने से 24 लड़कियों की आत्माएं निकलीं। सबने आदर्श को घेर लिया।

"तूने हमें मारा! धोखा दिया!"

आदर्श चिल्लाया। उसकी खाल निकलने लगी। नीचे से अंधेरा निकल रहा था। वो इंसान नहीं था।

वो भागा। बालकनी से कूद गया। 12वीं मंजिल।

नीचे नहीं गिरा। बीच में ही हवा में... गायब। जैसे कभी था ही नहीं।

पुलिस आई। बॉडी नहीं मिली। केस बंद।

आईने में लिखा: _"पांचवां सच - प्रेम अंधा होता है। 2 बाकी। 1 दिन बाकी।"_
तीसरी दरार। अब आईना टूटने वाला था।

*9. दिन 7 - अंतिम सच और आईने की भूख*

*दिन 7, रात 11:00।*

आईना बोल रहा था। लगातार। "6 दिन। 5 सच। एक और। एक और। फिर तू मेरी।"

मेरे सामने 3 लोग: निशा - सुधर रही, मम्मी-पापा - वीडियो पर रो रहे, बिल्ली-दादी - पैर के पास।

पर आईना बोला, "इन्हें देख। सब झूठे। निशा फिर मारेगी। मम्मी-पापा बोझ हैं। दादी मर चुकी है। तू अकेली है। मान ले। और शांति पा ले।"

मैं टूट रही थी।

तभी डोरबेल।

रुस्तम चाचा। हाथ में हथौड़ा। "तोड़ दे इसे बेटा! अभी! 12 बजने वाले हैं!"

मैंने हथौड़ा लिया।

आईने में देखा।

आखिरी बार।

वहां मैं थी। पर सींग वाले, खून वाले हाथ वाली मैं नहीं।

वहां काव्या थी। आंखों में आंसू। हाथ में हथौड़ा। पर पीछे... पीछे निशा थी, मुझे थामे हुए। मम्मी-पापा का आशीर्वाद था। दादी का पंजा मेरे पैर पर।

और मेरे सिर पर सींग नहीं, एक रोशनी थी। छोटी सी।

आईना चीखा: _"नहीं! ये सच नहीं! तू अकेली है! दुनिया बुरी है!"_

मैं चिल्लाई: *"नहीं! दुनिया बुरी है, पर सब बुरे नहीं! निशा बुरी थी, पर सुधर गई! आदर्श नकली था, पर मम्मी-पापा असली हैं! मैं अकेली नहीं हूं!"*

*"ये है छठा सच - उम्मीद। और सातवां सच - मैं आईने से बड़ी हूं!"*

मैंने हथौड़ा मारा।

12:00 बज रहे थे।

धड़ाम!

*10. सवेरा - टूटा आईना, जुड़ी जिंदगी*

कांच चूर-चूर।

पर कोई धमाका नहीं। कोई भूत नहीं निकला।

बस... शांति।

टूटे कांच के हर टुकड़े में एक चेहरा था। नवाब, बेगम, पारसी सेठ, उसकी बेटी, 24 लड़कियां, गायत्री... सब मुस्कुरा रहे थे। और धीरे-धीरे धुंध बनकर उड़ गए।

सुबह 6 बजे।

निशा मेरे पास बैठी थी। "थैंक यू काव्या। तूने मुझे दूसरा मौका दिया।"

मम्मी का कॉल: "बेटा, लोन की टेंशन मत ले। हम संभाल लेंगे। तू खुश रह।"

राहुल सर का मैसेज: "डील कैंसिल। तुम्हारा कैफे, तुम्हारे रूल।"

और बिल्ली-दादी? वो खिड़की पर बैठी थी। मुझे देखकर म्याऊं बोली। और कूद गई। बाहर। उसकी पूंछ आखिरी बार दिखी।

मैं टूटे आईने के पास गई। चौखट बची थी। लकड़ी की।

उस पर अब नया निशान था। उल्टा त्रिशूल नहीं। एक कमल।

और शब्द: _"जो खुद से जीत गया, उसे कोई आईना हरा नहीं सकता।"_

मैंने चौखट को कैफे में लगाया। उसमें नॉर्मल आईना फिट करवाया।

अब जो भी उसमें देखता है, उसे अपनी सबसे अच्छी स्माइल दिखती है।

क्योंकि असली आत्मा वही है जो हम बनना चाहते हैं, ना कि जो हम डरते हैं।

*समाप्त*

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*सीख:* आईना हमेशा सच नहीं दिखाता। कभी-कभी वो हमारे डर, हमारे शक, हमारी इनसिक्योरिटी दिखाता है। असली आत्मा देखने के लिए आईना नहीं, इंसान का दिल चाहिए। और 7 दिन नहीं, पूरी जिंदगी चाहिए खुद को समझने के लिए।

#आत्मादर्पण

रुका हुआ समयउसका नाम था नील। उम्र 23 साल। बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में संस्कृत का छात्र। किताबों का कीड़ा, पर दिमाग में ह...
08/06/2026

रुका हुआ समय

उसका नाम था नील। उम्र 23 साल। बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में संस्कृत का छात्र। किताबों का कीड़ा, पर दिमाग में हमेशा सवाल — अगर मंत्र से कुछ होता है तो दिखता क्यों नहीं।

हॉस्टल के पीछे अस्सी घाट के पास एक पुरानी दुकान थी, तांत्रिक किताबें बेचने वाली। नील वहां से एक फटी हुई पांडुलिपि उठा लाया, नाम था "काल स्तंभन प्रयोग"।

पहले पन्ने पर लाल स्याही से लिखा था — इसे केवल गुरु की आज्ञा से करना। समय को रोकना प्रकृति के विरुद्ध है।

