12/12/2025
ग़दरी शूरवीरों की गौरवशाली विरासत से प्रेरणा लेते हुए देशी-विदेशी पूँजीवादी शोषण के ख़िलाफ़ संघर्ष को आगे बढ़ाओ
लूट, शोषण, अन्याय पर टिकी व्यवस्था में शासकों की हमेशा कोशिश रहती है कि जनता को उनकी क़ुर्बानियों से भरी जुझारू क्रांतिकारी विरासत से दूर रखा जाए। क्योंकि अतीत की इस जुझारू विरासत से सीखकर ही जनता ज़ुल्म को चुनौती देना सीखती है, शोषण से आज़ादी के सपने देखती है और क़ुर्बानी का जज़्बा हासिल करती है। भारत की मेहनतकश जनता के पास अंग्रेज़ों की ग़ुलामी से आज़ादी के लिए संघर्ष और क़ुर्बानियों की गौरवशाली विरासत है। ग़ुलामी के ख़िलाफ़ ग़दर आंदोलन एक ऐसा आंदोलन था, जिसने न सिर्फ़ सोए हुए देशवासियों को जगाकर आज़ादी की नई चिंगारी दी, बल्कि इसके कारण अंग्रेज़ों को अपना तख़्त डगमगाता नज़र आया। ग़दर आंदोलन ऐसा आंदोलन था, जिससे प्रेरणा लेकर न सिर्फ़ उस समय आज़ादी के दीवानों की नई पीढ़ियाँ तैयार हुईं, बल्कि ग़दरी क्रांतिकारियों का गौरवशाली इतिहास आज भी क्रांतिकारियों की पीढ़ियों के रास्ते रौशन कर रहा है। लेकिन हमारे समय का यह दुखद पहलू है कि इस गौरवशाली आंदोलन, इसके नायकों की क़ुर्बानियों, जज़्बों और उनके आदर्शों के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।
अंग्रेज़ी ग़ुलामी से मुक्ति के लिए ग़दर पार्टी का संघर्ष
भारत को ग़ुलाम बनाने के बाद अंग्रेज़ हुक्मरानों ने भारत की दस्तकारियों को तबाह कर दिया, शहरों की आम मेहनतकश आबादी को भुखमरी और अकाल के दिन काटने के लिए मजबूर कर दिया। दूसरी ओर उन्होंने भारत के सामंतों के साथ गठजोड़ क़ायम कर लिया और किसानों पर टैक्सों का इतना बोझ बढ़ा दिया कि अपने हाथों से उपजाई फ़सलें भी उनका पेट न भर सकीं। कठिनाइयाँ झेलते किसान सूदखोरों के क़र्ज़दार हो गए। नतीजतन, लोगों को बेहतर रोज़ी-रोटी के लिए अपने परिवारों का पेट पालने के लिए विदेशों की ओर रुख़ करना पड़ा। हाँगकाँग, मलेशिया, सिंगापुर, शंघाई और फिर उन्होंने कनाडा, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की धरती पर पैर रखे। इस प्रवास में सबसे आगे रहे मध्य पंजाब के किसान, जो अब ज़मीन छोड़कर कनाडा, अमेरिका में लकड़ी चीरने वाले कारख़ानों और अन्य कारख़ानों में मज़दूरी करने लगे। किसानों के अलावा अंग्रेज़ सेना से रिटायर हुए सैनिक भी इन प्रवासियों में शामिल थे।
रोज़ी-रोटी कमाने के लिए गए इन मेहनतकशों को पश्चिमी पूँजीपति न सिर्फ़ सस्ते मज़दूरों के तौर पर इस्तेमाल करते थे, बल्कि उनके श्रम को गोरे मज़दूरों की हड़तालें तोड़ने के लिए भी इस्तेमाल करते थे। इस तरह गोरे मज़दूरों में भारत के इन मज़दूरों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलने लगी। 1907-08 में आर्थिक मंदी बढ़ी, तो भारतीयों के ख़िलाफ़ यह हिंसा और नफ़रत भी बढ़ी। ग़ुलाम देश के नागरिक होने के कारण उनके साथ और भी ज़्यादा बदसलूकी होती थी। उनके अंदर यह एहसास पैदा होने लगा कि सिर्फ़ डॉलरों से उनके माथे से ग़ुलामी का निशान नहीं मिट सकता, पराई धरती पर उन्हें इज़्ज़त की ज़िंदगी नसीब नहीं हो सकती। ऐसे में देश को आज़ाद कराने की भावना पैदा होने लगी।
