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Atmaon ka Saudagar  रात के बाजार में आत्माओं से सौदा करता रहस्यमयी व्यापारी। क्या आप इसमें कोई बदलाव चाहेंगे?मृत लोगों क...
07/09/2026

Atmaon ka Saudagar

रात के बाजार में आत्माओं से सौदा करता रहस्यमयी व्यापारी। क्या आप इसमें कोई बदलाव चाहेंगे?

मृत लोगों की अधूरी इच्छाएँ बेचने वाला रहस्यमयी व्यापारी — आत्माओं से सौदा

बनारस की गलियों में एक कहावत है — "अगर आधी रात को घंटाघर के पीछे वाली गली में दीया दिखे, तो समझो सेठ किशनलाल की दुकान खुली है।"

सेठ किशनलाल कोई साधारण व्यापारी नहीं था। दिन में उसकी दुकान बंद रहती। रात 12 बजे वह खुलती। वहाँ अनाज या कपड़ा नहीं बिकता था। वहाँ बिकती थीं — मृत लोगों की अधूरी इच्छाएँ।

कहते हैं, किशनलाल को 40 साल पहले एक अघोरी ने वरदान दिया था — वह आत्माओं की भाषा समझ सकता था। मरने वाले अपनी अंतिम इच्छा उसे बता जाते। वह उन इच्छाओं को काँच की शीशियों में कैद कर लेता।

उसकी दुकान पर आत्माएँ आतीं। कोई कहती — "मुझे अपनी बेटी की शादी देखनी थी।" कोई कहता — "मैं अपने बेटे से माफी माँगना चाहता था।"

किशनलाल उन इच्छाओं को जीवित लोगों को बेचता। नियम था — जो जीवित व्यक्ति किसी मृत की अधूरी इच्छा पूरी करता, उसे बदले में कुछ मिलता — कभी धन, कभी स्वास्थ्य, कभी शांति।

एक रात आया रमेश। गरीब मजदूर। उसने कहा, "सेठ जी, मेरी माँ मर गई। उसकी आखिरी इच्छा थी कि मैं पढ़-लिख जाऊँ। पर मेरे पास पैसे नहीं।"

किशनलाल ने एक शीशी उठाई। उसमें एक बूढ़े की आत्मा थी, जिसकी इच्छा थी — "कोई मेरी पोती को पढ़ाए।" किशनलाल ने कहा, "सौदा करोगे? तुम उस बूढ़े की पोती को पढ़ाओगे, बदले में बूढ़ा तुम्हें पढ़ने के लिए पैसे देगा — अपनी छिपी हुई तिजोरी से।"

रमेश ने हाँ कहा। उसने लड़की को पढ़ाया। एक दिन लड़की ने कहा, "मेरे दादाजी ने मरने से पहले कहा था — almari के नीचे पैसे हैं।" सच में पैसे मिले। रमेश ने पढ़ाई की, मास्टर बन गया।

पर हर सौदे में खतरा था। एक बार एक लालची जमींदार आया। उसने कहा, "मुझे किसी अमीर मृत की इच्छा दो, जिससे मुझे खजाना मिले।"

किशनलाल ने चेतावनी दी — "इच्छा पूरी करनी होगी, सिर्फ लेना नहीं।"

जमींदार ने एक आत्मा की इच्छा ली — "मेरे अनाथ बेटे को घर दो।" पर उसने बेटे को घर नहीं दिया, सिर्फ खजाना ले लिया। उसी रात आत्माओं ने उसका गला घोंट दिया। सुबह उसकी लाश दुकान के बाहर मिली।

लोग डरने लगे। पर दुखी लोग आते रहे।

एक दिन किशनलाल बूढ़ा हो गया। उसने अपने शिष्य मोहन को बुलाया और कहा, "मेरा समय आ गया। मेरी एक अधूरी इच्छा है — मैं इन सभी आत्माओं को मुक्त करना चाहता हूँ।"

मोहन ने पूछा, "कैसे?"

किशनलाल ने कहा, "तुम्हें बिना स्वार्थ के 101 इच्छाएँ पूरी करनी होंगी।"

किशनलाल मर गया। मोहन ने उसकी बात मानी। उसने पैसे लेना बंद कर दिया। वह दुखियों की मदद करने लगा — बिना सौदे के।

धीरे-धीरे शीशियाँ खाली होने लगीं। आत्माएँ मुस्कुराकर प्रकाश में विलीन होने लगीं।

101वीं इच्छा पूरी हुई — एक माँ की इच्छा थी कि उसका बेटा फौज में भर्ती हो। मोहन ने उसकी मदद की। जैसे ही वह भर्ती हुआ, आखिरी शीशी टूट गई।

उस रात बनारस के आसमान में सैकड़ों रोशनियाँ दिखीं — जैसे आत्माएँ मुक्त होकर तारों में मिल रही हों।

मोहन ने दुकान बंद कर दी। वहाँ अब एक छोटा मंदिर है। लोग कहते हैं, आधी रात को वहाँ अभी भी फुसफुसाहट सुनाई देती है — "धन्यवाद..."

और सेठ किशनलाल? कहते हैं, उसकी आत्मा अभी भी वहीं है — पर अब वह व्यापारी नहीं, रखवाला है। वह हर उस व्यक्ति का इंतजार करता है, जो किसी मृत की अधूरी इच्छा पूरी करना चाहता है। क्योंकि उसने सिखाया — "सबसे बड़ा सौदा वह है, जिसमें कोई हारता नहीं।"

शाम की चाय, पापा का आना : पूरी कहानी1. वह घर, वह गली, वह शामकस्बा था छोटा-सा, नाम था शांतिपुर। स्टेशन रोड से जो पहली गली...
05/09/2026

शाम की चाय, पापा का आना : पूरी कहानी

1. वह घर, वह गली, वह शाम

कस्बा था छोटा-सा, नाम था शांतिपुर। स्टेशन रोड से जो पहली गली बाईं ओर मुड़ती थी, उसी में तीसरा मकान था रघुनाथ प्रसाद का। पुराना-सा मकान, जिसकी दीवारों पर चूना जगह-जगह से उखड़ गया था, पर आँगन में तुलसी का पौधा हरा-भरा था और दरवाज़े पर स्वस्तिक का निशान हर दीपावली पर नए सिरे से बनाया जाता था।

घर के मुखिया थे श्री रघुनाथ प्रसाद। आयु लगभग पचपन वर्ष। डाक विभाग में पोस्टमैन। खाकी वर्दी, सिर पर टोपी, कंधे पर चमड़े का थैला, पैरों में कैनवास के जूते और हाथ में साइकिल। चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान जो बारह घंटे की ड्यूटी की थकान को भी हरा दे। गली के बच्चे उन्हें "डाकिया अंकल" कहते, बूढ़े "रघुनाथ भैया", और अधिकारी "प्रसाद जी"।

उनकी पत्नी थीं कमला देवी। आयु पचास के आसपास। सीधी-सादी गृहिणी। माथे पर बिंदी, बालों में सफ़ेदी झलकने लगी थी। उनके हाथ की चाय पूरे मोहल्ले में प्रसिद्ध थी। कहती थीं, "चाय में पत्ती कम, प्रेम ज़्यादा होना चाहिए। तभी स्वाद आता है।"

उनके तीन बच्चे थे। बड़ी बेटी सुनीता, आयु बाईस वर्ष। बी.ए. करके घर पर ही सिलाई-कढ़ाई सीख रही थी। स्वभाव शांत, माँ का हर काम में हाथ बँटाती। मंझला बेटा अनिल, आयु उन्नीस वर्ष। इंटर कॉलेज में पढ़ता, क्रिकेट का दीवाना। गली की टीम का कप्तान। छोटी बेटी गुड़िया, असली नाम प्रीति, आयु बारह वर्ष। सातवीं कक्षा की छात्रा। पापा की सबसे लाड़ली। पापा उसे "मेरी गुड़िया" कहते, और वह पापा को "मेरे हीरो"।

रघुनाथ प्रसाद की दिनचर्या घड़ी की सुई जैसी पक्की थी। सुबह सात बजे नाश्ता। आठ बजे साइकिल पर डाकखाने के लिए प्रस्थान। वहाँ थैले में चिट्ठियाँ, मनीऑर्डर, रजिस्ट्री, पार्सल भरते। फिर दिनभर गाँव-गाँव, गली-गली। धूप हो या बरसात, आँधी हो या सर्दी, उनकी साइकिल कभी नहीं रुकती। लोग कहते, "रघुनाथ जी तो चलते-फिरते डाकखाने हैं! इनके थैले में लोगों की उम्मीदें बंद हैं।"

और शाम को छह बजे उनकी वापसी होती। उस वापसी का नाम था, घर की सबसे खूबसूरत घड़ी।

2. प्रतीक्षा की घड़ियाँ

शाम के पाँच बजते ही घर में एक मीठी हलचल शुरू हो जाती। कमला देवी आँगन में झाड़ू लगातीं, तुलसी के पास दीया जलातीं, अगरबत्ती घुमातीं। सुनीता छत से सूखे कपड़े उतार लाती, उन्हें तह करके रखती। अनिल गली में क्रिकेट खेलते हुए बार-बार नुक्कड़ की ओर देखता, "पापा आने वाले होंगे, एक ओवर और!"

