05/09/2026
शाम की चाय, पापा का आना : पूरी कहानी
1. वह घर, वह गली, वह शाम
कस्बा था छोटा-सा, नाम था शांतिपुर। स्टेशन रोड से जो पहली गली बाईं ओर मुड़ती थी, उसी में तीसरा मकान था रघुनाथ प्रसाद का। पुराना-सा मकान, जिसकी दीवारों पर चूना जगह-जगह से उखड़ गया था, पर आँगन में तुलसी का पौधा हरा-भरा था और दरवाज़े पर स्वस्तिक का निशान हर दीपावली पर नए सिरे से बनाया जाता था।
घर के मुखिया थे श्री रघुनाथ प्रसाद। आयु लगभग पचपन वर्ष। डाक विभाग में पोस्टमैन। खाकी वर्दी, सिर पर टोपी, कंधे पर चमड़े का थैला, पैरों में कैनवास के जूते और हाथ में साइकिल। चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान जो बारह घंटे की ड्यूटी की थकान को भी हरा दे। गली के बच्चे उन्हें "डाकिया अंकल" कहते, बूढ़े "रघुनाथ भैया", और अधिकारी "प्रसाद जी"।
उनकी पत्नी थीं कमला देवी। आयु पचास के आसपास। सीधी-सादी गृहिणी। माथे पर बिंदी, बालों में सफ़ेदी झलकने लगी थी। उनके हाथ की चाय पूरे मोहल्ले में प्रसिद्ध थी। कहती थीं, "चाय में पत्ती कम, प्रेम ज़्यादा होना चाहिए। तभी स्वाद आता है।"
उनके तीन बच्चे थे। बड़ी बेटी सुनीता, आयु बाईस वर्ष। बी.ए. करके घर पर ही सिलाई-कढ़ाई सीख रही थी। स्वभाव शांत, माँ का हर काम में हाथ बँटाती। मंझला बेटा अनिल, आयु उन्नीस वर्ष। इंटर कॉलेज में पढ़ता, क्रिकेट का दीवाना। गली की टीम का कप्तान। छोटी बेटी गुड़िया, असली नाम प्रीति, आयु बारह वर्ष। सातवीं कक्षा की छात्रा। पापा की सबसे लाड़ली। पापा उसे "मेरी गुड़िया" कहते, और वह पापा को "मेरे हीरो"।
रघुनाथ प्रसाद की दिनचर्या घड़ी की सुई जैसी पक्की थी। सुबह सात बजे नाश्ता। आठ बजे साइकिल पर डाकखाने के लिए प्रस्थान। वहाँ थैले में चिट्ठियाँ, मनीऑर्डर, रजिस्ट्री, पार्सल भरते। फिर दिनभर गाँव-गाँव, गली-गली। धूप हो या बरसात, आँधी हो या सर्दी, उनकी साइकिल कभी नहीं रुकती। लोग कहते, "रघुनाथ जी तो चलते-फिरते डाकखाने हैं! इनके थैले में लोगों की उम्मीदें बंद हैं।"
और शाम को छह बजे उनकी वापसी होती। उस वापसी का नाम था, घर की सबसे खूबसूरत घड़ी।
2. प्रतीक्षा की घड़ियाँ
शाम के पाँच बजते ही घर में एक मीठी हलचल शुरू हो जाती। कमला देवी आँगन में झाड़ू लगातीं, तुलसी के पास दीया जलातीं, अगरबत्ती घुमातीं। सुनीता छत से सूखे कपड़े उतार लाती, उन्हें तह करके रखती। अनिल गली में क्रिकेट खेलते हुए बार-बार नुक्कड़ की ओर देखता, "पापा आने वाले होंगे, एक ओवर और!"
और गुड़िया? वह तो पाँच बजे से ही दरवाज़े की चौखट पर बैठ जाती। बस्ता एक ओर रखकर, चोटी खोलकर। राह तकती आँखें।
"माँ! पापा कब आएँगे?" वह दसवीं बार पूछती।
"बस बेटा, घंटी बजेगी, समझ जाना पापा आ गए।" कमला देवी मुस्करातीं। "जा, हाथ-मुँह धो ले, चोटी बना ले। पापा को गुड़िया सजी-धजी अच्छी लगती है।"
गुड़िया दौड़कर जाती, मुँह धोती, माँ से चोटी बनवाती। फिर वापस चौखट पर।
पाँच बजकर पैंतालीस मिनट। दूर गली के मोड़ से साइकिल की घंटी की आवाज़ आती, टन-टन! गुड़िया उछल पड़ती, "पापा आ गए!"
