Anmol khajana

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गुरु प्यारी साध संगत जी, संत स्तगुरुओ को किसी चीज़ की कमी नहीं होतीं ।यह बात हजूर महाराज जी के समय की है, साध संगत जी ,ड...
18/08/2026

गुरु प्यारी साध संगत जी, संत स्तगुरुओ को किसी चीज़ की कमी नहीं होतीं ।
यह बात हजूर महाराज जी के समय की है, साध संगत जी ,डेरे में purchase की सेवा लगी हुई थी चण्डीगढ़ से कुछ सामान डेरे के लिए ख़रीद करके डेरे में भेजना होता था,इसी सिलसिले में एक बार डेरे से purchase ऑफ़िसर ख़ुद यहाँ आए हुए थे उन्होंने सेक्रेटेरी shiri GS भटनागर को बताया कि उनका विदेश में बिज़नेस है और जब उन्हें ब्यास में purchase ऑफ़िसर की सेवा मिली तो हुज़ूर महाराज जी ने उन्हें बुलाके कहा, अरोरा जी आप डेरे की जब भी purchase करो तो एक बात का पूरा ख़याल रखना की कभी भी बिलिंग में टैक्स की हेराफेरी नहीं करनी जेसा तुम अपने बिज़नेस में करते थे, ये मत सोचना कि टैक्स चोरी करके डेरे की बचत करनी है, ऐसा मत सोचना, डेरे को पेसे की कमी नहीं है, फिर महाराज जी ने दरिया की ओर ऊँगली करते हुए कहा कि ये जो दरिया चल रहा है, ये पानी का नहीं, ये डेरे के लिए बाबा जी ने नोटो का भरा हुआ चला रखा है जब भी चाहे हम यहाँ से जितने मर्ज़ी पैसे निकाल सकते हैं डेरे को कभी पेसे की कमी नहीं होंगीं , साध संगत जी जैसे कि हम सभी जानते हैं कि जब डेरे की शुरुआत हुई थी तब भी संगत ने कैसे बढ़-चढ़कर डेरे के निर्माण के लिए कितना कुछ किया था यह कुल मालिक खुद ही कर सकता है इतनी आसानी से सब हो गया था कि कुछ कहा नहीं जा सकता जिस कार्य में वह कुल मालिक खुद आ जाता है वहां पर किसी चीज की कभी भी कोई कमी नहीं रहती हमारे संत सद्गुरु कुल मालिक का रूप हुए हैं, महाराज सावन सिंह जी फौज में नौकरी करते थे और हर महीने डेरे को सेवा भेजते थे, महाराज जी वेतन मिलने पर सबसे पहले डेरे को सेवा भेजते थे और बाद में घर खर्च भेजते थे, महाराज जी का बाबा जयमल सिंह जी से बहुत प्रेम था और महाराज जयमल सिंह जी भी बाबा जी से बहुत प्रेम करते थे, हमेशा चिट्ठी लिखकर उनका हालचाल पूछते रहते थे, साध संगत जी,अभी भी लाक डाउन में बाबा जी ने management को कहा है जितना ज़्यादा से ज़्यादा लंगर बनाना पड़े बनाओ, डेरे में किसी चीज़ की कमी नही होने वाली ,न्यूज़ के मुताबिक़ डेरे की तरफ़ से डेढ़ करोड़ पेक लंच रोज़ाना बनाया जा रहा है ,इतना बड़ा काम कोई रूहानी ताक़त ही कर सकती हैं , आप देख सकते हैं कि आज तक कभी भी डेरे की तरफ से कोई स्पेशल सेवा संगत से नहीं ली जाती संगत को कभी नहीं कहा जाता कि आप डेरे को पैसे की सेवा प्रदान करें ऐसा कभी नहीं कहा गया है लेकिन फिर भी संगत अपनी मर्जी से गुरु घर में सेवा प्रदान करती है यह संगत का डेरे के प्रति प्यार है और साथ ही एक बात और देखने को मिलती है की संगत की दी हुई सेवा व्यर्थ नहीं जाती कैसे वहां पर हर एक चीज का उपयोग किया जाता है यह हमें वहां से सीखना चाहिए वहां पर कोई भी चीज व्यर्थ नहीं की जाती उसे किसी ना किसी उपयोग में लाया जाता है और संगत भी बड़े ही प्रेम और प्यार से वहां पर सेवा करती है सतगुरु के हुक्म की पालना करती है वहां पर हर एक चीज पूरी तरह से बैलेंस की हुई है हर एक चीज का उपयोग किया जाता है और बहुत ही बेहतर तरीके से किया जाता है वहां पर सब कुछ इतनी अच्छी तरह से मैनेज किया हुआ है जिसकी जितनी प्रशंसा करें उतनी ही कम है साध संगत जी डॉक्टर, इंजीनियर और बड़े से बड़े ऑफिसर वहां पर सेवा करते हैं गुरु घर की सेवा करते हैं सतगुरु के हुक्म की पालना करते हैं वहां पर कुर्सी का या फिर किसी तरह के अहोदे का कोई भेदभाव नहीं है सब एक समान सेवा करते हैं वहां पर कोई बड़ा नहीं है कोई छोटा नहीं है

सभी एक साथ सेवा करते हैं एक साथ ही सत्संग सुनते हैं और साथ ही खाना खाते हैं जिससे हमारा मन झुकना सीखता है और संगत के प्रति प्रेम बढ़ता है गुरु के प्रति प्रेम बढ़ता है यह बात वहां सीखने को मिलती है और साथ ही डेरे में सफाई का इतना ध्यान रखा जाता है कि कहीं भी कोई कूड़ा करकट दिखाई नहीं देता और अगर कोई छोटा सा पत्ता भी देखने को मिल जाता है तो संगत तुरंत उसे उठा लेती है और वहां पर कूड़ा दान बने हुए हैं उसमें डाल देती है ऐसे संगत वहां पर सेवा करती है ,वहां पर संगत का सतगुरु के प्रति इतना प्रेम है कि अगर पूरा दिन सेवा करने का या सिमरन करने का हुक्म हो जाए तो संगत उस हुक्म को निभाने लग जाएगी इतना सतगुरु से प्रेम है संगत से प्रेम है सच में डेरा रोहानियत की एक बहुत बड़ी मिसाल है विश्वभर से वहां पर संगत आती है सतगुरु के दर्शन करने के लिए सतगुरु का सत्संग सुनने के लिए और संगत की सेवा करने के लिए, वहां पर जाकर संगत एक परिवार जैसी लगती है एक दूसरे से इतना प्रेम वहां से सीखने को मिलता है ऐसे लगता है कि वह हमारे अपने हैं सत्संगी भाई हैं हमारे गुरु भाई हैं ऐसा प्रेम संगत में वहां पर देखा जाता है सभी को प्यार से बुलाया जाता है सच में डेरा रोहानियत की एक बहुत बड़ी मिसाल है , वहां पर केवल और केवल रोहानियत से जुड़ी बातें की जाती हैं और एक बार सतगुरु द्वारा फरमाया भी गया था कि यहां पर आपको केवल रूहानियत ही मिलेगी, तो साध संगत जी वहां पर जाकर हर कोई अपने आप ही बदल सा जाता है जिसने कभी घर पर कोई काम नहीं किया होता, कोई सेवा नहीं की होती वह भी वहां जाकर सेवा करने लग जाता है उसे अपने आप ही वहां का रंग चढ़ने लग जाता है और वह संगत की सेवा में सतगुरु की सेवा में लीन हो जाता है यह चमत्कार वहां पर देखने को मिलता है , सच में डेरे की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी ही कम है, एक वही ऐसी जगह है जहां पर जाकर पीछे का कोई ख्याल नहीं रहता हमें एक तरह से अजीब तरह की आजादी मिल जाती है हमें हल्का सा महसूस होता है क्योंकि वहां की सुगंध ही ऐसी है वहां की खुशबू ही ऐसी है, जो भी वहां पर जाता है उसका वापस आने का मन नहीं करता यह बहुत बार देखा गया है संगत द्वारा सुना गया है कि वहां पर जाकर मन शांत हो जाता है और अपने आप ही मन सेवा में लगने लगता है सिमरन में लगने लगता है