13 मार्च 1913 को सोहन सिंह भकना और उनके साथियों की पहल पर एस्टोरिया में बैठक बुलाई गई, जिसमें ओरेगॉन और वाशिंगटन जैसे शहरों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। पहली बैठक में ही देश को आज़ाद कराने के विचार को समर्थन मिला। 21 अप्रैल 1913 को एक और बड़ी बैठक में हिंदुस्तान ग़दर पार्टी की स्थापना हुई और अख़बार शुरू करने का फ़ैसला लिया गया, जिसका नाम 1857 के ग़दर (विद्रोह) की याद में ‘ग़दर’ रखा गया। सोहन सिंह भकना को अध्यक्ष और लाला हरदयाल को महासचिव बनाया गया। अख़बार के लिए लाला हरदयाल के साथ करतार सिंह सराभा, हरनाम सिंह टुंडीलाट और पंडित जगत राम को ज़िम्मेदारी सौंपी गई। इस साप्ताहिक अख़बार का पहला अंक 1 नवंबर 1913 को प्रकाशित हुआ और दिनों-दिन ग़दर की ऐसी चिंगारियाँ भड़कीं, जो जहाँ भी पहुँचती विद्रोह की लपटें भड़कने लगतीं और ग़दर पार्टी की एक इकाई बन जाती। पार्टी के सदस्यों की संख्या कुछ महीनों में 12,000 तक पहुँच गई। पार्टी का कार्यालय अमेरिका के सैन फ़्रांसिस्को शहर का युगांतर आश्रम था, जहाँ सारा दिन भारत के मज़दूरों का आना-जाना लगा रहता। पार्टी को पता था कि असली लड़ाई भारत की ज़मीन पर ही होगी। दिन-ब-दिन प्रचार और आने वाले संघर्ष की तैयारियाँ तेज़ होने लगीं।
1914 की कामागाटामारू की घटना ने आग में घी डालने का काम किया। उधर पहला विश्व युद्ध शुरू हो गया और अंग्रेज़ भी इसमें शामिल हो चुके थे। देश को आज़ाद करने की घोषणा हुई। पार्टी के सदस्यों ने मेहनत से कमाई गई एक-एक पाई और अपना सब कुछ पार्टी कार्यालय में जमा करवाकर हथियार ख़रीदे और अपनी मातृभूमि के लिए चल पड़े। लेकिन तैयारियों के दौरान ग़दरी क्रांतिकारियों से गंभीर ग़लतियाँ हुईं। न सिर्फ़ उन्होंने ख़ुद को और अपने आदर्शों को छिपाकर नहीं रखा, बल्कि उन्होंने देश में वापस जाने का फ़ैसला भी गुप्त नहीं रखा। नतीजतन अंग्रेज़ी सरकार चौकन्नी हो चुकी थी और उसने देश की सारी बंदरगाहों पर मज़बूत नाकाबंदी कर दी थी। सारे नेताओं की पहचान हो गई थी, जिसके कारण बहुत सारे नेता भारत के तटों पर ही पकड़े गए, इनमें गिरफ़्तार हुए नेताओं में सोहन सिंह भकना भी शामिल थे। फिर करतार सिंह सराभा, हरनाम सिंह टुंडीलाट, रहमत अली वजीदके, जगत राम, पंडित कांशी राम और अन्य कई प्रसिद्ध ग़दरी क्रांतिकारी देश में प्रवेश करने में सफल हो गए। देश पहुँचते ही उन्होंने नेतृत्व केंद्र को फिर से संगठित करने का काम शुरू कर दिया।
करतार सिंह सराभा के बारे में यह प्रसिद्ध था कि यह नौजवान अपनी साइकिल पर जहाँ से भी गुज़रता था, वहाँ ग़दरी क्रांतिकारियों की पूरी टोली बन जाती थी। सैनिक छावनियों में संपर्क स्थापित किया गया, सैनिकों को साम्राज्यवादियों की सेवा करने की बजाय मातृभूमि को आज़ाद कराने के लिए लड़ने के लिए प्रेरित किया गया और आने वाली हथियारबंद क्रांति का हिस्सा बनने के लिए तैयार किया गया। तय हुआ कि शुरुआत पंजाब की छावनियों से की जाएगी और पंजाब और इसके साथ लगते इलाक़ों पर क़ब्ज़ा करके आगे बढ़ा जाएगा। ग़दर की तारीख़ का फ़ैसला हो गया, जो कि 21 फ़रवरी 1915 निर्धारित की गई। लेकिन अंग्रेज़ों ने भी अपने जासूस ग़दर पार्टी में घुसा रखे थे। ऐसे ही ग़द्दार किरपाल सिंह ने बिल्कुल आख़िरी मौक़े पर सूचना अंग्रेज़ों तक पहुँचा