नील हंसा। उसने सोचा, प्रोजेक्ट के लिए अच्छा टॉपिक है।

विधि आसान लिखी थी — अमावस्या की रात, पीपल के नीचे, काले तिल, सरसों तेल का दिया, और एक मंत्र 108 बार — "ओम क्लीं कालभैरवाय स्तंभय स्तंभय स्वाहा।"

अमावस्या थी। रात 11 बजे नील अस्सी घाट के सुनसान पीपल के नीचे बैठा। दिया जलाया, तिल छिड़के, आंखें बंद कीं।

पहले 21 बार कुछ नहीं। 51 बार पर हवा रुक गई। 87 बार पर दिया की लौ स्थिर हो गई, हिलना बंद। 108वीं बार जैसे ही बोला, एक घंटी जैसी आवाज आई, और सब थम गया।

नील ने आंखें खोलीं।

गंगा का पानी बहना बंद। लहर जमी हुई। सामने एक कुत्ता भौंकते हुए, मुंह खुला, आवाज नहीं। ऊपर एक चील उड़ते हुए, पंख हवा में रुके। घाट पर एक चायवाला केतली उल्टी कर रहा था, चाय की धार हवा में ठहरी हुई।

समय रुक गया था।

पहले तो नील हंसा। उसने चाय की धार को छुआ, उंगली गीली हुई। कुत्ते के पास गया, उसकी नाक गरम। सब जिंदा, बस रुके हुए।

उसने फोन निकाला, 12:03 दिखा रहा था, सेकंड कांटा नहीं हिल रहा।

वह घाट से हॉस्टल तक दौड़ा। सब रुके हुए। एक लड़का सीढ़ी पर गिरते हुए, किताबें हवा में। मेस में दाल की कड़छी हवा में।

नील को लगा वह भगवान बन गया।

उसने पहले मजे किए। लाइब्रेरी में जाकर वो किताबें पढ़ीं जो इश्यू नहीं होतीं। कैंटीन से समोसे उठा कर खाए। प्रोफेसर की मेज पर पैर रख कर फोटो खींची।

एक घंटा, दो घंटा। फिर डर लगा।

सन्नाटा बहुत भारी था। कोई आवाज नहीं, कोई पंछी नहीं, सिर्फ उसकी सांस। उसने वापस पीपल के पास जाकर मंत्र उल्टा पढ़ा, कुछ नहीं हुआ। पांडुलिपि में आगे के पन्ने फटे हुए थे।

वह रोने लगा।

तभी उसे याद आया, पांडुलिपि में नीचे छोटे अक्षरों में लिखा था — स्तंभन खोलने के लिए वही क्षण दोहराओ, पर निस्वार्थ भाव से।

नील समझा नहीं। वह फिर घाट पर बैठा। इस बार दिया बुझा हुआ था, तिल बिखरे थे। उसने आंखें बंद कीं और सोचा, मुझे क्या चाहिए।

पहले तो लगा, समय चल जाए। फिर लगा, अगर चल गया तो मैं फिर वही नील, फेल होने वाला छात्र।

तभी उसके सामने रुका हुआ चायवाला दिखा। उसकी आंखों में डर था, जैसे वह उस पल में फंसा हो। नील को याद आया, यह चायवाला रोज उसे उधार चाय देता था, कभी पैसे नहीं मांगे।

नील ने मंत्र पढ़ना शुरू किया, पर इस बार अपने लिए नहीं। उसने मन में कहा, इन सबको वापस जाने दो।

21 बार, 51 बार, 108 बार।

108वीं बार पर एक धमक हुई।

पहले चाय की धार गिरी, छन से। फिर कुत्ता भौंका। चील उड़ी। गंगा बही। फोन में 12:04 हुआ।

सब चल पड़ा।

नील वहीं गिर पड़ा। सुबह मल्लाहों ने उठाया।

उसके बाद नील बदल गया। उसने पांडुलिपि गंगा में बहा दी। उसने कभी किसी को नहीं बताया कि 61 मिनट तक दुनिया रुकी थी।

पर हर अमावस्या को रात 12:03 पर वह अस्सी घाट जाता है, एक दिया जलाता है, और चुपचाप बैठता है। क्योंकि उसे अब पता है, समय रोकना शक्ति नहीं, सजा है।

एक बार उसने डायरी में लिखा —

मैंने समय रोका, तो समझा समय चलता नहीं, हमें चलाता है। जब सब रुक गया, तो मैं अकेला था। और अकेलापन सबसे बड़ा तंत्र है।

और आज भी अगर तुम बनारस में अमावस्या की रात पीपल के नीचे दिया जलता देखो, तो समझ जाना, कोई नील वहां बैठा है, समय को नहीं, अपने घमंड को रोकने की साधना कर रहा है।

चूड़ियों की आवाजउत्तराखंड, अल्मोड़ा से 20 किलोमीटर ऊपर, एक छोटा गाँव स्याली। गाँव के बाहर देवदार के जंगल में एक पुराना आ...
08/06/2026

चूड़ियों की आवाज

उत्तराखंड, अल्मोड़ा से 20 किलोमीटर ऊपर, एक छोटा गाँव स्याली। गाँव के बाहर देवदार के जंगल में एक पुराना आश्रम, माँ आनंदमयी आश्रम। 1980 में बनी थी, अब खंडहर।

आश्रम में कभी साध्वी मीरा माँ रहती थीं। सफेद साड़ी, हाथों में लाल कांच की चूड़ियां, जो कभी नहीं उतारती थीं। लोग कहते थे, चूड़ियां उनकी तपस्या का वचन थीं। 1998 में सर्दियों की एक रात, साध्वी अपने कुटिया में ध्यान में बैठी मिलीं, मृत। ठंड से नहीं, हार्ट अटैक से। चूड़ियां वहीं हाथों में थीं।