रघुनाथ प्रसाद गली में प्रवेश करते। वर्दी धूल से सनी, पर चेहरा खिला। गली के बच्चे उन्हें घेर लेते। "डाकिया अंकल! मेरी चिट्ठी आई?" "अंकल! टॉफी दो न!"
वे हँसकर किसी के सिर पर हाथ फेरते, किसी की गाल खींचते। उनके थैले के एक कोने में हमेशा टॉफियाँ रहतीं, बच्चों के लिए। "लो बेटा, आज संतरे वाली!"
घर के दरवाज़े पर पहुँचते ही गुड़िया दौड़कर उनसे लिपट जाती। "पापा!"
"अरे मेरी गुड़िया!" रघुनाथ उसे गोद में उठा लेते, हालाँकि वह अब बड़ी हो रही थी। "आज स्कूल में क्या हुआ? किसी ने तंग तो नहीं किया?"
"पापा! आज मुझे गणित में पूरे बीस में से बीस नंबर मिले! टीचर ने सबके सामने तारीफ़ की!" गुड़िया इतराती।
"शाबाश मेरी बेटी! तो आज डबल चाय बनेगी, और साथ में पकौड़े भी!" रघुनाथ हँसते।
सुनीता पानी का लोटा लाती। "पापा, हाथ-मुँह धो लीजिए।"
अनिल साइकिल पकड़कर अंदर रखता। "पापा, आज आपकी साइकिल की घंटी ढीली हो गई है, मैं कस दूँगा।"
"मेरा बेटा इंजीनियर बनेगा!" पापा उसकी पीठ थपथपाते।
3. चाय की रस्म
पापा के आते ही घर का सबसे पवित्र अनुष्ठान शुरू होता, शाम की चाय। यह केवल चाय नहीं थी, यह परिवार की संसद थी, जहाँ दिनभर की बातें होतीं, हँसी होती, कभी-कभी आँसू भी।
कमला देवी पहले से तैयारी रखतीं। पीतल की केतली में पानी। चायपत्ती का डिब्बा। अदरक का टुकड़ा। हरी इलायची। पापा हाथ-मुँह धोकर, कुर्ता बदलकर आँगन में खाट पर बैठते। वर्दी की टोपी उतारकर खूँटी पर टाँगते।
"कमला! आज की डाक में क्या खास था, सुनोगी?" वे कहते, जूते उतारते हुए।
"पहले चाय पीजिए, फिर सुनाइएगा। चाय ठंडी हो जाएगी।" कमला चाय छानतीं।
चाय बनाने की प्रक्रिया भी एक कला थी। पानी उबलता, उसमें अदरक कूटकर डाला जाता, फिर चायपत्ती, फिर दूध। धीमी आँच पर खदकती चाय। ऊपर मलाई की परत। काँच के गिलासों में परोसी जाती। खुशबू ऐसी कि पड़ोसी मिश्रा जी भी खिंचे चले आते।
"भाभी! आज की चाय में कुछ खास बात है!" मिश्रा जी कहते, जो अक्सर शाम को आ जाते।
"खास बात यही है भाई साहब, कि ये पापा के आने की खुशी में बनी है!" सुनीता हँसकर कहती।
पापा पहली चुस्की लेते। आँखें बंद करते। "आहा! कमला, तुम्हारे हाथ की चाय पीकर तो दिनभर की थकान उतर जाती है। स्वर्ग मिल जाता है!"
कमला शरमाकर कहतीं, "बस-बस! ज़्यादा तारीफ़ मत कीजिए! बच्चे क्या सोचेंगे!"
