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Shout out to my newest followers! Excited to have you onboard! Dilip Kumar Rajak, Guljar Hussain, Islam Raza, Chatu Giri
20/02/2026

Shout out to my newest followers! Excited to have you onboard! Dilip Kumar Rajak, Guljar Hussain, Islam Raza, Chatu Giri

04/02/2026

जब जंग हो ‘नाइंसाफ़ी’ के ख़िलाफ़
तो कभी बदलना भी पड़ता है किरदार

Shout out to my newest followers! Excited to have you onboard! Raj Kumar, Ram Gopal, Aditi Chanchal, Goutam Laskar, Rohi...
04/02/2026

Shout out to my newest followers! Excited to have you onboard! Raj Kumar, Ram Gopal, Aditi Chanchal, Goutam Laskar, Rohit Yadav Yadav, Lal Rawat, Mamta Adhikari, Amjad Ali, Sirajul Hoque, Saidul Sekh, Kanak Mandal, Niranjan Barman, Jeevram Meena, Ankit Yadav, Abid Shah, Rakesh Kumar, Upendra Yadav, Priti Prajapati, Tuntay Sarkar, Abul Kalam, Mati Mati, Samiul Islam

03/02/2026

हमारी प्रेस कांफ्रेंस के बाद जिस तरह उप्र निर्वाचन आयोग ने FORM 7 से संबंधित गड़बड़ियों और धाँधलियों की शिकायतों का संज्ञान लिया है, वो हर सचेत-सावधान पीडीए प्रहरी की सजगता और सक्रियता का परिणाम है। इसी तरह जुटे रहें। कोई भी कितना भी बड़ा सत्ताधारी हो या भ्रष्टाचारी अधिकारी, जब उनकी काली करतूतों का राज़ खुल जाता है तो जनता और समाज के बीच में अपनी छवि को बचाने के लिए वो अपराध से बचता है। इस आश्वासन का मतलब ये नहीं कि हम चौकन्ना न रहें बल्कि अब और भी तगड़ी निगरानी करनी होगी क्योंकि घपलेबाज फ़ार्म 7 की चार सौ बीसी पकड़े जाने के बाद, वोटों की हेराफेरी के लिए कोई और तरीक़ा ढूँढने की कोशिश करेंगे।

आम जनता, पीडीए प्रहरी, कुछ ईमानदार पत्रकारों और अधिकारियों की वजह से ही लोकतंत्र को बचाया जा सकता है।

With Prempal Singh – I'm on a streak! I've been a top fan for 3 months in a row. 🎉
03/02/2026

With Prempal Singh – I'm on a streak! I've been a top fan for 3 months in a row. 🎉

31/01/2026
31/01/2026
31/01/2026
29/01/2026

कल्पना कीजिए, एक छोटे से गाँव की तंग गली में सुबह की पहली किरण के साथ ही एक लड़का अपनी व्हीलचेयर को धकेलते हुए स्कूल की ओर बढ़ता है। उसके कंधे पर बैग नहीं, बल्कि पूरे जीवन का बोझ है। हाथों में ताकत नहीं, पर आँखों में सपने हैं – एक दिन सरकारी नौकरी, माँ की दवाइयाँ, बहन की शादी, और शायद थोड़ा सम्मान भी।
वही सपना, उसी प्रमाण-पत्र की आस में, जो उसके दर्द को सरकारी कागज पर शब्द दे सके।
पर उसी प्रमाण-पत्र को एक दिन कोई और चुरा लेता है।
कोई ऐसा व्यक्ति, जिसकी आँखें पूरी तरह देखती हैं, पैर मजबूती से चलते हैं, कान साफ सुनते हैं – वह कागज पर लिख देता है "40% दिव्यांग", बस इसलिए कि आरक्षण की सीट उसकी हो जाए। नौकरी मिल जाए। पदोन्नति हो जाए। छूट मिल जाए। जीवन आसान हो जाए।
और उस लड़के का सपना?
वह तो टूट ही जाता है।
उसकी कतार में नाम आने की बारी कभी नहीं आती।
उसकी फाइलें सालों तक लटकी रहती हैं।
जाँच होती है, सत्यापन होता है, पर असली दर्द वाला इंसान आखिर में वही रह जाता है – वंचित, उपेक्षित, और अब अपमानित भी। क्योंकि अब हर दिव्यांग को देखकर लोग सोचते हैं – "कौन जानता है, यह भी फर्जी तो नहीं?"
फर्जी प्रमाण-पत्र सिर्फ एक कागज नहीं चुराता,
वह चुराता है विश्वास।
वह चुराता है इंसाफ।
वह चुराता है उन लोगों का हक, जो हर सुबह दर्द के साथ जागते हैं और दर्द के साथ सोते हैं।
एक माँ है, जिसका बेटा जन्म से ही सुन नहीं सकता।
वह रोज अपने बच्चे को स्कूल छोड़ने जाती है, आँसू पोछते हुए।
उसे पता है कि उसके बेटे को नौकरी में 4% आरक्षण मिलना चाहिए।
पर जब वह ऑफिस जाती है तो अधिकारी कहते हैं – "आपके जैसे बहुत हैं, लिस्ट लंबी है।"
वह नहीं जानती कि उस लिस्ट में कई नाम ऐसे हैं, जिनके कान कभी बहरे हुए ही नहीं।
एक बूढ़ा पिता है, जिसकी कमर झुक गई है, आँखें धुंधली हो गई हैं।
वह पेंशन के लिए चक्कर काटता है।
डॉक्टर ने कहा था – "60% दिव्यांग", पर प्रमाण-पत्र बनवाने में इतना समय लग गया कि अब उसकी बारी ही नहीं आती।
क्योंकि बीच में सैकड़ों फर्जी वाले आ गए, जिन्होंने पैसे देकर, रिश्वत देकर, झूठ बोलकर जगह बना ली।
यह फर्जीवाड़ा कोई साधारण धोखा नहीं है।
यह एक तरह का चोरी है – सबसे गरीब, सबसे असहाय से।
यह उन लोगों की जिंदगी से चोरी है, जिनके पास पहले से ही बहुत कम है।
जिनके पास चलने की ताकत नहीं, सुनने की आवाज नहीं, देखने की रोशनी नहीं – पर उम्मीद थी।
और फर्जी प्रमाण-पत्र ने वह आखिरी उम्मीद भी छीन ली।
तो अगली बार जब कोई फर्जी दिव्यांग प्रमाण-पत्र बनवाए,
तो याद रखना –
वह सिर्फ नौकरी नहीं छीन रहा,
वह किसी बच्चे का बचपन, किसी माँ की नींद, किसी बूढ़े की आखिरी साँस का सुकून छीन रहा है।
हम सब मिलकर आवाज उठाएँ –
नकली दिव्यांगता के खिलाफ,
असली इंसानियत के लिए।
क्योंकि सच्चा दिव्यांग वही नहीं जो शरीर से कमजोर है,
सच्चा दिव्यांग वही है जो दूसरों के हक पर डाका डालता है।
और असली दिव्यांग आज भी इंतजार कर रहा है –
न कि नौकरी का,
बल्कि इंसाफ का।
क्या हम उसे वह इंसाफ देंगे?
या फिर चुपचाप देखते रहेंगे जब उसका हक किसी और की जेब में चला जाता है?
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