11/07/2026
😡😡😡वाह हमारी सोशल मीडिया की 'इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म' की दुकान! कसम से, आज के डिजिटल युग में अफवाहें और सनसनी इस कदर तरक्की कर चुकी हैं कि असली और नकली का भेद करने बैठो, तो खुद का दिमाग ही प्रेशर कुकर की तरह सीटी मारने लगता है। जरा गौर फरमाइए इस कमाल की कलाकारी पर, जहाँ दो अलग-अलग राज्यों के, अलग-अलग सालों के बेहद दर्दनाक और खौफनाक हादसों को मिक्सी में डालकर ऐसा 'क्राइम रायता' फैलाया गया है कि देखने वाले का कलेजा कांपने के बजाय सिर चकरा जाए। एक तरफ दिल्ली का वो बदनाम महरौली कांड, तो दूसरी तरफ महाराष्ट्र के मीरा रोड की वो दिल दहला देने वाली वारदात—दोनों को उठाकर ऐसा खिचड़ी बनाया गया है कि इतिहासकार भी अपनी डिग्रियां फाड़ लें। वैसे, हमारे देश में व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के कुछ ऐसे होनहार 'प्रोफेसर' बैठे हैं, जिन्हें न तो तारीखों से कोई मतलब है और न ही किरदारों के असली नामों से; उन्हें तो बस मसालेदार हेडलाइन चाहिए, चाहे उसके लिए जिंदा को मुर्दा करना पड़े या दिल्ली को उठाकर मुंबई के बगल में बसाना पड़े।
जब लोग बिना सोचे-समझे इन आधी-अधूरी और घालमेल वाली खबरों को 'फॉरवर्डेड एज़ रिसीव्ड' के तमगे के साथ ऐसे धड़ल्ले से शेयर करने लगते हैं, जैसे खुद मौके पर ही मौजूद रहे हों। अरे भाई, मीरा रोड वाले जिस खौफनाक कांड में कुकर और तवे वाली हैवानियत सच में हुई थी, उसके किरदार कोई और थे, और दिल्ली वाले जिस मामले के नाम यहाँ घसीटे जा रहे हैं, उसकी कहानी फ्रिज और जंगल के चक्कर काट रही थी। लेकिन नहीं, आजकल की इस अंधी दौड़ में सच जानने की फुर्सत किसे है? सबको बस सबसे पहले 'ब्रेकिंग न्यूज' का ढिंढोरा पीटना है। इस चक्कर में खौफनाक और संवेदनशील अपराध भी सोशल मीडिया की टीआरपी और लाइक्स बटोरने का एक सस्ता तमाशा बनकर रह जाते हैं। वाकई, इंसान की हैवानियत पर तो दिल कांपता ही है, लेकिन इन वायरल खबरों को बनाने वालों की इस जादुई 'क्रिएटिविटी' को देखकर तो खुद यमराज भी अपना सिर पकड़कर बैठ जाएं कि भाई, इतनी खतरनाक स्क्रिप्ट तो मैं भी नहीं लिख सकता था!
#मौनकीगूंज