गुरु प्यारी साध संगत जी अभी-अभी एक सत्संगी ने बताया है कि इस समय जो भी माहौल चल रहा है उसको देखते हुए कैसे समूह साध संगत...
18/08/2026

गुरु प्यारी साध संगत जी अभी-अभी एक सत्संगी ने बताया है कि इस समय जो भी माहौल चल रहा है उसको देखते हुए कैसे समूह साध संगत अपने सतगुरु के हुक्म के अनुसार नाम सिमरन में लगी हुई है मालिक को याद कर रही है ताकि इस मुसीबत से हम सभी को छुटकारा मिल सके, अभी-अभी एक सत्संगी ने बताया है की संगत ने अपने घरों में यह नियम बना रखा है कि हम सभी परिवार वालों को इतने इतने समय नाम सिमरन में बैठना है नाम की कमाई करनी है मालिक को याद करना है और सभी घरों में नाम सिमरन चल रहा है और निरंतर चल रहा है और उन्होंने बताया की सतगुरु ने उनको दर्शन दिए हैं जब वह नाम की कमाई में लीन थे सतगुरु हाजिर हुए हैं और सतगुरु एक बड़े से छाते के नीचे खड़े हैं और संगत को सिमरन करने के लिए कह रहे हैं और जो सिमरन कर रहा है मालिक को याद कर रहा है वह उस छाते के नीचे सतगुरु के पास जा रहा है

उसकी रखवाली मालिक खुद कर रहा है, उन्होंने बताया है कि सतगुरु का वह विराट रूप देखकर संगत निहाल हो रही है संगत नाम सिमरन में लगी हुई है, जो भी सिमरन कर रहा है वह सतगुरु के पास जा रहा है और जो नहीं कर रहे हैं सतगुरु उनको पुकार रहे हैं की इस समय नाम की कमाई करो, इस समय हमारी संभाल केवल और केवल वह मालिक ही कर सकता है उसके बिना हमारा हाथ किसी ने नहीं पकड़ना जो भी उसकी याद में सिमरन कर रहा है उसकी संभाल हो रही है सभी संगत अपने परिवारों के साथ बैठकर एक साथ मालिक को याद कर रही है मालिक का ध्यान कर रही है ऐसे समय में एक साथ मालिक को याद किया जा रहा है ताकि मालिक अपने बच्चों की पुकार सुने और उन्हें इस मुसीबत से छुटकारा दिलाए ताकि फिर से संगत सतगुरु की सेवा में लीन हो सके उन्होंने बताया है कि इस समय अगर कोई हमें इस महामारी से बचा सकता है तो वह केवल और केवल नाम सिमरन ही है अगर हमारी संभाल इस समय हो सकती है तो केवल नाम सिमरन से ही हो सकती है इसीलिए तो सतगुरु हमेशा से कहते आ रहे हैं कि भाई मालिक के साथ रिश्ता जोड़ो क्योंकि उसके बिना हमारे साथ किसी ने भी सहाई नहीं होना आप देख सकते हैं कि जिसको भी यह महामारी लग रही है उसकी डेड बॉडी तक उसके परिवार वालों को नहीं दी जा रही उसको छूने तक नहीं दिया जा रहा, यह कैसा माहौल चल रहा है जिनको हम सबसे ज्यादा प्रेम करते हैं वह भी हमसे दूर भाग रहे हैं वह भी हमारे पास आने से डर रहे हैं इसी से यह साबित हो जाता है कि यहां पर सभी रिश्ते नाते झूठे हैं आप देख सकते हैं कि अगर किसी को यह महामारी लग रही है तो उसको कैसे अलग कर दिया जाता है और उसके परिवार वाले उसके पास जाने से डर रहे हैं उसको हाथ लगाने से डर रहे हैं इसीलिए तो फरमाया जाता है कि भाई यहां पर कोई किसी का नहीं है सभी रिश्ते गर्ज़ों के हैं गर्ज खत्म हो जाती है तो रिश्ता भी खत्म हो जाता है अगर हमारे साथ कोई जाएगा तो वह केवल और केवल नाम की कमाई ही हमारे साथ जाएगी जो हमने उस मालिक की याद में समय बिताया होगा नाम सिमरन किया होगा वही हमारे साथ जाएगा और हमारे दुख सुख में भी वही सहाई होगा इस समय केवल मालिक ही हमारी संभाल कर सकता है हमारे चाहने वाले भी हमसे दूर भाग रहे हैं तो आप समझ सकते हैं की ये जो भी रिश्ते नाते हैं यह सब मतलब से बने हुए हैं सबको अपनी-अपनी पड़ी हुई है कोई किसी के बारे में नहीं सोच रहा कोई किसी के पास नहीं जा रहा एक दूसरे से हम भाग रहे हैं और इस समय मालिक ही हमारे पास खड़ा है कुल मालिक ही है जो हमारे दुखों को दूर कर सकता है हमें इस मुसीबत से बाहर निकाल सकता है अगर उसकी रेहमत हम पर हो जाती है तो हमें किसी से भी डरने की जरूरत नहीं है आप देख सकते हैं जो पूर्ण संत महात्मा है उनको किसी बात का कोई डर नहीं है क्योंकि वह मालिक से जुड़े हुए हैं उनको सब मालूम है कि आगे क्या होने वाला है लेकिन वह उसके हुकम में रहते हैं वह अंतर्यामी होते हैं वह उस खुदा का रूप होते हैं देखने में हमारे जैसे लगते हैं लेकिन कुल मालिक होते हैं तो हमें भी इस समय ज्यादा से ज्यादा समय अपने परिवार वालों के साथ नाम सिमरन में लगाना है और व्यर्थ कामों में हमें नहीं पढ़ना है इस समय अगर हम चाहते हैं कि मालिक हमारा हाथ पकड़े तो हमें नाम सिमरन करना है क्योंकि नाम सिमरन ही मालिक की बाजू है अगर हम इसे पकड़ लेते हैं तो हमारा कुछ भी नहीं हो सकता हमारी संभाल संगत की संभाल फिर वह खुद करता है कोई चीज उनके पास नहीं आती कोई महामारी उनके पास नहीं आती क्योंकि जैसे की वाणी में फरमाया गया है " व्हिच करता पुरख खलोया बाल ना बिंगा होया " कि जहां पर कुल मालिक खुद आ जाता है जहां पर खुद मालिक अपने शिष्य की संभाल करने के लिए आ जाता है तो फिर कोई भी चीज उसके शिष्य का कुछ नहीं बिगाड़ सकती उसके बाल तक को नहीं छू सकती तो हमें भी अब नाम की कमाई में लगना है रोजाना यह नियम बना लेना है कि इस समय हमें सभी को उसकी याद में बैठना है नाम सिमरन करना है ज्यादा से ज्यादा करना है , क्योंकि साथ में किया गया नाम सिमरन साथ में किया गया भजन सिमरन, साथ में की गई अरदास जल्दी ही उस कुल मालिक तक पहुंचती है क्योंकि जब सब बच्चे इकट्ठे होकर अपने बाप को ही याद करते हैं पुकार लगाते हैं तो उसे सुनने ही पड़ती है वह सुने बिना रह नहीं सकता क्योंकि उसके बच्चे उसे पुकार रहे हैं तो उसे हमारी पुकार सुननी ही पड़ती है हमें भी नाम सिमरन में वक्त देना है जो भी हम कर रहे हैं जैसे भी कर रहे हैं उन सब कामों को अलग रखकर हमें नाम सिमरन में लगना है समय निकालना है अपने परिवार वालों के साथ उसकी याद में बैठना है ताकि हमारी की गई फरियाद उसके दरबार पर कबूल हो सके, और हमारी इस महामारी से संभाल हो सके और हम फिर से वैसे ही सतगुरु की सेवा में संगत की सेवा में सत्संग में लीन हो सके जैसे हम पहले गुरु घर की सेवा करते थे संगत की सेवा में लीन रहते थे बहुत समय हो गया है संगत गुरु घर जाने के लिए तड़प रही है सतगुरु के दर्शनों के लिए तड़प रही है सतगुरु इस समय अभी हमें यही कह रहे हैं कि नाम सिमरन करो तो हमें उनके हुक्म की पालना करते हुए नाम सिमरन का जाप करना है उनका हुक्म मानकर करना है क्योंकि सतगुरु हमें यही पुकार लगा रहे हैं कि नाम सिमरन करो जितना हो सकता है उतना करो क्योंकि मालिक ही हमें अपनी शरण दे सकता है हमें ऐसे माहौल से बचा सकता है

