WAQF TODAY

Website

WAQF TODAY Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from WAQF TODAY, News & Media Website, Lucknow.
(2)

اردو و ہندی میں تازہ ترین خبریں۔ ملکی، بین الاقوامی، تعلیم، صحت، تفریح، اور مذہب — وقف کے متعلق۔
ताज़ा ख़बरें हिंदी और उर्दू में। देश-दुनिया, शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन और धर्म — वक्फ के बारे में।

देश-दुनिया में चर्चित हुए मेरठ के नीले ड्रम हत्‍याकांड में आखिरकार फैसला आ गया। जिला एवं सत्र न्‍यायाधीश अरविंद कुमार मि...
15/10/2026

देश-दुनिया में चर्चित हुए मेरठ के नीले ड्रम हत्‍याकांड में आखिरकार फैसला आ गया। जिला एवं सत्र न्‍यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा II ने पति सौरभ की हत्‍या करने वाली मुस्‍कान और उसके प्रेमी साहिल को फांसी की सजा सुनाई है। सजा का ऐलान होते ही जहां मुस्‍कान और साहिल रोने लगे, वहीं कोर्ट के बाहर वकीलों ने एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर खुशी मनाई।

ब्रह्मापुरी मोहल्‍ले में रहने वाले सौरभ राजपूत की हत्‍या 3 मार्च, 2025 को हुई थी। करीब डेढ़ साल तक चली सुनवाई के बाद जज ने अपना फैसला सुना दिया। जज अरविंद कुमार मिश्रा II ने 31 मई, 2003 को सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के रूप में अपना करियर शुरू किया था। 23 साल के करियर में वह गोरखपुर, मिर्जापुर, कानपुर, अलीगढ़ और गाजीपुर की अदालतों में तैनात रहे। मेरठ के जिला अदालत में उन्‍होंने 21 मई, 2026 को जॉइन किया था।
वह मूलरूप से मऊ के रहने वाले हैं। उन्‍होंने बीए, एलएलबी और एलएलएम की पढ़ाई की है। सजाए का ऐलान करते समय जज अरविंद कुमार मिश्रा II ने कहा- अधर्म के काम पर सजा देना धर्म होता है। मुस्‍कान और साहिल आप दोनों ने सौरभ राजपूत की नृशंस हत्‍या की है। इसे छोड़ा नहीं जा सकता। इसमें किसी तरह की माफी नहीं स्‍वीकार होगी। इ‍सलिए आप दोनों को मृत्‍युदंड दिया जाता है।

मेरठ में पहली बार किसी महिला को फांसी की सजा

बताया जा रहा है कि मेरठ में पहली बार किसी महिला कैदी को फांसी की सजा मिली है। सजा मिलने के बाद मुस्‍कान और साहिल को विशेष बैरक में शिफ्ट कर दिया गया है। अभी तक दोनों सामान्‍य कपड़े पहनते थे। अब मुस्‍कान को क्रीम कलर की साड़ी या सूट और साहिल को सफेद कुर्ता और पैजामा पहनना होगा।

15 October - भारत रत्न डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जयंती 🙏मिसाइल मैन, जन-जन के राष्ट्रपति, और युवाओं के प्रेरणास्रोत को शत-...
15/10/2026

15 October - भारत रत्न डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जयंती 🙏
मिसाइल मैन, जन-जन के राष्ट्रपति, और युवाओं के प्रेरणास्रोत को शत-शत नमन।
आपने सिखाया - "सपना वो नहीं जो आप सोते हुए देखते हैं, सपना वो है जो आपको सोने न दे।"
जन्म: 15 अक्टूबर 1931
अमर श्रद्धांजलि 💐

14/10/2026

दुआ भी हुई, जनता ने बात भी कही! यूपी की सत्ता में इस बार कौन? सियासी दावों के बीच जनता का क्या है मिज़ाज? 🤔

13/10/2026

👎🏽

13/10/2026

Neha Bora Rahul ghandhi Protest

09/10/2026
नदवा का दीनी, सामाजिक और राजनीतिक सफरनामा:लखनऊ ( मुफ्ती अब्दुल गफ्फार ) : ​दारुल उलूम नदवतुल उलेमा (लखनऊ) के बानी हजरत म...
08/10/2026

नदवा का दीनी, सामाजिक और राजनीतिक सफरनामा:

लखनऊ ( मुफ्ती अब्दुल गफ्फार ) : ​दारुल उलूम नदवतुल उलेमा (लखनऊ) के बानी हजरत मौलाना अबुल हसन अली हसानी नदवी (मौलाना अली मियां) ने अपनी जिंदगी को दीनी तालीम और खानकाही तरबियत के फरोग के लिए वक्फ कर दिया था। अपनी इल्मी सलाहियत और खलीज (खाड़ी) मुमालिक के शेखों से गहरे ताल्लुकात व रसूख की वजह से देश और दुनिया में उनका एक बड़ा मकाम था और हुकूमत के दौर-ए-इक्तदार में भी उनकी बात को अहमियत दी जाती थी। 80 के दशक में जब वजीर-ए-आजम इंदिरा गांधी ने उलेमाओं को सियासत में शामिल होने की दावत दी, तो कई लोगों ने इसे कबूल किया, लेकिन मरहूम अली मियां उन बुजुर्गों में से थे जिन्होंने सियासत से खुद को पूरी तरह अलग रखा और इंकार कर दिया।
​ताहम, उनके दुनिया से रुखसत होने के बाद मंजरनामा बदला है। आज उनके कुछ शागिर्दों ने दीनी खिदमत के बजाय सियासत, मीडिया और सामाजिक मैदानों में अपने कदम आगे बढ़ाए हैं। मसलन, मोहिबुल्लाह नदवी (मेम्बर ऑफ पार्लियामेंट) और शकील अहमद नदवी (समाजवादी पार्टी के अकलियत मोर्चे के सदर) के तौर पर सियासी जमातों के लिए काम कर रहे हैं। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि इन लोगों के सियासी मकासिद का कौम और मिल्लत के खराबी व भलाई से कोई खास लेना-देना नजर नहीं आता।
​एक और तल्ख हकीकत यह है कि लखनऊ शहर और इसके आसपास के इलाकों में मस्जिद, मदरसों और वक्फ की जमीनों पर नाजायज कब्जों का सिलसिला जारी है, और इसमें जिम्मेदार लोग खामोश तमाशबीन बने हुए हैं। नदवा ने दीनी तालीम के मैदान में अपनी एक नुमाया पहचान तो बनाई, लेकिन उसने अपने से छोटे मदरसों को अपने साथ जोड़ने और उनकी सही रहनुमाई करने में कोताही बरती। दूसरी तरफ, दारुल उलूम देवबंद देश भर में तकरीबन 20,000 मदरसों से वाबस्ता है या उनका संचालन करता है। हालांकि, इन मदरसों के जरूरी कागजात (रजिस्ट्रेशन और लीगल डॉक्यूमेंट्स) दुरुस्त न होने के कारण आज बड़ा संकट खड़ा हो गया है।
​मौजूदा हुकूमत गैर-कानूनी करार देकर मदरसों पर बुलडोजर चला रही है या उन्हें सील कर रही है। पूरे देश में लगभग 3,900 मदरसे इसकी जद में आए हैं, जिनमें से सिर्फ उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में तकरीबन 2,100 मदरसे बुलडोज या बंद कर दिए गए हैं। इस तबाही और बर्बादी के पीछे इन बड़े रहनुमाओं और अदारों (संस्थानों) की रहनुमाई और सरपरस्ती की भारी कमी साफ दिखाई देती है।
​मीडिया और सामाजिक सतह पर भी हालात बेहद फिक्रमंद हैं। 'इंकलाब' और 'राष्ट्रीय सहारा' जैसे उर्दू अखबारों में काम करने वाले अहलकार (पत्रकार) अक्सर वही खबरें चलाते हैं जो हुकूमत या उनके सिंडिकेट आकाओं की मर्जी के मुताबिक होती हैं। हाल ही में जब शहर में 'उम्मीद पोर्टल' (Umeed Portal) पर रजिस्ट्रेशन के लिए उर्दू ऑपरेटरों की सख्त जरूरत थी, तब इन उर्दू ऑपरेटरों ने अपने आकाओं के इशारे और इजाजत न मिलने के कारण इस काम से पूरी तरह बायकाट कर लिया और आगे नहीं आए। ऐसे नाजुक वक्त में शहर की बच्चियों और लड़कियों ने आगे आकर कौम की मदद की और फॉर्म भरने का काम संभाला।
​दूसरी तरफ, यही हजरात चंदा उगाहने, मसलकी झगड़े फैलाने और सियासी पेशेवरी के लिए 'राष्ट्रीय मुस्लिम मंच' जैसे संगठनों में भी सक्रिय पाए जाते हैं। कौमी तालीमी बेदारी का हाल यह है कि लखनऊ यूनिवर्सिटी के उर्दू विभाग में उर्दू पढ़ने के लिए सही एप्लिकेंट (आवेदक) तक मयस्सर नहीं हो रहे हैं।
​आज के इस पुर-आशोब (मुश्किल) दौर में नदवा को अपनी साख और वकार बचाने के लिए दीनी तालीम को आधुनिक व एडवांस बनाना होगा। उसे अपने बानी (मौलाना अली मियां) के उस वाज़ेह ख्वाब को आगे बढ़ाना होगा, जिसमें मसलकी मतभेदों से ऊपर उठकर पूरे समाज को जोड़ने और उनकी सही रहनुमाई करने की बात कही गई थी।

नदवा का दीनी, सामाजिक और राजनीतिक सफरनामा​दारुल उलूम नदवतुल उलेमा (लखनऊ) के बानी हजरत मौलाना अबुल हसन अली हसानी नदवी (मौ...
08/10/2026

