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ग़दरी शूरवीरों की गौरवशाली विरासत से प्रेरणा लेते हुए देशी-विदेशी पूँजीवादी शोषण के ख़िलाफ़ संघर्ष को आगे बढ़ाओलूट, शोषण...
12/12/2025

ग़दरी शूरवीरों की गौरवशाली विरासत से प्रेरणा लेते हुए देशी-विदेशी पूँजीवादी शोषण के ख़िलाफ़ संघर्ष को आगे बढ़ाओ

लूट, शोषण, अन्याय पर टिकी व्यवस्था में शासकों की हमेशा कोशिश रहती है कि जनता को उनकी क़ुर्बानियों से भरी जुझारू क्रांतिकारी विरासत से दूर रखा जाए। क्योंकि अतीत की इस जुझारू विरासत से सीखकर ही जनता ज़ुल्म को चुनौती देना सीखती है, शोषण से आज़ादी के सपने देखती है और क़ुर्बानी का जज़्बा हासिल करती है। भारत की मेहनतकश जनता के पास अंग्रेज़ों की ग़ुलामी से आज़ादी के लिए संघर्ष और क़ुर्बानियों की गौरवशाली विरासत है। ग़ुलामी के ख़ि‍लाफ़ ग़दर आंदोलन एक ऐसा आंदोलन था, जिसने न सिर्फ़ सोए हुए देशवासियों को जगाकर आज़ादी की नई चिंगारी दी, बल्कि इसके कारण अंग्रेज़ों को अपना तख़्त डगमगाता नज़र आया। ग़दर आंदोलन ऐसा आंदोलन था, जिससे प्रेरणा लेकर न सिर्फ़ उस समय आज़ादी के दीवानों की नई पीढ़ियाँ तैयार हुईं, बल्कि ग़दरी क्रांतिकारियों का गौरवशाली इतिहास आज भी क्रांतिकारियों की पीढ़ियों के रास्ते रौशन कर रहा है। लेकिन हमारे समय का यह दुखद पहलू है कि इस गौरवशाली आंदोलन, इसके नायकों की क़ुर्बानियों, जज़्बों और उनके आदर्शों के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।

अंग्रेज़ी ग़ुलामी से मुक्ति के लिए ग़दर पार्टी का संघर्ष

भारत को ग़ुलाम बनाने के बाद अंग्रेज़ हुक्मरानों ने भारत की दस्तकारियों को तबाह कर दिया, शहरों की आम मेहनतकश आबादी को भुखमरी और अकाल के दिन काटने के लिए मजबूर कर दिया। दूसरी ओर उन्होंने भारत के सामंतों के साथ गठजोड़ क़ायम कर लिया और किसानों पर टैक्सों का इतना बोझ बढ़ा दिया कि अपने हाथों से उपजाई फ़सलें भी उनका पेट न भर सकीं। कठिनाइयाँ झेलते किसान सूदखोरों के क़र्ज़दार हो गए। नतीजतन, लोगों को बेहतर रोज़ी-रोटी के लिए अपने परिवारों का पेट पालने के लिए विदेशों की ओर रुख़ करना पड़ा। हाँगकाँग, मलेशिया, सिंगापुर, शंघाई और फिर उन्होंने कनाडा, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की धरती पर पैर रखे। इस प्रवास में सबसे आगे रहे मध्य पंजाब के किसान, जो अब ज़मीन छोड़कर कनाडा, अमेरिका में लकड़ी चीरने वाले कारख़ानों और अन्य कारख़ानों में मज़दूरी करने लगे। किसानों के अलावा अंग्रेज़ सेना से रिटायर हुए सैनिक भी इन प्रवासियों में शामिल थे।

रोज़ी-रोटी कमाने के लिए गए इन मेहनतकशों को पश्चिमी पूँजीपति न सिर्फ़ सस्ते मज़दूरों के तौर पर इस्तेमाल करते थे, बल्कि उनके श्रम को गोरे मज़दूरों की हड़तालें तोड़ने के लिए भी इस्तेमाल करते थे। इस तरह गोरे मज़दूरों में भारत के इन मज़दूरों के ख़ि‍लाफ़ नफ़रत फैलने लगी। 1907-08 में आर्थिक मंदी बढ़ी, तो भारतीयों के ख़ि‍लाफ़ यह हिंसा और नफ़रत भी बढ़ी। ग़ुलाम देश के नागरिक होने के कारण उनके साथ और भी ज़्यादा बदसलूकी होती थी। उनके अंदर यह एहसास पैदा होने लगा कि सिर्फ़ डॉलरों से उनके माथे से ग़ुलामी का निशान नहीं मिट सकता, पराई धरती पर उन्हें इज़्ज़त की ज़िंदगी नसीब नहीं हो सकती। ऐसे में देश को आज़ाद कराने की भावना पैदा होने लगी।

13 मार्च 1913 को सोहन सिंह भकना और उनके साथियों की पहल पर एस्टोरिया में बैठक बुलाई गई, जिसमें ओरेगॉन और वाशिंगटन जैसे शहरों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। पहली बैठक में ही देश को आज़ाद कराने के विचार को समर्थन मिला। 21 अप्रैल 1913 को एक और बड़ी बैठक में हिंदुस्तान ग़दर पार्टी की स्थापना हुई और अख़बार शुरू करने का फ़ैसला लिया गया, जिसका नाम 1857 के ग़दर (विद्रोह) की याद में ‘ग़दर’ रखा गया। सोहन सिंह भकना को अध्यक्ष और लाला हरदयाल को महासचिव बनाया गया। अख़बार के लिए लाला हरदयाल के साथ करतार सिंह सराभा, हरनाम सिंह टुंडीलाट और पंडित जगत राम को ज़िम्मेदारी सौंपी गई। इस साप्ताहिक अख़बार का पहला अंक 1 नवंबर 1913 को प्रकाशित हुआ और दिनों-दिन ग़दर की ऐसी चिंगारियाँ भड़कीं, जो जहाँ भी पहुँचती विद्रोह की लपटें भड़कने लगतीं और ग़दर पार्टी की एक इकाई बन जाती। पार्टी के सदस्यों की संख्या कुछ महीनों में 12,000 तक पहुँच गई। पार्टी का कार्यालय अमेरिका के सैन फ़्रांसिस्को शहर का युगांतर आश्रम था, जहाँ सारा दिन भारत के मज़दूरों का आना-जाना लगा रहता। पार्टी को पता था कि असली लड़ाई भारत की ज़मीन पर ही होगी। दिन-ब-दिन प्रचार और आने वाले संघर्ष की तैयारियाँ तेज़ होने लगीं।

1914 की कामागाटामारू की घटना ने आग में घी डालने का काम किया। उधर पहला विश्व युद्ध शुरू हो गया और अंग्रेज़ भी इसमें शामिल हो चुके थे। देश को आज़ाद करने की घोषणा हुई। पार्टी के सदस्यों ने मेहनत से कमाई गई एक-एक पाई और अपना सब कुछ पार्टी कार्यालय में जमा करवाकर हथियार ख़रीदे और अपनी मातृभूमि के लिए चल पड़े। लेकिन तैयारियों के दौरान ग़दरी क्रांतिकारियों से गंभीर ग़लतियाँ हुईं। न सिर्फ़ उन्होंने ख़ुद को और अपने आदर्शों को छिपाकर नहीं रखा, बल्कि उन्होंने देश में वापस जाने का फ़ैसला भी गुप्त नहीं रखा। नतीजतन अंग्रेज़ी सरकार चौकन्नी हो चुकी थी और उसने देश की सारी बंदरगाहों पर मज़बूत नाकाबंदी कर दी थी। सारे नेताओं की पहचान हो गई थी, जिसके कारण बहुत सारे नेता भारत के तटों पर ही पकड़े गए, इनमें गिरफ़्तार हुए नेताओं में सोहन सिंह भकना भी शामिल थे। फिर करतार सिंह सराभा, हरनाम सिंह टुंडीलाट, रहमत अली वजीदके, जगत राम, पंडित कांशी राम और अन्य कई प्रसिद्ध ग़दरी क्रांतिकारी देश में प्रवेश करने में सफल हो गए। देश पहुँचते ही उन्होंने नेतृत्व केंद्र को फिर से संगठित करने का काम शुरू कर दिया।