गुरु प्यारी साध संगत जी यह बात 1937 के आसपास की है जब महाराज जी हुआ करते थे जैसे कि हम सब जानते हैं कि उस समय महाराज जी ...
18/08/2026

गुरु प्यारी साध संगत जी यह बात 1937 के आसपास की है जब महाराज जी हुआ करते थे जैसे कि हम सब जानते हैं कि उस समय महाराज जी संगत के बीच बैठकर बातें करते थे उस समय ऐसा नहीं होता था कि गुरु को देखते ही उनके पैरों में पढ़ना संगत शुरू कर दें उनके कपड़ों को हाथ लगाना संगत शुरू कर दें, उस समय ऐसा नहीं होता था उस समय महाराज जी संगत के बीच बैठे होते थे और संगत से बातें करते थे संगत का हाल पूछते थे उनके प्रश्नों के जवाब उन्हें देते थे लेकिन अगर आज के समय की बात की जाए तो मुश्किल से ही ऐसा हो पाएगा की सतगुरु हमारे बीच बैठे हो और हम उनको माथा ना डेके, उनको हाथ ना लगाएं बिना रह सकें जैसे कि फरमाया जाता है कि रूहानियत कपड़ों में नहीं, रूहानियत पीछे भागने से नहीं बल्कि खुद पहचान करने से खुद नाम की कमाई करने से हासिल होती है तो साध संगत जी उस समय महाराज जी बातें कर रहे थे

और महाराज जी के मुख पर बहुत तेज नूर रहता था जिससे सभी संगत बहुत प्रभावित होती थी जो भी उनके आसपास होते थे उन पर उसका गहरा असर पड़ता था यह बातें सुनने को भी मिली है क्योंकि जो पूरा संत सतगुरु होता है उसका तेज इतना होता है जिससे करोड़ों लोगों का उद्धार हो सकता है और जैसे कि प्रेम की पहेली में भी बताया गया है की सतगुरु के मुख पर कितना नूर रहता था जिससे बहुत संगत प्रभावित होती थी तो ऐसे ही उस समय भी एक सज्जन अभ्यासी ने ऐसे ही सतगुरु से कह दिया था कि है महाराज आप के मुख्य पर इतना नूर कैसे हैं आप कोई साधारण व्यक्ति तो नहीं है यह तो मैं जानता हूं आप खुद कुल मालिक का रूप है यह प्रश्न मुझे पूछना तो नहीं चाहिए लेकिन सतगुरु ऐसे ही अंदर जिज्ञासा हो गई कि क्यों ना पूछ लिया जाए तो इसलिए सतगुरु पूछ लिया तो जब यह प्रशन उस भाई ने महाराज जी के सामने रखा था महाराज जी पहले तो कुछ नहीं बोले उसके बाद महाराज जी ने कहा कि यह नूर हम सभी के अंदर है यह नूर उस कुल मालिक का है यह सचखंड से आता है यह कभी कम नहीं होता कभी ज्यादा नहीं होता यह बिन बाती बिन तेल है यह ऐसा प्रकाश है जो कभी बुझ नहीं सकता यह ऐसा प्रकाश है जिसे तेल की जरूरत नहीं यह हमेशा से था , है और रहेगा, यह हम सभी के अंदर हैं बस कमी सिर्फ और सिर्फ पहचान की है जिसने भजन सिमरन कर कर अंदर जाकर उस मालिक से मिलाप कर लिया उसने पहचान कर ली फिर वह यह नहीं पूछता की ये क्यों है ? कहां से आता है ? यह नूर उस कुल मालिक का है यह उसके दरबार से आता है इसीलिए तो सत्संग में भी कहता हूं कि जितना हो सके भजन सिमरन के लिए समय निकालो, उसके दरबार में हाजिरी लगे तो यह नूर अपने आप दिखाई देने लगेगा ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ संत महात्माओं में होता है ऐसा बिल्कुल भी नहीं है मालिक की जोत हम सभी में एक समान है किसी में भी कम नहीं है किसी में भी ज्यादा नहीं है यह जो दौलत है मालिक ने सभी को एक जैसी दी है लेकिन जो पहचान कर लेता है जो उस मालिक से जुड़ जाता है उस पर यह नूर अपने आप दिखाई पड़ता है कहने की कोई जरूरत नहीं है यह नूर उसकी कृपा से ही आता है हम उसके आगे अरदास कर सकते हैं विनती कर सकते हैं लेकिन आगे उसकी मर्जी है जिसको चाहे अपने से मिला लेता है वह उसकी मर्जी है उसके द्वार हम सभी के लिए एक समान खुले हैं लेकिन वहां तक जाना यह उसकी मौज है, जब हमें नामदान की बख्शीश हो जाती है तब हमें समझ जाना चाहिए कि कुल मालिक हमें अपने से मिलाना चाहता है हमारा उद्धार करना चाहता है इसलिए वह नामदान की बक्शीश हमें कर देता है हमें तभी समझ जाना चाहिए कि उसका संदेश हमें आ गया है कि हमें भजन सिमरन करना है और इस माया से ऊपर उठकर उससे मिलाप करना है यह माया भी उसकी ही है उसी ने ही बनाई है इसको हम दोष नहीं दे सकते कि यह क्यों बनी ! कैसे बनी ! यह भी उसी ने बनाई है और हम इसमें बुरी तरह से फंस गए हैं हम खुद फंसे हैं वह हमें बहुत बार मौका दे चुका है क्योंकि वह हमसे बहुत प्यार करता है, हमें नहीं पता हम यहां पर कितनी बार जन्म ले चुके हैं कितनी बार हमने मनुष्य जन्म व्यर्थ गवाया है लेकिन जब नामदान की बख्शीश हो जाए तब हमें केवल और केवल भजन सिमरन पर जोर देना चाहिए चाहे कितने भी काम क्यों ना हो समय निकालकर भजन सिमरन करना चाहिए साध संगत जी यह वचन उस समय महाराज जी ने संगत को कहे थे साध संगत जी इसी के साथ हम आपसे इजाजत लेते हैं