उनके बाद आश्रम बंद हो गया।

2023 में गाँव के प्रधान ने आश्रम को होमस्टे बनाने का सोचा। मजदूर आए, सफाई हुई। पहली रात जो मजदूर रुका, सुबह भाग गया। बोला, रात 12 बजे चूड़ियों की छन छन सुनाई दी, कमरे में कोई नहीं।

दूसरा मजदूर, तीसरा, सबने वही कहा। ठीक 12:03 पर, कुटिया के अंदर से चूड़ियों की आवाज, जैसे कोई चल रहा हो। दरवाजा खोलो तो सन्नाटा।

प्रधान ने मुझे बुलाया। मैं, अजय, देहरादून से डॉक्यूमेंट्री बनाता हूँ। मैं टीम के साथ गया।

पहली रात हमने कैमरे लगाए। 11:55 तक सब शांत। 12:00 पर तापमान अचानक 4 डिग्री गिरा। 12:03 पर ऑडियो मीटर पर साफ छन छन। 12 बार। फिर रुक गई। कैमरे में कुछ नहीं।

हमने कुटिया खोली। अंदर साध्वी की पुरानी चौकी, एक माला, और दीवार पर एक फोटो। फोटो में मीरा माँ, हाथों में वही लाल चूड़ियां।

गाँव की बूढ़ी अम्मा कमला ने बताया, मीरा माँ को चूड़ियां उनकी माँ ने दी थीं। वचन था, जब तक गाँव की बेटियां सुरक्षित नहीं, चूड़ियां नहीं उतारूंगी। 1997 में गाँव में एक लड़की, गीता, 16 साल की, जंगल में लापता हुई थी। मीरा माँ ने बहुत खोजा, पुलिस आई, कुछ नहीं मिला। मीरा माँ ने उसी रात चूड़ियां खनकाते हुए प्रतिज्ञा की थी, जब तक गीता नहीं मिलेगी, मैं ध्यान नहीं छोड़ूंगी।

एक महीने बाद मीरा माँ की मौत हो गई। गीता का पता नहीं चला।

हमने रिकॉर्डिंग सुनी। चूड़ियों की आवाज के साथ हल्की सी फुसफुसाहट थी, "गीता... गीता..."

हमने पुरानी फाइलें निकालीं। 1997 की एफआईआर में लिखा था, गीता आखिरी बार आश्रम के पीछे वाले झरने की तरफ गई थी।

अगले दिन हम झरने पर गए। झाड़ियों में एक पुराना कुआं, ढका हुआ। मजदूरों ने खोला। अंदर हड्डियां, स्कूल का बस्ता, और एक जोड़ी टूटी लाल चूड़ियां।

डीएनए टेस्ट हुआ। हड्डियां गीता की थीं।

पता चला, गीता उस दिन झरने पर फिसल कर कुएं में गिर गई थी। किसी ने देखा नहीं। मीरा माँ को लगा था कोई उठा ले गया।

हमने गीता का अंतिम संस्कार गाँव में किया। मीरा माँ की समाधि के पास। उसी रात हमने आश्रम में दिया जलाया।

रात 12:03 पर फिर चूड़ियां बजीं। पर इस बार 12 बार नहीं, 3 बार। फिर एक आवाज आई, साफ, "धन्यवाद।"

कैमरे में उस पल फोटो के पास हल्की सी रोशनी दिखी, जैसे कोई हाथ उठा कर चूड़ियां उतार रहा हो।

सुबह हमने कुटिया में देखा। मीरा माँ की फोटो में उनके हाथ खाली थे। चूड़ियां गायब। हमने समाधि खोली नहीं, पर समाधि के पास मिट्टी पर दो लाल कांच की चूड़ियां रखी थीं, जुड़ी हुई।

उसके बाद से आज तक स्याली आश्रम में रात 12 बजे चूड़ियां नहीं बजतीं।

अब वहां होमस्टे चलता है। लोग आते हैं। कमला अम्मा हर मेहमान को कहानी सुनाती है, और कहती है, वो भूत नहीं थी, वो एक वचन था जो 25 साल तक बजता रहा।

और अगर तुम कभी अल्मोड़ा जाओ, स्याली आश्रम में रात रुकना। 12:03 पर कान लगाना। शायद अब छन छन नहीं, पर हवा में हल्की सी खुशबू आएगी, चंदन और कांच की।

क्योंकि कुछ साध्वियां मरती नहीं, वो सिर्फ अपनी चूड़ियां उतार कर जाती हैं।

नदी के दीपकबिहार, दरभंगा जिला। गाँव बिरौल के बगल से कमला नदी बहती है। बरसात में चौड़ी, गर्मी में पतली। घाट पर पुराना शिव...
08/06/2026

नदी के दीपक

बिहार, दरभंगा जिला। गाँव बिरौल के बगल से कमला नदी बहती है। बरसात में चौड़ी, गर्मी में पतली। घाट पर पुराना शिव मंदिर, और घाट के नीचे तीन सीढ़ियां हमेशा पानी में डूबी रहती हैं।

पिछले साल कार्तिक महीने से अजीब शुरू हुआ।

हर रात ठीक 11:45 पर नदी में दीपक तैरने लगते। मिट्टी के छोटे दिये, सरसों के तेल से भरे, बाती जलती हुई। न कोई छोड़ने आता, न कोई ले जाने। 12 से 15 दीपक, रोज। धारा के खिलाफ, धीरे धीरे बीच नदी तक जाते, फिर एक जगह गोल घूम कर बुझ जाते।

पहले दिन मल्लाहों ने सोचा किसी ने छठ का दिया बहाया होगा। दूसरे दिन फिर। तीसरे दिन पूरा गाँव घाट पर।

कोई नहीं आता, पर दीपक आते।

प्रधान ने कैमरा लगवाया। रात 11:44 तक नदी खाली। 11:45 पर पानी के अंदर से बुलबुले उठते, और बुलबुलों के साथ दीपक ऊपर आते, जैसे कोई नीचे से थाली में रख कर छोड़ रहा हो। हवा तेज हो तो भी बाती नहीं बुझती।