करतार सिंह सराभा के बारे में यह प्रसिद्ध था कि यह नौजवान अपनी साइकिल पर जहाँ से भी गुज़रता था, वहाँ ग़दरी क्रांतिकारियों की पूरी टोली बन जाती थी। सैनिक छावनियों में संपर्क स्थापित किया गया, सैनिकों को साम्राज्यवादियों की सेवा करने की बजाय मातृभूमि को आज़ाद कराने के लिए लड़ने के लिए प्रेरित किया गया और आने वाली हथियारबंद क्रांति का हिस्सा बनने के लिए तैयार किया गया। तय हुआ कि शुरुआत पंजाब की छावनियों से की जाएगी और पंजाब और इसके साथ लगते इलाक़ों पर क़ब्ज़ा करके आगे बढ़ा जाएगा। ग़दर की तारीख़ का फ़ैसला हो गया, जो कि 21 फ़रवरी 1915 निर्धारित की गई। लेकिन अंग्रेज़ों ने भी अपने जासूस ग़दर पार्टी में घुसा रखे थे। ऐसे ही ग़द्दार किरपाल सिंह ने बिल्कुल आख़िरी मौक़े पर सूचना अंग्रेज़ों तक पहुँचा दी। ग़दरी क्रांतिकारियों द्वारा आख़िरी कोशिश के तौर पर तारीख़ को पहले करके 19 फ़रवरी कर दिया गया, लेकिन इसका भेद भी खुल गया। अंग्रेज़ों ने भारतीय सैनिकों को निहत्था कर दिया और गोरे सैनिकों का पहरा बिठा दिया। ग़दरियों को पकड़ना शुरू किया। ग़दर की हार हो चुकी थी। बहुत सारे ग़दरी गिरफ़्तार कर लिए गए, कई पुलिस मुठभेड़ों में मारे गए। बाग़ी सैनिकों का कोर्ट मार्शल करके सैकड़ों को गोली से उड़ा दिया गया या फाँसी पर लटका दिया गया। करतार सिंह सराभा, जगत राम, वी. जे. पिंगले, हरनाम सिंह सियालकोट के साथ-साथ अनेक ग़दरी क्रांतिकारी फाँसी पर चढ़ा दिए गए और बहुत से लोगों को काले पानी भेज दिया गया। जो बचे उन्हें अलग-अलग जेलों में क़ैद कर दिया गया।

इस तरह यह ग़दर असफल हो गया। लेकिन ग़दरियों ने हिम्मत नहीं हारी। जो ग़दरी अंडमान की कुख्यात काला पानी सज़ा काटने पहुँचे, उन्होंने इस जेल को अपनी नई रणभूमि‍ बना लिया। आख़िर 1921 में कुख्यात सेलुलर जेल को तुड़वाकर ही दम लिया। इस संघर्ष के दौरान कई लोगों ने अपनी जान गँवाई। बाबा सोहन सिंह भकना जैसे काले पानी की उम्र क़ैद की सज़ा काटकर झुकी कमर के साथ रिहा हुए, लेकिन अपनी हिम्मत और जज़्बे को एक इंच भी झुकने नहीं दिया। ऐसी अद्वितीय है ग़दरी क्रांतिकारियों की क़ुर्बानी, बहादुरी और आदर्शों के प्रति प्रतिबद्धता।

ग़दर पार्टी की गौरवशाली विरासत

ग़दर पार्टी के शूरवीरों ने न सिर्फ़ क़ुर्बानी, आत्मसम्मान और हिम्मत न हारने की मिसाल क़ायम की, बल्कि इससे बढ़कर उन्होंने भारत की आज़ादी की लड़ाई के इतिहास में एक नई ऊर्जा का संचार किया। ग़दर पार्टी की निम्नलिखित विशेषताएँ उन्हें एक अद्वितीय आंदोलन और अपने समय की प्रगतिशील धारा का दर्जा देती हैं।

1) 1857 के विद्रोह के बाद ग़दर पार्टी के नेतृत्व में पहला बड़ा आंदोलन था, जिसने साम्राज्यवादी ग़ुलामी से पूर्ण आज़ादी का सपना देखा, जिसने रावलपिंडी और मुल्तान से लेकर ढाका तक व्यापक विद्रोह के लिए जाल बुना। इसका लक्ष्य सिर्फ़ पूर्ण आज़ादी नहीं, बल्कि आज़ादी के बाद लोकतांत्रिक गणतंत्र का निर्माण करना भी इसके लक्ष्य का हिस्सा था। इसने आज़ादी की क्रांतिकारी लड़ाई के दायरे को उग्रवादी विद्यार्थियों से आगे बढ़ाकर मज़दूरों-किसानों तक विस्तार किया। इसने लड़ाई को मुट्ठी-भर हठी योद्धाओं की उग्रवादी कार्रवाइयों के बजाय एक जन आंदोलन बनाने पर ज़ोर दिया। इस आंदोलन ने भारतीय सैनिकों को देश की आज़ादी के लिए लड़ने और अंग्रेज़ों के ख़ि‍लाफ़ विद्रोह करने के लिए तैयार किया और आज़ादी की लड़ाई को अंग्रेज़ साम्राज्यवादियों की बैरकों तक ले गए।

2) ग़दर पार्टी इस मामले में भी विशेष थी कि इसने ऐसे समय में पूर्ण आज़ादी का नारा दिया, जब कांग्रेस जैसी शक्तियाँ भारतीयों को पहले विश्व युद्ध में अंग्रेज़ों की मदद करने के लिए प्रेरित कर रही थीं और जिनका लक्ष्य किसी उग्रवादी संघर्ष द्वारा आज़ादी की जगह अंग्रेज़ों से रियायतों की भीख माँगना था। इस तरह इसने कांग्रेस और गांधी के समझौतापरस्त रवैये को उजागर करके उसका विकल्प पेश किया।

3) यह आज़ादी का ऐसा व्यापक आंदोलन था, जो जाति, धर्म से मुक्त था। यह पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष आंदोलन था। इसके सारे सदस्य किसी भी धर्म को मानने या न मानने के लिए आज़ाद थे, लेकिन यह आंदोलन किसी ख़ास धर्म पर आधारित नहीं था, किसी धार्मिक मान्यताओं से प्रेरणा नहीं लेता था, न ही इसका लक्ष्य कोई धर्म आधारित राज्य स्थापित करना था। इस तरह इसमें जाति-रंग का कोई भी भेदभाव नहीं किया जाता था। जनवादी उसूलों से मुताबिक़, भारत में बसे अलग-अलग धर्मों, जातियों के लोगों को एक साझी लड़ाई में पिरोने के लिए ऐसा करना बहुत ज़रूरी भी था और आज भी ज़रूरी है।

इसके साथ ही ग़दर पार्टी की कुछ कमज़ोरियाँ भी रहीं, जिन्हें ऐतिहासिक संदर्भ में रखकर ही समझा जा सकता है। इसका आदर्श अमेरिका, कनाडा की तर्ज पर एक लोकतांत्रिक गणराज्य था और उससे भी प्रगतिशील समाजवादी व्यवस्था को इसने अपने आदर्श के तौर पर नहीं अपनाया। यह समाज के वर्ग विभाजन को और सामाजिक परिवर्तन में अलग-अलग वर्गों की भूमिका को नहीं समझ सकी। इसने अंग्रेज़ों को सेना में विद्रोह द्वारा चुनौती देने की कोशिश की, लेकिन उनके साथ गठजोड़ करने वाले भारत के सामंतों के ख़ि‍लाफ़ इसने कोई आंदोलन नहीं छेड़ा, जबकि सामंतवाद के ख़ि‍लाफ़ किसानों को संगठित करना चाहिए था। इसका कारण यह था कि पार्टी ख़ुद नई थी। लेकिन इन कमजोरियों के बावजूद इसकी उपलब्धियाँ और क़ुर्बानियाँ इसका मुख्य पहलू हैं। कमजोरियों पर चर्चा आज के समय को संबोधित करते हुए ज़्यादा प्रासंगिक हैं।

ग़दर पार्टी के बाक़ी बचे जुझारू कार्यकर्ताओं का बड़ा हिस्सा समाजवादी विचारों की ओर आकर्षित हुआ। इसमें बड़ी भूमिका रूस में 1917 की क्रांति के बाद अस्तित्व में आए समाजवादी देश की थी। कई ग़दरी क्रांतिकारी ख़ुद सोवियत रूस जाकर वहाँ की उपलब्धियाँ अपनी आँखों से देखकर आए और समाजवादी विचारों के साथ जुड़ गए। ‘किरती’ शुरू करने वाले संतोख सिंह किरती ग़दरी क्रांतिकारियों के ही साथी थे, जो सोवियत संघ जाकर आए थे। उम्र क़ैद काटने के बाद भी घरों में नहीं बैठे, किसान सभाएँ संगठित करने लगे और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए। इस तरह ग़दर आंदोलन की विरासत समाजवादी विचारों तक पहुँचती है। ग़दर आंदोलन की विरासत में साम्राज्यवाद के ख़ि‍लाफ़ चुनौती है, दमन के ख़ि‍लाफ़ लड़ने के लिए आत्मविश्वास का जज़्बा है और मानवता की ख़ुशहाली के लिए समाजवाद का सपना है।

ग़दर पार्टी की विरासत और
आज का समय

ग़दरी शूरवीरों, उनके उत्तराधिकारियों और मेहनतकश जनता की क़ुर्बानियों से भरी जद्दोजहद के कारण 15 अगस्त को देश अंग्रेज़ों से आज़ाद हुआ। लेकिन उस समय मेहनतकश जनता का प्रतिनिधित्व करने वाली धारा कमज़ोर होने के कारण भारत की राज्यसत्ता पूँजीपतियों के हाथ आ गई। पिछले 78 सालों में मेहनतकश जनता के हिस्से में नई तरह की ग़ुलामी, ग़रीबी, लूट, दमन और अन्याय ही आया है। दूसरी ओर अंबानी, अदाणी, टाटा और बिरला और अन्य छोटे-बड़े पूँजीपतियों का देश के संसाधनों पर क़ब्ज़ा बढ़ता गया है। इन्होंने मेहनतकश जनता को लूटकर अत्यधिक संपत्ति जुटाई है। अब तक भारत में मौजूद रहीं सभी सरकारों और पूरी राज्य व्यवस्था ने पूँजीपतियों के हितों के लिए काम किया है।