गुरु प्यारी साध संगत जी आज की साखी नामदान की बक्सीश से संबंधित है इस साखी में हमें नाम जैसी बड़ी और अनमोल दौलत के बारे म...
18/08/2026

गुरु प्यारी साध संगत जी आज की साखी नामदान की बक्सीश से संबंधित है इस साखी में हमें नाम जैसी बड़ी और अनमोल दौलत के बारे में अपने सतगुरु की अपार कृपा के बारे में पता चलेगा कि नाम से बड़ी दौलत और कोई भी नहीं और नाम की कमाई कोई मजाक नहीं तो साखी को पूरा सुनने की कृपालता करें जी ।

बुखारा का बादशाह इब्राहिम अदम को परमार्थ का शौक हुआ वह फकीरों की तलाश में रहने लगा लेकिन ऐसो आराम की जिंदगी भी जीता रहा , उसकी सेज सवा मन फूलों से तैयार होती थी एक दिन उसने अपने दो मंजिला मकान के ऊपर 2 आदमी घूम रहे दिखे , उसने पूछा भाई ! कौन हो ? उन्होंने कहा हम सारवान है , उसने पूछा कैसे आए हो ? कहने लगे कि हमारा ऊंट खो गया है तो बादशाह ने कहा कभी उठ महलों की छत पर आते हैं ? जवाब मिला कभी परमात्मा भी सवा मन फूलों की सेज पर मिलता है इतनी बात कहकर वह दोनों अलोप हो गए और बादशाह बेहोश हो गया जब उसे होश आया तो उसकी सोच ने पलटा खाया और परमात्मा की तलाश में अपने मुल्क के फकीरों के पास जाने लगा लेकिन तसल्ली ना हुई, हिंदुस्तान में आया ,बहुत ढूंढा फिर भी तसल्ली ना हुई आखिर काशी जा पहुंचा कबीर साहिब के आगे ,कि मुझे अपना शिष्य बना लो कबीर साहब ने कहा कि तू बादशाह मैं गरीब जुलाहा तेरा मेरा गुजारा कैसे होगा ? अर्ज की बादशाह बनकर तेरे द्वार पर नहीं आया एक गरीब भिखारी बन कर आया हूं ,खुदा के लिए मुझे बख्श लो , औरतें नरम दिल होती हैं जो कि कबीर साहिब जी की पत्नी थी सिफारिश की तो उसे रख लिया बादशाह नालियां बांटने का काम करने लगा एक दिन माई लोई ने कबीर साहेब को कहा कि यह बादशाह और हम गरीब जुलाहे है जो हम खाते हैं वही खा कर चुप रहता है इसको कुछ दो ! कबीर साहिब ने कहा कि अभी इसका हृदय निर्मल नहीं हुआ, माइ ने कहा कि क्या फर्क है आप ऐसा क्यों कह रहे है, रूखी सूखी खाकर यह हमारी सेवा करता है हुक्म मानने से इनकार नहीं करता इसका हृदय कैसे निर्मल नहीं, कबीर साहिब कहने लगे ऐसा करो घर का कूड़ा करकट लेकर छत पर चढ़ जाओ मैं इसको बाहर भेजता हूं जब यह जाने लगे तो इसके सिर पर डाल देना और पीछे हटकर कान लगाकर सुनना कि क्या कहता है, क्या बोलता है, माई ऊपर गई तो कबीर साहिब ने कहा बेटा मैं बाहर कुछ भूल आया हूं उसे अंदर ले आओ, बादशाह बाहर गया माई ने सिर पर कूड़ा डाल दिया और बादशाह गुस्से में बोला अगर होता बुखारा जो करता सो करता ,माइ ने आकर कबीर साहिब को बताया कि ऐसा कहता था कबीर साहिब ने कहा कि मैंने जो तुझसे कहा था कि अभी हृदय साफ नहीं है, हुआ नाम के काबिल नहीं हुआ है, 6 साल और बीत गए 1 दिन कबीर साहिब ने कहा कि अब बर्तन तैयार है माइ ने कहा कि मुझे तो कुछ फर्क दिखाई नहीं देता जैसा पहले था वैसा ही अब है कबीर साहिब के घर साधु महात्मा आते रहते थे कई बार ऐसा मौका आता कि खाने-पीने को कुछ नहीं होता था तो चने खाकर ही सो जाना पड़ता था माइ ने कहा कि जिस तरह पहले हमारे हुकुम से इनकार नहीं करता था अब भी उसी तरह है जो कुछ हम देते हैं वही खा लेता है कबीर साहिब ने कहा कि अगर तू फर्क देखना चाहती है तो पहले तू घर का कूड़ा करकट ले गई थी अब और गंदगी बदबू वाली गली सड़ी चीजें इकट्ठी करके ले जा ,जब गली से निकले इसके सिर पर डाल देना, माई ने ऐसा ही किया जब बादशाह बाहर निकला तो माई ने जो गंदगी थी उसके सिर पर डाल दी बादशाह खुश हुआ उसका मूह लाल हो गया , कहने लगा शाबाश डालने वाले तेरा भला हो यह मन अहंकारी था इसका यही इलाज था माइ ने आकर कबीर साहेब को बताया कि जी अब तो वैसे कहता था कबीर साहिब ने कहा मैं जो तुझसे कहता