दी। ग़दरी क्रांतिकारियों द्वारा आख़िरी कोशिश के तौर पर तारीख़ को पहले करके 19 फ़रवरी कर दिया गया, लेकिन इसका भेद भी खुल गया। अंग्रेज़ों ने भारतीय सैनिकों को निहत्था कर दिया और गोरे सैनिकों का पहरा बिठा दिया। ग़दरियों को पकड़ना शुरू किया। ग़दर की हार हो चुकी थी। बहुत सारे ग़दरी गिरफ़्तार कर लिए गए, कई पुलिस मुठभेड़ों में मारे गए। बाग़ी सैनिकों का कोर्ट मार्शल करके सैकड़ों को गोली से उड़ा दिया गया या फाँसी पर लटका दिया गया। करतार सिंह सराभा, जगत राम, वी. जे. पिंगले, हरनाम सिंह सियालकोट के साथ-साथ अनेक ग़दरी क्रांतिकारी फाँसी पर चढ़ा दिए गए और बहुत से लोगों को काले पानी भेज दिया गया। जो बचे उन्हें अलग-अलग जेलों में क़ैद कर दिया गया।
इस तरह यह ग़दर असफल हो गया। लेकिन ग़दरियों ने हिम्मत नहीं हारी। जो ग़दरी अंडमान की कुख्यात काला पानी सज़ा काटने पहुँचे, उन्होंने इस जेल को अपनी नई रणभूमि बना लिया। आख़िर 1921 में कुख्यात सेलुलर जेल को तुड़वाकर ही दम लिया। इस संघर्ष के दौरान कई लोगों ने अपनी जान गँवाई। बाबा सोहन सिंह भकना जैसे काले पानी की उम्र क़ैद की सज़ा काटकर झुकी कमर के साथ रिहा हुए, लेकिन अपनी हिम्मत और जज़्बे को एक इंच भी झुकने नहीं दिया। ऐसी अद्वितीय है ग़दरी क्रांतिकारियों की क़ुर्बानी, बहादुरी और आदर्शों के प्रति प्रतिबद्धता।
ग़दर पार्टी की गौरवशाली विरासत
ग़दर पार्टी के शूरवीरों ने न सिर्फ़ क़ुर्बानी, आत्मसम्मान और हिम्मत न हारने की मिसाल क़ायम की, बल्कि इससे बढ़कर उन्होंने भारत की आज़ादी की लड़ाई के इतिहास में एक नई ऊर्जा का संचार किया। ग़दर पार्टी की निम्नलिखित विशेषताएँ उन्हें एक अद्वितीय आंदोलन और अपने समय की प्रगतिशील धारा का दर्जा देती हैं।
1) 1857 के विद्रोह के बाद ग़दर पार्टी के नेतृत्व में पहला बड़ा आंदोलन था, जिसने साम्राज्यवादी ग़ुलामी से पूर्ण आज़ादी का सपना देखा, जिसने रावलपिंडी और मुल्तान से लेकर ढाका तक व्यापक विद्रोह के लिए जाल बुना। इसका लक्ष्य सिर्फ़ पूर्ण आज़ादी नहीं, बल्कि आज़ादी के बाद लोकतांत्रिक गणतंत्र का निर्माण करना भी इसके लक्ष्य का हिस्सा था। इसने आज़ादी की क्रांतिकारी लड़ाई के दायरे को उग्रवादी विद्यार्थियों से आगे बढ़ाकर मज़दूरों-किसानों तक विस्तार किया। इसने लड़ाई को मुट्ठी-भर हठी योद्धाओं की उग्रवादी कार्रवाइयों के बजाय एक जन आंदोलन बनाने पर ज़ोर दिया। इस आंदोलन ने भारतीय सैनिकों को देश की आज़ादी के लिए लड़ने और अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ विद्रोह करने के लिए तैयार किया और आज़ादी की लड़ाई को अंग्रेज़ साम्राज्यवादियों की बैरकों तक ले गए।
2) ग़दर पार्टी इस मामले में भी विशेष थी कि इसने ऐसे समय में पूर्ण आज़ादी का नारा दिया, जब कांग्रेस जैसी शक्तियाँ भारतीयों को पहले विश्व युद्ध में अंग्रेज़ों की मदद करने के लिए प्रेरित कर रही थीं और जिनका लक्ष्य किसी उग्रवादी संघर्ष द्वारा आज़ादी की जगह अंग्रेज़ों से रियायतों की भीख माँगना था। इस तरह इसने कांग्रेस और गांधी के समझौतापरस्त रवैये को उजागर करके उसका विकल्प पेश किया।
