Awara Poetry

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साहिर की कलम से,,,,,,,,  #परछाइयां जवान रात के सीने पे दूधिया आँचलमचल रहा है किसी ख़ाब-ए-मर्मरीं की तरहहसीन फूल हसीं पति...
02/03/2024

साहिर की कलम से,,,,,,,, #परछाइयां

जवान रात के सीने पे दूधिया आँचल
मचल रहा है किसी ख़ाब-ए-मर्मरीं की तरह

हसीन फूल हसीं पतियाँ हसीं शाख़ें
लचक रही हैं किसी जिस्म-ए-नाज़नीं की तरह

फ़ज़ा में घुल से गए हैं उफ़ुक़ के नर्म ख़ुतूत
ज़मीं हसीन है ख़्वाबों की सरज़मीं की तरह

तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
कभी गुमान की सूरत कभी यक़ीं की तरह

वो पेड़ जिन के तले हम पनाह लेते थे
खड़े हैं आज भी साकित किसी अमीं की तरह

उन्ही के साए में फिर आज दो धड़कते दिल
ख़मोश होंटों से कुछ कहने सुनने आए हैं

न जाने कितनी कशाकश से कितनी काविश से
ये सोते जागते लम्हे चुरा के लाए हैं

यही फ़ज़ा थी यही रुत यही ज़माना था
यहीं से हम ने मोहब्बत की इब्तिदा की थी

धड़कते दिल से लरज़ती हुई निगाहों से
हुज़ूर-ए-ग़ैब में नन्ही सी इल्तिजा की थी

कि आरज़ू के कँवल खिल के फूल हो जाएँ
दिल-ओ-नज़र की दुआएँ क़ुबूल हो जाएँ

तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
तुम आ रही हो ज़माने की आँख से बच कर

नज़र झुकाए हुए और बदन चुराए हुए
ख़ुद अपने क़दमों की आहट से झेंपती डरती

ख़ुद अपने साए की जुम्बिश से ख़ौफ़ खाए हुए
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं

रवाँ है छोटी सी कश्ती हवाओं के रुख़ पर
नदी के साज़ पे मल्लाह गीत गाता है

तुम्हारा जिस्म हर इक लहर के झकोले से
मिरी खुली हुई बाहोँ में झूल जाता है

तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
मैं फूल टाँक रहा हूँ तुम्हारे जोड़े में

तुम्हारी आँख मसर्रत से झुकती जाती है
न जाने आज मैं क्या बात कहने वाला हूँ

ज़बान ख़ुश्क है आवाज़ रुकती जाती है
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं

मिरे गले में तुम्हारी गुदाज़ बाहें हैं
तुम्हारे होंटों पे मेरे लबों के साए हैं

मुझे यक़ीं है कि हम अब कभी न बिछड़ेंगे
तुम्हें गुमान कि हम मिल के भी पराए हैं

तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
मिरे पलंग पे बिखरी हुई किताबों को

अदा-ए-इज्ज़-ओ-करम से उठा रही हो तुम
सुहाग-रात जो ढोलक पे गाए जाते हैं

दबे सुरों में वही गीत गा रही हो तुम
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं

वो लम्हे कितने दिलकश थे वो घड़ियाँ कितनी प्यारी थीं
वो सेहरे कितने नाज़ुक थे वो लड़ियाँ कितनी प्यारी थीं

बस्ती की हर इक शादाब गली ख़्वाबों का जज़ीरा थी गोया
हर मौज-ए-नफ़स हर मौज-ए-सबा नग़्मों का ज़ख़ीरा थी गोया

नागाह लहकते खेतों से टापों की सदाएँ आने लगीं
बारूद की बोझल बू ले कर पच्छिम से हवाएँ आने लगीं

ता'मीर के रौशन चेहरे पर तख़रीब का बादल फैल गया
हर गाँव में वहशत नाच उठी हर शहर में जंगल फैल गया

मग़रिब के मोहज़्ज़ब मुल्कों से कुछ ख़ाकी-वर्दी-पोश आए
इठलाते हुए मग़रूर आए लहराते हुए मदहोश आए