था कि अब कोई कसर बाकी नहीं है, हृदय नाम के काबिल हो गया है, साध संगत जी, कबीर साहिब जैसा संत सद्गुरु और बादशाह बुखारा जैसा शिष्य ,फिर और क्या चाहिए था जैसे ही कबीर साहिब ने उसे नाम दिया उसकी रूह ऊपर चढ़ गई फिर कबीर साहिब ने कहा जा ! अब जहां मर्जी जाकर बैठ जा तेरी भक्ति पूरी हो गई, साध संगत जी जैसे कि आपने साखी में सुना कि कैसे कबीर साहब ने बादशाह बुखारा की परीक्षा की उसको पहले नाम के काबिल बनाया ,नाम दान देने से पहले उसको उसके काबिल कबीर साहब ने बनाया और फिर जाकर उसे नामदान की बख्शीश की और अगर हम इस समय देखें तो हमारे सतगुरु हमारे बाबाजी कितने दयालु हैं कितने दयावान है जो हमारी परख नहीं करते कि हमने क्या किया है हम क्या पीछे कर कर आए हैं , क्या हमारे कर्म है, वह अपनी दया मेहर से हमारे किए गए पिछले सारे कर्म काट देते हैं वह हमारे किए गए कर्मों पर गौर ना करते हुए हमें नामदान की बख्शीश करते हैं, अपने गले से लगाते है, वह यह नहीं देखते कि यह जीव पीछे क्या क्या कर कर आया है उसे अपनी शरण दे देते हैं वह तो हमारी इतनी परीक्षा भी नहीं लेते आप देख लीजिए उस समय जब कोई संत सद्गुरु अपने किसी शिष्य को नाम दान देता था तो उसकी कितनी परीक्षा ली जाती थी फिर जाकर उसे नामदान की बख्शीश होती थी तो हम समझ सकते हैं कि नाम कितनी बड़ी दौलत है जो ऐसे ही दी नहीं जा सकती यह केवल पूर्ण संत महात्माओं के पास मिलती है और इतनी आसानी से नहीं मिलती उनकी सेवा करनी पड़ती है उनके हुक्म में रहना पड़ता है उनकी साध संगत की सेवा करनी पड़ती है इसके बिना गुरु की खुशी प्राप्त नहीं की जा सकती आप इतिहास देख लीजिए अपने गुरु के लिए हमारे संत महात्माओं ने क्या-क्या नहीं किया उनकी खुशी के लिए उन्होंने क्या-क्या नहीं किया अपनी आंख तक निकाल कर दे दी गुरु साहब ने पानी धोया लेकिन अगर हम अपनी तरफ देखें तो हमने तो ऐसा कुछ भी नहीं किया और ना ही कर सकते है, लेकिन फिर भी सतगुरु बाबा जी हम पर कृपा कर कर हमें नामदान की बख्शीश कर देते हैं कितनी आसानी से हमें नाम दान मिल जाता है लेकिन फिर भी हमें उसकी कदर नहीं है हम उनके हुक्म की पालना नहीं करते उनके हुक्म को हम नहीं मानते ,वह हमें कितना समझाते हैं कि भाई भजन सिमरन करो उन्होंने तो अपनी तरफ से पहल कर दी है सतगुरु ने अपनी तरफ से जो देना था हमें दे दिया अब हमारी बारी है हमें कर कर दिखाना है बनकर दिखाना है साध संगत जी नाम बहुत बड़ी दौलत है जिसको पाकर फकीर बादशाही को ठोकर मार देता है नाम की कमाई कोई मजाक नहीं है गुरु नानक साहब 11 साल पत्थरो कि सेज पर रहे गुरु अमरदास जी ने 12 साल पानी धोया है, हिर्दे जितना निर्मल होता है नाम उतनी ही जल्दी असर करता है , साध संगत जी हम आपके लिए ऐसी ही रूहानी साखियां लेकर आते रहते हैं

गुरु प्यारी साध संगत जी यह साखी महाराज सावन सिंह जी के समय की है साध संगत जी एक सत्संगी परिवार डेरा ब्यास के नजदीक का था...
18/08/2026

गुरु प्यारी साध संगत जी यह साखी महाराज सावन सिंह जी के समय की है साध संगत जी एक सत्संगी परिवार डेरा ब्यास के नजदीक का था जो कि डेरा ब्यास में अक्सर जाया करता और सेवा किया करता साध संगत जी उस परिवार में एक बुजुर्ग बीबी थी जोकि बहुत कमाई वाली थी और उन्हें महाराज सावन सिंह जी से नामदान मिला था साध संगत जी वह बीवी की कमाई इतनी थी कि वह घंटों भजन सिमरन में बैठी रहती कभी-कभी दिन रात का भी ख्याल नहीं होता खाने पीने का भी ख्याल नहीं होता , पूरे गांव वालों को पता था की माताजी बहुत कमाई वाली है उन्हें जब भी कोई परेशानी आती तो वह माताजी से मिलने चले जाते क्योंकि माताजी पर बाबा जी की कृपा अपार थी वह दिन-रात मालिक की भजन बंदगी में ही रहती थी ।