2014 में भाजपा के नेतृत्व वाले एन.डी.ए. गठबंधन द्वारा भारत की यूनियन सरकार पर क़ब्ज़े के बाद जनता की हालत और ज़्यादा बदतर हुई है। नोटबंदी, जी.एस.टी. ने करोड़ों लोगों के रोज़गार और काम-धंधे ठप्प कर दिए। देश की अर्थव्यवस्था गिर रही है। ग़रीबी-भुखमरी दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। महँगाई ने जनता को अपनी रोटी के ख़र्चे पूरे करने भी मुश्किल कर दिए हैं। बेरोज़गारी ने पिछले 45 सालों के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। नौजवान निराश हैं। मज़दूर, ग़रीब किसान और विद्यार्थी आत्महत्या के रास्ते पर चल पड़े हैं। 1991 में शुरू हुई निजीकरण की नीतियों को भाजपा ज़ोर-शोर से लागू कर रही है, जिसके तहत सरकारी विभागों, जनता के संस्थानों को देशी-विदेशी पूँजीपतियों के सामने कौड़ियों के दाम परोसा जा रहा है, जिसमें सबसे ज़्यादा लाभ भारत के एकाधिकारी पूँजीपतियों ने कमाया है।

भाजपा के पीछे दरअसल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सक्रिय है, जो ‘हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान’ के नारे से भारत को हिंदू राष्ट्र में बदलने की पूरी कोशिश कर रहा है। इस मक़सद के लिए जनता में धर्म, जाति के आधार पर नफ़रत और तनाव बढ़ाया जा रहा है। मोदी के सत्ता में आने के बाद भगवाधारी सरेआम गुंडागर्दी कर रहे हैं और मुसलमानों, दलितों और जनवादी कार्यकर्ताओं पर हमले कर रहे हैं। राम मंदिर का निर्माण हुआ, बाबरी मस्जिद को गिराने के दोषी संघ और भाजपा नेता बरी कर दिए गए हैं, कश्मीरी जनता पर दमन बढ़ा दिया गया है। फ़ाशीवादी-सांप्रदायिक राजनीति के तहत नागरिकता संशोधन क़ानून लाया गया, जिसे देश-भर के लोगों के ज़बरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा। इस क़ानून पर अभी चाहे चुप्पी का माहौल है, लेकिन भाजपा सरकार अंदर ही अंदर नागरिकता क़ानून को लागू करने की तैयारी में है। हिंदू राष्ट्र के सपने को पूरा करने और बड़े पूँजीपतियों के पक्ष में नीतियाँ बनाने की ज़रूरत के चलते भाजपा राजनीतिक ताक़तों का अंधाधुंध केंद्रीकरण कर रही है और राज्यों की क्षेत्रीय स्वायत्तता छीनने का राष्ट्रीय दमन कर रही है। इसके साथ बहुराष्ट्रीय भारत में राष्ट्रीय दमन भी तीव्र होता जा रहा है।

ऐसे मौजूदा माहौल में हमारे ग़दरी शूरवीरों की याद की मशाल जलाना, उनकी विरासत को जानना-समझना और उससे प्रेरित होना आज बहुत ज़रूरी है। ग़दरी शूरवीरों ने लूट, दमन, अन्याय को चुनौती दी, जनता के लिए क़ुर्बानियाँ दीं और मानवता की ख़ुशहाली के लिए पहले लोकतांत्रिक गणराज्य, फिर समाजवादी व्यवस्था का रास्ता दिखाया है। आओ, ग़दरी शूरवीर शहीदों से प्रेरणा लेते हुए पूँजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था के ख़ात्मे; लूट, शोषण, अन्याय से मुक्त समाज के निर्माण के लिए क्रांतिकारी संघर्ष को आगे बढ़ाने के संकल्प लें।

किसान मोर्चे के दौरान गिरफ़्तारी के समय अमृतसर रेलवे स्टेशन पर पाँच ग़दरी शूरवीर, अगस्त 1939

(बाएँ से दाएँ) – बाबा संता सिंह गंडीविंड, बाबा दर्शन सिंह फ़ेरूमान, बाबा फ़ौजा सिंह भुल्लर,
बाबा सोहन सिंह भकना, बाबा कर्म सिंह चीमा

मुक्ति संग्राम – नवंबर 2025 में प्रकाशित

पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ की सैनेट ख़त्म करने के कोशिशों के ख़िलाफ़ जनसंघर्ष ने मोदी हुकूमत को झुकाया1 नवंबर 2025 को के...
11/12/2025

पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ की सैनेट ख़त्म करने के कोशिशों के ख़िलाफ़ जनसंघर्ष ने मोदी हुकूमत को झुकाया

1 नवंबर 2025 को केंद्र सरकार ने पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ की सैनेट और सिंडिकेट को ख़त्म करने का नोटिस जारी किया था, जिसका मक़सद यूनिवर्सिटी की सैनेट और सिंडिकेट चुनाव की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को ख़त्म करके पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ को केंद्र के नियंत्रण के अधीन करना था और पंजाब यूनिवर्सिटी समेत पंजाब की धरती पर बने चंडीगढ़ पर पंजाब के दावे को ख़त्म करना था। इसके ख़ि‍लाफ़ यूनिवर्सिटी के विभिन्न छात्र संगठनों के संयुक्त मंच ‘पंजाब यूनिवर्सिटी बचाओ मोर्चा’ के नेतृत्व में संघर्ष के सामने मोदी सरकार को झुकते हुए यह जनविरोधी फ़रमान वापिस लेना पड़ा और 91 सदस्यीय सैनेट बहाल करनी पड़ी है। यह छात्र संघर्ष की शानदार जीत है। लेकिन संघर्ष अभी भी जारी है। डेढ़ साल से सैनेट और सिंडिकेट के चुनाव नहीं करवाए गए है। मोर्चे की माँग है कि चुनावों की तारीख़ की तुरंत घोषणा की जाए। मोर्चे ने तब तक संघर्ष जारी रखने का ऐलान किया है, जब तक चुनावों की तारीख़ और अन्य विवरणों की औपचारिक घोषणा नहीं कर दी जाती।

पंजाब यूनिवर्सिटी
और सैनेट का इतिहास

साल 1882 में विभिन्न लोगों ने एक लाख रुपए इकट्ठा करके लाहौर में पंजाब यूनिवर्सिटी की स्थापना की थी। यूनिवर्सिटी की स्थापना के समय से ही सैनेट इसके प्रशासनिक ढाँचे का हिस्सा रही है। ‘भारतीय यूनिवर्सिटी एक्ट 1904’ ने सभी यूनिवर्सिटी में सैनेट की मौजूदगी को लाज़िमी बना दिया था। 1947 में जब पंजाब के दो टुकड़े हो गए, तो पंजाब यूनिवर्सिटी की इमारत लाहौर (पश्चिमी पंजाब) में रह गई। पूर्वी पंजाब में इस यूनिवर्सिटी की विरासत को जिं़दा रखने के लिए इसका कैंपस पहले अस्थायी तौर पर सोलन में बनाया गया और फिर पंजाब के लोगों ने पैसे जुटाकर 1956 में चंडीगढ़ में पंजाब यूनिवर्सिटी फिर से खड़ी कर दी।

1966 में पंजाब के पुनर्गठन के नाम पर पहले कई पंजाबी बोलने वाले इलाक़े बाहर किए गए और यूनिवर्सिटी को हिमाचल, हरियाणा और पंजाब की यह कहकर संयुक्त यूनिवर्सिटी बना दिया गया कि इन तीनों राज्यों के कॉलेज इससे जुड़े हुए हैं और साथ ही अपना नियंत्रण भी स्थापित कर लिया गया, लेकिन यह व्यवस्था अस्थायी थी।

हिमाचल और हरियाणा द्वारा अपनी-अपनी यूनिवर्सिटी (शिमला और कुरुक्षेत्र) खोलने के कारण 1973 के बाद इससे सिर्फ़ पंजाब के कॉलेज ही जुड़े रह गए और हरियाणा तथा हिमाचल की हिस्सेदारी ख़त्म हो गई। पंजाब पुनर्गठन एक्ट 1966 में पंजाब यूनिवर्सिटी के साथ-साथ पंजाब कृषि यूनिवर्सिटी, लुधियाणा और श्रोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी को भी अंतर-राज्यीय संस्थाएँ घोषित किया गया था।

