05/08/2026
डेहरी नगर पालिका के कार्यपालक अधिकारी विमल कुमार की हत्या विधि व्यवस्था के पतन का जीता जागता प्रमाण है। इस सरकार में भ्रष्टाचार की बात करना तो बेकार है। आज इसी संबंध में प्रेस वार्ता को संबोधित किया।
बिहार में 100 दिनों के अंदर दूसरे कार्यपालक अधिकारी की हत्या इस बड़बोली सरकार के माथे पर कलंक है। यह दर्शाता है कि नए मुख्यमंत्री के नेतृत्व में अपराधियों का मनोबल बढ़ा है और अधिकारियों का घटा है।
इस पूरे मामले को पुलिस अलग दिशा देने में लगी है। पुलिस ने आनन-फ़ानन में बिना जाँच, अनुसंधान, पोस्टमार्टम और फोरेंसिक रिपोर्ट के सीधे ही ड्राइवर को दोषी बता दिया। कह रहे है कि ड्राइवर पर काम का अत्यधिक दबाव, छुट्टी नहीं मिल रही थी, तो इसका मतलब वह EO कर्तव्यपरायण थे।
कल को मुख्यमंत्री की सुरक्षा में तैनात किसी सुरक्षाकर्मी या अधिकारी को छुट्टी नहीं मिली तो वह कुछ भी कदम उठा सकता है। क्या IG स्तर के अधिकारी तब भी ऐसा ही Sweeping Statement देंगे।
ड्राइवर के बार बार बदलते बयान संदेह उत्पन्न करते है। पहले बयान में कहता है कि, "दो अपाची बाइक से हमलावर आए”
दूसरा बयान में- "एक अपाची बाइक से हमलावर आए" और तीसरे बयान में कहता है कि "मैंने ही हत्या की"
स्पष्ट है कि पुलिस ड्राइवर को हत्यारा बता रही है लेकिन असली साजिशकर्ता को बचा रही है। साजिशकर्ता के नाम दिवंगत के परिजन बता रहे है। उनकी पत्नी जिन्होंने अपना सुहाग खोया है, वो नन्हे बिलखते बच्चे जिन्होंने अपना पिता का साया खोया है, वो माँ जिसकी कोख सूनी हुई है और वो बहन जिनके भाई को सत्ता संरक्षित अपराधियों ने छीन लिया।
परिजन जिस सत्ताधारी विधायक पर आरोप लगा रहे है उस एंगल से पुलिस जांच क्यों नहीं कर रही? क्या इसलिए कि उस विधायक के उसी रेंज के वरीय अधिकारी से घनिष्ठ संबंध है और वह अधिकारी प्रदेश के उपमुख्यमंत्री के संबंधी है।
पत्नी के आरोप को यह सरकार हल्के में क्यों ले रही है? जब सपष्ट है कि ये EO उस विधायक के सीधे टारगेट पर थे, इसी विधायक ने विधानसभा में EO को लेकर टिप्पणी भी की थी। अगर EO कर्तव्यपरायण नहीं होते तो विधायक की शिकायत के बाद नगर विकास मंत्री उन्हें हटा देते लेकिन यहाँ मामला भ्रष्टाचार और वसूली का था।
जैसा की डेहरी में विधायक के कार्यकलाप और उसकी कैसे राजनीतिक एंट्री हुई सभी जानते है। इस विस्फोटक आरोप को भला पुलिस और प्रशासन कैसे नजरअंदाज कर सकते है कि डेहरी विधायक ₹25 लाख से लेकर ₹50 लाख से तक की वसूली की नियमित मांग कर रहे थे। विधायक पर भ्रष्टाचार के साथ साथ हत्या का मुक़दमा दर्ज होना चाहिए। नामज़द FIR होनी चाहिए।
EO की पत्नी बबीता देवी ने आरोप लगाया है कि डेहरी विधायक सोनू सिंह रोजाना फोन कॉल कर वसूली की मांग कर मानसिक उत्पीड़न करते थे, और EO स्व॰ श्री विमल कुमार मनोवैज्ञानिक दबाव में "हाँ सर" "हाँ सर" का जवाब देते थे। घटना से 1 दिन पूर्व विमल जी की विधायक से मुलाकात भी हुई। इस विधायक ने अधिकारी को इतना अधिक प्रताड़ित कर दिया था कि उनकी पत्नी ने उन्हें तबादले की सलाह भी दी थी। लेकिन ईमानदार अधिकारियों का इस सरकार में कैसे ट्रांसफर पोस्टिंग होता है, सब जानते है। ज़ाहिर है कि अधिकारी और उनके परिजनों को अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता और जान के खतरे का पूर्वानुमान भी था।
भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 199 जो पूर्व में धारा 166A थी उसका बिहार पुलिस ने जानबूझकर उल्लंघन किया है। यह धारा मुख्य रूप से पुलिस या जांच अधिकारियों पर लागू होती है यदि वे किसी गंभीर मामले में एफआईआर दर्ज नहीं करते या जांच के नियमों को तोड़ते है। स्पष्ट है कि बिहार पुलिस में विधायक से संबंधित साक्ष्यों की जानबूझकर उपेक्षा की है और यह BNS की स्पष्ट अवेहलना है।
क्या मुख्यमंत्री-उपमुख्यमंत्री के निर्देश पर बिहार पुलिस द्वारा पूर्वाग्रही तरीके से जांच की जा रही है? बिहार पुलिस निष्पक्ष जाँच क्यों नहीं कर रही है?
7 हत्याओं का आरोपी इस प्रदेश के मुख्यमंत्री बने है जब से सम्पूर्ण बिहार में सत्ताधारी नेताओं और अपराधियों का नापाक गठजोड़ बनना शुरू हुआ है और दो अधिकारी इस सिंडिकेट की बलि चढ़ चुके है। मुख्यमंत्री और दो-दो उपमुख्यमंत्रियों की निष्क्रियता, भ्रष्टाचारियों को संरक्षण तथा लचर प्रदर्शन से प्रशासनिक अधिकारियों का मनोबल टूट चुका है।
प्रदेशवासियों में नागरिक सुरक्षा, सरकार-अपराधी गठजोड़ तथा पुलिस की एकपक्षीय कार्यशैली तथा मुख्यमंत्री की समझ और विश्वसनीयता को लेकर एक जनव्यापक चर्चा शुरू हो चुकी है। ये बड़बोले मुख्यमंत्री सोचते है कि विपक्ष का आवास और सुरक्षा लेकर, जाति और धर्म विशेष समूहों को टारगेट कर , बुलडोजर चलाकर तालियाँ बटोर लोगों को ख़ुश कर देंगे तो यह मूर्खता और अंहकार की पराकाष्ठा है।