तो साध संगत जी और भी लोगों को पता चलने लगा कि माताजी लोगों की परेशानियां दूर करती है जब यह बात महाराज सावन सिंह जी तक पहुंची और महाराज जी हंस पड़े और एक दिन वह मांझी डेरा ब्यास में महाराज जी के दर्शन करने गई हुई थी महाराज जी ने मांझी को कहा कि मुझे पता लगा है कि आप लोगो की परेशानियां दूर करते हो मांझी ने कहा महाराज जी आप तो सब जानते हो मुझे बताने की क्या जरूरत है महाराज जी ने मांझी को यही कहा कि आप कम बोला करें यह कमाई बहुत मुश्किल से एकत्रित होती है इसे ऐसे ही जाया ना करें बस यह बातें उन्होंने मांझी को कहीं और मांझी को समझ आ गया था कि महाराज जी मुझे क्या समझाना चाहते हैं और उसके बाद उन्होंने कभी भी किसी से कुछ नहीं कहा और वह दिन रात भजन सिमरन में ही रहती उन्होंने परिवार वालों से भी बोलना कम कर दिया था वह अपने आप में समय व्यतीत करने लगी और महाराज जी की कृपा उन पर अपार रहने लगी साध संगत जी गुरु की इस मार्ग पर बहुत ज्यादा जरूरत पड़ती है क्योंकि जब हम इस रास्ते पर चलते हैं तो कुछ चीजें ऐसी होती हैं जो हमें समझ नहीं आती और हमें मिल जाती हैं तो उस समय गुरु ही हमें समझाता है हमें बताता है हमें रास्ता दिखाता है कि हमें अब क्या करना है कैसे आगे बढ़ना है गुरु के बिना हम इस मार्ग पर नहीं चल सकते क्योंकि मालिक ने नाम के खजाने की चाबी केवल और केवल पूर्ण संत महात्माओं के हाथ में दी होती है और रास्ता भी उन्हीं को पता होता है इसलिए तो वाणी में भी यही समझाया गया है कि गुरु के बिना उस कुल मालिक तक नहीं पहुंचा जा सकता ,गुरु की कृपा से ही मालिक से मिलाप हो सकता है गुरु ही हमें बता सकता है कि हमें क्या करना है कैसे करना है हमें पूरे गुरु से ही वह युक्ति पता चलती है कि कैसे मालिक की भजन बंदगी करनी है उस युक्ति को हम नामदान भी कहते हैं जिन जीवो को नाम दान की बक्शीश हो जाती है वह बहुत ही भाग्यशाली जीव होते हैं जिन्हें पूरे गुरु से नाम की बख्शीश हो जाती है क्योंकि नाम दान का अर्थ होता है कि गुरु ने अपने जीवो की जिम्मेदारी ले ली है कि वह उन्हें इस माया के खेल से छुटकारा दिलाएगा उन्हें इस जन्म में मुक्ति मिलेगी यह केवल गुरु की कृपा से ही हो सकता है इसलिए तो सत्संग में भी सतगुरु समझाते हैं कि भाई नाम की कमाई कर लो, मौत के बाद आपको किसी ने M.A , B.A की डिग्री नहीं दे देनी, जो भी है जीते जी है मौत के बाद कुछ नहीं है अगर जीते जी उस कुल मालिक से मिलाप नहीं कर पाए तो मौत के बाद क्या गारंटी है कि हम उसे मिलाप कर पाएंगे इसलिए समझाया जाता है की भजन सिमरन को पूरा समय देना चाहिए ताकि जब मालिक हमारा हिसाब किताब देखें कि मेरे इस जीव ने समय निकालकर नाम का सिमरन किया है तो वह अपनी उस प्यारी रूह को अपनी गोद में जगह देता है तो हमें भी नाम की कमाई में लगना है शब्द की कमाई में लगना है और अपने सतगुरु के हुक्म की पालना करनी है बिना नागा भजन सिमरन करना है साध संगत जी इसी के साथ हम आपसे इजाजत लेते

गुरु प्यारी साध संगत जी यह साखी बड़े महाराज जी के समय की है उस समय डेरा इतना विकसित नहीं हुआ था केवल थोड़े से लोग होते थ...
18/08/2026

गुरु प्यारी साध संगत जी यह साखी बड़े महाराज जी के समय की है उस समय डेरा इतना विकसित नहीं हुआ था केवल थोड़े से लोग होते थे थोड़ी सी संगत होती थी तो वहां पर कुछ सेवादार थे जो तन मन से गुरु घर की सेवा करते थे जो सतगुरु का हुक्म होता था वह उस हुक्म की पालना करते थे क्योंकि उनका अपने सतगुरु से इतना प्रेम था की सतगुरु कोई भी हुक्म करते थे उसे निभाने में लग जाते थे क्योंकि वह अपने सतगुरु महाराज जी के हुक्म को सर्वप्रथम रखते थे उनके लिए और कोई काम इतना महत्वपूर्ण नहीं होता था जितना कि उनके लिए महाराज जी का हुक्म होता था सतगुरु लगभग 4 से 5 घंटे का सत्संग रोजाना करते थे उस समय इतनी देर तक सत्संग किया जाता था और सत्संग में सतगुरु केवल और केवल भजन सिमरन पर ज्यादा जोर देते थे संगत को हमेशा भजन सिमरन बिना नागा करने के लिए कहते थे कि चाहे कुछ भी हो जाए समय निकालकर हमें मालिक की भजन बंदगी करनी है चाहे कितने ही काम क्यों ना हो, हमें समय निकालना ही है तो ऐसे ही वहां पर कुछ सेवादार ऐसे होते थे जिनसे भजन सिमरन तो नहीं होता था लेकिन वह सेवा तन और मन से गुरु घर की करते थे महाराज जी को भी यह बात पता थी कि मेरे कुछ बच्चे हैं जो भजन सिमरन ठीक से नहीं निभाते लेकिन सेवा तन मन से करते हैं जी जान से करते हैं महाराज जी उनको बार-बार समझाने की कोशिश भी करते थे कि भाई सेवा अपनी जगह है भजन सिमरन अपनी जगह है सेवा एक यरिया है उस मालिक तक पहुंचने का लेकिन भजन सिमरन के बिना बात नहीं बन सकती