यहाँ यह रोचक तथ्य है कि पालमपुर (हिमाचल) और हिसार (हरियाणा) में कृषि यूनिवर्सिटी बनने के बाद पंजाब सरकार ने पंजाब कृषि यूनिवर्सिटी, लुधियाणा पर अधिकार जताकर, उसकी वित्तीय जिम्मेदारियाँ उठाकर, कृषि यूनिवर्सिटी को राज्य यूनिवर्सिटी बना लिया था। लेकिन पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ अंतर-राज्यीय ही बना रहा, जो बिल्कुल तर्कहीन, ग़ैर-वाजिब था। अब मोदी सरकार इसमें से पंजाब की हिस्सेदारी ख़त्म करके इसे पंजाब से छीनना चाहती है और पूरी तरह अपने नियंत्रण में लेना चाहती है। यह यूनिवर्सिटी पंजाब को चंडीगढ़ से जोड़ने वाला आख़ि‍री बड़ा संस्थान है। इसके साथ पंजाब के 202 कॉलेज जुड़े हुए हैं, जिनके ज़रिए लाखों विद्यार्थी उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं।

सैनेट यूनिवर्सिटी की
प्रशासनिक व्यवस्था है

सैनेट यूनिवर्सिटी की प्रशासनिक व्यवस्था होती है, जिसके पास यूनिवर्सिटी के सारे प्रबंध और कामकाज की ज़ि‍म्मेदारी होती है। सैनेट व्यवस्था का जनवादी पक्ष यह है कि कुल 91 सदस्यों में से 47 सदस्यों की नियुक्ति चुनाव के ज़रिए की जाती है, जिनमें यूनिवर्सिटी से जुड़े पंजाब के करीब 200 कॉलेजों और यूनिवर्सिटी कैंपस से पढ़ाई पूरी कर चुके विद्यार्थी आदि शामिल होते हैं। बाक़ी बचे सदस्य चांसलर (यह ओहदा उप-राष्ट्रपति के पास होता है) द्वारा नियुक्त किए जाते हैं। इस तरह यूनिवर्सिटी के प्रशासनिक कामों में, ख़ासतौर पर अकादमिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों के हाथ फ़ैसले लेने की ताक़त का होना और इस ताक़त का बँटवारा, यूनिवर्सिटी के जनवादीकरण के लिए ज़रूरी है।

पंजाब यूनिवर्सिटी की सैनेट सिलेबस से लेकर परीक्षाएँ, फ़ीस में वृद्धि/कटौती, डिग्री मान्यताएँ, शिक्षक-ग़ैरशिक्षक नियुक्तियाँ, यूनिवर्सिटी नियमों में फेरबदल आदि कई काम देखती है। इन कामों के लिए सैनेट से मंजूरी लेनी पड़ती है और सैनेट सदस्यों की सहमति से पास करवाना पड़ता है। यहाँ यह बात भी सच है कि सारतत्व सैनेट कोई पूरी तरह जनवादी संस्था नहीं है कि इसके ज़रिए शिक्षा के निजीकरण आदि के जारी हमले को पीछे धकेला जा सके, लेकिन फिर भी सैनेट व्यवस्था कहीं न कहीं पंजाब यूनिवर्सिटी के फ़ैसलों के लिए ख़ास महत्व रखता है।

मौजूदा नोटिफ़ि‍केशन और सैनेट–सिंडिकेट की बनावट में बदलाव

मौजूदा समय में पंजाब यूनिवर्सिटी के अंदर 91 सदस्यीय सैनेट काम करती है, जिसमें 47 सदस्यों का चुनाव वोटों के ज़रिए होता था। इन 47 सदस्यों में से 15 सदस्य ग्रैजुएट क्षेत्र के (जिन्हें पंजाब यूनिवर्सिटी से ग्रैजुएट हुए करीब 3.5 लाख विद्यार्थी वोट डालकर चुनते हैं), संबंधित आर्ट्स कॉलेजों के 16 प्रोफ़ेसर और प्रिंसिपल, टेकनीकल कॉलेजों के 4 प्रोफ़ेसर और प्रिंसिपल, यूनिवर्सिटी कैंपस के 6 प्रोफ़ेसर और संबंधित कॉलेजों के 6 प्रिंसिपल और प्रोफ़ेसर आदि होते थे। पंजाब यूनिवर्सिटी से संबंधित 202 कॉलेज और 4 रीज़नल सेंटर सिर्फ़ पंजाब में ही हैं, इसलिए सैनेट में पंजाब से ही सदस्य चुनकर जाते थे। 36 सदस्य चांसलर द्वारा नामजद किए जाते थे और 8 सदस्य –यूनिवर्सिटी का वी.सी., पंजाब का मुख्यमंत्री, उच्च शिक्षामंत्री, हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस और यूनिवर्सिटी के दो डीन समेत पंजाब विधानसभा के 2 विधायक – स्थायी सदस्य होते थे। इस तरह सैनेट की बनावट में ताक़तों का बँटवारा हुआ है, जिसकी वजह से भाजपा हुकूमत के निजीकरण-भगवाकरण के एजेंडे की रफ़्तार धीमी पड़ती थी।

91 सदस्यीय सैनेट अपने में से 15 सदस्यीय सिंडिकेट का चुनाव करती थी, जिसमें वीसी और डी.पी.आई. पंजाब के अलावा सारे सदस्य चुने हुए होते थे, जो यूनिवर्सिटी के रोज़मर्रा के कामों में अगुवाई करते थे।

मौजूदा नोटिफ़ि‍केशन के ज़रिए यूनियन सरकार (मोदी सरकार) ने 91 सदस्यीय सैनेट ख़त्म करके 31 सदस्यीय करने का इरादा किया था, जिसमें ग्रैजुएट हलक़ों की 15 की 15 सीटें काटी जानी थीं, जो पंजाब के कॉलेजों से लोकतांत्रिक तरीक़े से चुनकर आते थे। नई सैनेट के 31 सदस्यों में 7 स्थायी सदस्य, 8 चांसलर द्वारा चुने हुए, 2 एम.एल.ए., 4 कैंपस प्रोफ़ेसर और 10 संबंधित कॉलेजों के प्रिंसिपल व प्रोफ़ेसर होने थे। यूनिवर्सिटी के रोज़मर्रा के कामों की अगुवाई 14 सदस्यीय सिंडिकेट को करनी थी, जिसका चेयरपर्सन वी.सी. ने होना था और 10 अन्य सदस्य भी वी.सी. द्वारा नामजद होने थे। इसके अलावा उच्च-शिक्षा सचिव पंजाब, डी.पी.आई. चंडीगढ़ और चांसलर द्वारा नामजद एक सैनेट सदस्य होना था। इन नए बदलावों में यह प्रावधान भी था कि 14 सदस्यीय सिंडिकेट अपनी सारी ताक़तें वाइस चांसलर को सौंप देगी, जिसका मतलब था कि पंजाब यूनिवर्सिटी के प्रशासनिक फ़ैसलों की सारी ताक़त केंद्र सरकार द्वारा लगाए गए वी.सी. और चांसलर के पास चली जानी थी। न ही यह सिंडिकेट सैनेट को जवाबदेह होती। इस बदलाव से समझा जा सकता है कि भाजपा-संघ के लोगों को यूनिवर्सिटी के अंदर बेरोकटोक नामजद करने और पूरी सिंडिकेट के ज़रिए सांप्रदायिक फ़ाशीवादी हमले को और तीखे रूप में लागू करने का मोदी सरकार का एजेंडा था।

सैनेट भंग करने के पीछे
हुकूमती सोच

सैनेट के जनवादी ढाँचे पर हमला – जहाँ एक तरफ़ मोदी सरकार की उच्च-शिक्षा संस्थानों में जनवाद पर हमलों की कड़ी का ही हिस्सा है, वहीं यह आमतौर पर राज्यों के अधिकारों पर, और इस मामले में ख़ासतौर पर पंजाब के अधिकारों पर हमले का हिस्सा भी है। इस नोटिफ़ि‍केशन के ज़रिए मोदी सरकार सैनेट की जगह नई शिक्षा नीति में दर्ज “बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स” लागू करने की नीति की ओर बढ़ रही है, जिससे सरकार समर्थक चार-पाँच लोगों के हाथ पूरी यूनिवर्सिटी की कमान सौंपकर पूर्ण केंद्रीय नियंत्रण का रास्ता साफ़ करना चाहती थी।

इस फै़सले के पीछे के मक़सद का सारांश इन बिंदुओं से समझा जा सकता है:

पंजाब यूनिवर्सिटी समेत चंडीगढ़ पर पंजाब की दावेदारी कमजोर करना। पंजाब के गाँवों को तोड़कर बसाए गए चंडीगढ़ में पंजाब यूनिवर्सिटी पंजाब की दावेदारी की आख़ि‍री कड़ी की तरह है। सैनेट के ख़ात्मे से पंजाब के कॉलेज यूनिवर्सिटी के प्रशासनिक अमल से बाहर हो जाते।
केंद्रीकरण: मोदी सरकार राज्यों से शिक्षा संस्थान छीनकर उच्च-शिक्षा को अपने हाथ तले करना चाहती है। नई शिक्षा नीति के तहत यह काम और तेज़ी से होना है। आज भले ही आर्थिक तौर पर केंद्र सरकार का 60% और पंजाब सरकार का 40% हिस्सा है, लेकिन पंजाब के पास कोई प्रशासनिक ताक़त नहीं है और सारा नियंत्रण केंद्र के हाथ में है।
भगवाकरण: भाजपा-आर.एस.एस. हमेशा “हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान” का नारा बुलंद करती है। शिक्षा में पिछड़ी विचारधारा का प्रचार ज़ोरों पर है। दिल्ली यूनिवर्सिटी में मनुस्मृति पर कोर्स शुरू किए गए हैं। कैंपस में सांप्रदायिक गुंडागर्दी आम हो चुकी है। सैनेट के रहते भी यह होता रहा है। पिछले समय में नामजद ज़्यादातर सदस्य भाजपा-आर.एस.एस. से जुड़े थे, जैसे सतपाल जैन, संजय टंडन आदि। ए.बी.वी.पी. का प्रसार बढ़ा है, भगवाकरण की धूप तेज़ हुई है। सैनेट ख़त्म होने से सांप्रदायिक कामों को और खुली छूट मिल जाती।
निजीकरण: लंबे समय से सरकारें उच्च शिक्षा संस्थानों को महँगा कर रही हैं। सेल्फ़-फ़ाइनांस्ड कोर्सों के बहाने एक साल की फ़ीस लाखों तक की है। फ़ीस वृद्धि की रफ़्तार सैनेट की वजह से धीमी पड़ती थी। अब लूट को तेज़ करने के लिए सैनेट ख़त्म करने की कोशिश है, ताकि सिर्फ़ अमीर तबक़ा ही शिक्षा ले सके। नई शिक्षा नीति 2020 में भी सैनेट का कोई नामो-निशान नहीं है।
‘पंजाब पुनर्गठन एक्ट’ 1966 और पंजाब की राजनीतिक पार्टियों की घटिया भूमिका

‘पंजाब पुनर्गठन एक्ट’ की धारा 72 सिर्फ़ मामूली बदलाव की इजाज़त देती है, सैनेट-सिंडिकेट के मूल नियम बदलने का हक़ नहीं। वह हक़ सिर्फ़ पंजाब सरकार के पास है, जो विधानसभा में पंजाब यूनिवर्सिटी एक्ट 1947 में संशोधन लाकर ही कर सकती है। मोदी हुकूमत का पंजाब विधानसभा को दरकिनार करके नोटिफ़ि‍केशन जारी करना उसकी दादागिरी को दिखाता है।

तकनीकी तौर पर भी धारा 72 अब व्यर्थ हो चुकी है। 1970 के दशक में ही कुरुक्षेत्र और शिमला यूनिवर्सिटी बनने के बाद इसे रद्द करके पंजाब यूनिवर्सिटी को राज्य यूनिवर्सिटी घोषित कर देना चाहिए था, लेकिन अकाली दल, कांग्रेस और अब आम आदमी पार्टी – सभी ने पंजाब के हितों से ग़द्दारी की। ये पार्टियाँ चुपचाप केंद्रीकरण के पक्ष में खड़ी रहीं। पंजाब पहले ही पंजाबी बोलने वाले इलाक़े, नदी के पानी और अपनी राजधानी गँवा चुका है, अब ये यूनिवर्सिटी भी बलि चढ़ाने को तैयार हैं। पंजाब के मुख्यमंत्री, उच्च शिक्षा मंत्री और दो एम.एल.ए. सैनेट के स्थायी सदस्य हैं, लेकिन 2022 के बाद की 8 मीटिंगों में एक बार भी नहीं आए। असल में 2010 से अब तक कभी नहीं आए। 2022 में पंजाब यूनिवर्सिटी का केंद्रीकरण करने की कोशिश के ख़ि‍लाफ़ मोहाली में हुए विद्यार्थियों के प्रदर्शन पर लाठीचार्ज भी भगवंत मान सरकार ने ही करवाया था।

स्थाई हल सैनेट बहाल से आगे है

2024 में भी सरकार ने एक साल पहले ही (अक्टूबर 2024 में) सैनेट भंग कर दी थी, जबकि उसका कार्यकाल अक्टूबर 2025 तक था। वी.सी. तानाशाह तरीक़े से छात्र-विरोधी फै़सले सुना रही है। नए चुनावों का नोटिस 10 महीने पहले जारी होना ज़रूरी था, लेकिन जान-बूझकर जारी नहीं किया गया।

सैनेट कोई साफ़-सुथरी संस्था नहीं है। इसके रहते भी फ़ीस बढ़ी है, शिक्षा महँगी हुई है। फिर भी इसे बचाना इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि जनवादी संघर्ष की बदौलत यह संस्था बनी थी और एक हद तक जनवादी अधिकार इसके ज़रिए हासिल हो रहे हैं। इसे ख़त्म करना पीछे की ओर क़दम होगा। हमारी माँग जन-प्रतिनिधित्व बढ़ाने की होनी चाहिए, घटानं के ख़िलाफ़ संघर्ष होना चाहिए।

आज मुख्य बात यह है कि विद्यार्थियों के सामने 91 सदस्यीय सैनेट बहाल करवाने की माँग है, ताकि इस जनवादी ढाँचे को बनाए रखकर भविष्य में इसे और मज़बूत करने के लिए लड़ा जा सके। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि पंजाब यूनिवर्सिटी का संकट सिर्फ़ सैनेट बहाली से हल नहीं होगा। इसकी जड़ पंजाब पुनर्गठन एक्ट 1966 में है। 1966 में ही पंजाब के साथ अन्याय की जड़ें डाली गई थीं। इसलिए 91 सदस्यीय सैनेट की बहाली के साथ-साथ पंजाब यूनिवर्सिटी को पंजाब राज्य यूनिवर्सिटी बनाना होगा। पंजाब सरकार को विधानसभा में बिल लाकर धारा 72 रद्द करके केंद्र को प्रशासनिक फै़सलों से बाहर करना होगा और अपना बकाया भी तुरंत जारी करना होगा।

पंजाब यूनिवर्सिटी के मसले ने शिक्षा प्रबंधन के बड़े मसलों की ओर भी ध्यान खींचा है। वह है शिक्षा पर जबरन थोपा गया केंद्रीय नियंत्रण। शिक्षा का क्षेत्र राज्यों के पास होना चाहिए, जैसा 1975 तक था। 1976 में आपातकाल के दौरान 42वें संशोधन से इंदिरा गांधी हुकूमत ने इसे समवर्ती सूची में डाल दिया था, जो असल में केंद्रीय सूची ही है। इसलिए आज शिक्षा को फिर राज्य सूची में डालना होगा। सभी केंद्रीय यूनिवर्सिटी को संबंधित राज्यों के हवाले करना होगा। केवल इन क़दमों से ही यूनियन सरकार की शिक्षा में दख़लअंदाज़ी रोकी जा सकती है।

– जोबन और गुरविंदर

मुक्ति संग्राम – नवंबर 2025 में प्रकाशित

अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला: 2,500 मुस्लिम भाईचारे के लोगों पर दर्ज किए गए मुक़दमेपिछले समय में कम से कम 22 मुक़दमे 2,5...
10/12/2025

अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला: 2,500 मुस्लिम भाईचारे के लोगों पर दर्ज किए गए मुक़दमे

पिछले समय में कम से कम 22 मुक़दमे 2,500 से ज़्यादा मुस्लिम भाईचारे के लोगों पर दर्ज किए गए। ये 2,500 लोग कौन हैं? इनका क्या “अपराध” है? जिस कारण इन्हें क़ानूनी कार्रवाइयों का, घरों पर बुलडोज़र चलने का सामना करना पड़ रहा है। इस बारे में बात करते हैं, पिछले दिनों सोशल मीडिया पर ‘आई लव मुहम्मद’ नाम पर ट्रेंड चला। नौजवानों ने हाथों में बैनर लेकर, टी-शर्टों पर लिखकर फ़ोटोज़ सोशल मीडिया पर डालीं। ये कानपुर, बरेली में हुई घटनाओं के विरोध में किया गया।

उत्तर प्रदेश के कानपुर में मुस्लिम भाईचारे के लोगों द्वारा 4 सितंबर को पैग़ंबर मुहम्मद के जन्मदिन पर प्रोग्राम किया जा रहा था। जिसमें ‘आई लव मुहम्मद’ नाम का रोशनी वाला बोर्ड लगाया गया था। इस बोर्ड को लेकर कुछ स्थानीय हिंदू कट्टरपंथियों ने पुलिस को शिकायत की। मौक़े पर पुलिस ने पहुँचकर दो दर्जन मुस्लिम भाईचारे के लोगों को गिरफ़्तार किया और मुक़दमा दर्ज कर दिया गया। इन लोगों पर ‘धर्म के नाम पर दुश्मनी बढ़ाने, माहौल बिगाड़ने’ जैसे दोष लगाकर मुक़दमा दर्ज किया।

इस घटना के विरोध में 26 सितंबर को उत्तर प्रदेश के बरेली में स्थानीय इमाम की अगुवाई में लोगों ने हाथों में ‘आई लव मुहम्मद’ नाम के बैनर लेकर प्रदर्शन किया और कानपुर में हुए मुक़दमे रद्द करने की माँग की। लेकिन प्रदर्शन के दौरान पुलिस से झड़प हुई, जिसे हिंसा का नाम दे दिया गया और 75 लोगों को गिरफ़्तार किया और उन लोगों में से चार के घरों पर बुलडोज़र चला दिया गया!