3) यह आज़ादी का ऐसा व्यापक आंदोलन था, जो जाति, धर्म से मुक्त था। यह पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष आंदोलन था। इसके सारे सदस्य किसी भी धर्म को मानने या न मानने के लिए आज़ाद थे, लेकिन यह आंदोलन किसी ख़ास धर्म पर आधारित नहीं था, किसी धार्मिक मान्यताओं से प्रेरणा नहीं लेता था, न ही इसका लक्ष्य कोई धर्म आधारित राज्य स्थापित करना था। इस तरह इसमें जाति-रंग का कोई भी भेदभाव नहीं किया जाता था। जनवादी उसूलों से मुताबिक़, भारत में बसे अलग-अलग धर्मों, जातियों के लोगों को एक साझी लड़ाई में पिरोने के लिए ऐसा करना बहुत ज़रूरी भी था और आज भी ज़रूरी है।
इसके साथ ही ग़दर पार्टी की कुछ कमज़ोरियाँ भी रहीं, जिन्हें ऐतिहासिक संदर्भ में रखकर ही समझा जा सकता है। इसका आदर्श अमेरिका, कनाडा की तर्ज पर एक लोकतांत्रिक गणराज्य था और उससे भी प्रगतिशील समाजवादी व्यवस्था को इसने अपने आदर्श के तौर पर नहीं अपनाया। यह समाज के वर्ग विभाजन को और सामाजिक परिवर्तन में अलग-अलग वर्गों की भूमिका को नहीं समझ सकी। इसने अंग्रेज़ों को सेना में विद्रोह द्वारा चुनौती देने की कोशिश की, लेकिन उनके साथ गठजोड़ करने वाले भारत के सामंतों के ख़िलाफ़ इसने कोई आंदोलन नहीं छेड़ा, जबकि सामंतवाद के ख़िलाफ़ किसानों को संगठित करना चाहिए था। इसका कारण यह था कि पार्टी ख़ुद नई थी। लेकिन इन कमजोरियों के बावजूद इसकी उपलब्धियाँ और क़ुर्बानियाँ इसका मुख्य पहलू हैं। कमजोरियों पर चर्चा आज के समय को संबोधित करते हुए ज़्यादा प्रासंगिक हैं।
ग़दर पार्टी के बाक़ी बचे जुझारू कार्यकर्ताओं का बड़ा हिस्सा समाजवादी विचारों की ओर आकर्षित हुआ। इसमें बड़ी भूमिका रूस में 1917 की क्रांति के बाद अस्तित्व में आए समाजवादी देश की थी। कई ग़दरी क्रांतिकारी ख़ुद सोवियत रूस जाकर वहाँ की उपलब्धियाँ अपनी आँखों से देखकर आए और समाजवादी विचारों के साथ जुड़ गए। ‘किरती’ शुरू करने वाले संतोख सिंह किरती ग़दरी क्रांतिकारियों के ही साथी थे, जो सोवियत संघ जाकर आए थे। उम्र क़ैद काटने के बाद भी घरों में नहीं बैठे, किसान सभाएँ संगठित करने लगे और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए। इस तरह ग़दर आंदोलन की विरासत समाजवादी विचारों तक पहुँचती है। ग़दर आंदोलन की विरासत में साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ चुनौती है, दमन के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए आत्मविश्वास का जज़्बा है और मानवता की ख़ुशहाली के लिए समाजवाद का सपना है।
ग़दर पार्टी की विरासत और
आज का समय
ग़दरी शूरवीरों, उनके उत्तराधिकारियों और मेहनतकश जनता की क़ुर्बानियों से भरी जद्दोजहद के कारण 15 अगस्त को देश अंग्रेज़ों से आज़ाद हुआ। लेकिन उस समय मेहनतकश जनता का प्रतिनिधित्व करने वाली धारा कमज़ोर होने के कारण भारत की राज्यसत्ता पूँजीपतियों के हाथ आ गई। पिछले 78 सालों में मेहनतकश जनता के हिस्से में नई तरह की ग़ुलामी, ग़रीबी, लूट, दमन और अन्याय ही आया है। दूसरी ओर अंबानी, अदाणी, टाटा और बिरला और अन्य छोटे-बड़े पूँजीपतियों का देश के संसाधनों पर क़ब्ज़ा बढ़ता गया है। इन्होंने मेहनतकश जनता को लूटकर अत्यधिक संपत्ति जुटाई है। अब तक भारत में मौजूद रहीं सभी सरकारों और पूरी राज्य व्यवस्था ने पूँजीपतियों के हितों के लिए काम किया है।