सेवा करने से मन निर्मल होता है और जैसे ही मन निर्मल हो जाता है वैसे ही रूह की चढ़ाई हो जाती है इसलिए सेवा करने का हुक्म दिया जाता है ताकि भजन सिमरन में चढ़ाई करनी आसान हो जाए लेकिन अगर हम सेवा ही करते रहे और भजन सिमरन नहीं किया तो फिर हम आगे कैसे बढ़ पाएंगे तो इसीलिए हमें भजन भी करना है लेकिन उनमें से एक सेवादार था जो बहुत सेवा करता था लेकिन उससे भजन सिमरन नहीं हो पाता था महाराज जी ने उसे बहुत बार कहा था कि भाई तू बहुत अच्छा सेवादार है लेकिन भजन सिमरन भी कर लिया कर वह यही कहता था की सतगुरु मुझसे जितना हो सकता है मैं करता हूं बाकी जिम्मेदारी आपकी है बाकी सब आप जानते हैं मैंने अपने आप को आप पर छोड़ दिया है अगर आप मुझसे भजन सिमरन करवा सकते हो वह आपकी कृपा है तो जब उस भाई का मृत्यु का समय नजदीक आया तो वहां पर जो संगति थी वह उसके पास इकट्ठी हो गई क्योंकि वह जोर-जोर से चिल्ला रहा था उसकी आवाज सुनकर संगत वहां पर इकट्ठी हो गई तो यह बात सतगुरु तक पहुंची, तो सतगुरु ने कहा उसे कहो नाम सिमरन का जाप करें जब यह बात का सनेहा उस तक पहुंचाया गया तो उसने कहा कि महाराज जी को यहां पर लेकर आओ मुझसे उठा नहीं जा रहा तो सेवादार फिर से महाराज जी के पास गया और महाराज जी से कहा कि महाराज जी वह तो आपको बुला रहा है लेकिन महाराज जी अंतर्ध्यान थे कुर्सी पर बैठे थे महाराज जी ने कहा कि मैं अभी थोड़ी देर में आता हूं आप उसे कहो कि नाम सिमरन का जाप करता रहे और उस सेवादार ने उस भाई को यही जाकर कहा कि महाराज जी ने कहा है नाम सिमरन का जाप करते रहो लेकिन वह बहुत तड़प रहा था तो उसकी तड़प देखकर सेवादार फिर से महाराज जी के पास गया और महाराज जी से कहा कि महाराज जी वह बहुत तड़प रहा है आपकी जरूरत वहां पर है तो महाराज जी ने कहा कि ,क्या मैं उसे काल के मुंह में जाने दूं,उसकी तड़प का मुझे पता है लेकिन उसने नाम की कमाई नहीं की , रूह की चढ़ाई नहीं हुई और उसका हिसाब किताब किया जा रहा है उसे दोबारा जन्म लेना पड़ेगा इसकी ही चर्चा और हिसाब किताब कॉल कर रहा था और उसे दोबारा जन्म देने की पूरी व्यवस्था हो गई थी लेकिन उसने मेरी संगत की सेवा की है और जो मेरी संगत की सेवा करता है उसे तो मैं हर हाल में सचखंड लेकर ही जाऊंगा फिर जो चाहे हो जाए इसलिए उसे अभी इतनी तड़प हो रही है क्योंकि उसकी पहले चढ़ाई नहीं हुई अब रूह ऊपर चढ़ रही है और उसे तकलीफ हो रही है इसीलिए तो मैं कहता हूं कि भाई जीते जी मर जाओ जीते जी उस मालिक से मिल जाओ ताकि मृत्यु के समय कोई तकलीफ ना हो उसके बाद महाराज जी उसके पास गए और महाराज जी ने उसके सिर पर हाथ रखा और उसकी चीखें बंद हो गई और उसने अंतिम सांस ली और वह मालिक को प्यारा हो गया साध संगत जी इसे कहते हैं पूरे गुरु की पहचान कि जब कोई पूरा गुरु अपने शिष्य की जिम्मेदारी लेता है तो उसे बीच रास्ते में नहीं छोड़ता जो कहता है वह करता भी है जब गुरु ने वचन दे दिया कि अब तुम मेरी जिम्मेवारी हो तो वह उसे हर हाल में सचखंड लेकर जाता है कुछ भी हो जाए वह अपने जीव को काल के इस जंजाल से मुक्त करवा ही लेता है यह पूरे गुरु की पहचान होती है वह अपने जीव को इस संसार में दोबारा नहीं लौटने देता, उसकी इसी जन्म में मुक्ति करवा देता है लेकिन सतगुरु की खुशी केवल और केवल हमारे भजन सिमरन में है, करने को तो सतगुरु बहुत कुछ कर सकते हैं लेकिन अगर वह ऐसा बोलने लग जाएं तो हम में से कोई भी भजन सिमरन नहीं करेगा हम तो उन पर ही निर्भर हो जाएंगे लेकिन सतगुरु चाहते हैं कि मेरे बच्चे खुद अपने पैरों पर खड़े हो ,खुद नाम की कमाई करें वह सब कुछ जान ले जो उनके जानने योग्य है कि वह मालिक की अंश है आत्मा मालिक की अंश है इसलिए सतगुरु कहते हैं कि जीते जी मर जाओ और जिसने जीते जी मर कर देख लिया होता है उसे फिर मृत्यु से किसी तरह का कोई भी डर नहीं रहता जैसे कि कबीर साहब फरमाते हैं " जिस मरने ते जग डरे ,मेरे मन आनंद मरने ही ते पाइए पूर्ण परमानंद" जिसने जीते जी मर कर देख लिया उसे मृत्यु से फिर भय नहीं रहता और कबीर साहब कहते है जिस मौत से दुनिया डरती है वह तो मेरे लिए आनंद का सागर है मेरे लिए तो वह परमानंद है यह वचन केवल और केवल पूर्ण संत महात्मा ही कह सकते हैं जिन्होंने जीते जी मर कर देखा है और वह शिक्षा अपने शिष्यों को भी देते हैं कि भाई नाम की कमाई करने में लगो जीते जी मर जाओ ताकि दोबारा आना जाना खत्म हो जाए जन्म जन्म का यह खेल खत्म हो जाए और मालिक से मिलाप हो जाए ,माया के इस खेल से छुटकारा मिल जाए साध संगत जी हमें भी बाबाजी के हुक्म की पालना करनी है उनके कहे गए वचनों का पालन करना है ।

गुरु प्यारी साध संगत जी यह साखी सन 1927 की है जब सतगुरु महाराज जी हुआ करते थे उस समय लोग बहुत सीधे हुआ करते थे, ज्यादा म...
18/08/2026

गुरु प्यारी साध संगत जी यह साखी सन 1927 की है जब सतगुरु महाराज जी हुआ करते थे उस समय लोग बहुत सीधे हुआ करते थे, ज्यादा मन में प्रसन्न नहीं होते थे उस समय के लोग ज्यादा विवादों में नहीं पड़ते थे सतगुरु जो हुकुम करते थे उनके भाने को मानकर वही काम करने में लग जाते थे अपने मुर्शिद से अपने गुरु से बिना सवाल किए हुकम की पालना करते थे लेकिन अगर आज के समय में देखा जाए तो हम में से कुछ भाई हैं जो कोई भी काम करने से पहले विचार करने लग जाते हैं अपनी बुद्धि से पूछने लग जाते हैं कि क्या यह काम मेरे लिए सही होगा या नहीं तो वह विचारों में पड़ जाते हैं लेकिन उस समय ऐसा नहीं होता था जो हुक्म कर दिया संगत उस सेवा में लग जाती थी

