Adv. Sarvesh Sonkar

Adv. Sarvesh Sonkar B.Sc , M.Sc , M.A, MBA, LL.B , LLM

03/05/2026

वो दौर सोचिए जब बेटियों को बोझ समझा जाता था, उनकी आवाज़ दबा दी जाती थी और उनके सपनों को जन्म लेने से पहले ही खत्म कर दिया जाता था… उसी अंधेरे में एक इंसान खड़ा हुआ—डॉ. भीमराव अंबेडकर—जिसने सिर्फ कानून नहीं बनाए, बल्कि हर उस खामोश बेटी को आवाज़ दी, उसे पढ़ने का हक दिया, बराबरी का अधिकार दिया और सिर उठाकर जीने की हिम्मत दी… आज अगर कोई लड़की अपने सपने देख पा रही है, अपने फैसले खुद ले पा रही है, तो उसकी हर धड़कन में बाबासाहेब का संघर्ष गूंजता है—क्योंकि उन्होंने सिर्फ समाज नहीं बदला, उन्होंने हर बेटी की किस्मत नई लिख दी।

“SS Coaching, Lucknow has been dedicated to supporting NIOS Board students for the past 25–26 years, especially those fa...
03/05/2026

“SS Coaching, Lucknow has been dedicated to supporting NIOS Board students for the past 25–26 years, especially those facing academic challenges and unable to get promoted. Through our guidance, many students have successfully saved their academic year and built strong careers. Over the years, more than 100,000 students have passed through our coaching and are now leading successful lives across the country and around the world. Today, our students are studying and working in medical and engineering colleges, as pilots, air hostesses, and in reputed government and private organizations. SS Coaching remains committed to providing positive and meaningful guidance to students and their parents.
On this occasion, we extend our heartfelt thanks to our entire staff and all our associates for their dedication and support throughout these 25 years.”

लाइन में खड़ा भक्त सोचता है—परमात्मा तो सबके हैं, सबको बराबर देखते होंगे। लेकिन तभी एक VIP आता है और बिना लाइन के सीधे अ...
03/05/2026

लाइन में खड़ा भक्त सोचता है—परमात्मा तो सबके हैं, सबको बराबर देखते होंगे। लेकिन तभी एक VIP आता है और बिना लाइन के सीधे अंदर चला जाता है। वहीं खड़े-खड़े समझ आ जाता है कि यहाँ भी शायद “पहचान” ही सबसे बड़ी पूजा है। फिर मन में हल्का-सा खटका उठता है—अगर ऊपर वाला सच में सबको बराबर मानता, तो नीचे इतना फर्क क्यों दिखता? या तो उसकी बराबरी कहीं रास्ते में खो जाती है, या फिर हम ही किसी ऐसी चीज़ पर भरोसा कर रहे हैं जो असल में हमारे जैसा सीधा-सादा नहीं है। उधर दुनिया के साधारण नियम देखो—धूप सब पर बराबर पड़ती है, बारिश सबको भीगाती है, कोई VIP लाइन नहीं होती। तब सवाल सीधा-सा रह जाता है—भक्ति किसकी करें? उस व्यवस्था की जहाँ लाइन तोड़ने वाले आगे हैं, या उस सच्चाई की जहाँ सब एक जैसे हैं। शायद असली भक्ति वही है, जहाँ इंसान इंसान को बराबर समझे—बाकी तो बस भीड़ और बहाने हैं।

पहली पंक्ति : को तार्किक दृष्टि से देखें तो हिंसा और विनाश का मार्ग उचित नहीं माना जाता, इसलिए इन बातो को आदर्श के रूप म...
03/05/2026

पहली पंक्ति : को तार्किक दृष्टि से देखें तो हिंसा और विनाश का मार्ग उचित नहीं माना जाता, इसलिए इन बातो को आदर्श के रूप में नहीं लेना चाहिए क्योंकि ऐसे कृत्यों को सही नहीं ठहराया जा सकता।
दूसरी पंक्ति: डॉ. भीमराव अंबेडकर जी के विचारों को दर्शाती है, जहाँ ज्ञान, विज्ञान और शिक्षा को बदलाव का सबसे बड़ा साधन माना गया है, तथा कलम व विचारों के माध्यम से अधिकार, स्वतंत्रता तथा स्थायी सामाजिक परिवर्तन का मार्ग दिखाया गया है।