2014 में भाजपा के नेतृत्व वाले एन.डी.ए. गठबंधन द्वारा भारत की यूनियन सरकार पर क़ब्ज़े के बाद जनता की हालत और ज़्यादा बदतर हुई है। नोटबंदी, जी.एस.टी. ने करोड़ों लोगों के रोज़गार और काम-धंधे ठप्प कर दिए। देश की अर्थव्यवस्था गिर रही है। ग़रीबी-भुखमरी दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। महँगाई ने जनता को अपनी रोटी के ख़र्चे पूरे करने भी मुश्किल कर दिए हैं। बेरोज़गारी ने पिछले 45 सालों के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। नौजवान निराश हैं। मज़दूर, ग़रीब किसान और विद्यार्थी आत्महत्या के रास्ते पर चल पड़े हैं। 1991 में शुरू हुई निजीकरण की नीतियों को भाजपा ज़ोर-शोर से लागू कर रही है, जिसके तहत सरकारी विभागों, जनता के संस्थानों को देशी-विदेशी पूँजीपतियों के सामने कौड़ियों के दाम परोसा जा रहा है, जिसमें सबसे ज़्यादा लाभ भारत के एकाधिकारी पूँजीपतियों ने कमाया है।
भाजपा के पीछे दरअसल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सक्रिय है, जो ‘हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान’ के नारे से भारत को हिंदू राष्ट्र में बदलने की पूरी कोशिश कर रहा है। इस मक़सद के लिए जनता में धर्म, जाति के आधार पर नफ़रत और तनाव बढ़ाया जा रहा है। मोदी के सत्ता में आने के बाद भगवाधारी सरेआम गुंडागर्दी कर रहे हैं और मुसलमानों, दलितों और जनवादी कार्यकर्ताओं पर हमले कर रहे हैं। राम मंदिर का निर्माण हुआ, बाबरी मस्जिद को गिराने के दोषी संघ और भाजपा नेता बरी कर दिए गए हैं, कश्मीरी जनता पर दमन बढ़ा दिया गया है। फ़ाशीवादी-सांप्रदायिक राजनीति के तहत नागरिकता संशोधन क़ानून लाया गया, जिसे देश-भर के लोगों के ज़बरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा। इस क़ानून पर अभी चाहे चुप्पी का माहौल है, लेकिन भाजपा सरकार अंदर ही अंदर नागरिकता क़ानून को लागू करने की तैयारी में है। हिंदू राष्ट्र के सपने को पूरा करने और बड़े पूँजीपतियों के पक्ष में नीतियाँ बनाने की ज़रूरत के चलते भाजपा राजनीतिक ताक़तों का अंधाधुंध केंद्रीकरण कर रही है और राज्यों की क्षेत्रीय स्वायत्तता छीनने का राष्ट्रीय दमन कर रही है। इसके साथ बहुराष्ट्रीय भारत में राष्ट्रीय दमन भी तीव्र होता जा रहा है।
ऐसे मौजूदा माहौल में हमारे ग़दरी शूरवीरों की याद की मशाल जलाना, उनकी विरासत को जानना-समझना और उससे प्रेरित होना आज बहुत ज़रूरी है। ग़दरी शूरवीरों ने लूट, दमन, अन्याय को चुनौती दी, जनता के लिए क़ुर्बानियाँ दीं और मानवता की ख़ुशहाली के लिए पहले लोकतांत्रिक गणराज्य, फिर समाजवादी व्यवस्था का रास्ता दिखाया है। आओ, ग़दरी शूरवीर शहीदों से प्रेरणा लेते हुए पूँजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था के ख़ात्मे; लूट, शोषण, अन्याय से मुक्त समाज के निर्माण के लिए क्रांतिकारी संघर्ष को आगे बढ़ाने के संकल्प लें।
किसान मोर्चे के दौरान गिरफ़्तारी के समय अमृतसर रेलवे स्टेशन पर पाँच ग़दरी शूरवीर, अगस्त 1939
(बाएँ से दाएँ) – बाबा संता सिंह गंडीविंड, बाबा दर्शन सिंह फ़ेरूमान, बाबा फ़ौजा सिंह भुल्लर,
बाबा सोहन सिंह भकना, बाबा कर्म सिंह चीमा
मुक्ति संग्राम – नवंबर 2025 में प्रकाशित