08/03/2026
आज श्री मुरारी बापू की जीवन की राह दिखाती रामायण में एक बहुत अच्छी बात पढ़ने को मिली सोचा आपके साथ सांझा की जाए ।।
मानस बोध
एक बहुत बड़ा मेला लगा था। एक छोटा सा बच्चा अपनी माँ के साथ मेले में गया। बच्चा बार-बार अपनी माँ से खिलौने ले देने की ज़िद कर रहा था। माँ ग़रीब थी, वह बच्चे को कुछ भी खरीदकर दे पाने की स्थिति में नहीं थी, इसलिए बहाने बनाती थी कि यह तो नक़ली होती है, इसमें सब नक़ली दिखता है। उसके पास पैसे नहीं थे। दिल में बहुत इच्छा थी कि बच्चे को मैं खिलौना ख़रीदकर दूँ, लेकिन सामर्थ्य नहीं था। उस माँ और बच्चे के पीछे चीज़ एक श्रीमंत मेला देखने आया, वह लगातार देखता है कि इस बच्चे को कुछ ख़रीदना है। श्रीमंत का कोई बच्चा नहीं था, इसलिए उसे बच्चे के प्रति बहुत प्रेम हुआ कि इस बच्चे को मैं कुछ ले दूँ। लेकिन उसे लगा कि यह स्त्री युवा है, अकेली है, मैं उसके बच्चे की तरफ़ प्रेम दर्शाऊँगा तो उसे लगेगा कि मेरे बच्चे पर इतना प्रेम किसलिए ? कोई बुरा इरादा है, ऐसा अर्थ शायद लगाए, इसलिए पुरुष बेचारा मन ही मन में भाव को रोक रहा है। अचानक मेले कुछ धक्का-मुक्की हुई और बच्चा और उसकी माँ बिछुड़ गए। में बच्चा रोने लगा। संतानहीन श्रीमंत पुरुष को बच्चे को खिलाने का, उसे प्रेम करने का अवसर मिल गया। उसने बच्चे का हाथ पकड़कर कहा, 'बेटा, तुझे यह खिलौना चाहिए ना ? लो, मैं तुझे सब ख़रीद देता हूँ। तू खिलौने के लिए रो रहा था, तो चल अब तू बोले उतने खिलौने ले दूँ ।' बच्चे ने रोते-रोते ही जवाब दिया, 'अब मुझे खिलौने नहीं चाहिए, अब मुझे अपनी माँ चाहिए।' मेले के खिलौने तभी तक अच्छे लगते हैं, जब तक माँ का साथ रहे। जब माँ का हाथ छूट जाता है, तब सारा मेला बिगड़ जाता है। संसार के भोग तभी सुखद रहेंगे जब माँ यानी कि परमात्मा का साथ रहेगा। काम तभी फलदायी बनेगा जब राम का साथ होगा।
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