ख़ामोश ज़मीं के सीने में ख़ेमों की तनाबें गड़ने लगीं
मक्खन सी मुलाएम राहों पर बूटों की ख़राशें पड़ने लगीं
फ़ौजों के भयानक बैंड तले चर्खों की सदाएँ डूब गईं

जीपों की सुलगती धूल तले फूलों की क़बाएँ डूब गईं
इंसान की क़िस्मत गिरने लगी अजनास के भाव चढ़ने लगे
चौपाल की रौनक़ घुटने लगी भरती के दफ़ातिर बढ़ने लगे

बस्ती के सजीले शोख़ जवाँ बन बन के सिपाही जाने लगे
जिस राह से कम ही लौट सके उस राह पे राही जाने लगे

उन जाने वाले दस्तों में ग़ैरत भी गई बरनाई भी
माओं के जवाँ बेटे भी गए बहनों के चहेते भाई भी

बस्ती पे उदासी छाने लगी मेलों की बहारें ख़त्म हुईं
आमों की लचकती शाख़ों से झूलों की क़तारें ख़त्म हुईं

धूल उड़ने लगी बाज़ारों में भूक उगने लगी खलियानों में
हर चीज़ दुकानों से उठ कर रू-पोश हुई तह-ख़ानों में

बद-हाल घरों की बद-हाली बढ़ते बढ़ते जंजाल बनी
महँगाई बढ़ कर काल बनी सारी बस्ती कंगाल बनी

चरवाहियाँ रस्ता भूल गईं पनहारियाँ पनघट छोड़ गईं
कितनी ही कुँवारी अबलाएँ माँ बाप की चौखट छोड़ गईं

अफ़्लास-ज़दा दहक़ानों के हल बैल बिके खलियान बिके
जीने की तमन्ना के हाथों जीने के सब सामान बिके

कुछ भी न रहा जब बिकने को जिस्मों की तिजारत होने लगी
ख़ल्वत में भी जो ममनूअ' थी वो जल्वत में जसारत होने लगी

तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
तुम आ रही हो सर-ए-शाम बाल बिखराए

हज़ार-गूना मलामत का बार उठाए हुए
हवस-परस्त निगाहों की चीरा-दस्ती से

बदन की झेंपती उर्यानियाँ छुपाए हुए
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं

मैं शहर जा के हर इक दर पे झाँक आया हूँ
किसी जगह मिरी मेहनत का मोल मिल न सका

सितमगरों के सियासी क़िमार-ख़ाने में
अलम-नसीब फ़रासत का मोल मिल न सका

तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
तुम्हारे घर में क़यामत का शोर बरपा है

महाज़-ए-जंग से हरकारा तार लाया है
कि जिस का ज़िक्र तुम्हें ज़िंदगी से प्यारा था

वो भाई नर्ग़ा-ए-दुश्मन में काम आया है
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं

हर एक गाम पे बद-नामियों का जमघट है
हर एक मोड़ पे रुस्वाइयों के मेले हैं

न दोस्ती न तकल्लुफ़ न दिलबरी न ख़ुलूस
किसी का कोई नहीं आज सब अकेले हैं

तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
वो रहगुज़र जो मिरे दिल की तरह सूनी है
न जाने तुम को कहाँ ले के जाने वाली है

तुम्हें ख़रीद रहे हैं ज़मीर के क़ातिल
उफ़ुक़ पे ख़ून-ए-तमन्ना-ए-दिल की लाली है

तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
सूरज के लहू में लिथड़ी हुई वो शाम है अब तक याद मुझे
चाहत के सुनहरे ख़्वाबों का अंजाम है अब तक याद मुझे

उस शाम मुझे मालूम हुआ खेतों की तरह इस दुनिया में
सहमी हुई दो-शीज़ाओं की मुस्कान भी बेची जाती है

उस शाम मुझे मालूम हुआ इस कार-गह-ए-ज़र्दारी में
दो भोली-भाली रूहों की पहचान भी बेची जाती है

उस शाम मुझे मालूम हुआ जब बाप की खेती छिन जाए
ममता के सुनहरे ख़्वाबों की अनमोल निशानी बिकती है

उस शाम मुझे मालूम हुआ जब भाई जंग में काम आएँ
सरमाए के क़हबा-ख़ाने में बहनों की जवानी बिकती है