इस दौरान ही अन्य राज्यों – उत्तराखंड के काशीपुर में, गुजरात के गोधरा में, महाराष्ट्र के मुंबई में लोगों ने कानपुर पुलिस की कार्रवाई का विरोध करने, झूठे मुक़दमे रद्द करने की माँग को लेकर प्रदर्शन किए। इन सभी जगहों पर ही प्रदर्शनों में शामिल लोगों पर मुक़दमे दर्ज किए और गिरफ़्तारियाँ की गईं।

यहाँ तक कि उत्तर प्रदेश के बहराइच ज़िले की कैसरगंज तहसील में एस.डी.एम. को शांतिपूर्वक माँग-पत्र देने गए मुस्लिम भाईचारे के प्रतिनिधिमंडल पर मुक़दमे दर्ज किए गए!

इस सारे घटनाक्रम पर पुलिस विभाग के उच्च अधिकारियों, भाजपा सरकार के नेताओं द्वारा बयान जारी किए गए। इन बयानों में मुस्लिम भाईचारे के लोगों पर की गई कार्रवाई को जायज़ ठहराया गया और धार्मिक त्योहार मनाने और प्रदर्शनों में शामिल लोगों को देश का माहौल बिगाड़ने वाले तत्व बताया गया!

सांप्रदायिक राजनेताओं और पुलिस के गुंडा गठजोड़ को मुस्लिम संप्रदाय के लोग अपराधी नज़र आते हैं! और उन्हें क़ानूनी-ग़ैर-क़ानूनी तौर पर डराना-धमकाना, उनके घरों-दुकानों पर बुलडोज़र चलाना अपना “पवित्र” फ़र्ज़ लगता है। भारत में दुनिया का सबसे बड़े तथाकथित लोकतंत्र होने के, क़ानून की नज़रों में सबको बराबर अधिकारों के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। लेकिन ज़मीनी सच्चाइयाँ इन सारे दावों की पोल खोल देती है।

लुटेरी शासक पार्टी भाजपा के नेता सांप्रदायिक ज़हर उगलते, फुँकारें मारते कभी मंदिर-मस्जिद का मुद्दा, कभी लव जिहाद, कभी गौरक्षा के मुद्दे को उभारकर और कभी हिंदू धर्म को ख़तरे के मसले को उभारकर समाज में नफ़रती माहौल बनाते रहते हैं। लोगों में सांप्रदायिक हिंसा को उभारने और मुस्लिम भाईचारे को कोने में लगाने की कवायद सरेआम जारी है।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की सांप्रदायिक विचारधारा के तहत काम कर रही ‘भारतीय जनता पार्टी’ भारत के संविधान की धारा 25, जो ‘भारत के हर नागरिक की अपने धर्म का पालन (रीति-रिवाज़, धार्मिक त्योहार मनाने) करने की आज़ादी की रक्षा करती है’ की धज्जियाँ उड़ाती रही है। पिछले 11 सालों में धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने वाली घटनाओं में लगातार वृद्धि हुई है। साल 2023 में नफ़रती भाषण की 668 घटनाएँ दर्ज हुईं, जो साल 2024 में बढ़कर 1,165 हो गईं, जो कि 74% वृद्धि है!

पिछले सालों से हर धार्मिक त्योहार जैसे रामनवमी, ईद, काँवड़ यात्रा आदि के दौरान मुस्लिम भाईचारे के लोगों के घरों, दुकानों, मस्जिदों यहाँ तक टोपी-दाढ़ी वाले साधारण लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। घरों की तोड़-फोड़ करना, आर्थिक बायकॉट, मस्जिदों पर भगवा झंडा फहराना आदि की घटनाएँ बढ़ी हैं।

इन घटनाओं से साफ़ है कि भारत में शासक वर्ग की पार्टियाँ धर्म के नाम पर वोटों की रोटी सेंकते हैं। ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति और आर.एस.एस. की राजनीति ‘हिंदू-हिंदी-हिंदुस्तान’ को धड़ल्ले से आगे बढ़ाने और अल्पसंख्यकों के मानव अधिकारों को लगातार छीनने के लिए भाजपा के नेतृत्व वाली भारत सरकार काम कर रही है। भारतीय सियासत में धर्म को एक निजी मसला न रहने देते हुए, हर धार्मिक रीति-रिवाज़, त्योहारों का राजनीतिक लाभ उठाया जा रहा है।

ऐसे समय में जब मेहनतकश जनता ग़रीबी, भुखमरी, महँगाई, बढ़ती बेरोज़गारी की मार झेल रही है, शासकों द्वारा मुसलमानों को हिंदुओं के दुश्मन के रूप में नक़ली तौर पर पेश करके मेहनतकशों के भाईचारे को ख़त्म करने की कोशिश की जा रही है। ऐसे समय में धर्मों, जातियों से ऊपर उठकर जनता द्वारा वर्ग के आधार पर एकजुटता बनाकर सांप्रदायिक राजनीति का मुँहतोड़ जवाब देना ही एकमात्र रास्ता बनता है।

– रविंदर कौर

मुक्ति संग्राम – नवंबर 2025 में प्रकाशित

सांप्रदायिक-फ़ाशीवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष: कट्टर हिंदुत्वी सांप्रदायिक फ़ाशीवादी प्रोजेक्ट के विरु...
09/12/2025

सांप्रदायिक-फ़ाशीवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष: कट्टर हिंदुत्वी सांप्रदायिक फ़ाशीवादी प्रोजेक्ट के विरुद्ध एकजुट होकर संघर्ष करना होगा

27 सितंबर 2025 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष पूरे हुए हैं। 1925 को दशहरे वाले दिन नागपुर में इस सांप्रदायिक संस्था की स्थापना हुई थी। भारत में सांप्रदायिक-फ़ाशीवादी विचारधारा और राजनीति की नुमाइंदगी करने वाले इस मुख्य संगठन आर.एस.एस. के जन्म और विकास को समझना ज़रूरी है।

20वीं सदी के शुरुआती दशक

विश्व-भर में यह भारी उथल-पुथल का दौर था। विश्व पूँजीवादी व्यवस्था 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी के आरंभ में साम्राज्यवाद के पड़ाव में दाख़िल हो रही थी। सस्ते श्रम की लूट, प्राकृतिक साधनों पर क़ब्ज़े की हवस भरी भूख और अपने बने माल को बेचने के लिए बाज़ारों की ज़रूरत से पैदा हुई साम्राज्यवादी लड़ाई ने दुनिया को पहले विश्व युद्ध में झोंक दिया था। लेकिन साथ ही इतिहास के तौर पर पूँजीवादी व्यवस्था की क़ब्र खोदने वाले क्रांतिकारी मज़दूर वर्ग के नेतृत्व में रूस के मज़दूरों ने समाजवादी क्रांति करके, मानव इतिहास को एक नई दिशा दी थी।

साल 1917 की महान अक्टूबर क्रांति मानव इतिहास की एक ऐसी रौशन मीनार बन गई, जिसकी रोशनी ने पूरे संसार के मज़दूरों में एक नया उत्साह भर दिया था। इधर हमारे देश भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवादियों की अपनी ज़रूरतों के कारण ही रेलवे लाइनें बिछ गई थीं, आने-जाने के आधुनिक साधनों की शुरुआत हो गई थी और ज़रूरत के अनुसार उद्योग भी लगने शुरू हो गए थे। यानी उपनिवेशवादी सरकार के तहत, सामंती सामाजिक-आर्थिक ढाँचे में ही पूँजीवाद पैदा होना शुरू हो गया था। भले ही उपनिवेशवादी शासकों की नीतियाँ अपने उपनिवेशों में पूँजीवादी राह पर आर्थिक विकास को प्रोत्साहन देने की बजाय, पिछड़ी सामंती व्यवस्था को बनाए रखने पर आधारित थीं। उपनिवेशवादी नीतियों के कारण यहाँ की दस्तकारियाँ तबाह हो गई थी। भूमि संबंधों में नए ज़मींदारी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी और महलवाड़ी की नीतियों के कारण, किसान आबादी की लूट के चलते किसान आबादी में भी ग़ुस्सा बढ़ रहा था। अंग्रेज़ों ने इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति की ज़रूरतें पूरी करने के लिए कपास और नील की खेती करवाई। किसानों की इच्छा के विरुद्ध नील की ज़बरदस्ती खेती करवाने के ख़िलाफ़ नील विद्रोह हुए। किसानों पर भारी करों के विरोध में और ज़मींदारों के ज़ुल्म के ख़िलाफ़ देश-भर में विद्रोह शुरू हो गए। उधर नए पैदा हुए मज़दूर वर्ग के संघर्षों की भी शुरुआत हो चुकी थी। मज़दूर वर्ग की विचारधारा का झंडा ऊँचा करने की सोच से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना होती है। देश के कई हिस्सों में दलितों और महिलाओं की शिक्षा की चेतना आ रही थी। जहाँ नए उभर रहे पूँजीपति वर्ग और मध्य वर्ग की पार्टी ‘इंडियन नेशनल कांग्रेस’ को महात्मा गांधी जैसा नेता मिल गया था, जो पूँजीवाद और मध्य वर्ग के लिए रियायतें हासिल करने के लिए और शासकों से बातचीत के दौरान अपनी सौदेबाज़ी की ताक़त बढ़ाने के लिए देश-भर में फैले जनता के ग़ुस्से को बेहद योग्यता से इस्तेमाल करने की समझ रखता था। इसी दौरान मज़दूरों की भी ट्रेड यूनियनें बन रही थीं। यह वह समय था, जब भारत की पुरानी वर्ण-जाति व्यवस्था पर आधारित सामाजिक व्यवस्था, जिसमें ज़मींदारों और ब्राह्मणों का दबदबा था, टूट रही थी। राजे-रजवाड़ों और ज़मींदारों को अपना स्वर्ग डगमगाता नज़र आ रहा था। शिक्षा के क्षेत्र में ख़ासतौर पर दलितों और महिलाओं की शिक्षा के अभियानों को, ऊँची जातियों और ब्राह्मणों के दबदबे वाले सामंती वर्ग ने अपने लिए ख़तरे के रूप में देखा। उन्हें लगा कि आम लोगों और महिलाओं की बराबरी की नई चेतना हिंदुत्व की परंपरागत पुरानी चेतना से मेल नहीं खाती और हिंदुत्व के मूल्यों-मान्यताओं के लिए ख़तरा पैदा हो गया है। उस दौर के राजे-रजवाड़े और ज़मींदार भले वे हिंदू हों या मुसलमान, आम मज़दूरों का सामाजिक पिछड़ापन उनकी ताक़त था और वे जनता की हर तरह की नई चेतना से वे डरते थे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना

नागपुर इलाक़े के पाँच चित्तपावन ब्राह्मणों ने कुछ औरों को साथ लेकर 27 सितंबर 1925 को आर.एस.एस. की स्थापना की। ‘हिंदू महासभा’ की स्थापना पहले ही 1915 में मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में हरिद्वार में एक सम्मेलन में हो चुकी थी। पहले इसका नाम ‘सर्वदेशक हिंदू सभा’ था। मदन मोहन मालवीय, लाला लाजपत राय और विनायक दामोदर सावरकर इसके नेता थे। केशव बलिराम हेडगेवार और बाल कृष्ण शिवराम मुंजे भी इसके बड़े नेता थे। मुंजे, आर.एस.एस. का संस्थापक हेडगेवार का राजनीतिक नेता था। इतिहासकार राम पुनियानी का कहना है कि ब्रिटेन में गोलमेज़ सम्मेलन में हिस्सा लेकर लौटते हुए, मुंजे की मुसोलिनी से मुलाक़ात का इंतज़ाम ब्रिटिश सरकार ने किया था। मुंजे ने उस मीटिंग में मुसोलिनी को कहा था कि उनके फ़ाशीवादी सैन्य स्कूल से वे बहुत प्रभावित हुए हैं और अपने देश में भी जाकर ऐसा कुछ करना चाहते हैं। बाद में इन्होंने नासिक में भोंसला सैन्य स्कूल भी खोला था, जो आज तक चल रहा है। आर.एस.एस. की स्थापना में मुंजे की बड़ी भूमिका रही है। कहा जाता है कि मुंजे ने फ़ाशीवादी नेता मुसोलिनी के विचारों से प्रभावित होकर हिंदुत्वी अभियान को हथियारबंद करने और उसके अनुसार संगठनात्मक ढाँचा बनाने की वकालत की थी। नागपुर के एक चौराहे में मुंजे की मूर्ति है, जिसके नीचे उसका एक वाक्य लिखा है – ‘जिसकी फ़ौज, उसका राज’। वैसे मुंजे, बाल गंगाधर तिलक का अनुयायी था। मदन मोहन मालवीय और अन्य हिंदुत्ववादी नेता कांग्रेस में रहकर हिंदुत्ववादी हितों की नुमाइंदगी करने का दावा करते थे। 1922 में सावरकर ने किताब लिखी, जिसमें हिंदुत्व की विचारधारात्मक व्याख्या की गई। उसने कहा कि यह देश हिंदुओं का देश है, यह उनका देश है, जिनकी यह पितृ भूमि है और पुण्य भूमि भी है। मुसलमान और ईसाई, जो बाहर से आए हैं, वे दूसरे दर्जे के नागरिक हैं। आर.एस.एस. ने इन विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए नई उम्र के लड़कों को प्रशिक्षण देने के अभियान के तहत हाथ में डंडा लेकर शारीरिक व्यायाम करने और विचारधारात्मक शिक्षा देने के लिए शाखाएँ लगानी शुरू कीं। शाखा से मतलब है एकत्र होकर शारीरिक व्यायाम और बौद्धिक शिक्षा हासिल करना। शाखा की बौद्धिक शिक्षा में हिंदू राजाओं की महानता और मुसलमान राजाओं की क्रूरता का विचार नई उम्र के लड़कों के दिमाग़ों में बिठाया जाता है। 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के समय यह निर्देश जारी किया गया था कि शाखा का काम नियमित रूप से चलता रहना चाहिए और ऐसा कोई काम नहीं करना, जिससे अंग्रेज़ों को तकलीफ़ पहुँचे या नुक़सान हो। इन शाखाओं में हिंदू राष्ट्रवाद या हिंदू राष्ट्रवाद के सिद्धांत पर लोगों को पक्का किया जाता था। दूसरी तरफ़ उस दौर में मुस्लिम कुलीन वर्ग के लोग भी मुस्लिम लीग के झंडे तले कहते थे कि मुसलमान भी एक राष्ट्र हैं। आठवीं सदी में मुहम्मद बिन क़ासिम ने सिंध पर हमला किया था, तब से भारत में मुसलमान भी एक राष्ट्र हैं। दो राष्ट्रों का सिद्धांत, जो सबसे पहले सावरकर ने दिया था, बाद में मुस्लिम लीग ने भी अपना लिया था। आगे चलकर आर.एस.एस. हिंदुत्ववादी हितों का नुमाइंदा संगठन के रूप में स्थापित हो गया। शाखा में लड़कियाँ शामिल नहीं हो सकतीं। लड़कों को प्रशिक्षण दिया जाता है कि वे कोई राष्ट्र विरोधी काम नहीं करेंगे। राष्ट्र का मतलब हिंदू राष्ट्र है। दूसरा ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के विरुद्ध लड़ाई में हिस्सा नहीं लेंगे। वैसे हिंदू महासभा के नेताओं के रूप में इनके कई नेता शुरू में कांग्रेस में शामिल थे और कई जगह सत्याग्रह में भी हिस्सा लेते रहे हैं। बाद वाले दौर में भी कई हिंदुत्ववादी कार्यकर्ता कांग्रेस के नेता रहे हैं। आर.एस.एस. के संस्थापक हेडगेवार ने भी 1920 के गांधी के सत्याग्रह में हिस्सा लिया था। लेकिन 1930 के सत्याग्रह से तय करके आर.एस.एस. को दूर रखा गया था। लेकिन ख़ुद हेडगेवार अस्थायी तौर पर सरसंघचालक की ज़िम्मेदारियाँ किसी और को सौंपकर सत्याग्रह में शामिल हुआ था और जेल भी गया था। उसका कहना था कि उसका मक़सद अंग्रेज़ों के विरुद्ध लड़ना नहीं था, बल्कि जेल में संघ के विचारों वाले लोगों से संपर्क करके संघ को मज़बूत करना था।