और गुड़िया? वह तो पाँच बजे से ही दरवाज़े की चौखट पर बैठ जाती। बस्ता एक ओर रखकर, चोटी खोलकर। राह तकती आँखें।

"माँ! पापा कब आएँगे?" वह दसवीं बार पूछती।

"बस बेटा, घंटी बजेगी, समझ जाना पापा आ गए।" कमला देवी मुस्करातीं। "जा, हाथ-मुँह धो ले, चोटी बना ले। पापा को गुड़िया सजी-धजी अच्छी लगती है।"

गुड़िया दौड़कर जाती, मुँह धोती, माँ से चोटी बनवाती। फिर वापस चौखट पर।

पाँच बजकर पैंतालीस मिनट। दूर गली के मोड़ से साइकिल की घंटी की आवाज़ आती, टन-टन! गुड़िया उछल पड़ती, "पापा आ गए!"

रघुनाथ प्रसाद गली में प्रवेश करते। वर्दी धूल से सनी, पर चेहरा खिला। गली के बच्चे उन्हें घेर लेते। "डाकिया अंकल! मेरी चिट्ठी आई?" "अंकल! टॉफी दो न!"

वे हँसकर किसी के सिर पर हाथ फेरते, किसी की गाल खींचते। उनके थैले के एक कोने में हमेशा टॉफियाँ रहतीं, बच्चों के लिए। "लो बेटा, आज संतरे वाली!"

घर के दरवाज़े पर पहुँचते ही गुड़िया दौड़कर उनसे लिपट जाती। "पापा!"

"अरे मेरी गुड़िया!" रघुनाथ उसे गोद में उठा लेते, हालाँकि वह अब बड़ी हो रही थी। "आज स्कूल में क्या हुआ? किसी ने तंग तो नहीं किया?"

"पापा! आज मुझे गणित में पूरे बीस में से बीस नंबर मिले! टीचर ने सबके सामने तारीफ़ की!" गुड़िया इतराती।

"शाबाश मेरी बेटी! तो आज डबल चाय बनेगी, और साथ में पकौड़े भी!" रघुनाथ हँसते।

सुनीता पानी का लोटा लाती। "पापा, हाथ-मुँह धो लीजिए।"

अनिल साइकिल पकड़कर अंदर रखता। "पापा, आज आपकी साइकिल की घंटी ढीली हो गई है, मैं कस दूँगा।"

"मेरा बेटा इंजीनियर बनेगा!" पापा उसकी पीठ थपथपाते।

3. चाय की रस्म

पापा के आते ही घर का सबसे पवित्र अनुष्ठान शुरू होता, शाम की चाय। यह केवल चाय नहीं थी, यह परिवार की संसद थी, जहाँ दिनभर की बातें होतीं, हँसी होती, कभी-कभी आँसू भी।

कमला देवी पहले से तैयारी रखतीं। पीतल की केतली में पानी। चायपत्ती का डिब्बा। अदरक का टुकड़ा। हरी इलायची। पापा हाथ-मुँह धोकर, कुर्ता बदलकर आँगन में खाट पर बैठते। वर्दी की टोपी उतारकर खूँटी पर टाँगते।

"कमला! आज की डाक में क्या खास था, सुनोगी?" वे कहते, जूते उतारते हुए।

"पहले चाय पीजिए, फिर सुनाइएगा। चाय ठंडी हो जाएगी।" कमला चाय छानतीं।

चाय बनाने की प्रक्रिया भी एक कला थी। पानी उबलता, उसमें अदरक कूटकर डाला जाता, फिर चायपत्ती, फिर दूध। धीमी आँच पर खदकती चाय। ऊपर मलाई की परत। काँच के गिलासों में परोसी जाती। खुशबू ऐसी कि पड़ोसी मिश्रा जी भी खिंचे चले आते।

"भाभी! आज की चाय में कुछ खास बात है!" मिश्रा जी कहते, जो अक्सर शाम को आ जाते।

"खास बात यही है भाई साहब, कि ये पापा के आने की खुशी में बनी है!" सुनीता हँसकर कहती।

पापा पहली चुस्की लेते। आँखें बंद करते। "आहा! कमला, तुम्हारे हाथ की चाय पीकर तो दिनभर की थकान उतर जाती है। स्वर्ग मिल जाता है!"

कमला शरमाकर कहतीं, "बस-बस! ज़्यादा तारीफ़ मत कीजिए! बच्चे क्या सोचेंगे!"

"बच्चे यही सोचेंगे कि उनके माँ-पापा एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते हैं!" पापा हँसते।

फिर शुरू होतीं दिनभर की कहानियाँ। पापा डाकिए थे, उनके थैले में केवल चिट्ठियाँ नहीं, कहानियाँ भी होतीं।

"आज वर्मा जी के बेटे की नौकरी का नियुक्ति पत्र आया। बूढ़ी माँ ने पत्र पढ़ते ही मेरे हाथ चूम लिए। कहने लगीं, बेटा, तुम तो देवदूत हो!"

"आज शर्मा जी का मनीऑर्डर आया, पाँच हज़ार का। कहने लगे, बेटे ने बंबई से पहली तनख्वाह भेजी है। उनकी आँखों में आँसू थे, पर चेहरे पर गर्व।"

"आज एक चिट्ठी आई, सरहद से। एक सैनिक ने अपनी माँ को लिखा था, माँ, मैं ठीक हूँ। वह माँ पत्र सीने से लगाकर रो पड़ी।"

बच्चे मंत्रमुग्ध सुनते। उनके लिए पापा की कहानियाँ किसी कथावाचक से कम न थीं। गुड़िया पापा की गोद में सिर रखकर सुनती। अनिल ध्यान से सुनता। सुनीता चाय के गिलास धोते हुए सुनती।

"पापा! आप तो कहानियों के खज़ाने हैं!" गुड़िया कहती।

"बेटा! डाकिया केवल चिट्ठी नहीं बाँटता, वह खुशियाँ बाँटता है, उम्मीदें बाँटता है।" पापा कहते।

4. बरसात की वह शाम

एक बार सावन में भारी बरसात हुई। सुबह से ही मूसलाधार वर्षा। शाम के छह बजे, पापा नहीं आए। सात बजे। आठ बजे। घर में चिंता बढ़ने लगी। कमला देवी बार-बार दरवाज़े पर जातीं, गली में झाँकतीं।

"माँ! पापा कहाँ हैं? इतनी बरसात में..." सुनीता की आवाज़ में चिंता थी।

"आ जाएँगे बेटा, बरसात में साइकिल धीमी चलती है।" कमला ने कहा, पर उनके हाथ काँप रहे थे।

गुड़िया रोने लगी। "माँ! पापा को कुछ हो गया तो?"