लखनऊ बार एसोसिएशन के महामंत्री पद पर निर्वाचित आदरणीय जितेंद्र यादव उर्फ जीतू भाई एवं अध्यक्ष पद पर निर्वाचित आदरणीय G.N...
03/05/2026

लखनऊ बार एसोसिएशन के महामंत्री पद पर निर्वाचित आदरणीय जितेंद्र यादव उर्फ जीतू भाई एवं अध्यक्ष पद पर निर्वाचित आदरणीय G.N. शुक्ला जी उर्फ चच्चू को हमारी ओर से अग्रिम हार्दिक बधाई।
हमें बहुत खुशी है कि हमारा और हमारे मित्रों का मत सार्थक साबित हुआ। जिन अधिवक्ता उम्मीदवारों पर हम सब मित्रों ने भरोसा किया, वही इस पद के लिए चुने गए—यह हम सभी अधिवक्ताओं के लिए बहुत संतोष का विषय है।
हालांकि अभी मतगणना पूरी नहीं हुई है, आधी गिनती हो चुकी है और शेष कल होगी, फिर भी जिस प्रकार से आप लोगों ने बढ़त बना रखी है, उससे यह साफ प्रतीत होता है कि जीत निश्चित रूप से आपकी ही होगी। इसी विश्वास के साथ हम आपको अग्रिम बधाई दे रहे हैं।
काफी समय से इन पदों के लिए कड़ा मुकाबला चल रहा था, ऐसे में आपकी यह जीत आपकी मेहनत और लोगों के विश्वास को दिखाती है। जो उम्मीदवार इस चुनाव में उपविजेता की स्थिति में रहे, वे अपना प्रयास जारी रखें। निश्चित रूप से आने वाले समय में आप लोगों को भी सफलता मिलेगी। आपकी कड़ी मेहनत और संघर्ष के लिए आप सभी को हमारी तरफ से बहुत-बहुत आभार।
हमें पूरा भरोसा है कि आप सभी अधिवक्ताओं के हित में, उनके अधिकारों और सम्मान के लिए सच्चे मन से काम करेंगे और उनकी समस्याओं को समझकर उन्हें दूर करने का पूरा प्रयास करेंगे।
प्रकृति से यही प्रार्थना है कि आप अपने काम को ईमानदारी और लगन से करते हुए लखनऊ बार एसोसिएशन को आगे बढ़ाएँ।
एक बार फिर आप दोनों को अग्रिम बधाई और सफल कार्यकाल के लिए शुभकामनाएँ।

🚨 महिलाओं के लिए नौकरी का शानदार मौका! 🚨हमारे HPCL पेट्रोल पंप पर महिलाओं को सशक्त बनाने की पहल 💪👉 स्टाफ में 33% महिलाओं...
03/05/2026

🚨 महिलाओं के लिए नौकरी का शानदार मौका! 🚨
हमारे HPCL पेट्रोल पंप पर महिलाओं को सशक्त बनाने की पहल 💪
👉 स्टाफ में 33% महिलाओं की भर्ती की जा रही है
📌 Eligibility (योग्यता):
✔ न्यूनतम आयु: 21 वर्ष
✔ अधिकतम आयु: 40 वर्ष
✔ कोई शैक्षिक योग्यता आवश्यक नहीं
✔ जरूरी दस्तावेज़: आधार कार्ड + बैंक अकाउंट
📌 खास बातें:
✨ फ्रेशर भी अप्लाई कर सकते हैं
✨ काम सीखने की इच्छा होनी चाहिए
📍 सीधे पेट्रोल पंप पर आकर आवेदन करें
👉 आज ही इस अवसर का लाभ उठाएं और बनें आत्मनिर्भर

03/05/2026

फाउंडेशन द्वारा आयोजित डॉ. भीमराव अंबेडकर “ला प्रोटेक्टर अवॉर्ड” में मंच पर अपने विचार रखने का अवसर मिला, इसके लिए मैं मिल्ली फाउंडेशन का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।
साथ ही, इस कार्यक्रम के आयोजक श्री मुकेश कुमार जी (आगामी सेंट्रल बार एसोसिएशन के संयुक्त मंत्री पद के प्रत्याशी) का भी विशेष धन्यवाद, जिन्होंने मुझे यह सम्मान और अवसर दिया।
मैं सभी मीडिया बंधुओं का भी धन्यवाद करता हूँ, जिन्होंने मुझसे प्रश्न पूछे और मुझे अपने विचार साझा करने का मौका दिया।
आप सभी का बहुत-बहुत आभार।
जय भीम, जय विज्ञान, जय संविधान।