गाँव में डर फैला। बुजुर्ग बोले, नदी मांग रही है।

असली कहानी 30 साल पुरानी थी।

1994 में इसी घाट पर कार्तिक पूर्णिमा को मेला लगता था। उस साल नाव पलट गई थी। 14 औरतें दीपदान कर रही थीं, सब डूब गईं। लाशें तीन दिन बाद मिलीं। तब से घाट बंद कर दिया गया था।

पंडित जी ने कहा, वो आत्माएं हर साल दीपदान करने आती हैं, अधूरा रह गया था।

एक लड़का था, अर्जुन। शहर में पढ़ता था, छुट्टी में गाँव आया। उसने कहा, कैमरा, ड्रोन, साइंस। उसने रात को ड्रोन उड़ाया। वीडियो में साफ दिखा — दीपक पानी के नीचे से नहीं, किनारे की झाड़ियों से आ रहे हैं। पर कोई इंसान नहीं।

अर्जुन ने रात को झाड़ियों में छिप कर देखा।

11:43 पर नदी का पानी हल्का गर्म हुआ। 11:44 पर पानी के अंदर से एक बूढ़ी औरत का हाथ निकला, पूरा सफेद, चूड़ियां पहनीं। हाथ में थाली, थाली में जले हुए दीपक। उसने थाली पानी पर रखी, दीपक तैर गए। फिर हाथ डूब गया।

अर्जुन कांप गया। सुबह प्रधान को बताया। किसी ने माना नहीं।

अगली रात अर्जुन अकेला घाट पर उतरा। 11:45 पर दीपक आए। उसने हिम्मत कर के पानी में पैर डाला और बोला, "कौन हो?"

पानी से आवाज आई, जैसे कई औरतें एक साथ, "हम वो हैं जिन्हें दीपदान नहीं करने दिया।"

अर्जुन ने पूछा, "क्या चाहिए?" आवाज, "पूरा करो।"

अगले दिन गाँव वालों ने पंडित को बुलाया। पंडित ने पोथी देखी। 1994 में जिन 14 औरतों की मौत हुई थी, उनके नाम निकाले। उनके परिवार अब गाँव में नहीं थे, कोई शहर, कोई मर गया।

कार्तिक पूर्णिमा आई। पूरे गाँव ने घाट साफ किया। 14 बड़े आटे के दीपक बनाए, हर दीपक पर एक नाम लिखा — सुमित्रा, फूलो, गीता, राधा...। पंडित ने मंत्र पढ़े। ठीक 11:45 पर सबने दीपक पानी में छोड़े।

उस रात नदी में 28 दीपक तैरे — 14 गाँव वालों के, 14 अपने आप वाले। दोनों धाराएं बीच नदी में मिलीं, एक साथ गोल घूमीं, और एक तेज रोशनी हुई। फिर सब बुझ गए।

पानी से फिर वही हाथ निकला, पर इस बार खाली। हाथ जुड़े, नमस्कार किया, और डूब गया।

उसके बाद से अपने आप दीपक आने बंद हो गए।

अब हर कार्तिक पूर्णिमा को गाँव वाले 14 दीपक जरूर छोड़ते हैं। अर्जुन हर साल शहर से आता है। वह कहता है, नदी में भूत नहीं तैरते थे, अधूरी प्रार्थनाएं तैरती थीं।

और आज भी अगर तुम बिरौल घाट पर 11:45 पर जाओ, पानी हल्का गर्म महसूस होगा, जैसे कोई नीचे से थाली उठा रहा हो।

मंदिर के पीछे खून से लिखा संदेशउन्नाव जिले का छोटा सा गाँव, बिरहा। गाँव के बाहर पीपल के नीचे सौ साल पुराना काली माता का ...
08/06/2026

मंदिर के पीछे खून से लिखा संदेश

उन्नाव जिले का छोटा सा गाँव, बिरहा। गाँव के बाहर पीपल के नीचे सौ साल पुराना काली माता का मंदिर। पुजारी रामदीन, उम्र 68 साल, पिछले 40 साल से वहीं।

सावन का महीना। रोज शाम आरती, भीड़, घंटे की आवाज।

उस रात बारिश तेज थी। आरती के बाद रामदीन ने मंदिर बंद किया, ताला लगाया, घर चला गया।

सुबह 4 बजे जब वह झाड़ू लगाने आया, तो मंदिर के पीछे की दीवार पर कुछ लाल धब्बे दिखे। पास गया तो रोंगटे खड़े हो गए।

दीवार पर खून से लिखा था — "वो लौट आया है।"

लिखावट ताज़ा, खून अभी गीला। न कोई पैर के निशान, न कोई हाथ का। दीवार 12 फुट ऊंची, पीछे सिर्फ खेत।

रामदीन दौड़ कर प्रधान को बुलाया। प्रधान, दो सिपाही, पूरा गाँव इकट्ठा। पुलिस ने कहा, शायद किसी ने मज़ाक किया। पानी से धुलवाया।

अगली सुबह फिर वही। उसी जगह, उसी खून से, नया संदेश — "मुझे मत भूलो।"

अब गाँव डर गया।

रामदीन ने बताया, 25 साल पहले इसी मंदिर में एक घटना हुई थी। गाँव का एक लड़का, विजय, 19 साल का। बहुत भक्त था। हर मंगलवार काली माँ को खून से तिलक करता था, अपना अंगूठा चीर कर। लोग मना करते, वह कहता, माँ खून मांगती है।

एक सावन की रात विजय मंदिर में अकेला रुका। सुबह उसकी लाश मिली, मंदिर के पीछे उसी दीवार के पास। गला कटा हुआ, पर चाकू नहीं मिला। खून से दीवार पर लिखा था, "मैं आऊंगा।" पुलिस ने आत्महत्या लिख दी। परिवार गाँव छोड़ गया।