आर.एस.एस. का विस्तार और
अन्य सहायक संगठनों की स्थापना

यह शुरू से ही एक पुरुष प्रधान संगठन था। पहली शाखाएँ विदर्भ और महाराष्ट्र में लगीं। जब काफ़ी संख्या में विचारक तैयार हो गए तो पूरे भारत में संघ का प्रचार-प्रसार शुरू हो गया। संघ के विचारक को प्रचारक कहा जाता है, जो पूर्णकालिक कार्यकर्ता होता है और विवाह न करने का वचन देता है। आर.एस.एस. में महिलाओं का संगठन भी है, लेकिन वह मुख्य संगठन के मातहत है। 1936 में लक्ष्मी बाई केलकर ने, जो आर.एस.एस. के किसी प्रचारक की बहन थी, ने हेडगेवार को पत्र लिखा कि स्त्रियों को भी आर.एस.एस. में आने का अवसर दो। हेडगेवार ने कहा कि स्त्री-पुरुषों का साथ रहना हमारे समाज के लिए ठीक नहीं है, तुम एक दूसरा संगठन बना लो। नया संगठन बनाया गया, जिसका नाम रखा गया ‘राष्ट्रीय सेविका समिति’। वैसे धर्म के नाम पर बनने वाले दुनिया में किसी भी संगठन में महिलाओं को बराबर का दर्जा हासिल नहीं है। आगे चलकर देश में छात्रों, नौजवानों, मज़दूरों और किसानों में वामपंथी संगठनों का बोलबाला होने पर, उनके विरोध में इन्होंने 1948 में ए.बी.वी.पी. की स्थापना की। ए.बी.वी.पी. का मुख्य नारा था – मैनेजमेंट से मिलकर मामले हल करवाए जाएँ। उधर भारत में बड़ी संख्या आदिवासी आबादी की समस्या थी कि वे हिंदू नहीं हैं और प्रकृति पूजक हैं। उनके हिंदुकरण के लिए ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ की स्थापना की गई। प्रचार किया गया कि जंगलवासी असल में हिंदू थे, जो धर्म परिवर्तन से डरते हुए शहरों से भागकर जंगलों में रहने लगे हैं। 1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की अगुवाई में अपने राजनीतिक विंग के रूप में ‘भारतीय जन संघ’ नाम की पार्टी बनाई। दीन दयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी इसके मुख्य नेता थे। इस पार्टी ने राजनीति के मोर्चे पर हिंदू राष्ट्र की बात रखी और निजीकरण की पैरवी और सार्वजनिक क्षेत्र की नीतियों का विरोध किया। आगे चलकर ‘भारतीय मज़दूर संघ’ और ‘भारतीय किसान संघ’ भी बनाए गए। धार्मिक और सामाजिक-सांस्कृतिक मामलों में कई तरह के तथाकथित समाज सुधारक और बजरंग दल जैसे धार्मिक संगठन भी बनाए गए। महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का संबंध भी इनसे ही रहा है। शुरू में गाय के मुद्दे पर संघर्ष छेड़ते रहे। लेकिन इस सबके बावजूद आज़ादी के बाद के दशकों में हिंदुत्ववादी विचारधारा की आम लोगों में स्वीकृति नहीं हो सकी थी। 1974 में देश में व्यापक जनता के ग़ुस्से के ज़माने में जय प्रकाश की अगुवाई में आंदोलन चला जो ‘जे.पी. आंदोलन’ के नाम से मशहूर है। आर.एस.एस. और इसका राजनीतिक विंग भाजपा उसमें शामिल हो गए थे। उस आंदोलन के कंधे चढ़कर आर.एस.एस. अपने हिंदुत्ववादी एजेंडे का विस्तार करने में काफ़ी हद तक सफल हुई। इस आंदोलन से नई बनने वाली जनता पार्टी का यह अंग बन गए। इसके कार्यकर्ता जनता पार्टी के सदस्य भी बन गए और आर.एस.एस. के सदस्य भी रहे। दोहरी सदस्यता का शोर मचने पर, 1980 में जनता पार्टी में विभाजन हो गया और आर.एस.एस. के समर्थकों ने नई पार्टी ‘भारतीय जनता पार्टी’ की स्थापना कर ली और लोगों की आँखों में धूल झोंकने के लिए ‘गांधीवादी समाजवाद’ की विचारधारा को अपना मार्ग़दर्शक बताया।

नव उदारवादी आर्थिक नीतियों का दौर और भारत में सांप्रदायिक राजनीति का उभार

1990-91 में नव उदारवादी नीतियों का दौर शुरू होता है। वैश्वीकरण, निजीकरण और नियंत्रण मुक्ति के इस दौर में भारत के राजनीतिक परिदृश्य में बुनियादी बदलाव देखने को मिलने लगे। आर.एस.एस. अपने जन्म काल से ही हिंदुत्व के सांप्रदायिक एजेंडे को अलग-अलग रूपों में आगे लाती रही है। कभी गाय के नाम पर और कभी राम मंदिर का मुद्दा उभारकर मुसलमान विरोधी नफ़रत का प्रचार करती रही है। लेकिन पूँजीवादी संकटों के नतीजे के रूप में और भारत में कल्याणकारी राज्य वाली नीतियों के दौर के अंत के बाद पैदा होने वाली जनता की बेचैनी के समय, सांप्रदायिकता के बीज पनपने के लिए उपजाऊ ज़मीन तैयार होना शुरू हो गई थी। उधर मज़दूर वर्ग की क्रांतिकारी धारा की कमज़ोरी भी पिछड़े विचारों के बढ़ने का कुछ हद तक कारण बनी। भारतीय मज़दूर आबादी की लूट के लिए देसी और विदेशी पूँजी जो नई नीतियाँ लेकर आई, उन्हें तेज़ी और सख्ती से लागू करने के लिए, परंपरागत पूँजीवादी राजनीतिक पार्टियों की नाकामी से सांप्रदायिक फ़ाशीवादी पार्टी को आगे लाना भारतीय एकाधिकारी पूँजीपति वर्ग की अनिवार्य ज़रूरत बन गया। यह वह दौर है जब आर.एस.एस. की सांप्रदायिक विचारधारा का उभार शुरू हुआ। गाय के मुद्दे पर होने वाली भीड़ हत्याओं की घटनाओं में 100 से ज़्यादा मौतें हो चुकी हैं, जिनमें ज़्यादातर मुसलमान थे। सांप्रदायिक राजनीति के मुख्य नारे हिंदू राष्ट्र की स्थापना के लिए, अल्पसंख्यकों ख़ासतौर पर देश की मुसलमान आबादी को निशाना बनाया गया। इस अभियान में सबसे बड़ा मुद्दा बाबरी मस्जिद को गिराना और राम मंदिर निर्माण को बनाया गया। आडवाणी की रथयात्रा जैसी रथयात्राओं के दौरान किए जाने वाले ज़हरीले सांप्रदायिक प्रचार ने बड़े स्तर पर हिंदू-मुस्लिम दंगे करवाए। ग़रीबी, बेरोज़गारी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे ज़रूरी मुद्दों की जगह आर.एस.एस. ने कभी लव जिहाद, लैंड जिहाद, थूक जिहाद और अन्य कई तरह के जिहादों का नाम लेकर, भावनात्मक मुद्दों को इस तरह उभारा कि देश की बहुत बड़ी संख्या में निराश और हताश नौजवान इनके झाँसे में आने लगे। समाज के दलित मज़दूर और महिलाओं को निचले दर्जे पर रखना इनके एजेंडे में शामिल है। इनमें काम करने के लिए ‘सामाजिक समरसता मंच’ बनाया और कहा कि जातियों का ख़ात्मा नहीं, बल्कि अलग-अलग जातियों में तालमेल होना चाहिए।

आर.एस.एस. के मुख्य काम –
हिंदू–मुस्लिम के नाम पर समाज में नफ़रत फैलाना और वोटों के लिए कतारबंदी करना

2002 के गुजरात में मुसलमान विरोधी क़त्लेआम इस राजनीति की प्रमुख मिसाल है। उसके बाद भी मुज़फ़्फ़रनगर क़त्लेआम और 2020 के दिल्ली क़त्लेआम में मुस्लिम आबादी को निशाना बनाया गया। कोरोना समय में कोरोना जिहाद का झूठा प्रचार किया गया। अब मस्जिदों के सामने हँगामा करना, हनुमान चालीसा का पाठ और हिंदुत्ववादी त्योहारों के दौरान मुसलमान विरोधी नफ़रती प्रचार रोज़ाना की घटनाएँ बन गई हैं। इन दिनों कई शहरों में मुसलमान दुकानदारों और रेहड़ी वालों के सामान के बहिष्कार और शहर छोड़ देने की धमकियों का दौर चल रहा है। नई शिक्षा नीति के तहत पाठ्यक्रम बदले जा रहे हैं। वैज्ञानिक चेतना की जगह अंधविश्वास फैलाने वाले अभियान चलाए जा रहे हैं और इन्हें सरकारी संरक्षण हासिल है। मीडिया पर सांप्रदायिक फ़ाशीवादी आर.एस.एस. का नियंत्रण करके अभिव्यक्ति की आज़ादी का गला घोंटा जा रहा है। 2014 में मोदी सरकार के आने पर सांप्रदायिकता के अभियान को काफ़ी मज़बूती हासिल हुई है। यह है भारत में सांप्रदायिक फ़ाशीवादी संगठन आर.एस.एस. का 100 साल का इतिहास।

आज देश के नौजवानों, मज़दूरों, किसानों और मध्य वर्ग की मज़दूर आबादी के सामने बहुत बड़ी चुनौती है कि वे सांप्रदायिक फ़ाशीवादी राजनीति के इस हमले को समझें और देश की मज़दूर आबादी में धर्म, जाति और अंधराष्ट्रवाद के नाम पर डाली जाने वाली फूट का मुँहतोड़ जवाब देते हुए, पूँजीवादी समाज के ख़ात्मे और समाजवादी व्यवस्था की स्थापना के आंदोलन को तेज़ करें। आज लूट, शोषण, अन्याय के ख़िलाफ़ जनता में बढ़ते आक्रोश को सही दिशा देने के लिए, विचारक क्षेत्र में भी पूँजीवादी विचारधारात्मक दबदबे और सांप्रदायिक फ़ाशीवादी विचारधारा का मुक़ाबला करते हुए, मज़दूर वर्ग के विचारधारात्मक नेतृत्व की स्थापना के लिए आंदोलन को आगे बढ़ाने की ज़रूरत है। मानवता का भविष्य बहुत शानदार है। अँधेरे की ताक़तों की हार निश्चित है।

– सुखदेव

मुक्ति संग्राम – नवंबर 2025 में प्रकाशित

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