अपनी बुद्धि को हटाकर जो सतगुरु का हुक्म है उसकी पालना करने में लग जाती थी और इसीलिए उस समय लोगों के सीधे पन के कारण उनका ध्यान भी जल्दी लग जाता था क्योंकि सतगुरु जो उन्हें समझाते थे वह बिल्कुल वैसा ही करते थे अपनी मनमर्जी नहीं करते थे अपनी मनमानी नहीं करते थे अगर उन्हें कहा जाता था कि इतनी देर सिमरन पर बैठना है तो वह अपने गुरु के इस हुक्म को सबसे ऊपर रखकर भजन बंदगी करते थे अपने गुरु के हुक्म की पालना करते थे अपने गुरु के भाने को मानते थे क्योंकि उनका अपने सतगुरु से बहुत प्रेम था इसलिए उस समय महाराज जी ने बहुत संगत को उस मालिक से मिलाया ,उस मालिक की राह दिखाई और बहुत संगत उस मार्ग पर चली और मंजिल को प्राप्त हुई ,क्योंकि उन्होंने अपने सतगुरु का भाना माना सतगुरु के घर की सेवा की वह भी बिना कोई सवाल किए बिना कोई प्रश्न किए, इस समय बेशक हमारा सतगुरु से प्रेम है प्यार है लेकिन कहीं ना कहीं जाकर हम वाद विवाद में पड़ जाते हैं ना चाहते हुए भी इन सब चीजों में पड़ जाते हैं कि शायद जो वह कह रहे हैं वह मेरे लिए इतना जरूरी नहीं है उनका तो काम ही है बोलना ,कहना, लेकिन यह मेरे ऊपर निर्भर करता है कि मुझे करना है कि नहीं करना है लेकिन उस समय ऐसा नहीं होता था संगत का इतना गहरा प्रेम होता था कि अगर उस समय सतगुरु कह देते थे कि आज पूरा दिन भजन पर बैठना है तो कुछ सज्जना ऐसे भी होते थे कि पूरा पूरा दिन भजन बंदगी में लगा देते थे वह भी अपने गुरु के प्यार की खातिर, जो हुक्म होता वह करने के लिए हमेशा से तैयार रहते थे उनका सीधा पन ही उन्हें मालिक से मिलवा गया, वह बिल्कुल एक छोटे बच्चे के जैसे थे इसलिए तो कहा जाता है कि अगर मालिक से मिलना हो तो एक बच्चे के जैसे होना पड़ेगा अपनी मनमर्जी करनी दूर करनी पड़ेगी, हटानी होगी जो हुक्म होता है वैसा ही करना पड़ेगा,उन्हें जैसा करने को कहा जाता था वह करने में लग जाते थे इसलिए तो कहा गया है कि बच्चे मालिक का रूप होते हैं क्योंकि वह बहुत ही सीधे होते हैं उनको जैसा बताओ वह वैसा ही करने लग जाते हैं इसलिए बच्चों को मालिक का रूप कहा जाता है लेकिन इस समय हम इतने उलझे हुए हैं इतने विचारों में पड़े हुए हैं कि ना तो हमें अपने सतगुरु का हुक्म समझ में आता है ना हमें यह पता चलता है कि हम करना क्या चाहते हैं और क्यों करना चाहते हैं मन जैसा हम से करवा रहा है हम अपने मन की सुनकर उसके पीछे लग रहे हैं हमें अपनी कोई सुध बुध नहीं है ऐसे ही एक सत्संगी मांझी हुआ करती थी जो कि बिल्कुल सीधी थी ,कोई प्रश्न नहीं ,जो हुकुम वही करना अगर बोला गया है कि ढाई घंटे भजन सिमरन करना है तो ढाई घंटे ही करना है ना कम ना ज्यादा अगर सतगुरु ने 5 घंटे बोल दिया तो 5 घंटे बैठना है हुक्म मानना है हुकुम की पालना करनी है तो ऐसे ही उस समय मांझी से एक सत्संगी बहन ने सवाल कर दिया कि अगर आप की मृत्यु के समय हजूर महाराज जी आपको लेने आ जाए तो क्या आप उनके साथ जाओगे तो माझी ने कहा कि नाम दान देते वक्त मुझे मेरे सतगुरु ने यह हुक्म किया है कि भजन बंदगी करनी है इतना समय भजन सिमरन को देना ,मृत्यु के समय मैं तुम्हारी संभाल करूंगा मैं तुम्हारी जिम्मेदारी उठाता हूं तो मेरे मौजूदा सतगुरु ने मेरी जिम्मेदारी ली है ऐसी कोई बात नहीं है कि वह बड़े हैं या फिर यह छोटे हैं बात एक ही है जो मुझे मेरे सतगुरु ने हुक्म किया है मैं तो वैसा ही करूंगी अगर उन्होंने कहा है कि वह मुझे लेने आएंगे तो मैं उनके साथ ही जाऊंगी क्योंकि मैं हुकम की पालना कर रही हूं मेरे लिए हुकम सबसे ऊपर है मेरे लिए मेरे महाराज जी का हुक्म सबसे ऊपर है मेरे लिए और कोई भी काम इतना विशेष नहीं है जितना मेरे लिए मेरे सतगुरु का हुक्म है यह बात महाराज जी को पता चल गई की माई ने ऐसा कहा है महाराज जी थोड़ा सा मुस्कुरा पड़े और जब उस माता का मृत्यु का समय आया ,माता को पता चल गया था उसका समय नजदीक है अब उसे जाना है तो वह पहले से ही तैयारी में लग गई क्योंकि अक्सर देखा जाता है जो सत्संगी अभ्यासी होते हैं उन्हें मृत्यु की खबर पहले ही हो जाती है लेकिन जिन्होंने भजन सिमरन नहीं किया उन्हें तो कुछ नहीं पता चलता कि कब क्या हो जाए जिन्होंने नाम की कमाई की होती है शब्द की कमाई की होती है उन्हें हर खबर पहले ही मालूम पड़ जाती है तो जब माता को पता चला कि उसका समय नजदीक आ गया है अब उसे जाना है तो वह तैयारी में लग गई और वह ध्यान में बैठ गई की आखरी बार अपने सतगुरु की हुकुम की पालना कर लूं और जब वह ध्यान में लीन हो गई तो हजूर महाराज जी उसके ध्यान में आए और कहा कि चलो आपका समय आ गया है माताजी ने कुछ नहीं बोला माताजी ने उस समय महाराज जी ने जो बताया था उस नाम का जाप करना शुरू कर दिया और जैसा बताया जाता है वैसा ही करना शुरू कर दिया उन्होंने कुछ जवाब नहीं दिया हजूर महाराज जी ने दो बार कहा कि चलो समय हो गया है माता जी ने महाराज जी को याद किया कि महाराज जी आपका हुक्म था कि आप मुझे लेने आओगे अगर आप मुझे यहां आकर कह दो कि आप हजूर महाराज जी के साथ चले जाओ तो मैं चली जाऊंगी लेकिन आपके हुकुम की उलांगना, में नहीं कर सकती तो जो सावन सिंह जी महाराज जी थे वही हजूर महाराज जी थे वह दूसरे रूप में माता के सामने प्रकट हुए माता को समझ में आया कि कोई अलग नहीं है सब एक ही जोत है ,हमारे देखने की दृष्टि है कि वह बड़े महाराज जी हैं वह हजूर महाराज जी है, माता को उस समय यह समझ में आया कि जोत एक ही है माता के आंसू निकल गए और महाराज जी यह देखकर बहुत खुश हुए की हुकुम की पालना पूरी तरह की गई है ,ये साखी उस समय उस सत्संगी परिवार के एक सदस्य ने ही संगत को सुनाई थी

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