रामदीन बोला, वही लिखावट है।

तीसरी रात गाँव वालों ने पहरा लगाया। चार लोग, टॉर्च, लाठी। मंदिर के पीछे कैमरा भी लगाया।

सुबह 3:17 पर कैमरा बंद हो गया। 3:20 पर फिर चालू। उन तीन मिनट में दीवार पर नया संदेश — "दरवाजा खोलो।"

पहरेदारों ने कसम खाई, कोई आया नहीं, कोई गया नहीं। हवा भी नहीं चली।

अब बात शहर तक गई। एक यूट्यूबर, अमन, जो भूतिया जगहों की वीडियो बनाता था, टीम लेकर आया। रात को लाइव स्ट्रीम।

रात 2 बजे तक सब नॉर्मल। 2:55 पर मंदिर की घंटी अपने आप बजी। एक बार, दो बार, तीन बार। 3:00 बजे पीछे की दीवार से चटकने की आवाज आई। कैमरे में दिखा, दीवार पर खून अपने आप उभर रहा है, जैसे अंदर से रिस रहा हो। धीरे धीरे शब्द बने — "विजय को न्याय दो।"

लाइव में 80 हजार लोग देख रहे थे। अमन बेहोश हो गया।

पुलिस ने दीवार तोड़ने का फैसला किया।

अगले दिन दोपहर में दीवार गिराई गई। ईंटों के पीछे एक छोटा सा खोह निकला, इतना कि एक आदमी बैठ सके। अंदर हड्डियां, एक जंग लगा चाकू, और एक कपड़े में लिपटी डायरी।

डायरी विजय की थी।

पढ़ने पर सच निकला। विजय ने आत्महत्या नहीं की थी। उस रात मंदिर में प्रधान का बेटा रमेश और उसके दो दोस्त आए थे। उन्होंने विजय का मजाक उड़ाया, उसे नशे में मारपीट की। झगड़े में विजय का गला चाकू से कट गया। डर कर उन्होंने लाश वहीं दीवार के पास दफनाई, ऊपर से कच्ची दीवार उठा दी, और खून से "मैं आऊंगा" लिख कर आत्महत्या का नाटक किया।

डायरी में आखिरी पन्ने पर लिखा था, "अगर मैं मर गया, तो माँ काली, तू गवाही देना।"

25 साल तक विजय की आत्मा नहीं, उसका सच दीवार में बंद था। सावन की नमी से ईंटें कमजोर हुईं, खून की निशानी बाहर आई।

पुलिस ने 62 साल के रमेश को उठाया। पहले मुकरा, फिर डायरी देख कर टूट गया। उसने कबूल किया। उसके दोनों दोस्त मर चुके थे।

कोर्ट में केस चला। रमेश को उम्रकैद हुई।

जिस दिन फैसला आया, उसी रात मंदिर के पीछे दीवार पर आखिरी बार खून से लिखा दिखा, पर इस बार धुला नहीं, सूखा हुआ, जैसे सालों पुराना — "धन्यवाद।"

सुबह पुजारी ने देखा तो आंखों में पानी था। उसने उस जगह पर दिया जलाया।

गाँव वालों ने नई दीवार नहीं उठाई। उस खोह को वैसा ही रखा, सामने कांच लगा दिया। अंदर विजय की डायरी, उसका अंगूठी, और एक दिया हमेशा जलता है।

अब हर सावन में मंदिर के पीछे लोग जाते हैं, दिया जलाते हैं, और कहते हैं, सच को दफन कर सकते हो, मिटा नहीं सकते।

रामदीन अब भी 4 बजे झाड़ू लगाता है। वह कहता है, खून से लिखा संदेश डराने नहीं आया था, वह 25 साल से इंसाफ मांग रहा था।

और जब भी कोई पूछता है, खून कहाँ से आया, तो वह हंस कर कहता है, जब सच बोलने वाला मर जाता है, तो दीवारें बोलती हैं।

सपने वाला मंत्र — कानपुर, किदवई नगर। गली नंबर 4 में मनोज की मोबाइल रिपेयर की दुकान। 10x10 का खोखा, ऊपर टीन, अंदर एक मेज,...
08/06/2026

सपने वाला मंत्र —

कानपुर, किदवई नगर। गली नंबर 4 में मनोज की मोबाइल रिपेयर की दुकान। 10x10 का खोखा, ऊपर टीन, अंदर एक मेज, एक हीटर, और दीवार पर अम्मा की फोटो। उम्र 34 साल। शादी को 7 साल, एक बेटी 4 साल की। महीने की कमाई 10-12 हजार, खर्चा 20 हजार।

रोज रात 11 बजे शटर गिरा कर घर आता, दाल चावल खाता, और 1 बजे तक नींद नहीं आती।

फिर एक रात से सपना शुरू हुआ।

सपना हमेशा एक जैसा। वह काशी के किसी घाट पर खड़ा है। धुंध है। सामने एक साधु बैठा है, आंखें बंद। साधु होंठ हिलाता है और एक आवाज आती है, जैसे पानी के अंदर से।

पहली रात मनोज को सिर्फ "ओम... ह्रीं..." याद रहा।

दूसरी रात पूरा साफ हुआ — ओम ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे नमः।

तीसरी रात, चौथी रात, हर रात वही। 15 दिन तक लगातार।

मनोज ने अम्मा को बताया। अम्मा ने तुरंत माथा छुआ, "ये तो नवार्ण मंत्र है बेटा, माँ दुर्गा का। तुझे सपने में कौन दे रहा है?" मनोज हंसा, "सपने में किस्मत थोड़ी मिलती है अम्मा।"