सूरज के लहू में लिथड़ी हुई वो शाम है अब तक याद मुझे
चाहत के सुनहरे ख़्वाबों का अंजाम है अब तक याद मुझे

तुम आज हज़ारों मील यहाँ से दूर कहीं तन्हाई में
या बज़्म-ए-तरब-आराई में
मेरे सपने बुनती होंगी बैठी आग़ोश पराई में
और मैं सीने में ग़म ले कर दिन-रात मशक़्क़त करता हूँ
जीने की ख़ातिर मरता हूँ
अपने फ़न को रुस्वा कर के अग़्यार का दामन भरता हूँ
मजबूर हूँ मैं मजबूर हो तुम मजबूर ये दुनिया सारी है
तन का दुख मन पर भारी है
इस दौर में जीने की क़ीमत या दार-ओ-रसन या ख़्वारी है
मैं दार-ओ-रसन तक जा न सका तुम जेहद की हद तक आ न सकीं
चाहा तो मगर अपना न सकीं
हम तो दो ऐसी रूहें हैं जो मंज़िल-ए-तस्कीं पा न सकें
जीने को जिए जाते हैं मगर साँसों में चिताएँ जलती हैं
ख़ामोश वफ़ाएँ जलती हैं
संगीन हक़ाइक़-ज़ारों में ख़्वाबों की रिदाएँ जलती हैं
और आज जब इन पेड़ों के तले फिर दो साए लहराए हैं
फिर दो दिल मिलने आए हैं
फिर मौत की आँधी उट्ठी है फिर जंग के बादल छाए हैं
मैं सोच रहा हूँ इन का भी अपनी ही तरह अंजाम न हो
इन का भी जुनूँ नाकाम न हो
इन के भी मुक़द्दर में लिखी इक ख़ून में लिथड़ी शाम न हो
सूरज के लहू में लिथड़ी हुई वो शाम है अब तक याद मुझे
चाहत के सुनहरे ख़्वाबों का अंजाम है अब तक याद मुझे
हमारा प्यार हवादिस की ताब ला न सका
मगर उन्हें तो मुरादों की रात मिल जाए
हमें तो कश्मकश-ए-मर्ग-ए-बे-अमाँ ही मिली
उन्हें तो झूमती गाती हयात मिल जाए
बहुत दिनों से है ये मश्ग़ला सियासत का
कि जब जवान हों बच्चे तो क़त्ल हो जाएँ
बहुत दिनों से ये है ख़ब्त हुक्मरानों का
कि दूर दूर के मुल्कों में क़हत बो जाएँ
बहुत दिनों से जवानी के ख़्वाब वीराँ हैं
बहुत दिनों से सितम-दीदा शाह-राहों में
निगार-ए-ज़ीस्त की इस्मत पनाह ढूँढती है
चलो कि आज सभी पाएमाल रूहों से
कहें कि अपने हर इक ज़ख़्म को ज़बाँ कर लें
हमारा राज़ हमारा नहीं सभी का है
चलो कि सारे ज़माने को राज़-दाँ कर लें
चलो कि चल के सियासी मुक़ामिरों से कहें
कि हम को जंग-ओ-जदल के चलन से नफ़रत है
जिसे लहू के सिवा कोई रंग रास न आए
हमें हयात के उस पैरहन से नफ़रत है
कहो कि अब कोई क़ातिल अगर इधर आया
तो हर क़दम पे ज़मीं तंग होती जाएगी
हर एक मौज-ए-हवा रुख़ बदल के झपटेगी
हर एक शाख़ रग-ए-संग होती जाएगी
उठो कि आज हर इक जंग-जू से ये कह दें
कि हम को काम की ख़ातिर कलों की हाजत है
हमें किसी की ज़मीं छीनने का शौक़ नहीं
हमें तो अपनी ज़मीं पर हलों की हाजत है
कहो कि अब कोई ताजिर इधर का रुख़ न करे
अब इस जगह कोई कुँवारी न बेची जाएगी
ये खेत जाग पड़े उठ खड़ी हुईं फ़स्लें
अब इस जगह कोई क्यारी न बेची जाएगी
ये सर-ज़मीन है गौतम की और नानक की
इस अर्ज़-ए-पाक पे वहशी न चल सकेंगे कभी
हमारा ख़ून अमानत है नस्ल-ए-नौ के लिए
हमारे ख़ून पे लश्कर न पल सकेंगे कभी
कहो कि आज भी हम सब अगर ख़मोश रहे
तो इस दमकते हुए ख़ाक-दाँ की ख़ैर नहीं
जुनूँ की ढाली हुई एटमी बलाओं से
ज़मीं की ख़ैर नहीं आसमाँ की ख़ैर नहीं
गुज़िश्ता जंग में घर ही जले मगर इस बार
अजब नहीं कि ये तन्हाइयाँ भी जल जाएँ
गुज़िश्ता जंग में पैकर जले मगर इस बार
अजब नहीं कि ये परछाइयाँ भी जल जाएँ
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं,,,,,,,,,,