जीवन सच में मुट्ठी की रेत की तरह कब फिसल जाता है, पता ही नहीं चलता। आज मैं आप सबके साथ अपने दो छायाचित्र साझा कर रहा हूँ...
03/05/2026

जीवन सच में मुट्ठी की रेत की तरह कब फिसल जाता है, पता ही नहीं चलता। आज मैं आप सबके साथ अपने दो छायाचित्र साझा कर रहा हूँ—एक वर्ष 1993 का जब मैं लखनऊ के अमीनाबाद इंटर कॉलेज में कक्षा 11 का छात्र था, और दूसरा इसी माह 2026 का।
समय कब बीत गया, एहसास ही नहीं हुआ। इस लंबे सफर में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन बाबा साहेब के आशीर्वाद से सब बेहतर होता गया। मैं अपने बहुजन समाज के महापुरुषों, अपने माता-पिता, पिता तुल्य बड़े भाइयों- माता तुल्य बड़ी भाभियों का आभारी हूँ, जिनके आशीर्वाद से आज सब पहले से बेहतर है, तथा मेरे जीवन और तरक्की में मेरी पत्नी का बराबर का संघर्ष और बहुत महत्वपूर्ण योगदान है।
जय भीम, जय विज्ञान, जय संविधान।

आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप कोमैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपकोजिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब करमर गई फुलिया बिच...
03/05/2026

आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको
जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी एक कुएँ में डूब कर
है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी
चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा
कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई
कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है
थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को
डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से
आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़िया है घात में
होनी से बेखबर कृष्णा बेख़बर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी
चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले फिर ढीली पड़ी फिर ढह गई
दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया
और उस दिन ये हवेली हँस रही थी मौज में
होश में आई तो कृष्णा थी पिता की गोद में
जुड़ गई थी भीड़ जिसमें जोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था
बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है
कोई हो संघर्ष से हम पाँव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएँगे ज़िन्दा उनको छोडेंगे नहीं
कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें
बोला कृष्णा से बहन सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से
पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गए थे सरचंप के दालान में
दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर
देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर
क्या कहें सरपंच भाई क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पाँव के नीचे था रुतबा पा गया
कहती है सरकार कि आपस मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो
देखिए ना यह जो कृष्णा है चमारो के यहाँ
पड़ गया है सीप का मोती गँवारों के यहाँ
जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
हाथ न पुट्ठे पे रखने देती है मगरूर है
भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
फिर कोई बाँहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ
आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
जाने-अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई
वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही
जानते हैं आप मंगल एक ही मक़्क़ार है
हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है
कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
गाँव की गलियों में क्या इज़्ज़त रहे्गी आपकी
बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
हाथ मूँछों पर गए माहौल भी सन्ना गया था
क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था
रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुर ज़ोर था
भोर होते ही वहाँ का दृश्य बिलकुल और था
सिर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाथ में
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में
घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने -
"जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने"
निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोलकर
एक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर
गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
सुन पड़ा फिर "माल वो चोरी का तूने क्या किया"
"कैसी चोरी, माल कैसा" उसने जैसे ही कहा
एक लाठी फिर पड़ी बस होश फिर जाता रहा
होश खोकर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर
ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर -
"मेरा मुँह क्या देखते हो ! इसके मुँह में थूक दो
आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूँक दो"
और फिर प्रतिशोध की आंधी वहाँ चलने लगी
बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी
दुधमुँहा बच्चा व बुड्ढा जो वहाँ खेड़े में था
वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था
घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ जोर से रोने लगे
"कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएँ नहीं
हुक्म जब तक मैं न दूँ कोई कहीं जाए नहीं"
यह दरोगा जी थे मुँह से शब्द झरते फूल से
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से
फिर दहाड़े, "इनको डंडों से सुधारा जाएगा
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा
इक सिपाही ने कहा, "साइकिल किधर को मोड़ दें
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें"
बोला थानेदार, "मुर्गे की तरह मत बांग दो
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो
ये समझते हैं कि ठाकुर से उलझना खेल है
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है, जेल है"
पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल
"कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्णा का हाल"
उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को
सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को
धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
प्रांत के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को
मैं निमंत्रण दे रहा हूँ- आएँ मेरे गाँव में
तट पे नदियों के घनी अमराइयों की छाँव में
गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही
हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए
बेचती है जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए!

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