"बच्चे यही सोचेंगे कि उनके माँ-पापा एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते हैं!" पापा हँसते।
फिर शुरू होतीं दिनभर की कहानियाँ। पापा डाकिए थे, उनके थैले में केवल चिट्ठियाँ नहीं, कहानियाँ भी होतीं।
"आज वर्मा जी के बेटे की नौकरी का नियुक्ति पत्र आया। बूढ़ी माँ ने पत्र पढ़ते ही मेरे हाथ चूम लिए। कहने लगीं, बेटा, तुम तो देवदूत हो!"
"आज शर्मा जी का मनीऑर्डर आया, पाँच हज़ार का। कहने लगे, बेटे ने बंबई से पहली तनख्वाह भेजी है। उनकी आँखों में आँसू थे, पर चेहरे पर गर्व।"
"आज एक चिट्ठी आई, सरहद से। एक सैनिक ने अपनी माँ को लिखा था, माँ, मैं ठीक हूँ। वह माँ पत्र सीने से लगाकर रो पड़ी।"
बच्चे मंत्रमुग्ध सुनते। उनके लिए पापा की कहानियाँ किसी कथावाचक से कम न थीं। गुड़िया पापा की गोद में सिर रखकर सुनती। अनिल ध्यान से सुनता। सुनीता चाय के गिलास धोते हुए सुनती।
"पापा! आप तो कहानियों के खज़ाने हैं!" गुड़िया कहती।
"बेटा! डाकिया केवल चिट्ठी नहीं बाँटता, वह खुशियाँ बाँटता है, उम्मीदें बाँटता है।" पापा कहते।
4. बरसात की वह शाम
एक बार सावन में भारी बरसात हुई। सुबह से ही मूसलाधार वर्षा। शाम के छह बजे, पापा नहीं आए। सात बजे। आठ बजे। घर में चिंता बढ़ने लगी। कमला देवी बार-बार दरवाज़े पर जातीं, गली में झाँकतीं।
"माँ! पापा कहाँ हैं? इतनी बरसात में..." सुनीता की आवाज़ में चिंता थी।
"आ जाएँगे बेटा, बरसात में साइकिल धीमी चलती है।" कमला ने कहा, पर उनके हाथ काँप रहे थे।
गुड़िया रोने लगी। "माँ! पापा को कुछ हो गया तो?"
"चुप बेटा! ऐसा नहीं कहते। तेरे पापा बहुत हिम्मती हैं।" कमला ने उसे सीने से लगाया।
अनिल छाता लेकर नुक्कड़ तक गया, पर कोई नहीं दिखा। लौटकर बोला, "माँ, गली में पानी भर गया है।"
रात के नौ बजे दरवाज़ा खटखटाया। कमला दौड़कर गईं। सामने रघुनाथ प्रसाद खड़े थे, पूरी तरह भीगे हुए। कपड़ों से पानी टपक रहा था। साइकिल नहीं थी।
"पापा!" गुड़िया दौड़कर लिपटी।
"अरे! अरे! मैं भीग गया हूँ बेटा, तू भी भीग जाएगी!" पापा ने उसे अलग किया, पर वह नहीं हटी।
कमला ने तौलिया दिया। "इतनी बरसात में क्यों आए? कहीं रुक जाते! साइकिल कहाँ है?"
"साइकिल का पहिया कीचड़ में फँस गया, चेन टूट गई। वहीं एक दुकान पर रख आया हूँ।" रघुनाथ बोले। "पर डाक... डाक तो पहुँचानी थी। एक माँ अपने बेटे के पत्र की प्रतीक्षा कर रही थी। तीन महीने से कोई खबर नहीं थी। मैं न जाता, तो वह रातभर सो न पाती।"
कमला की आँखों में आँसू आ गए। "आप भी न! अपनी जान की परवाह ही नहीं!"
"कमला! डाकिया की जान तो उसकी डाक में बसती है।" पापा मुस्कराए।
उस रात चाय के साथ खिचड़ी बनी। पापा ने भीगे कपड़े बदलकर, तौलिये में लिपटकर चाय पी। "आज की चाय सबसे मीठी लग रही है! इसमें तुम्हारी चिंता का स्वाद है!"
गुड़िया ने अपनी नई फ्रॉक के पल्लू से पापा के जूते पोंछे। पापा ने उसे सीने से लगा लिया। "मेरी बेटी सबसे प्यारी!"