पर उसी हफ्ते किस्मत हिली।

दुकान पर एक साहब आए, पुराना लैपटॉप ठीक कराने। काम देख कर बोले, "तुम हाथ से ईमानदारी से काम करते हो, मेरे ऑफिस में आ जाओ।" 12 हजार की दुकान छोड़ कर मनोज 18 हजार की नौकरी पर लग गया।

उस रात सपने में साधु पहली बार मुस्कुराया। मंत्र के बाद बोला, "सुनना शुरू किया है, अब बोलना सीख।"

सुबह मनोज ने पहली बार जागते हुए मंत्र बोला। नहा कर, अगरबत्ती जला कर, 11 बार। मन हल्का लगा।

ऑफिस में पहले महीने में ही उसने एक डेड सर्वर जिंदा कर दिया। बॉस ने 2000 इनाम दिया। घर में पहली बार राधा ने कहा, "तुम्हारे चेहरे पर थकान कम है।"

सपना चलता रहा। अब हर रात मंत्र के बाद एक शब्द आता।

"धैर्य।"
"सत्य।"
"दया।"
"त्याग।"

मनोज ने जप बढ़ा दिया, 21 बार, फिर 51 बार।

तीन महीने बाद अम्मा को हार्ट अटैक आया। डॉक्टर ने कहा दो लाख लगेंगे। मनोज के पास 30 हजार। वह रात अस्पताल की बेंच पर रोया। नींद आई तो सपना आया। साधु ने मंत्र नहीं कहा, सिर्फ कहा, "मांग मत, दे।"

सुबह मनोज ने बाइक बेची, दुकान का सामान बेचा, ऑफिस से एडवांस लिया, दोस्तों से मांगा नहीं, सच बताया। मोहल्ले के लोगों ने खुद पैसे दिए। दो दिन में पैसा हो गया। अम्मा बच गई।

डिस्चार्ज पर अम्मा बोली, "तू बदल गया है। पहले तू लेता था, अब देता है।"

उस रात साधु ने कहा, "किस्मत बदलना मतलब नोट नहीं, रास्ता साफ होना है।"

अगले एक साल में सब बदला।

मनोज ने झूठ बोलना बंद किया। पहले वह ग्राहक को महंगा पार्ट बताता था, अब सच बताता। लोग उसी के पास आने लगे। बॉस ने उसे टीम लीडर बना दिया, 25 हजार तनख्वाह।

एक स्कूल की प्रिंसिपल का काम किया, रात रुक कर फ्री में डेटा बैकअप किया। उन्होंने पूरे स्कूल का AMC दे दिया, 40 हजार महीना।

मनोज ने "मंत्र टेक" नाम से अपना सेंटर खोला। उद्घाटन पर हवन नहीं, 11 गरीब बच्चों को स्कूल बैग बांटे।

अब वह रोज सुबह 5 बजे उठता, 108 बार मंत्र करता। सपने में अब घाट साफ दिखता, गंगा दिखती, साधु जवान दिखता।

एक रात मनोज ने पूछा, "बाबा आप कौन हो?" साधु हंसा, "मैं तू है, दस साल बाद वाला। मैं रोज तुझे याद दिलाने आता हूँ कि तू भूल मत।"

मनोज की आंख खुली तो रो रहा था।

आज दो साल बाद मनोज 36 साल का है। सिविल लाइंस में ऑफिस, तीन लड़के काम करते हैं। अम्मा रोज उसके साथ जप करती है। राधा ने बुटीक खोल लिया। बेटी कॉन्वेंट में पढ़ती है।

पैसा है, पर असली बदल यह है — अब उसे सपने की जरूरत नहीं।

जब ग्राहक चिल्लाता है, अंदर मंत्र चलता है, वह शांत रहता है। जब कोई पैसा मार जाता है, मंत्र चलता है, वह छोड़ देता है। जब कोई मदद मांगता है, मंत्र चलता है, वह दे देता है।

पिछले हफ्ते एक 22 साल का लड़का आया, आंखों में वही थकान। बोला, "भैया, रोज रात एक ही आवाज आती है, ओम ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे नमः, नींद उड़ जाती है।"

मनोज ने उसे कुर्सी दी, पानी दिया, और कहा, "मुझे भी आती थी। ये डराने नहीं, जगाने आती है।"

उसने लड़के को नौकरी पर रख लिया। पहले दिन एक रुद्राक्ष की माला दी और कहा, "सुनना शुरू किया है, अब बोलना सीख। रोज 11 बार बोल, फिर देख।"

रात को मनोज ने आखिरी बार वह सपना देखा। घाट पर साधु नहीं था। सिर्फ एक दिया जल रहा था। हवा में आवाज आई, "अब तू ही साधु है।"

सुबह उठ कर मनोज ने डायरी में लिखा —

मंत्र ने मेरी किस्मत नहीं बदली। मंत्र ने मुझे बदला। रोज सुनने से धीरज आया। रोज बोलने से सच आया। रोज दोहराने से मन टिका। जब मैं बदला, तो रास्ते अपने आप खुले। किस्मत कोई लॉटरी नहीं, किस्मत रोज का जप है।

और तब से मनोज हर नए आदमी को वही मंत्र सुनाता है।

कहानी खत्म।

01/06/2026

करी पता ₹10000 में निकले तो खरीद दो

एक लड़की को हर रात किसी अदृश्य शक्ति का स्पर्श महसूस होता था1. पुरानी हवेली  कोलकाता से दो घंटे दूर, हुगली नदी के किनारे...
01/06/2026

एक लड़की को हर रात किसी अदृश्य शक्ति का स्पर्श महसूस होता था

1. पुरानी हवेली

कोलकाता से दो घंटे दूर, हुगली नदी के किनारे बसा था गाँव, चंदनपुर। वहाँ थी एक सौ पचास साल पुरानी हवेली, "राय बाड़ी"। अंग्रेजों के जमाने में राय बहादुर की कोठी थी। अब खंडहर।