"चुप बेटा! ऐसा नहीं कहते। तेरे पापा बहुत हिम्मती हैं।" कमला ने उसे सीने से लगाया।

अनिल छाता लेकर नुक्कड़ तक गया, पर कोई नहीं दिखा। लौटकर बोला, "माँ, गली में पानी भर गया है।"

रात के नौ बजे दरवाज़ा खटखटाया। कमला दौड़कर गईं। सामने रघुनाथ प्रसाद खड़े थे, पूरी तरह भीगे हुए। कपड़ों से पानी टपक रहा था। साइकिल नहीं थी।

"पापा!" गुड़िया दौड़कर लिपटी।

"अरे! अरे! मैं भीग गया हूँ बेटा, तू भी भीग जाएगी!" पापा ने उसे अलग किया, पर वह नहीं हटी।

कमला ने तौलिया दिया। "इतनी बरसात में क्यों आए? कहीं रुक जाते! साइकिल कहाँ है?"

"साइकिल का पहिया कीचड़ में फँस गया, चेन टूट गई। वहीं एक दुकान पर रख आया हूँ।" रघुनाथ बोले। "पर डाक... डाक तो पहुँचानी थी। एक माँ अपने बेटे के पत्र की प्रतीक्षा कर रही थी। तीन महीने से कोई खबर नहीं थी। मैं न जाता, तो वह रातभर सो न पाती।"

कमला की आँखों में आँसू आ गए। "आप भी न! अपनी जान की परवाह ही नहीं!"

"कमला! डाकिया की जान तो उसकी डाक में बसती है।" पापा मुस्कराए।

उस रात चाय के साथ खिचड़ी बनी। पापा ने भीगे कपड़े बदलकर, तौलिये में लिपटकर चाय पी। "आज की चाय सबसे मीठी लग रही है! इसमें तुम्हारी चिंता का स्वाद है!"

गुड़िया ने अपनी नई फ्रॉक के पल्लू से पापा के जूते पोंछे। पापा ने उसे सीने से लगा लिया। "मेरी बेटी सबसे प्यारी!"

उस रात पापा को हल्का बुखार हो गया। कमला ने रातभर पट्टी रखी। सुबह पापा ने कहा, "देखा! तुम्हारी सेवा से बुखार भी भाग गया!"

5. सर्दियों की धूप वाली शाम

पूस का महीना। दिन छोटे, रातें लंबी। शाम के पाँच बजे ही अँधेरा घिरने लगता। पापा थोड़ा जल्दी आने लगे, साढ़े पाँच बजे।

सर्दियों में चाय के साथ कुछ खास होता। कभी गजक, कभी मूँगफली, कभी शकरकंदी। पापा आते, तो अंगीठी जलती। सब अंगीठी के चारों ओर बैठते। चाय की चुस्कियों के साथ भुनी मूँगफली।

"पापा! कहानी सुनाओ न!" गुड़िया कहती।

"कौन-सी कहानी?"

"वह वाली, जब आपने बाढ़ में डाक पहुँचाई थी!"

पापा हँसते। "अच्छा सुनो। उस साल गंगा में बाढ़ आई थी। पूरा गाँव डूब गया था। लोग छतों पर थे। मैं नाव में बैठकर डाक बाँटने गया। एक बूढ़ी दादी ने कहा, बेटा, तू तो भगवान है!"

"पापा! आप सच में हीरो हैं!" अनिल कहता।

"हीरो नहीं बेटा, कर्तव्य। हर आदमी का कोई न कोई कर्तव्य होता है। मेरा कर्तव्य डाक पहुँचाना है।" पापा कहते।

एक सर्द शाम पापा अपने साथ एक पुराना कंबल लाए। "आज रास्ते में एक भिखारी ठिठुर रहा था। मैंने अपना कंबल उसे दे दिया।"

"तो आप कैसे आएँगे?" कमला ने पूछा।

"मेरे पास तो घर है, चाय है, तुम सब हो। उसके पास क्या है?" पापा बोले।

कमला ने चुपचाप अलमारी से नया कंबल निकाला। "यह लीजिए, कल से यही ओढ़कर जाइएगा।"

6. होली, दीपावली और पापा

होली पर पापा बच्चों जैसे हो जाते। सुबह ही रंग लेकर आते। "आज डाक विभाग की छुट्टी! आज तो रंगों की डाक बँटेगी!"

वे गुड़िया के गालों पर गुलाल लगाते। अनिल पर पिचकारी से रंग डालते। सुनीता के पैरों पर रंग लगाकर आशीर्वाद देते। कमला को देखते, तो शरमाकर कहते, "तुम तो पहले से ही इतनी सुंदर हो, रंग की क्या ज़रूरत!"

"धत्! बच्चों के सामने!" कमला शरमातीं।

शाम को भांग की ठंडाई नहीं, मीठी चाय बनती। साथ में गुझिया। पापा कहते, "रंगों का त्योहार प्रेम का त्योहार है।"

दीपावली की तैयारियाँ ज़ोरों पर होतीं। कमला गुजिया बनातीं। सुनीता रंगोली सजाती। अनिल दीये खरीदता। गुड़िया फुलझड़ियाँ गिनती।

धनतेरस की शाम पापा आए, तो उनके थैले में कुछ छिपा था। "आँखें बंद करो!" उन्होंने कहा।

सबने आँखें बंद कीं। पापा ने एक-एक उपहार निकाला। सुनीता के लिए सुंदर साड़ी। अनिल के लिए क्रिकेट का बल्ला। गुड़िया के लिए लाल फ्रॉक और एक बड़ी-सी गुड़िया। कमला के लिए चाँदी की पायल।

"इतना खर्च क्यों किया?" कमला ने डाँटा, पर आँखों में खुशी के आँसू थे।

"पूरे साल की बचत है। बोनस मिला था।" पापा मुस्कराए। "तुम सबकी खुशी से बड़ा धन क्या है? मैं तो रोज़ लोगों की खुशियों की डाक बाँटता हूँ, आज अपने घर की खुशी बाँट रहा हूँ।"

उस रात चाय के साथ गुजिया खाई गई। दीयों की रोशनी में पापा का चेहरा दमक रहा था। गुड़िया पापा की गोद में बैठी फुलझड़ी जलाती रही।

7. अनिल की परीक्षा और पापा का साथ

एक वर्ष अनिल की बोर्ड परीक्षा थी। वह बहुत घबराया था। रात-रात भर पढ़ता, आँखें लाल हो जातीं।

"बेटा! इतना मत पढ़, सेहत खराब हो जाएगी!" कमला कहतीं।

पापा उसे अपने पास बिठाते। "बेटा! परीक्षा तो आती-जाती रहती है। मेहनत सच्ची होनी चाहिए, फल की चिंता मत कर। मैं रोज़ देखता हूँ, किसान बीज बोता है, पर फल भगवान देता है। तू बीज बो, फल अवश्य मिलेगा।"

परीक्षा वाले दिन पापा उसे साइकिल पर बिठाकर केंद्र तक छोड़ने गए। रास्ते में दही-शक्कर खिलाई। "घबराना मत। प्रश्न ध्यान से पढ़ना। पहले आसान प्रश्न करना।"

"पापा! अगर फेल हो गया तो?" अनिल की आवाज़ काँपी।

"तो क्या? फिर से परीक्षा देना। फेल होना अपराध नहीं, हिम्मत हारना अपराध है।" पापा ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

शाम को पापा आए, तो अनिल दौड़कर आया। "पापा! पेपर बहुत अच्छा हुआ! आपके आशीर्वाद से!"

"मुझे पता था! मेरा बेटा शेर है!" पापा ने उसे गले लगाया। "आज की चाय तेरे नाम! कमला, पकौड़े भी तल दो!"

उस शाम पापा ने एक कहानी सुनाई। "बेटा! मैं भी कभी परीक्षा से डरता था। मेरे पिताजी, तुम्हारे दादाजी कहते थे, डर के आगे जीत है। जो डर को हरा दे, वही सिकंदर!"