उस रात पापा को हल्का बुखार हो गया। कमला ने रातभर पट्टी रखी। सुबह पापा ने कहा, "देखा! तुम्हारी सेवा से बुखार भी भाग गया!"
5. सर्दियों की धूप वाली शाम
पूस का महीना। दिन छोटे, रातें लंबी। शाम के पाँच बजे ही अँधेरा घिरने लगता। पापा थोड़ा जल्दी आने लगे, साढ़े पाँच बजे।
सर्दियों में चाय के साथ कुछ खास होता। कभी गजक, कभी मूँगफली, कभी शकरकंदी। पापा आते, तो अंगीठी जलती। सब अंगीठी के चारों ओर बैठते। चाय की चुस्कियों के साथ भुनी मूँगफली।
"पापा! कहानी सुनाओ न!" गुड़िया कहती।
"कौन-सी कहानी?"
"वह वाली, जब आपने बाढ़ में डाक पहुँचाई थी!"
पापा हँसते। "अच्छा सुनो। उस साल गंगा में बाढ़ आई थी। पूरा गाँव डूब गया था। लोग छतों पर थे। मैं नाव में बैठकर डाक बाँटने गया। एक बूढ़ी दादी ने कहा, बेटा, तू तो भगवान है!"
"पापा! आप सच में हीरो हैं!" अनिल कहता।
"हीरो नहीं बेटा, कर्तव्य। हर आदमी का कोई न कोई कर्तव्य होता है। मेरा कर्तव्य डाक पहुँचाना है।" पापा कहते।
एक सर्द शाम पापा अपने साथ एक पुराना कंबल लाए। "आज रास्ते में एक भिखारी ठिठुर रहा था। मैंने अपना कंबल उसे दे दिया।"
"तो आप कैसे आएँगे?" कमला ने पूछा।
"मेरे पास तो घर है, चाय है, तुम सब हो। उसके पास क्या है?" पापा बोले।
कमला ने चुपचाप अलमारी से नया कंबल निकाला। "यह लीजिए, कल से यही ओढ़कर जाइएगा।"
6. होली, दीपावली और पापा
होली पर पापा बच्चों जैसे हो जाते। सुबह ही रंग लेकर आते। "आज डाक विभाग की छुट्टी! आज तो रंगों की डाक बँटेगी!"
वे गुड़िया के गालों पर गुलाल लगाते। अनिल पर पिचकारी से रंग डालते। सुनीता के पैरों पर रंग लगाकर आशीर्वाद देते। कमला को देखते, तो शरमाकर कहते, "तुम तो पहले से ही इतनी सुंदर हो, रंग की क्या ज़रूरत!"
"धत्! बच्चों के सामने!" कमला शरमातीं।
शाम को भांग की ठंडाई नहीं, मीठी चाय बनती। साथ में गुझिया। पापा कहते, "रंगों का त्योहार प्रेम का त्योहार है।"
दीपावली की तैयारियाँ ज़ोरों पर होतीं। कमला गुजिया बनातीं। सुनीता रंगोली सजाती। अनिल दीये खरीदता। गुड़िया फुलझड़ियाँ गिनती।
धनतेरस की शाम पापा आए, तो उनके थैले में कुछ छिपा था। "आँखें बंद करो!" उन्होंने कहा।
सबने आँखें बंद कीं। पापा ने एक-एक उपहार निकाला। सुनीता के लिए सुंदर साड़ी। अनिल के लिए क्रिकेट का बल्ला। गुड़िया के लिए लाल फ्रॉक और एक बड़ी-सी गुड़िया। कमला के लिए चाँदी की पायल।
"इतना खर्च क्यों किया?" कमला ने डाँटा, पर आँखों में खुशी के आँसू थे।
"पूरे साल की बचत है। बोनस मिला था।" पापा मुस्कराए। "तुम सबकी खुशी से बड़ा धन क्या है? मैं तो रोज़ लोगों की खुशियों की डाक बाँटता हूँ, आज अपने घर की खुशी बाँट रहा हूँ।"
उस रात चाय के साथ गुजिया खाई गई। दीयों की रोशनी में पापा का चेहरा दमक रहा था। गुड़िया पापा की गोद में बैठी फुलझड़ी जलाती रही।
