01/06/2026
ऐतिहासिक रानीताल को तारणहार का इंतजार
चौदहवीं शताब्दी के ऐतिहासिक रानीताल को आज भी तारणहार का इंतजार है। रानीताल के साथ ही देवी मंदिर एवं सतीचौरा भी उपेक्षा का शिकार हैं। पिछले चार दशकों से इसे पर्यटन केंद्र घोषित करने की मांग की जा रही है, किंतु अब तक कोई ठोस परिणाम नहीं निकल सका है। स्थिति यह है कि चारों ओर फैली गंदगी के कारण यहां ठहरना भी कठिन हो गया है।
नगर पंचायत के पूर्व स्थित इस तालाब को चौदहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में भर राजा छत्रसाल की पत्नी ने खुदवाया था। पूजा-अर्चना के लिए पूर्व दिशा में देवी मंदिर की स्थापना कराई गई थी। नाग पंचमी के अवसर पर यहां विशाल यज्ञ का आयोजन होता था, जो बाद में मेले का रूप ले लेता था। दूर-दराज से भर समुदाय के लोग इसमें सम्मिलित होते थे। देवी मंदिर तथा सतीचौरा का जीर्णोद्धार नगर के छेदीलाल निषाद द्वारा कराया गया था।
इसका उद्घाटन 12 दिसंबर 1993 को क्षेत्रीय सांसद लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने किया था। रानीताल के उत्तर में ईंटों का एक टीला था, जिसे सतीचौरा के नाम से जाना जाता था।
वर्तमान में रानीताल के पूर्व एवं दक्षिण दिशा में बना खड़ंजा पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। देवी मंदिर तथा रानीताल जाने वाला मार्ग अतिक्रमण का शिकार है। वर्ष 1993 में तत्कालीन तहसीलदार ने कानूनगो एवं लेखपाल के साथ नापी कराकर इस मार्ग को आवागमन के लिए खुलवाया था।
बलिदान का गवाह है इतिहास
मान्यता है कि वर्ष 1304 ईस्वी में ईरान के सैय्यद अबू तालिब के वंशज सैय्यद जिक्रिया एवं भर राजा छत्रसाल के मध्य हुए युद्ध में उनके पुत्र त्रिलोकीनाथ वीरगति को प्राप्त हुए थे। त्रिलोकीनाथ की पत्नी अपने पति के साथ चिता में सती हो गई थीं। बाद में यही स्थान सतीचौरा के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
आज भी महिलाएं नाग पंचमी, विवाह, मुंडन तथा अन्य धार्मिक अवसरों पर यहां पूजा-अर्चना करती हैं। दिसंबर 1978 में प्रदेश सरकार के मंत्री बाबूलाल वर्मा ने केंद्रीय पर्यटन मंत्री से मिलकर ऐतिहासिक रानीताल को पर्यटन केंद्र घोषित करने की मांग की थी, लेकिन उसका भी कोई परिणाम नहीं निकला।
योजना बनी, पर अमल नहीं हो सका
वर्ष 1984 में नगर पंचायत ने रानीताल, देवी मंदिर, सतीचौरा आदि ऐतिहासिक स्थलों के पुनरुद्धार के लिए चार लाख रुपये का बजट बनाकर शासन को भेजा था। तत्कालीन जिलाधिकारी पंकज कुमार ने स्थलीय निरीक्षण कर इसे पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की संस्तुति भी की थी, लेकिन उनके स्थानांतरण के बाद योजना ठंडे बस्ते में चली गई।
छत्रसाल स्मारक समिति ने भी केंद्रीय एवं प्रदेशीय पर्यटन मंत्रियों को पत्र भेजकर इस ऐतिहासिक स्थल के संरक्षण एवं विकास की मांग की है।
समय के साथ दबंगों द्वारा भूमि पर कब्जा कर लिया गया। देवी मंदिर का फाटक भी चोर तोड़कर उठा ले गए। वर्तमान में सतीचौरा झाड़ियों से घिरा हुआ है और ऐतिहासिक धरोहर होने के बावजूद उपेक्षा का शिकार बना हुआ है।