08/10/2020

वो अश्क़ बन के मेरे चश्म ए तर में रहता है
अजीब शख्स है जो पानी के घर में रहता है

19/09/2019

वो बे-वफ़ा है तो क्या, मत कहो बुरा उसको
कि जो हुआ सो हुआ, ख़ुश रखे ख़ुदा उसको
وہ بے وفا ہے تو کیا مت کہو بُرا اُس کو
کہ جو ہوا سو ہوا خوش رکھے خدا اُس کو
नज़र ना आए तो उसकी तलाश में रहना
कहीं मिले तो पलट कर ना देखना उसको
نظر نہ آئے تو اسکی تلاش میں رہنا
کہیں ملے تو پلٹ کر نہ دیکھنا اُس کو
वो सादा ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या
हवा के साथ चला, ले उड़ी हवा उसको
وہ سادہ خُو تھا زمانے کے خم سمجھتا کیا
ہوا کے ساتھ چلا_____ لے اڑی ہوا اُس کو
वो अपने बारे में कितना है ख़ुशगुमाँ देखो
जब उसको मैं भी ना देखूं तो देखना उसको
وہ اپنے بارے میں کتنا ہے خوش گماں دیکھو
جب اس کو میں بھی نہ دیکھوں تو دیکھنا اُس کو
उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे
मेरी दुआ कि ख़ुदा दे ये हौसला उसको
اسے یہ دُھن کہ مجھے کم سے کم اداس رکھے
مری دعا کہ خدا دے یہ حوصلہ اُس کو
ग़ज़ल में तज़किरा उसका न कर नसीर के अब
भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उसको
غزل میں تذکزہ اس کا نہ کر نصیرؔ کہ اب
بھلا چکا وہ تجھے تو بھی بھول جا اُس کو

नसीर तुराबी
نصیرؔ ترابی

24/01/2019

अज़मतें सब तिरी ख़ुदाई की
हैसियत क्या मिरी इकाई की

इक बरस ज़िंदगी का बीत गया
तह जमी और एक काई की


10/08/2018

हरदम तमाशे गैर मे रहता है आदमी, डरता है कही खुद से मुलाकात न हो जाए.

18/06/2017

मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ

एक जंगल है तेरी आँखों में
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ

तू किसी रेल-सी गुज़रती है
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ

हर तरफ़ ऐतराज़ होता है
मैं अगर रौशनी में आता हूँ

एक बाज़ू उखड़ गया जबसे
और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ

मैं तुझे भूलने की कोशिश में
आज कितने क़रीब पाता हूँ

कौन ये फ़ासला निभाएगा
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ।

~~दुष्यंत कुमार

09/12/2015

Rukta nhi khin bhi gham ka ye bhanwar
Dube hi jaate hain iisme kbhi ye sahar wo sahar....
Ankhon ke paani ka mol kare bhi to kare kaise..
Sir se leke paanv me duba h humnazar.

05/04/2014

शामिल कभी न हो पाया मैं,
उत्सव की मादक रून-झुन में
जानबूझ कर हुआ नहीं मैं -
परम्परित सावन, फागुन में

क्या कहियेगा मेरे इस खूसठ स्वभाव को?
भीड़-भाड़, मेले-ठेले से सहज भाव मेरे दुराव को?
जब से होश संभाला तबसे,
खड़ा हुआ हूं पैरों अपने
अनायास आये तो आये
देखे नहीं जानकर सपने,
हुआ हताहत अपनों से पर
गया नहीं मैं कहीं शरण में

सच की कसमें खाते खाते-
ज़्यादातर जी लिया झूठ में
आप हरापन खोज रहे पर
क्या पायेंगे महज ठूंठ में?
मुझे निरर्थक खोज रहे हैं
एकलव्य या किसी करण में
शामिक कभी न हो पाऊंगा -
किसी जाति में या कि वरण में..................