नदवा का दीनी, सामाजिक और राजनीतिक सफरनामा
​दारुल उलूम नदवतुल उलेमा (लखनऊ) के बानी हजरत मौलाना अबुल हसन अली हसानी नदवी (मौलाना अली मियां) ने अपनी जिंदगी को दीनी तालीम और खानकाही तरबियत के फरोग के लिए वक्फ कर दिया था। अपनी इल्मी सलाहियत और खलीज (खाड़ी) मुमालिक के शेखों से गहरे ताल्लुकात व रसूख की वजह से देश और दुनिया में उनका एक बड़ा मकाम था और हुकूमत के दौर-ए-इक्तदार में भी उनकी बात को अहमियत दी जाती थी। 80 के दशक में जब वजीर-ए-आजम इंदिरा गांधी ने उलेमाओं को सियासत में शामिल होने की दावत दी, तो कई लोगों ने इसे कबूल किया, लेकिन मरहूम अली मियां उन बुजुर्गों में से थे जिन्होंने सियासत से खुद को पूरी तरह अलग रखा और इंकार कर दिया।
​ताहम, उनके दुनिया से रुखसत होने के बाद मंजरनामा बदला है। आज उनके कुछ शागिर्दों ने दीनी खिदमत के बजाय सियासत, मीडिया और सामाजिक मैदानों में अपने कदम आगे बढ़ाए हैं। मसलन, मोहिबुल्लाह नदवी (मेम्बर ऑफ पार्लियामेंट) और शकील अहमद नदवी (समाजवादी पार्टी के अकलियत मोर्चे के सदर) के तौर पर सियासी जमातों के लिए काम कर रहे हैं। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि इन लोगों के सियासी मकासिद का कौम और मिल्लत के खराबी व भलाई से कोई खास लेना-देना नजर नहीं आता।
​एक और तल्ख हकीकत यह है कि लखनऊ शहर और इसके आसपास के इलाकों में मस्जिद, मदरसों और वक्फ की जमीनों पर नाजायज कब्जों का सिलसिला जारी है, और इसमें जिम्मेदार लोग खामोश तमाशबीन बने हुए हैं। नदवा ने दीनी तालीम के मैदान में अपनी एक नुमाया पहचान तो बनाई, लेकिन उसने अपने से छोटे मदरसों को अपने साथ जोड़ने और उनकी सही रहनुमाई करने में कोताही बरती। दूसरी तरफ, दारुल उलूम देवबंद देश भर में तकरीबन 20,000 मदरसों से वाबस्ता है या उनका संचालन करता है। हालांकि, इन मदरसों के जरूरी कागजात (रजिस्ट्रेशन और लीगल डॉक्यूमेंट्स) दुरुस्त न होने के कारण आज बड़ा संकट खड़ा हो गया है।
​मौजूदा हुकूमत गैर-कानूनी करार देकर मदरसों पर बुलडोजर चला रही है या उन्हें सील कर रही है। पूरे देश में लगभग 3,900 मदरसे इसकी जद में आए हैं, जिनमें से सिर्फ उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में तकरीबन 2,100 मदरसे बुलडोज या बंद कर दिए गए हैं। इस तबाही और बर्बादी के पीछे इन बड़े रहनुमाओं और अदारों (संस्थानों) की रहनुमाई और सरपरस्ती की भारी कमी साफ दिखाई देती है।
​मीडिया और सामाजिक सतह पर भी हालात बेहद फिक्रमंद हैं। 'इंकलाब' और 'राष्ट्रीय सहारा' जैसे उर्दू अखबारों में काम करने वाले अहलकार (पत्रकार) अक्सर वही खबरें चलाते हैं जो हुकूमत या उनके सिंडिकेट आकाओं की मर्जी के मुताबिक होती हैं। हाल ही में जब शहर में 'उम्मीद पोर्टल' (Umeed Portal) पर रजिस्ट्रेशन के लिए उर्दू ऑपरेटरों की सख्त जरूरत थी, तब इन उर्दू ऑपरेटरों ने अपने आकाओं के इशारे और इजाजत न मिलने के कारण इस काम से पूरी तरह बायकाट कर लिया और आगे नहीं आए। ऐसे नाजुक वक्त में शहर की बच्चियों और लड़कियों ने आगे आकर कौम की मदद की और फॉर्म भरने का काम संभाला।
​दूसरी तरफ, यही हजरात चंदा उगाहने, मसलकी झगड़े फैलाने और सियासी पेशेवरी के लिए 'राष्ट्रीय मुस्लिम मंच' जैसे संगठनों में भी सक्रिय पाए जाते हैं। कौमी तालीमी बेदारी का हाल यह है कि लखनऊ यूनिवर्सिटी के उर्दू विभाग में उर्दू पढ़ने के लिए सही एप्लिकेंट (आवेदक) तक मयस्सर नहीं हो रहे हैं।
​आज के इस पुर-आशोब (मुश्किल) दौर में नदवा को अपनी साख और वकार बचाने के लिए दीनी तालीम को आधुनिक व एडवांस बनाना होगा। उसे अपने बानी (मौलाना अली मियां) के उस वाज़ेह ख्वाब को आगे बढ़ाना होगा, जिसमें मसलकी मतभेदों से ऊपर उठकर पूरे समाज को जोड़ने और उनकी सही रहनुमाई करने की बात कही गई थी।

07/10/2026

Jantar mantar media

07/10/2026

Jantar mantar

Address

Lucknow
226001

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when WAQF TODAY posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share