8. सुनीता की शादी और विदाई

समय बीता। सुनीता के लिए रिश्ता आया। लड़का था सुशील, बैंक में नौकरी। परिवार सभ्य, संस्कारी। शादी तय हुई।

घर में तैयारियाँ शुरू हुईं। पापा ने अपनी जीवनभर की बचत निकाली। "बेटी की शादी में कोई कमी नहीं होनी चाहिए।"

शादी वाले दिन घर दुल्हन-सा सजा। मेहमानों की भीड़। बाजे-गाजे। सुनीता लाल जोड़े में परी-सी लग रही थी। पापा की आँखों में खुशी और नमी दोनों थी।

कन्यादान के समय पापा का हाथ काँप रहा था। पंडित जी ने मंत्र पढ़े। पापा ने बेटी का हाथ दामाद के हाथ में दिया। "बेटा! मेरी अमानत है, संभालकर रखना।"

विदाई का समय आया। सुनीता पापा से लिपटी। "पापा! मैं आपको बहुत याद करूँगी! आपकी शाम की चाय, आपकी कहानियाँ..."

पापा का गला भर आया। बड़ी मुश्किल से बोले, "बेटा! बेटियाँ तो पराया धन होती हैं, पर दिल से कभी पराई नहीं होतीं। जब भी मन करे, चिट्ठी लिखना। तुम्हारा पापा डाकिया है, तुम्हारी चिट्ठी सबसे पहले पहुँचाएगा! और हाँ, वहाँ भी शाम की चाय ज़रूर पीना, मुझे याद करके।"

सबकी आँखें नम थीं। डोली उठी। पापा दरवाज़े पर खड़े देखते रहे, जब तक गाड़ी आँखों से ओझल न हो गई।

सुनीता के जाने के बाद पहली शाम। चाय बनी। कमला ने चार गिलास बनाए, पर हाथ रुक गया। पाँचवाँ गिलास...

पापा ने कहा, "कमला! एक गिलास अलग रख दो। बेटी की चाय। वह जहाँ भी हो, उसके हिस्से की चाय यहाँ बनेगी।"

कमला ने चुपचाप एक गिलास भरकर तुलसी के पास रख दिया। गुड़िया ने पूछा, "माँ! दीदी की चाय कौन पिएगा?"

"बेटा! प्रेम की चाय कभी व्यर्थ नहीं जाती।" पापा बोले।

उसके बाद हर शाम पाँच गिलास चाय बनती, एक तुलसी के पास रखा जाता।

9. गुड़िया की सफलता

गुड़िया अब बड़ी हो गई थी। दसवीं में उसने ज़िले में प्रथम स्थान प्राप्त किया। अख़बार में नाम छपा। "प्रीति, पुत्री श्री रघुनाथ प्रसाद, ने ज़िले में प्रथम स्थान प्राप्त किया।"

पापा की खुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने पूरे मोहल्ले में लड्डू बँटवाए। डाकखाने में सबने बधाई दी। अधिकारियों ने कहा, "प्रसाद जी! बेटी ने नाम रोशन कर दिया!"

उस शाम घर में उत्सव था। पकौड़े तले गए, खीर बनी। पापा ने गुड़िया को सीने से लगाया। "मेरी बेटी! तूने तो पापा का सीना चौड़ा कर दिया!"

"पापा! यह सब आपके आशीर्वाद से!" गुड़िया की आँखों में आँसू थे।

"नहीं बेटा! यह तेरी मेहनत का फल है।" पापा बोले। "याद रख, शिक्षा सबसे बड़ा धन है। इसे कोई चुरा नहीं सकता।"

10. सेवानिवृत्ति का दिन

वर्षों बीते। रघुनाथ प्रसाद की सेवानिवृत्ति का दिन आया। तीस वर्षों की सेवा। डाकखाने में भव्य समारोह हुआ। अधिकारियों ने उन्हें शॉल ओढ़ाया, स्मृति चिन्ह दिया।

"रघुनाथ जी ने तीस वर्षों में एक भी दिन अवकाश नहीं लिया! एक भी डाक विलंब से नहीं पहुँचाई! यह एक रिकॉर्ड है!" डाक अधीक्षक ने कहा।

सहकर्मियों ने कहा, "प्रसाद जी! आपके बिना डाकखाना सूना हो जाएगा!"

पापा की आँखें भर आईं। "यह डाकखाना मेरा मंदिर था, डाक मेरी पूजा।"

घर लौटे, तो मोहल्ले वालों ने फूलों से स्वागत किया। गुड़िया ने पापा के गले में माला डाली। अनिल ने पैर छुए। कमला ने आरती उतारी।

"पापा! अब आप आराम कीजिएगा! अब कोई सुबह आठ बजे की ड्यूटी नहीं!" गुड़िया बोली।

"आराम? मुझे तो अब भी शाम की चाय का इंतज़ार रहेगा! बस अब घंटी की आवाज़ नहीं आएगी!" पापा हँसे, पर हँसी में एक टीस थी।

उस शाम चाय विशेष बनी। पकौड़े तले गए। समोसे मँगवाए गए। पूरा मोहल्ला इकट्ठा हुआ। पापा ने कहा, "मेरे जीवन की सबसे बड़ी डाक तो यही है, आप सबका प्रेम। चिट्ठियाँ तो कागज़ की थीं, पर आपका प्रेम सोने का है।"

मिश्रा जी बोले, "रघुनाथ भाई! तुमने तो डाकिए की नौकरी को पूजा बना दिया!"

11. अंतिम चाय

सेवानिवृत्ति के दो वर्ष बाद पापा बीमार पड़े। उम्र हो चली थी, शरीर थक चला था। बिस्तर पर लेटे थे। डॉक्टर आते, दवा देते।

एक शाम, छह बजे, पापा ने धीमी आवाज़ में कहा, "कमला! चाय बनाओ। शाम की चाय का समय हो गया।"

कमला ने चाय बनाई। पापा को सहारा देकर बिठाया। पापा ने चुस्की ली। आँखें बंद कीं। "आहा! वही स्वाद। पचास वर्षों से यही स्वाद। कमला, तुम्हारे हाथ में जादू है।"

गुड़िया सिरहाने बैठी थी, पापा का हाथ थामे। "पापा! आप ठीक हो जाएँगे। फिर हम साथ चाय पिएँगे।"

पापा ने उसके सिर पर हाथ फेरा। "बेटा! जीवन भी डाक की तरह है। हर चिट्ठी को एक दिन अपने गंतव्य तक पहुँचना होता है। मैंने अपनी डाक पहुँचा दी। अब मेरी चिट्ठी ऊपर वाले के पास जाने का समय है।"

"ऐसा मत कहिए पापा!" गुड़िया रो पड़ी।

"रो मत बेटी।" पापा बोले। "मैं कहीं नहीं जा रहा। जब भी शाम की चाय बनेगी, मैं उसकी खुशबू में रहूँगा। जब भी गली में साइकिल की घंटी बजेगी, मैं उसकी टन-टन में रहूँगा।"

अनिल ने पापा के पैर दबाए। "पापा! आपने हमें सब कुछ दिया।"

"मैंने कुछ नहीं दिया बेटा, मैंने तो केवल कर्तव्य निभाया।" पापा मुस्कराए।

उस रात पापा शांति से सो गए। चेहरे पर वही मुस्कान, जो वे रोज़ शाम को घर आते समय लाते थे। कभी न जागने वाली नींद।

12. परंपरा जीवित है

घर में मातम छा गया। मोहल्ला उमड़ पड़ा। "रघुनाथ भैया चले गए!" हर आँख नम थी। अंतिम यात्रा में पूरा कस्बा शामिल हुआ।

पर अगले दिन, शाम के छह बजे, कमला देवी ने चाय बनाई। हाथ काँप रहे थे, आँखों में आँसू थे, पर चाय बनी। चार गिलास की जगह... उन्होंने पाँच गिलास बनाए। एक गिलास पापा की तस्वीर के सामने रखा।

"पापा की चाय।" उन्होंने कहा।

गुड़िया ने पूछा, "माँ! अब पापा की चाय कौन पिएगा?"

