17/09/2026
रोहिड़ा के फूल पेड़ का उपयोग,,,।।
राज्य पुष्प रोहिड़ा का पेड़ लगातार अनदेखी का शिकार हो रहा है. भीषण गर्मी और माइनस सर्दी में भी अपना वर्चस्व बनाए रखने वाले इस पेड़ की हर एक चीज बेशकीमती है. औषधीय गुणों से भरपूर रोहिड़ा के पेड़ की अनदेखी भविष्य में इसके वजूद पर भारी पड़ सकती है. सूखे में भी गुलजार रहने वाला यह पेड़ ना सिर्फ धोरों का श्रंगार है, बल्कि रेतीले धोरों के स्थिरीकरण के लिए भी यह पेड़ बहुउपयोगी है. दिसंबर से अप्रैल माह तक कई प्रकार के चटकीले फूलों से गुलजार होने वाला यह वृक्ष हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करता है.
प्रदेश सरकार ने 1983 में रोहिड़े के पुष्प को राज्य पुष्प घोषित कर दिया था, लेकिन आज यह अपने अस्तित्व और वजूद की लड़ाई लड़ रहा है. सरकार द्वारा इसके संरक्षण के लिए कोई विशेष योजना नहीं बनाई गई. स्थिरीकरण के लिए भी यह पेड़ बहुउपयोगी है. बता दे कि रोहिड़े की कटाई और इसकी लकड़ी के परिवहन पर प्रतिबंध है, कोई ऐसा करता हुआ पाया जाता है तो उसके खिलाफ वन अधिनियम के तहत कार्रवाई करने का वन विभाग के पास अधिकार है. वहीं, काश्तकार आज इसे लेने से मना कर रहा है और तर्क देता है कि इस पेड़ के नीचे फसल पैदा नहीं होती.
औषधीय गुण से भरपूर
रोहिड़ा औषधीय उपयोग में भी महत्वपूर्ण है. त्वचा, फोड़े-फुंसियों, पेट के रोग, घाव, कान का रोग, आंख के रोग की दवा में भी रोहिड़ा का उपयोग होता है. मूत्र संबंधी रोगों की दवा में भी रोहिड़ा का उपयोग होता है. पेट संबंधी रोगों में यह विशेष गुणकारी है और लिव-52 औषधि में भी इसका उपयोग किया जाता है.
रोहिड़ा पेड़ के फूल, तना, छाल काम आता है. यह लीवर, हार्ट, उदर रोगों में यह कारगर दवा है. इसके अलावा इसके फूलों से रोहितकारिष्ट, कुमार्यासव, कालमेघासव आदि दवा बनती है, जो लीवर संबंधी रोग, मोटापा, दमा, शुगर, बीपी सहित अन्य रोगों के इलाज में काम आता है.
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1. रोहिड़ा के फूल लीवर को स्वस्थ रखते हैं.
2. यह फूल शुगर और बीपी में असरदार हैं.
3. त्वचा रोगों और विषैले तत्वों में राहत मिलती है.
फूल मुरझाने लगते हैं. वहीं, रोहिड़ा के फूल इन दिनों खेत-खलियान में खिल रहे हैं. इसके फूल, पत्ते, फलियां व छाल काम आती है. जिससे इस पेड़ को तैयार करने में खर्चा बहुत कम एवं आमदनी अधिक और लंबे समय तक होती है. यह पेड़ कम बरसात वाले क्षेत्रों में भी अपना अस्तित्व बनाए रखता है. आपको बता दें कि रोहिड़ा के फूल को 1983 में राजस्थान का पुष्प घोषित किया गया था. इसे ‘मरू शोभा’ व ‘रेगिस्तान का सागवान’ भी कहते हैं. इसके लिए राजस्थान की जलवायु सबसे ज्यादा उपयुक्त रहती है |
इसकी लकड़ी है बेशकीमती
रोहिड़े की लकड़ी बेशकीमती और बेहद मजबूत होती है. रोहिड़े की लकड़ी की उम्र 100 साल बताई जाती है. बताया जाता है कि 100 साल तक रोहिड़े से बना फनीर्चर खराब नहीं होता और इसकी लकड़ी में कीड़े नहीं लगते. रोहिड़े की कमी की एक मुख्य वजह इसकी लकड़ी की मजबूती भी है, जो लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है. साज-सज्जा का सामान, फर्नीचर और घर के खिड़की और दरवाजे बनवाने के लिए भी रोहिड़े की अंधाधुंध कटाई हुई और आज भी हो रही है.
सर्दी और गर्मी सहने की अद्भुत क्षमता रखने वाला यह पेड़ -२ डिग्री सेल्सियस की ठंड और ५० डिग्री सेल्सियस की गर्मी में भी सीना तान कर खड़ा रहता है । पतझड़ के मौसम के अतिरिक्त यह वृक्ष खूब हरा-भरा रहता है ।
इस वृक्ष को विशेष वृक्षों की श्रेणी में लाने में इसके केसरिया रंग के घंटी के आकार के पुष्प महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जो देखने में बहुत ही सुन्दर और आकर्षक होते हैं ।
केसरिया रंग त्याग और बलिदान का प्रतीक माना जाता है और राजस्थान की भूमि वीरों की भूमि कहलाती है इसीलिए रोहिड़ा के फूल को १९८३ में राजस्थान का राज्य पुष्प घोषित किया गया है । गंधहीन होने के कारण इसके पुष्पों का प्रयोग पूजा पाठ में नहीं होता ।
इसके पुष्प राजस्थान की जैव विविधता को बनाए रखने में भी बहुत योगदान करते हैं । इसके पुष्पों पर जहां तरह तरह के कीट मंडराते रहते हैं वहीं बकरी के लिए यही पुष्प चारे का काम करते हैं । इसके वृक्षों पर अधिक पुष्पों का खिलना उस वर्ष अच्छी वर्षा होने का संकेत करता है । रोहिड़ा वृक्ष भूमि के कटाव को रोकने में मददगार होते हैं ।
रोहिड़ा की लकड़ी बहुत मजबूत और नक्काशी करने के लिए आदर्श मानी जाती है । इसलिए इसका उपयोग इमारती लकड़ी के रूप में किया जाता है और इसकी तुलना सागवान और शीशम से की जाती है ।
इसकी छाल का उपयोग विभिन्न रोगों के उपचार में ओषधि के रूप में किया जाता है । मूत्र , गर्मी , त्वचा और लीवर से सम्बन्धित रोगों में यह विशेष रूप से लाभकारी है ।