7. अनिल की परीक्षा और पापा का साथ
एक वर्ष अनिल की बोर्ड परीक्षा थी। वह बहुत घबराया था। रात-रात भर पढ़ता, आँखें लाल हो जातीं।
"बेटा! इतना मत पढ़, सेहत खराब हो जाएगी!" कमला कहतीं।
पापा उसे अपने पास बिठाते। "बेटा! परीक्षा तो आती-जाती रहती है। मेहनत सच्ची होनी चाहिए, फल की चिंता मत कर। मैं रोज़ देखता हूँ, किसान बीज बोता है, पर फल भगवान देता है। तू बीज बो, फल अवश्य मिलेगा।"
परीक्षा वाले दिन पापा उसे साइकिल पर बिठाकर केंद्र तक छोड़ने गए। रास्ते में दही-शक्कर खिलाई। "घबराना मत। प्रश्न ध्यान से पढ़ना। पहले आसान प्रश्न करना।"
"पापा! अगर फेल हो गया तो?" अनिल की आवाज़ काँपी।
"तो क्या? फिर से परीक्षा देना। फेल होना अपराध नहीं, हिम्मत हारना अपराध है।" पापा ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
शाम को पापा आए, तो अनिल दौड़कर आया। "पापा! पेपर बहुत अच्छा हुआ! आपके आशीर्वाद से!"
"मुझे पता था! मेरा बेटा शेर है!" पापा ने उसे गले लगाया। "आज की चाय तेरे नाम! कमला, पकौड़े भी तल दो!"
उस शाम पापा ने एक कहानी सुनाई। "बेटा! मैं भी कभी परीक्षा से डरता था। मेरे पिताजी, तुम्हारे दादाजी कहते थे, डर के आगे जीत है। जो डर को हरा दे, वही सिकंदर!"
8. सुनीता की शादी और विदाई
समय बीता। सुनीता के लिए रिश्ता आया। लड़का था सुशील, बैंक में नौकरी। परिवार सभ्य, संस्कारी। शादी तय हुई।
घर में तैयारियाँ शुरू हुईं। पापा ने अपनी जीवनभर की बचत निकाली। "बेटी की शादी में कोई कमी नहीं होनी चाहिए।"
शादी वाले दिन घर दुल्हन-सा सजा। मेहमानों की भीड़। बाजे-गाजे। सुनीता लाल जोड़े में परी-सी लग रही थी। पापा की आँखों में खुशी और नमी दोनों थी।
कन्यादान के समय पापा का हाथ काँप रहा था। पंडित जी ने मंत्र पढ़े। पापा ने बेटी का हाथ दामाद के हाथ में दिया। "बेटा! मेरी अमानत है, संभालकर रखना।"
विदाई का समय आया। सुनीता पापा से लिपटी। "पापा! मैं आपको बहुत याद करूँगी! आपकी शाम की चाय, आपकी कहानियाँ..."
पापा का गला भर आया। बड़ी मुश्किल से बोले, "बेटा! बेटियाँ तो पराया धन होती हैं, पर दिल से कभी पराई नहीं होतीं। जब भी मन करे, चिट्ठी लिखना। तुम्हारा पापा डाकिया है, तुम्हारी चिट्ठी सबसे पहले पहुँचाएगा! और हाँ, वहाँ भी शाम की चाय ज़रूर पीना, मुझे याद करके।"
सबकी आँखें नम थीं। डोली उठी। पापा दरवाज़े पर खड़े देखते रहे, जब तक गाड़ी आँखों से ओझल न हो गई।
सुनीता के जाने के बाद पहली शाम। चाय बनी। कमला ने चार गिलास बनाए, पर हाथ रुक गया। पाँचवाँ गिलास...
पापा ने कहा, "कमला! एक गिलास अलग रख दो। बेटी की चाय। वह जहाँ भी हो, उसके हिस्से की चाय यहाँ बनेगी।"
कमला ने चुपचाप एक गिलास भरकर तुलसी के पास रख दिया। गुड़िया ने पूछा, "माँ! दीदी की चाय कौन पिएगा?"