"बेटा! पापा पिएँगे। वे आते हैं, रोज़ शाम को आते हैं।" कमला बोलीं।

आज वर्षों बीत गए। अनिल डाक विभाग में ही अधिकारी है। वह कहता है, "मैं पापा के नक्शेकदम पर चलूँगा।" गुड़िया शिक्षिका है, बच्चों को पढ़ाती है। सुनीता अपने घर में सुखी है, उसके बच्चे हैं।

पर शांतिपुर के उस घर में आज भी शाम के छह बजे चाय बनती है। कमला देवी अब बहुत बूढ़ी हो गई हैं, पर चाय वही बनाती हैं। वही अदरक, वही इलायची, वही प्रेम। आँगन में पापा की खाट आज भी पड़ी है। उस पर पापा की टोपी रखी है। दीवार पर पापा की तस्वीर है, जिसमें वे मुस्करा रहे हैं।

हर शाम पाँच गिलास चाय बनती है। एक गिलास तस्वीर के सामने रखा जाता है। बच्चे पूछते हैं, "दादी! यह चाय किसके लिए?"

कमला मुस्कराकर कहती हैं, "तुम्हारे नानाजी के लिए। वे शाम को आते हैं, चाय पीते हैं, और हम सबको आशीर्वाद देते हैं।"

और सच ही तो है। जब शाम की चाय की खुशबू उठती है, अदरक और इलायची की महक गली तक जाती है, तो लगता है जैसे दूर से साइकिल की घंटी टनटनाई हो। जैसे पापा आ गए हों। खाकी वर्दी, कंधे पर थैला, चेहरे पर मुस्कान। जैसे कह रहे हों, "कमला! आज की डाक में क्या खास था?"

शाम की चाय, पापा का आना। यह केवल एक कहानी नहीं। यह हर उस घर की कहानी है जहाँ पिता की प्रतीक्षा में शाम सजती है। जहाँ चाय की प्याली में प्रेम घुलता है। जहाँ पिता का आना त्योहार होता है, और पिता की याद पूजा।

पिता चले जाते हैं, पर उनकी घंटी की टन-टन, उनकी चाय की चुस्की, उनकी कहानियों की गूँज कभी नहीं जाती। वह हर शाम, हर चाय के साथ लौट आती है।

सुबह के पाँच बजे थे। गली के नुक्कड़ से घी की खुशबू उठी, और पूरे मोहल्ले को पता चल गया, नंदू हलवाई ने भट्टी जला दी है।नंद...
05/09/2026

सुबह के पाँच बजे थे। गली के नुक्कड़ से घी की खुशबू उठी, और पूरे मोहल्ले को पता चल गया, नंदू हलवाई ने भट्टी जला दी है।

नंदू हलवाई की नुक्कड़ की दुकान : जलेबी, चाय और समोसों के दीवाने

1. वह नुक्कड़, वह दुकान

कस्बा था छोटा-सा, नाम था गोविंदपुर। रेलवे स्टेशन से उतरते ही जो पहली गली दाईं ओर मुड़ती थी, उसी के नुक्कड़ पर थी एक पुरानी-सी दुकान। ऊपर टीन की छत, सामने लकड़ी का बड़ा तख़्त, उस पर पीतल की परातें। दीवार पर काली स्याही से लिखा था, "नंदू हलवाई : शुद्ध देशी घी की जलेबी, समोसा, चाय। सन् 1962 से आपकी सेवा में।"

नंदू हलवाई। असली नाम नंदकिशोर गुप्ता। आयु लगभग साठ वर्ष। गठा हुआ बदन, मूँछें ताव दी हुईं, माथे पर चंदन का टीका, और गले में गमछा। वे जब कड़ाही में जलेबी छानते, तो देखने वालों की भीड़ लग जाती। एक हाथ से मैदे का घोल निचोड़ते, दूसरे हाथ से छन्ना घुमाते, और मुँह से गाते, "जलेबी रसीली, खाओ जी खाओ..."

उनकी पत्नी थीं शांता देवी। दुकान के पीछे छोटे-से घर में रहतीं। वही समोसों में आलू का मसाला भरतीं, वही चाय की पत्ती कूटतीं। उनका बनाया मसाला इतना प्रसिद्ध था कि दूर-दूर से लोग समोसे खाने आते।

उनके दो बेटे थे। बड़ा बेटा मोहन, आयु पैंतीस वर्ष, जो दुकान में पिता का हाथ बँटाता। छोटा बेटा सोहन, आयु अट्ठाईस वर्ष, जो शहर में नौकरी करता, पर हर रविवार दुकान पर आकर बैठता।

दुकान के सामने पड़ी थीं तीन बेंचें। सुबह से शाम तक वहाँ जमावड़ा रहता। कोई चाय पीता, कोई समोसा खाता, कोई सिर्फ़ बैठकर गपशप करता।

2. सुबह की पहली कड़ाही

नंदू हलवाई की दिनचर्या सूर्य से पहले आरंभ होती। प्रातः चार बजे उठकर स्नान, फिर तुलसी को जल, फिर दुकान की सफ़ाई। पाँच बजे भट्टी जलती। बड़ी कड़ाही में घी पिघलता। मैदे का घोल तैयार होता, जिसमें थोड़ा दही मिलाया जाता, ताकि जलेबी खस्ता बने।

साढ़े पाँच बजे पहली जलेबी कड़ाही में पड़ती। छन्न-छन्न की आवाज़, घी की खुशबू, और देखते ही देखते सुनहरी जलेबियाँ तैरने लगतीं। फिर उन्हें चाशनी में डुबोया जाता। केसर और इलायची वाली चाशनी।

सबसे पहले आते थे मास्टर रामदयाल। विद्यालय के अवकाशप्राप्त अध्यापक। हाथ में लोटा, जिसमें वे जलेबी लेकर घर जाते।

"नंदू! आज की पहली जलेबी मेरी!" मास्टर जी कहते।

"मास्टर जी, आपके बिना तो भट्टी भी नहीं जलती!" नंदू हँसकर एक दोना जलेबी देते। पैसे? मास्टर जी महीने के अंत में हिसाब चुकाते। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही थी।

उसके बाद आते थे स्टेशन मास्टर त्रिपाठी जी। रात की ड्यूटी से लौटते हुए वे दो समोसे और एक कुल्हड़ चाय पीते।

"नंदू भाई, तुम्हारे समोसे खाए बिना नींद नहीं आती!" वे कहते।

धीरे-धीरे भीड़ बढ़ती। मज़दूर, किसान, दुकानदार, छात्र। सबकी अपनी-अपनी पसंद। कोई कहता, "भैया, जलेबी ज़रा कुरकुरी करना!" कोई कहता, "समोसे में चटनी ज़्यादा डालना!"

मोहन चाय बनाता। दूध, पानी, चायपत्ती, अदरक, इलायची। कुल्हड़ में उबलती चाय, ऊपर मलाई की परत। एक कुल्हड़ की कीमत उन दिनों दो रुपये थी।

3. दीवानों की टोली

दुकान के नियमित ग्राहकों में एक टोली थी, जिसे सब "जलेबी गैंग" कहते। इसमें थे पाँच मित्र। रमेश, जो कपड़े की दुकान चलाता। सुरेश, जो बैंक में था। दिनेश, जो वकील था। महेश, जो ठेकेदार था। और छोटा पप्पू, जो अभी कॉलेज में पढ़ता था।

हर शाम छह बजे पाँचों बेंच पर जमा होते। आदेश एक ही होता, "नंदू काका! पाँच प्लेट समोसे, पाँच जलेबी, पाँच चाय!"

और फिर शुरू होती गपशप। राजनीति, क्रिकेट, सिनेमा, मोहल्ले की खबरें। कभी हँसी के ठहाके, कभी गंभीर चर्चा।

रमेश कहता, "अरे सुना? शर्मा जी के बेटे को नौकरी मिल गई!"

सुरेश कहता, "बैंक में नया नियम आया है, अब लोन आसान होगा।"

दिनेश वकील अंदाज़ में कहता, "कानून की किताब में लिखा है, समोसा ठंडा खाना अपराध है!"

सब हँस पड़ते। नंदू भी हँसते, "वकील साहब! आपके लिए तो गरम-गरम ही निकलेगा!"

पप्पू सबसे छोटा था, इसलिए उसे चिढ़ाते सब। "पप्पू! तू तो अभी बच्चा है, तुझे तो आधी जलेबी मिलेगी!"

