03/06/2026
ये पोस्ट कॉपीपेस्ट है पर इसमें कमेंट करने का ऑप्शन नहीं दिख रहा था, इसलिए मैं यहाँ Teesha की पोस्ट की सराहना कर रही हूं.
क्योंकि मुझे ख़ुद ऐसा लगता है कि किसी शख्स की बदतमीज़ी के पीछे उसको फेवर करने वाले आँख के अंधों ( अधिकतर मां बाप)का हाथ होता है.... हालांकि कभी कभी ये गाज उन समर्थकों के ऊपर भी गिर जाती है 😄। मेरी मां कहती थी कि " #कुकुराकेकटहाबनाइबतसबसेपहिलेहमहीकेकाटी."
अब नीचे teesha की लेखनी है
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मुझे लगता है बदतमीज़ लोगों की ब्रांडिंग, बहुत शानदार तरीके से परिवारों में की जाती है।
जीहाँ वाकई सच है यह...बदतमीज़ लोगों की सबसे बड़ी ताकत उनके समर्थक होते हैं। वह चाहे किसी को अपमानित करेगा, ताने मारेगा, रिश्तों में जहर घोलेगा, लोगों को रुलाएगा... और तभी कोई खड़ा होकर सर्टिफिकेट देगा;
"अरे, उसका मन साफ है। जो दिल मे होता है, मुंह पर बोल देता है, मन मे नहीं रखता, स्पष्ट बोल देता है! "
अजीब बात है कि चरित्र का पैमाना यह नहीं कि आप लोगों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं? पैमाना यह है कि आप कितने लोगों को आहत कर सकते हैं और फिर उसे अपनी स्पष्टवादिता बता सकते हैं!
दूसरी तरफ़ जो लोग बोलने से पहले सोचते हैं, शब्दों का वजन समझते हैं, रिश्तों में सम्मान बनाए रखते हैं, उन्हें शक की नज़रों से देखा जाता है;
"इतना अच्छा बनने की क्या जरूरत है? जरूर कोई स्वार्थ होगा...इतना मीठा- मीठा बोलते हैं, कोई न कोई काम निकलवाना होगा...बच के रहना!
मुझे हमेशा हैरानी होती है, कि हमने अभद्रता को ईमानदारी और विनम्रता को चालाकी मानना कब शुरू कर दिया?
आजकल टीनएजर्स में भी इन्ही कारणों से बदतमीजी बढ़ती जा रही है। आए दिन ऐसे वीडियो देखने को मिलते हैं, जिसमे अपने से बड़ों को स्पष्ट रूप से न कहना, सत्य कहना या बेबाक कहने के नाम पर अभद्रता और बदतमीजी सिखाई जाती है...और लोग वाह वाह कर के लहालोट होते हैं।
सच तो यह है कि मुंहफट होना और साफदिल होना दो अलग बातें हैं। कई लोग सिर्फ इसलिए "साफदिल" कहलाते रहते हैं, क्योंकि उनके आसपास के लोग उनकी बदतमीज़ी का अनुवाद करके उसे ईमानदारी बताते रहते हैं।
हर कड़वी बात सच नहीं होती...और हर विनम्र व्यक्ति स्वार्थी नहीं होता।
हो सकता है दुनिया बदतमीज़ी को बेबाकी और संवेदनहीनता को सच्चाई मानने लगी हो, लेकिन रिश्ते आज भी उन्हीं के साथ टिकते हैं जो सच बोलने का साहस तो रखते हैं, साथ ही दूसरों की गरिमा का सम्मान करने का विवेक भी।
ध्यान रखिए रिश्ते सच बोलने से नहीं टूटते, सच बोलने के तरीके से टूटते हैं।
सच बोलना एक बहुत सुंदर गुण है, पर किसी को अपमानित करना नहीं।
क्या आप भी ऐसे किसी 'दिल के साफ' व्यक्ति को जानते हैं?
बाकी तो...आल इज वेल!
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टीशा
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