"बेटा! प्रेम की चाय कभी व्यर्थ नहीं जाती।" पापा बोले।
उसके बाद हर शाम पाँच गिलास चाय बनती, एक तुलसी के पास रखा जाता।
9. गुड़िया की सफलता
गुड़िया अब बड़ी हो गई थी। दसवीं में उसने ज़िले में प्रथम स्थान प्राप्त किया। अख़बार में नाम छपा। "प्रीति, पुत्री श्री रघुनाथ प्रसाद, ने ज़िले में प्रथम स्थान प्राप्त किया।"
पापा की खुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने पूरे मोहल्ले में लड्डू बँटवाए। डाकखाने में सबने बधाई दी। अधिकारियों ने कहा, "प्रसाद जी! बेटी ने नाम रोशन कर दिया!"
उस शाम घर में उत्सव था। पकौड़े तले गए, खीर बनी। पापा ने गुड़िया को सीने से लगाया। "मेरी बेटी! तूने तो पापा का सीना चौड़ा कर दिया!"
"पापा! यह सब आपके आशीर्वाद से!" गुड़िया की आँखों में आँसू थे।
"नहीं बेटा! यह तेरी मेहनत का फल है।" पापा बोले। "याद रख, शिक्षा सबसे बड़ा धन है। इसे कोई चुरा नहीं सकता।"
10. सेवानिवृत्ति का दिन
वर्षों बीते। रघुनाथ प्रसाद की सेवानिवृत्ति का दिन आया। तीस वर्षों की सेवा। डाकखाने में भव्य समारोह हुआ। अधिकारियों ने उन्हें शॉल ओढ़ाया, स्मृति चिन्ह दिया।
"रघुनाथ जी ने तीस वर्षों में एक भी दिन अवकाश नहीं लिया! एक भी डाक विलंब से नहीं पहुँचाई! यह एक रिकॉर्ड है!" डाक अधीक्षक ने कहा।
सहकर्मियों ने कहा, "प्रसाद जी! आपके बिना डाकखाना सूना हो जाएगा!"
पापा की आँखें भर आईं। "यह डाकखाना मेरा मंदिर था, डाक मेरी पूजा।"
घर लौटे, तो मोहल्ले वालों ने फूलों से स्वागत किया। गुड़िया ने पापा के गले में माला डाली। अनिल ने पैर छुए। कमला ने आरती उतारी।
"पापा! अब आप आराम कीजिएगा! अब कोई सुबह आठ बजे की ड्यूटी नहीं!" गुड़िया बोली।
"आराम? मुझे तो अब भी शाम की चाय का इंतज़ार रहेगा! बस अब घंटी की आवाज़ नहीं आएगी!" पापा हँसे, पर हँसी में एक टीस थी।
उस शाम चाय विशेष बनी। पकौड़े तले गए। समोसे मँगवाए गए। पूरा मोहल्ला इकट्ठा हुआ। पापा ने कहा, "मेरे जीवन की सबसे बड़ी डाक तो यही है, आप सबका प्रेम। चिट्ठियाँ तो कागज़ की थीं, पर आपका प्रेम सोने का है।"
मिश्रा जी बोले, "रघुनाथ भाई! तुमने तो डाकिए की नौकरी को पूजा बना दिया!"