"नहीं! मैं भी पूरा पैसा देता हूँ!" पप्पू मुँह फुलाता।

नंदू उसे पुचकारते, "अरे मेरे लाल! तुझे तो डबल जलेबी मिलेगी। तू तो दुकान का भविष्य है!"

4. बरसात और जलेबी

सावन का महीना नंदू की दुकान के लिए त्योहार था। कहते हैं, बरसात में जलेबी खाने का अपना आनंद है। बादल गरजते, बूँदें पड़तीं, और लोग दुकान के टीन शेड के नीचे खड़े होकर गरम जलेबी खाते।

एक बार भारी बरसात में बिजली चली गई। पूरी गली अँधेरी। पर नंदू की भट्टी जल रही थी। लैंप की रोशनी में जलेबियाँ छन रही थीं। लोग भीगते हुए आए, छाते लगाए, और जलेबी खाई।

"नंदू भाई! अँधेरे में भी तुम्हारी जलेबी चमक रही है!" किसी ने कहा।

नंदू बोले, "बेटा! हलवाई की भट्टी कभी नहीं बुझती। यह तो प्रेम की ज्योति है!"

उस रात दुकान बंद होने तक नंदू ने तीन गुना जलेबी बेची। घर जाकर शांता देवी से बोले, "आज तो बरसात ने भी दुकान की शोभा बढ़ा दी!"

शांता देवी मुस्कराईं, "तुम्हारी जलेबी में जो मिठास है, वह चाशनी की नहीं, तुम्हारे मन की है।"

5. दीपावली की धूम

दीपावली पर दुकान का नज़ारा देखने लायक होता। एक सप्ताह पहले से ऑर्डर आने लगते। कोई दस किलो जलेबी मँगवाता, कोई पाँच किलो समोसे। शांता देवी और मोहन की पत्नी गीता दिन-रात काम करतीं।

धनतेरस के दिन दुकान पर इतनी भीड़ होती कि पुलिस को व्यवस्था के लिए आना पड़ता। नंदू सबको संभालते, "आराम से! सबको मिलेगा! जलेबी खत्म नहीं होगी!"

छोटी दीपावली की रात नंदू ग़रीबों में मुफ़्त जलेबी बाँटते। यह उनकी परंपरा थी। कहते, "जो बाँटता है, वही पाता है।"

एक बार एक बूढ़ी भिखारिन आई। नंदू ने उसे दो किलो जलेबी दी। वह रो पड़ी, "बेटा! भगवान तुम्हें लंबी उम्र दे!"

नंदू की आँखें भर आईं। "माई! यह तो मेरा सौभाग्य है कि आपने मेरी जलेबी स्वीकार की।"

6. संकट और स्नेह

एक वर्ष गाँव में हैज़ा फैला। डॉक्टरों ने कहा, बाहर का खाना मत खाओ। दुकान की बिक्री आधी रह गई। नंदू चिंतित हुए। कर्ज़ा भी था।

तभी "जलेबी गैंग" आगे आई। रमेश ने कहा, "नंदू काका! घबराओ मत। हम हैं न!"

पाँचों मित्रों ने मिलकर प्रचार किया। डॉक्टर से प्रमाणपत्र लाए कि दुकान में पूर्ण स्वच्छता है। नंदू ने भी दुकान में नई टाइलें लगवाईं, पानी का फिल्टर लगवाया।

धीरे-धीरे ग्राहक लौटे। एक दिन मास्टर रामदयाल ने कहा, "नंदू! तुम्हारी दुकान तो इस कस्बे की धड़कन है। यह बंद हो जाए, तो कस्बा सूना हो जाए।"

नंदू ने हाथ जोड़ दिए। "मास्टर जी! यह दुकान मेरी नहीं, आप सबकी है।"

7. पीढ़ी का हस्तांतरण

समय बीता। नंदू की आयु बढ़ी। एक दिन उन्होंने मोहन को बुलाकर कहा, "बेटा! अब कड़ाही की कमान तुम्हारे हाथ। मैं तो अब सलाहकार बनूँगा।"

मोहन की आँखों में आँसू थे। "पिताजी! आपके बिना यह दुकान अधूरी है।"

"नहीं बेटा!" नंदू बोले, "हलवाई का हुनर हाथ में नहीं, हृदय में होता है। जब तक हृदय में प्रेम है, जलेबी मीठी बनेगी।"

मोहन ने कमान संभाली। उसने दुकान का थोड़ा आधुनिकीकरण किया। नया साइनबोर्ड लगवाया, बैठने के लिए कुर्सियाँ बढ़ाईं। पर स्वाद वही रखा। वही घी, वही मसाला, वही चाशनी।

सोहन ने शहर से आकर कहा, "भैया! क्यों न हम ऑनलाइन ऑर्डर शुरू करें?"

मोहन हँसा, "अरे! जलेबी तो गरम खाने में आनंद है। ऑनलाइन में वह बात कहाँ?"

पर सोहन ने एक छोटा-सा प्रयास किया। कस्बे में होम डिलीवरी शुरू की। साइकिल पर टिफ़िन में जलेबी-समोसे घर-घर पहुँचने लगे। बिक्री और बढ़ी।

8. स्वर्ण जयंती

सन् 2012 में दुकान के पचास वर्ष पूरे हुए। स्वर्ण जयंती मनाई गई। पूरा कस्बा उमड़ पड़ा। "जलेबी गैंग" के पाँचों मित्र अब अधेड़ हो चुके थे, पर जोश वही था।

मंच सजा। नंदू हलवाई का सम्मान हुआ। ज़िलाधिकारी ने उन्हें "कस्बा गौरव" की उपाधि दी। नंदू ने माइक पर कहा,

"भाइयों और बहनों! 1962 में मैंने यह दुकान एक कड़ाही और एक सपने के साथ शुरू की थी। आज यह दुकान नहीं, एक परिवार है। आप सब मेरे परिवार हैं। मेरी जलेबी में जो मिठास है, वह आपके प्रेम की है। मेरे समोसों में जो स्वाद है, वह आपके स्नेह का है। मेरी चाय में जो खुशबू है, वह आपकी आत्मीयता की है।"

तालियों की गड़गड़ाहट हुई। कई आँखें नम थीं।

उस दिन नंदू ने घोषणा की, "आज से हर रविवार ग़रीब बच्चों को मुफ़्त नाश्ता मिलेगा। यह मेरी गुरु-दक्षिणा है इस कस्बे को।"

9. अंतिम अध्याय नहीं, नया आरंभ

आज नंदू हलवाई इस संसार में नहीं हैं। पर उनकी दुकान आज भी उसी नुक्कड़ पर है। मोहन अब बूढ़ा हो चला है, उसका बेटा अमन दुकान संभालता है।

सुबह पाँच बजे भट्टी आज भी जलती है। घी की खुशबू आज भी गली में फैलती है। बेंचों पर आज भी भीड़ रहती है। "जलेबी गैंग" की नई पीढ़ी आ गई है। पप्पू का बेटा टिंकू अब टोली का सबसे छोटा सदस्य है।

दीवार पर वही पुराना बोर्ड है, बस नीचे एक पंक्ति और जुड़ गई है, "संस्थापक : स्वर्गीय नंदकिशोर गुप्ता (नंदू हलवाई)। उनके आशीर्वाद से स्वाद वही, प्रेम वही।"

जो भी गोविंदपुर आता है, उससे लोग कहते हैं, "नंदू हलवाई की जलेबी खाए बिना मत जाना!"

और सच ही तो है। दुकानें तो बहुत होती हैं, पर जो दुकान दिलों में बस जाए, वह अमर हो जाती है। नंदू हलवाई की नुक्कड़ की दुकान केवल जलेबी, चाय और समोसों की दुकान नहीं थी। वह प्रेम की दुकान थी, स्नेह की दुकान थी, अपनत्व की दुकान थी।

आज भी जब कड़ाही में जलेबी छनती है, तो लगता है जैसे नंदू काका कहीं से गा रहे हैं, "जलेबी रसीली, खाओ जी खाओ..."