इसी हवेली में शिफ्ट हुई थी तारा। उम्र बीस साल। कोलकाता यूनिवर्सिटी में लिटरेचर की स्टूडेंट। पिता का ट्रांसफर हुआ तो पूरा परिवार यहाँ आ गया। माँ, पापा, छोटा भाई। हवेली सस्ती मिली थी।

पहले दिन से ही अजीब था। घर में ठंड। गर्मी में भी। और ऊपर वाले कमरे में, जहाँ तारा का बेडरूम था, रात को अजीब सी खुशबू आती। चंदन की।

तीसरी रात। 12 बजकर 3 मिनट। तारा गहरी नींद में थी। तभी उसे लगा कोई उसके माथे पर हाथ फेर रहा है। बहुत नरम स्पर्श। माँ जैसा।

वह हड़बड़ाकर उठी। कमरे में कोई नहीं। दरवाजा बंद। खिड़की बंद। पंखा चल रहा था।

"वहम है," उसने सोचा। फिर सो गई।

2. हर रात का स्पर्श

पर वह वहम नहीं था। अगली रात फिर। ठीक 12:03 पर। इस बार स्पर्श गाल पर। कोई उंगली से बाल हटा रहा था, जैसे माँ सुलाती है।

तारा चीखी। माँ-पापा दौड़े आए। "क्या हुआ?"

"कोई है कमरे में। मुझे छू रहा है।"

पापा ने पूरा कमरा देखा। अलमारी, बाथरूम, पलंग के नीचे। कोई नहीं। "सपना देखा होगा बेटा। नई जगह है न।"

पर तारा को पता था, सपना नहीं था। स्पर्श असली था। गर्म, जिंदा।

अब हर रात होने लगा। 12:03 पर। कभी माथे पर, कभी हाथ पर, कभी पैर के पास जैसे कोई चादर ठीक कर रहा हो। डर नहीं लगता था। अजीब सी शांति मिलती। जैसे कोई अपना है।

तारा ने डायरी लिखनी शुरू की।

दिन 7: आज उसने मेरी किताब बंद की। मैं पढ़ते पढ़ते सो गई थी। सुबह किताब टेबल पर थी, बुकमार्क लगा।
दिन 10: आज बारिश थी। खिड़की खुली रह गई। रात को लगा किसी ने खिड़की बंद की। सुबह सच में बंद थी।
दिन 15: बुखार था। रात को लगा कोई माथे पर गीली पट्टी रख रहा है। सुबह तकिया गीला था। बुखार गायब।

3. डॉक्टर या ओझा?

माँ परेशान हो गईं। डॉक्टर को दिखाया। डॉक्टर बोला, "स्लीप पैरालिसिस है। नींद में मतिभ्रम। दवाई दे दूँगा।"

दवाई से नींद गहरी हो गई। पर स्पर्श नहीं रुका। अब तो दिन में भी होने लगा। अकेली होती तो लगता कोई पीछे खड़ा है। दुपट्टा ठीक कर देता है।

भाई बोला, "दीदी, भूत है। ओझा बुलाओ।"

ओझा आया। हवेली में घूमा। ऊपर वाले कमरे में गया। और काँपने लगा। "यहाँ कोई है। बहुत पुराना। पर बुरा नहीं। माँ जैसा।"

"कौन है?" तारा ने पूछा।

ओझा ने दीवार पर टंगी एक पुरानी पेंटिंग देखी। धूल जमी थी। पोंछा। एक औरत। बीस-बाईस साल की। बंगाली साड़ी। आँखें तारा जैसी। "यह कौन है?"

पापा को याद आया। मकान मालिक ने बताया था। "यह राधा थी। राय बहादुर की बेटी। 1873 में प्लेग में मर गई थी। इसी कमरे में। शादी के एक महीने बाद।"

ओझा बोला, "वही है। वह गई नहीं। इंतजार कर रही है।"

"किसका?"

"पता नहीं। पर तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचाएगी। वह रक्षा कर रही है।"

4. राधा की कहानी

तारा ने हवेली के कागजात खोजे। लाइब्रेरी गई। सौ साल पुराना अखबार मिला। "राय बाड़ी की त्रासदी"।

राधा की शादी हुई थी काशी के जमींदार से। शादी के बाद वह यहाँ आई। पर एक महीने बाद प्लेग फैला। पति काशी चला गया, बोला दवा लेकर आएगा। पर लौटा नहीं। राधा अकेली मर गई। आखिरी शब्द थे, "वह आएगा। जरूर आएगा।"

तारा रो पड़ी। "वह आज भी इंतजार कर रही है।"

उस रात 12:03 पर स्पर्श हुआ। तारा डरी नहीं। धीरे से बोली, "राधा?"

हवा में चंदन की खुशबू बढ़ गई। जैसे जवाब मिला हो।

"तुम हो न? तुम मेरी रक्षा कर रही हो?"

पलंग का दूसरा कोना धँस गया। जैसे कोई बैठा हो।

तारा ने हिम्मत की। "तुम्हें क्या चाहिए राधा? मुक्ति?"