~ नईम

29/03/2014

ग़ौर तो कीजे के ये सजदा रवा क्यूँ कर हुआ
उस ने जब कुछ हम से माँगा तो ख़ुदा क्यूँ कर हुआ

ऐ निगाह-ए-शौक़ इस चश्म-ए-फ़ुसूँ-परदाज़ में
वो जो इक पिंदार था आख़िर हया क्यूँ कर हुआ

इक तराज़ू इश्क़ के हाथों में भी जब है तो वो
आलम-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ से मावरा क्यूँ कर हुआ

दीन ओ दानिश दोनों ही हर मोड़ पर थे दिल के साथ
यक-ब-यक दीवाना दोनों से ख़फ़ा क्यूँ कर हुआ

रह-ज़नों के ग़ोल इधर थे रह-बरों की भीड़ उधर
आ गए मंज़िल पे हम ये मोजज़ा क्यूँ कर हुआ

ख़ार-ज़ार-ए-दीन-ओ-दानिश लाला-ज़ार-ए-हुस्न-ओ-इश्क़
दिल की इक वहशत से तय ये मरहला क्यूँ कर हुआ

अपने ज़ेहनी ज़लज़लों का नाम जो रख लो मगर
दो दिलों का इक तसादुम सानेहा क्यूँ कर हुआ

तेरी महरूमी उसे जो भी कहे लेकिन 'जमील'
ग़ैर से उस ने वफ़ा की बे-वफ़ा क्यूँ कर हुआ

--जमील मज़हरी

25/03/2014

जब शाम हुई अपने दीये हमने जलाये,
सूरज का उजाला कभी शब् तक नहीं पहुंचा ।

जिस फूल मे खुशबु थी उधर सर को झुकाया,
हर फूल के मै नाम-ओ-नसब तक नहीं पहुंचा ।।

--काज़िम जरवली

20/03/2014

ये कह कर मुझ को रुला दिया
कि तूने माज़ी भुला दिया
जो किया तूने बुरा किया
उस से बुरा कि बता दिया

तुझ को हमेशा प्यार था
मुझे कितना ये ऐतबार था
बुरा किया ये प्यार तोड़े के
उस से बुरा कि जता दिया

ख्वाबों को तेरी जो दीद थी
मेरी नींदों की वही तो ईद थी
बुरा किया ख्वाब छीन के
उस से बुरा कि सुला दिया

तेरी आँखों के ये जो चिराग़ थे
मेरी मंज़िलों के सुराग थे
बुरा किया निगाहें फेर लीं
उस से बुरा चाँद भी छिपा दिया

तूने कितने ही मुझ को ग़म दिए
मैने आँसू फिर भी कम लिए
बुरा किया कि दामन छुड़ा लिया
उस से बुरा कि मुस्कुरा दिया

कुछ मासूम थी कुछ ज़हीन थी
मेरी रूह की जो भी ज़मीन थी
बुरा किया यहाँ हल चला दिया
उस से बुरा दर्द भी उगा दिया

जो भी मेरा अब हाल है
तेरी मुहब्बतों का कमाल है
बुरा किया मुझ को सँवारा नहीं
उस से बुरा आईना दिखा दिया

मिट्टी का दिल का गाँव था
हर दीवार पर तेरा नाम था
बुरा किया तूने पढ़ा नहीं
उस से बुरा कि मिटा दिया

जिसका भी अब ये गुनाह था
वक़्त सुबूत लम्हा गवाह था
बुरा किया हर गवाह हटा दिया
उस से बुरा सुबूत मिटा दिया

अगॅर्चे अब रिश्ता नहीं
ये दर्द पर जाता नहीं
जो कुछ हुआ वो बुरा हुआ
उस से बुरा कि तूने किया

Address

White House, Behind Reliance Petrol Station, Village & Post/Gontha Block/DohariGhat
Maunath Bhanjan
275303

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