1990 के दशक के उस गाँव की गलियों में, जहाँ साइकिल की घंटी की टन-टन सुबह का अलार्म होती थी, एक कहानी आज भी साँस लेती है।स...
05/09/2026

1990 के दशक के उस गाँव की गलियों में, जहाँ साइकिल की घंटी की टन-टन सुबह का अलार्म होती थी, एक कहानी आज भी साँस लेती है।

साइकिल की सवारी : गाँव की गलियाँ, 1990 की वह दस्तक

1. बरगद वाला मोड़

उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में बसा था रामपुर गाँव। न बहुत बड़ा, न बहुत छोटा। लगभग दो सौ घर, एक प्राथमिक विद्यालय, एक शिव मंदिर, एक तालाब, और गाँव के बाहर विशाल बरगद का पेड़, जिसके नीचे पंचायत बैठती थी।

गाँव के सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति थे पंडित रामनारायण तिवारी। आयु लगभग पैंसठ वर्ष, गौर वर्ण, माथे पर त्रिपुंड, कंधे पर जनेऊ। वे संस्कृत के ज्ञाता थे और गाँव के बच्चों को निःशुल्क वेद-पाठ सिखाते थे। उनकी पत्नी सावित्री देवी, जो अपने हाथ के बने आम के अचार के लिए पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध थीं।

उनके दो पुत्र थे। ज्येष्ठ पुत्र हरिशंकर तिवारी, जो पास के कस्बे में डाकखाने में बाबू थे। कनिष्ठ पुत्र प्रकाश तिवारी, आयु सोलह वर्ष, जो गाँव के इंटर कॉलेज में ग्यारहवीं कक्षा का छात्र था। प्रकाश के पास थी एक पुरानी किंतु चमचमाती हीरो साइकिल, जिसे वह अपने प्राणों से अधिक प्रेम करता था।

पंडित जी के पड़ोस में रहता था लोधी परिवार। मुखिया थे ठाकुर बलवंत सिंह। उनका पुत्र अर्जुन सिंह, आयु सत्रह वर्ष, प्रकाश का अभिन्न मित्र। अर्जुन के पास थी एक एटलस साइकिल, जिसकी घंटी की आवाज़ पूरे गाँव में पहचानी जाती थी।

गली के अंतिम छोर पर था प्रजापति परिवार। कुम्हार कन्हैयालाल प्रजापति मिट्टी के बर्तन बनाते थे। उनकी पुत्री गायत्री, आयु पंद्रह वर्ष, जो विद्यालय की सबसे मेधावी छात्रा थी। गायत्री के पास थी एक छोटी लेडीज़ साइकिल, जिसे उसके पिता ने उसकी कक्षा में प्रथम आने पर उपहार में दिया था।

और थे मास्टर दीनदयाल उपाध्याय। गाँव के प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक। उनकी साइकिल थी एक पुरानी रैले, जिसके कैरियर पर वे पुस्तकों का झोला बाँधकर विद्यालय जाते थे। बच्चे उन्हें "साइकिल वाले गुरुजी" कहते थे।

2. भोर की घंटी

1990 के दशक में गाँव की सुबह अलार्म घड़ी से नहीं, प्रकृति और परिश्रम से होती थी। ब्रह्ममुहूर्त में मंदिर का घंटा बजता। पंडित रामनारायण तिवारी स्नान करके शिवालय जाते, शंखनाद करते। उसके पश्चात् गाँव जागता।

प्रकाश की दिनचर्या का आरंभ साइकिल से होता। प्रातः पाँच बजे वह उठता, दातुन करता, कुएँ के शीतल जल से स्नान करता। फिर अपनी हीरो साइकिल को आँगन में खड़ी करके उसे पोंछता। टायरों में हवा जाँचता, चेन में सरसों का तेल डालता, घंटी बजाकर देखता। यह उसकी पूजा थी।

"प्रकाश!" माँ सावित्री देवी पुकारतीं, "नाश्ता कर ले बेटा, फिर जाना।"

"आया माँ!" प्रकाश पराठे और गुड़ खाकर, बस्ता कैरियर पर बाँधकर निकल पड़ता। गली में अर्जुन पहले से प्रतीक्षा करता मिलता।

"चलो मित्र! आज मास्टर जी से पहले विद्यालय पहुँचना है!" अर्जुन कहता।

दोनों मित्र साइकिलों पर सवार होकर गाँव की कच्ची-पक्की गलियों से गुज़रते। रास्ते में गायत्री मिलती, अपनी लेडीज़ साइकिल पर, बस्ता सामने की टोकरी में रखे।

"नमस्ते गायत्री!" दोनों कहते।

"नमस्ते! आज विज्ञान की परीक्षा है, स्मरण है न?" गायत्री मुस्कराकर कहती।

तीनों की साइकिलें साथ-साथ चलतीं। घंटियों की टन-टन, चिड़ियों का कलरव, खेतों से आती सरसों के फूलों की सुगंध, और दूर क्षितिज पर उगता सूर्य। यही था 1990 का गाँव, यही थी वह दस्तक जो हृदय के द्वार खटखटाती थी।

विद्यालय का मार्ग लगभग तीन कोस था। रास्ते में पड़ता था वह प्रसिद्ध बरगद का पेड़। उसके नीचे एक छोटी चाय की दुकान थी, जिसे चलाते थे हरिया काका। हरिया काका की दुकान पर मिट्टी के कुल्हड़ों में चाय मिलती थी। कभी-कभी तीनों मित्र वहाँ रुककर एक-एक कुल्हड़ चाय पीते, पैसे मिलाकर चुकाते।

"काका, आज उधारी!" अर्जुन हँसकर कहता।

"अरे बेटा, तुम्हारी उधारी तो सरस्वती माता चुकाएँगी, खूब पढ़ो!" हरिया काका आशीर्वाद देते।

3. विद्यालय और दोपहर की धूप

इंटर कॉलेज एक पुराना भवन था, जिसके सामने विशाल मैदान था। साइकिल स्टैंड में सैकड़ों साइकिलें खड़ी होतीं। प्रकाश अपनी साइकिल को सदैव एक ही स्थान पर खड़ा करता, ताला लगाता, और ताले की चाबी जनेऊ में बाँध लेता।

कक्षाओं में पढ़ाई होती। गुरुजन ब्लैकबोर्ड पर चॉक से लिखते। प्रकाश गणित में निपुण था, अर्जुन इतिहास में, और गायत्री तो सर्वगुण संपन्न थी। मध्यावकाश में तीनों वटवृक्ष के नीचे बैठकर रोटी-सब्ज़ी खाते। गायत्री अपनी माँ के हाथ के बने आलू के पराठे लाती, प्रकाश गुड़-चना, अर्जुन सत्तू के लड्डू। भोजन का आदान-प्रदान होता, हँसी-ठिठोली होती।

एक दिन विज्ञान के अध्यापक श्रीवास्तव जी ने घोषणा की, "बच्चों! इस वर्ष जनपद स्तरीय साइकिल दौड़ प्रतियोगिता होगी। विजेता को ज़िला विद्यालय निरीक्षक सम्मानित करेंगे।"

पूरी कक्षा में हर्ष की लहर दौड़ गई। प्रकाश और अर्जुन ने एक-दूसरे को देखा। आँखों में एक ही संकल्प था, प्रतियोगिता में भाग लेना है।

"गायत्री, तुम भी भाग लो!" प्रकाश ने कहा।

"बालिकाओं की श्रेणी भी है। मैं अवश्य भाग लूँगी!" गायत्री ने दृढ़ता से कहा।

उस दिन से तीनों का अभ्यास आरंभ हुआ। प्रातः चार बजे उठकर वे गाँव के बाहर कच्चे मार्ग पर अभ्यास करते। कभी प्रकाश आगे निकलता, कभी अर्जुन। गायत्री भी किसी से कम न थी। उसकी लेडीज़ साइकिल छोटी थी, किंतु उसका साहस विशाल था।

मास्टर दीनदयाल उपाध्याय ने उन्हें देखकर कहा, "बच्चों! साइकिल केवल यंत्र नहीं, यह आत्मविश्वास के पहिये हैं। जो इन पर संतुलन साध ले, वह जीवन में भी संतुलन साध लेता है।"