11. अंतिम चाय
सेवानिवृत्ति के दो वर्ष बाद पापा बीमार पड़े। उम्र हो चली थी, शरीर थक चला था। बिस्तर पर लेटे थे। डॉक्टर आते, दवा देते।
एक शाम, छह बजे, पापा ने धीमी आवाज़ में कहा, "कमला! चाय बनाओ। शाम की चाय का समय हो गया।"
कमला ने चाय बनाई। पापा को सहारा देकर बिठाया। पापा ने चुस्की ली। आँखें बंद कीं। "आहा! वही स्वाद। पचास वर्षों से यही स्वाद। कमला, तुम्हारे हाथ में जादू है।"
गुड़िया सिरहाने बैठी थी, पापा का हाथ थामे। "पापा! आप ठीक हो जाएँगे। फिर हम साथ चाय पिएँगे।"
पापा ने उसके सिर पर हाथ फेरा। "बेटा! जीवन भी डाक की तरह है। हर चिट्ठी को एक दिन अपने गंतव्य तक पहुँचना होता है। मैंने अपनी डाक पहुँचा दी। अब मेरी चिट्ठी ऊपर वाले के पास जाने का समय है।"
"ऐसा मत कहिए पापा!" गुड़िया रो पड़ी।
"रो मत बेटी।" पापा बोले। "मैं कहीं नहीं जा रहा। जब भी शाम की चाय बनेगी, मैं उसकी खुशबू में रहूँगा। जब भी गली में साइकिल की घंटी बजेगी, मैं उसकी टन-टन में रहूँगा।"
अनिल ने पापा के पैर दबाए। "पापा! आपने हमें सब कुछ दिया।"
"मैंने कुछ नहीं दिया बेटा, मैंने तो केवल कर्तव्य निभाया।" पापा मुस्कराए।
उस रात पापा शांति से सो गए। चेहरे पर वही मुस्कान, जो वे रोज़ शाम को घर आते समय लाते थे। कभी न जागने वाली नींद।
12. परंपरा जीवित है
घर में मातम छा गया। मोहल्ला उमड़ पड़ा। "रघुनाथ भैया चले गए!" हर आँख नम थी। अंतिम यात्रा में पूरा कस्बा शामिल हुआ।
पर अगले दिन, शाम के छह बजे, कमला देवी ने चाय बनाई। हाथ काँप रहे थे, आँखों में आँसू थे, पर चाय बनी। चार गिलास की जगह... उन्होंने पाँच गिलास बनाए। एक गिलास पापा की तस्वीर के सामने रखा।
"पापा की चाय।" उन्होंने कहा।
गुड़िया ने पूछा, "माँ! अब पापा की चाय कौन पिएगा?"
"बेटा! पापा पिएँगे। वे आते हैं, रोज़ शाम को आते हैं।" कमला बोलीं।
आज वर्षों बीत गए। अनिल डाक विभाग में ही अधिकारी है। वह कहता है, "मैं पापा के नक्शेकदम पर चलूँगा।" गुड़िया शिक्षिका है, बच्चों को पढ़ाती है। सुनीता अपने घर में सुखी है, उसके बच्चे हैं।
पर शांतिपुर के उस घर में आज भी शाम के छह बजे चाय बनती है। कमला देवी अब बहुत बूढ़ी हो गई हैं, पर चाय वही बनाती हैं। वही अदरक, वही इलायची, वही प्रेम। आँगन में पापा की खाट आज भी पड़ी है। उस पर पापा की टोपी रखी है। दीवार पर पापा की तस्वीर है, जिसमें वे मुस्करा रहे हैं।
हर शाम पाँच गिलास चाय बनती है। एक गिलास तस्वीर के सामने रखा जाता है। बच्चे पूछते हैं, "दादी! यह चाय किसके लिए?"
कमला मुस्कराकर कहती हैं, "तुम्हारे नानाजी के लिए। वे शाम को आते हैं, चाय पीते हैं, और हम सबको आशीर्वाद देते हैं।"
और सच ही तो है। जब शाम की चाय की खुशबू उठती है, अदरक और इलायची की महक गली तक जाती है, तो लगता है जैसे दूर से साइकिल की घंटी टनटनाई हो। जैसे पापा आ गए हों। खाकी वर्दी, कंधे पर थैला, चेहरे पर मुस्कान। जैसे कह रहे हों, "कमला! आज की डाक में क्या खास था?"
शाम की चाय, पापा का आना। यह केवल एक कहानी नहीं। यह हर उस घर की कहानी है जहाँ पिता की प्रतीक्षा में शाम सजती है। जहाँ चाय की प्याली में प्रेम घुलता है। जहाँ पिता का आना त्योहार होता है, और पिता की याद पूजा।
पिता चले जाते हैं, पर उनकी घंटी की टन-टन, उनकी चाय की चुस्की, उनकी कहानियों की गूँज कभी नहीं जाती। वह हर शाम, हर चाय के साथ लौट आती है।