खिड़की अपने आप खुली। चाँद की रोशनी आई। और रोशनी में धुंध सी बनी। एक आकृति। राधा। वही पेंटिंग वाली। मुस्कुरा रही थी।

आवाज़ नहीं आई। पर तारा के मन में बात आई। "मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस देखती हूँ। तुम मुझ जैसी हो। अकेली। इसलिए आती हूँ।"

5. दो अकेली लड़कियाँ

उस दिन से डर खत्म हो गया। तारा और राधा। एक जिंदा, एक मृत। पर दोस्त बन गईं।

तारा कॉलेज से आती, राधा को सब बताती। "आज प्रोफेसर ने डाँटा।" तो लगता दुपट्टे पर कोई हाथ फेर रहा है, सांत्वना दे रहा है।

"आज लड़के ने प्रपोज किया।" तो कमरा ठंडा हो जाता, जैसे राधा नाराज हो।

"तुम्हें जलन होती है?" तारा हँसती।

फिर गर्मी आ जाती। जैसे राधा शरमा गई हो।

तारा ने राधा की पेंटिंग साफ की। फूल चढ़ाए। "तुम मेरी बड़ी बहन हो।"

एक दिन तारा की तबीयत बहुत खराब हुई। टाइफाइड। 103 बुखार। माँ रो रही थी। डॉक्टर ने कहा, "रात निकाल ली तो ठीक।"

रात 12:03 पर कमरा ठंडा हो गया। तारा ने देखा, राधा उसके बगल में बैठी है। असली में। पारदर्शी, पर दिख रही है। वह तारा का हाथ पकड़े थी। हाथ ठंडा था, पर आरामदायक।

राधा ने माथा चूमा। और बोली, पहली बार आवाज़ में। "सो जा बहन। मैं हूँ न।"

तारा सो गई। सुबह बुखार गायब। डॉक्टर हैरान। "चमत्कार है।"

6. पति का लौटना

फिर आया काशी से एक बूढ़ा। उम्र नब्बे पार। नाम, विजय नारायण। राधा के पति का पोता।

वह हवेली देखने आया था। बोला, "दादाजी मरते समय तक दादी को याद करते थे। प्लेग के कारण अंग्रेजों ने काशी सील कर दी थी। वह आ नहीं पाए। बाद में आए तो राधा मर चुकी थी। जिंदगी भर अपराधबोध में रहे।"

उसके हाथ में एक पत्र था। राधा के पति का। मरने से पहले लिखा था। "राधा, मैं नहीं आ पाया। पर मेरा प्यार सच्चा था। अगर पुनर्जन्म है, तो मैं तुझे ढूँढ लूँगा। माफ कर देना।"

तारा ने पत्र राधा की पेंटिंग के सामने पढ़ा।

उस रात तूफान आया। 12:03 पर राधा आई। पर आज उदास थी।

तारा ने पूछा, "क्या हुआ?"

राधा बोली, "वह नहीं आया। उसका पोता आया। पर वह नहीं। मेरा इंतजार खत्म नहीं हुआ।"

"तो मुक्त क्यों नहीं होती? अब तो जान गई न कि वह मजबूर था।"

"मुक्ति नहीं चाहिए। अगर मुक्त हो गई, तो फिर इंतजार कैसे करूँगी? अगले जन्म में वह मुझे कैसे ढूँढेगा? मैं यहीं रहूँगी। हवेली में। जब तक वह न आए।"

तारा रो पड़ी। "पर तुम अकेली हो।"

राधा हँसी। "अब नहीं। अब तू है न। तू मेरी बहन है। जब तक तू है, मैं अकेली नहीं।"

7. स्पर्श का सच

तारा समझ गई। राधा का स्पर्श डर नहीं था। प्रेम था। जो अधूरा रह गया था, वह तारा में पूरा कर रही थी।

जिस बेटी को राधा जन्म नहीं दे पाई, वह तारा थी। जिस बहन की उसे जरूरत थी, वह तारा थी।

तारा ने फैसला किया। वह हवेली नहीं छोड़ेगी। शादी भी नहीं करेगी। राधा के साथ रहेगी।

माँ-पापा चिल्लाए। "पागल हो गई है! भूत के साथ रहेगी?"

तारा बोली, "भूत नहीं। राधा मेरी परिवार है। उसने मुझे बचाया। अब मैं उसे अकेला नहीं छोड़ूँगी।"

धीरे धीरे घर वाले माने। क्योंकि उन्होंने भी देखा। जब तारा दुखी होती, कमरे से चंदन की खुशबू आती। जब तारा खुश होती, खिड़की से ठंडी हवा आती।

8. आज भी 12:03 पर

दस साल बीत गए। तारा अब तीस की है। प्रोफेसर बन गई है। हवेली में ही रहती है। राधा के कमरे में।

हर रात 12:03 पर स्पर्श होता है। अब तारा चौंकती नहीं। मुस्कुराती है। "आ गई दीदी?"

कभी राधा बाल बनाती है। कभी किताब के पन्ने पलटती है। कभी बस पास बैठती है।

गाँव वाले कहते हैं, "राय बाड़ी में भूत है।"

तारा कहती है, "हाँ है। पर मेरा भूत सबसे प्यारा है। वह रक्षा करता है।"

कभी कोई बच्चा बीमार होता है, तारा उसे हवेली लाती है। रात भर रखती है। सुबह बच्चा ठीक। लोग कहते हैं, "राधा दीदी ने छू लिया।"

तारा ने डायरी में आखिरी पन्ना लिखा:
"लोग कहते हैं मृत लोग डराते हैं। गलत। अधूरा प्रेम डराता है। पूरा प्रेम रक्षा करता है। राधा का स्पर्श डर नहीं, दुआ है। वह अदृश्य है, पर सबसे ज्यादा महसूस होती है। क्योंकि प्रेम को शरीर नहीं चाहिए। प्रेम को बस एहसास चाहिए।"

आज भी हवेली में 12:03 पर चंदन की खुशबू आती है। अगर तुम कभी चंदनपुर जाओ, और राय बाड़ी के सामने रात को खड़े हो जाओ, तो ऊपर वाले कमरे की खिड़की देखना।

कभी कभी वहाँ दो साये दिखते हैं। एक तारा, एक राधा। दोनों हँस रही होती हैं।

क्योंकि एक लड़की को हर रात किसी अदृश्य शक्ति का स्पर्श महसूस होता था। और वह शक्ति थी प्रेम। जो मर कर भी नहीं मरा।

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