4. सावन की गलियाँ

सावन का महीना आया। गाँव हरियाली से ढक गया। खेतों में धान की रोपाई हो रही थी। गलियों में कीचड़ था, किंतु बच्चों के उल्लास में कोई कमी न थी।

रक्षाबंधन के दिन गायत्री ने प्रकाश और अर्जुन दोनों को राखी बाँधी। प्रकाश ने वचन दिया, "बहन! तुम्हारी रक्षा का दायित्व मेरा।" अर्जुन ने अपनी जेब से एक छोटा-सा दर्पण निकालकर उपहार दिया।

जन्माष्टमी पर गाँव में भव्य आयोजन हुआ। मंदिर में झाँकी सजी। प्रकाश ने श्रीकृष्ण की वेशभूषा धारण की, अर्जुन अर्जुन बने, और गायत्री राधा। रात्रि में दही-हांडी फोड़ी गई। पूरा गाँव एकत्र हुआ। पंडित रामनारायण तिवारी ने भागवत कथा सुनाई।

"देखो बच्चों," उन्होंने कहा, "श्रीकृष्ण ने भी जीवन के कुरुक्षेत्र में रथ के पहियों को धर्म की दिशा दी। तुम्हारी साइकिल के पहिये भी तुम्हें सन्मार्ग पर ले जाएँ, यही आशीर्वाद है।"

तीज-त्योहारों पर साइकिल का विशेष महत्व था। दीपावली पर प्रकाश ने अपनी साइकिल को फूलों से सजाया, हैंडल पर आम के पत्तों का तोरण बाँधा। गाँव के सभी बच्चे अपनी-अपनी साइकिलें सजाकर शोभायात्रा निकालते। घंटियाँ बजतीं, बच्चे गाते, "दीप जले, खुशियाँ मनाएँ..."

5. प्रतियोगिता का दिन

अंततः वह दिन आया। जनपद स्तरीय साइकिल दौड़। स्थान था ज़िला मुख्यालय का परेड मैदान। गाँव से एक ट्रैक्टर-ट्रॉली में बच्चे, गुरुजन और अभिभावक गए। पंडित रामनारायण तिवारी ने तीनों को तिलक लगाकर आशीर्वाद दिया। सावित्री देवी ने दही-शक्कर खिलाई। ठाकुर बलवंत सिंह ने अर्जुन के कंधे पर हाथ रखकर कहा, "बेटा! हार-जीत से बड़ा है प्रयास।"

बालक वर्ग में प्रकाश और अर्जुन थे। बालिका वर्ग में गायत्री।

शंखनाद हुआ, हरी झंडी दिखी, और साइकिलें दौड़ पड़ीं। धूल उड़ने लगी। दर्शक चिल्लाने लगे। प्रकाश ने आरंभ से ही बढ़त बनाई। अर्जुन उसके ठीक पीछे था। अंतिम चक्र में अर्जुन ने पूरी शक्ति लगाई और प्रकाश से आगे निकल गया।

परिणाम आया। बालक वर्ग में अर्जुन प्रथम, प्रकाश द्वितीय। बालिका वर्ग में गायत्री प्रथम!

गाँव में हर्षोल्लास छा गया। ट्रैक्टर-ट्रॉली में ढोल बजाते हुए तीनों विजेता गाँव लौटे। बरगद वाले मोड़ पर पूरा गाँव स्वागत के लिए खड़ा था। हरिया काका ने सबको निःशुल्क चाय पिलाई।

उस सायंकाल पंडित जी के आँगन में भोज हुआ। पूड़ी, कचौड़ी, खीर। ठाकुर बलवंत सिंह ने घोषणा की, "इस वर्ष गाँव में साइकिल दौड़ का आयोजन हम करेंगे!"

6. शीत ऋतु की स्मृतियाँ

पूस का महीना। घना कुहासा। सुबह साइकिल चलाना कठिन था। किंतु प्रकाश, अर्जुन और गायत्री का अभ्यास नहीं रुकता था। वे कुहासे में घंटी बजाते हुए विद्यालय जाते। गुरुजी कहते, "देखो, ये हैं सच्चे साधक।"

मकर संक्रांति पर गाँव में खिचड़ी भोज हुआ। तिल के लड्डू, गुड़ की गजक। बच्चे पतंग उड़ाते। प्रकाश की पतंग सबसे ऊँची जाती। अर्जुन की पतंग कट जाती तो वह हँसकर कहता, "कोई बात नहीं, अगली बार!"

होली आई। गाँव रंगों से सराबोर हुआ। साइकिलों पर रंग, कपड़ों पर रंग, चेहरों पर रंग। गायत्री ने दोनों भाइयों पर गुलाल लगाया। ठाकुर साहब ने पूरे गाँव को भोज दिया।

7. विदाई और नई दस्तक

वर्ष 1990 का अंतिम चरण। ग्यारहवीं की परीक्षाएँ समाप्त हुईं। ग्रीष्मावकाश में एक सायंकाल तीनों मित्र बरगद के नीचे बैठे थे।

"मित्रों," प्रकाश ने कहा, "अगले वर्ष बारहवीं है। उसके बाद न जाने कौन कहाँ जाए। किंतु यह साइकिल, ये गलियाँ, ये स्मृतियाँ सदैव रहेंगी।"

गायत्री की आँखों में आँसू थे। "मैं शिक्षिका बनना चाहती हूँ। गाँव की बालिकाओं को पढ़ाऊँगी।"

अर्जुन ने कहा, "मैं सेना में जाऊँगा। देश की सेवा करूँगा।"

प्रकाश ने आकाश की ओर देखा। "और मैं अभियंता बनकर गाँव की गलियों को पक्का कराऊँगा, ताकि आने वाली पीढ़ी की साइकिलें कीचड़ में न फँसें।"

तीनों ने एक-दूसरे के हाथ थामे। बरगद की छाँव में, चाय के कुल्हड़ों की खुशबू में, उन्होंने संकल्प लिया।

उसी रात्रि प्रकाश ने अपनी डायरी में लिखा, "1990 का यह दशक मेरे जीवन का स्वर्णिम अध्याय है। साइकिल के दो पहिये मुझे सिखा गए कि जीवन में संतुलन ही सबसे बड़ी कला है। गाँव की गलियाँ मुझे सिखा गईं कि मंज़िल से अधिक सुंदर होता है मार्ग। और मेरे मित्र मुझे सिखा गए कि सच्ची संपत्ति स्नेह है।"

8. उपसंहार

आज वर्षों बीत गए। रामपुर गाँव अब पहले जैसा नहीं। गलियाँ पक्की हो गई हैं। घरों में मोटरसाइकिलें आ गई हैं। किंतु बरगद का पेड़ आज भी खड़ा है। हरिया काका की दुकान अब उनका पुत्र चलाता है।

प्रकाश अभियंता बना। उसने गाँव की गलियों को पक्का कराया। अर्जुन सेना में अधिकारी बना। गायत्री गाँव के विद्यालय की प्रधानाध्यापिका बनी।

प्रति वर्ष दीपावली पर तीनों अपने परिवारों सहित गाँव आते हैं। अपनी पुरानी साइकिलें निकालते हैं, उन पर सवार होकर गाँव की गलियों में घूमते हैं। बच्चे आश्चर्य से देखते हैं।

"पापा! यह खटारा साइकिल क्यों चलाते हो?" प्रकाश का पुत्र पूछता है।

प्रकाश मुस्कराकर उत्तर देता है, "बेटा! यह खटारा नहीं, यह मेरी गुरु है। इसने मुझे 1990 के उस दशक में जीवन की सबसे बड़ी शिक्षा दी थी। जब भी मैं इन गलियों में साइकिल चलाता हूँ, मुझे वह दस्तक सुनाई देती है, जो मेरे हृदय के द्वार पर आज भी दस्तक देती है और कहती है, जड़ें कभी मत भूलना।"

और सच ही तो है। समय बदलता है, युग बदलते हैं, किंतु गाँव की गलियों में गूँजती साइकिल की घंटी, मित्रता की मधुर स्मृतियाँ, और 1990 के उस स्वर्णिम दशक की दस्तक कभी पुरानी नहीं होती। वह हर हृदय में अमर रहती है।

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