19/12/2025
पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक़ उल्ला ख़ान और रोशन सिंह का बलिदान दिवस
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास वीरों के त्याग, साहस और राष्ट्रभक्ति से भरा पड़ा है। 19 दिसंबर 1927 का दिन ऐसा ही एक स्वर्णिम लेकिन अत्यंत पीड़ादायक अध्याय है, जब तीन महान क्रांतिकारियों—पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक़ उल्ला ख़ान और रोशन सिंह—ने देश की आज़ादी के लिए हँसते-हँसते फाँसी का फंदा चूम लिया। यह दिन उनके अद्वितीय बलिदान को स्मरण करने और उनसे प्रेरणा लेने का अवसर है।
पंडित राम प्रसाद बिस्मिल एक महान कवि, लेखक और क्रांतिकारी थे। वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के प्रमुख स्तंभों में से एक थे। उनकी रचनाएँ—जैसे “सरफ़रोशी की तमन्ना”—युवाओं के दिलों में देशभक्ति की ज्वाला प्रज्वलित करती थीं। बिस्मिल जी का जीवन सादगी, साहस और दृढ़ संकल्प का प्रतीक था। उन्होंने अंग्रेज़ी शासन की अन्यायपूर्ण नीतियों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष को आवश्यक समझा और काकोरी कांड की योजना में अग्रणी भूमिका निभाई।
अशफाक़ उल्ला ख़ान, बिस्मिल जी के अभिन्न मित्र और सहयोद्धा थे। वे गहरे धार्मिक होते हुए भी सच्चे अर्थों में राष्ट्रवादी थे। हिंदू-मुस्लिम एकता उनके व्यक्तित्व की पहचान थी। अशफाक़ उल्ला ख़ान ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत की आज़ादी का संघर्ष किसी एक धर्म या वर्ग का नहीं, बल्कि पूरे देश का था। फाँसी से पहले भी उन्होंने देश के प्रति अपनी निष्ठा और अपने मित्र बिस्मिल के प्रति प्रेम को बड़े गर्व के साथ व्यक्त किया। उनका बलिदान आज भी आपसी भाईचारे और एकता का संदेश देता है।
रोशन सिंह अपेक्षाकृत कम चर्चित लेकिन उतने ही साहसी क्रांतिकारी थे। वे भी काकोरी कांड में सम्मिलित थे और अंग्रेज़ों के विरुद्ध संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। कठोर यातनाओं और लंबी कैद के बावजूद उनका मनोबल नहीं टूटा। अंततः उन्होंने भी देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
काकोरी कांड (1925) का उद्देश्य ब्रिटिश सरकार के खजाने को लूटकर क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए धन जुटाना था। यह घटना अंग्रेज़ी हुकूमत के लिए एक बड़ी चुनौती बनी। परिणामस्वरूप, कठोर मुकदमे चलाए गए और इन वीरों को फाँसी की सज़ा सुनाई गई। 19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर, फैज़ाबाद और इलाहाबाद की जेलों में क्रमशः बिस्मिल, अशफाक़ और रोशन सिंह को फाँसी दी गई।
इन तीनों शहीदों का बलिदान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा और ऊर्जा देने वाला सिद्ध हुआ। उनका जीवन हमें सिखाता है कि देशप्रेम, साहस, त्याग और एकता के बल पर ही कोई राष्ट्र स्वतंत्र और सशक्त बनता है। बलिदान दिवस पर उन्हें नमन करते हुए यह संकल्प लेना चाहिए कि हम उनके सपनों का भारत—न्यायपूर्ण, एकजुट और स्वाभिमानी—बनाने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहेंगे।