26/08/2026
*पूज्य भंते महास्थविर संघरक्षितजी मूल इंग्लैण्ड निवासी हैं।* डेनिस लिंगवुड नाम था। *बचपन में जब बीमार थे तब बौद्ध ग्रंथों के माध्यम से धम्म सान्निध्य में आए।* दूसरे महायुद्ध के काल में जबर्दस्ती से सेना में भर्ती करने के बाद वे भारत आए। *भारत भूमि पर पैर रखते ही उनके कदम धम्म की खोज करने में लगे।* लेकिन उन्हें निराश होना पड़ा। तब उन्होंने अपन तबादला सिलोन करवा लिया। महायुद्ध समाप्त होने के बाद भंतेजी ने भारत में ही रहने का निश्चय किया। *जुलाई 1950 में उन्होंने पूज्य भंते ऊ चन्द्रमणि जी के हाथों दीक्षा ली।* तत्पश्चात उन्होंने अपना समय धम्मप्रचार और अध्यय में बिताया। उनका 'सर्वे ऑफ बुद्धिज्म' ग्रंथ संसार भर में जाना-माना है। भारत में धम्मकार्य करते समय भंते संघरक्षित जी और पूज्य बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर जी से इनकी तीन बार भेंट और बहस हुई। *बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर भंते जी को एक आदर्श भिक्खु मानते थे।* सन 1964 को भंते जी इंग्लैण्ड गए, वहां उन्होंने त्रैलोक्य बौद्ध महासंघ सहाय्यक गण (जिसे पश्चिमात्य राष्ट्रों में फ्रेंड्स ऑफ दि वेस्टर्न बुद्धिस्ट आर्डर के नाम से जाना जाता है।) की स्थापना की। महासंघ के सदस्य बुद्ध, धम्म और संघ को अपना अंतिम आदर्श मानकर अपना धम्मजीवन बिताते हैं। उन्होंने Friends of the Western Buddhist Order की 1967 में और Western Buddhist Order की सन 1968 में स्थापना की, *जिसे भारत में 'त्रैलोक्य बौद्ध महासंघ सहायकगण' और 'त्रैलोक्य बौद्ध महासंघ' कहा जाता है।* पूर्व और पश्चिम, परम्परावादी जगत और आधुनिक जगत, तत्व और आचरण के बीच धम्म तत्वों के अनुवाद का काम संघरक्षित जी ने किया है। उनकी धम्म की गहरी अनुभूति और सुस्पष्ट चिंतन को सम्पूर्ण विश्व में सराहा जाता है। उन्होंने हमेशा ही आध्यात्मिक जीवन में प्रतिबद्धता या शरण गमन, कल्याणमित्रता के अद्वितीय मूल्य को आवासीय आध्यात्मिक कुल, धर्म और कला के संबंध को दृढ़तापूर्वक प्रतिपादित किया है। *त्रैलोक बौद्ध सहायकगण महासंघ अब एक विश्व बौद्ध आंदोलन है और विश्व के 45 देशों से भी अधिक देशों में इसके केन्द्र हैं।* पिछले कुछ वर्षों से संघरक्षित जी ने अपनी सारी जिम्मेदारियां अपने ज्येष्ठ शिष्यों को सौंप दी हैं। अब इंग्लैण्ड में वरमिंघम के मध्य इलाके के निवास में वे अपने लेखन और व्यक्तिगत तौर पर लोगों से मिलने में अपना ध्यान केंद्रित किए रहते हैं।
भंते संघरक्षित द्वारा रचित अंग्रेजी
साहित्य-
1. A
Survey of Buddhism,
2. The Three Jewels, 3. Flame in Darkness, 4. Crossing the Stream, 5. The Essence of Zen, 6. The Thousand-Petalled Lotus, 7. Human Enlightement, 8. The Ten Pillars of Buddhism, 9. The Eternal Legacy, 10. Travel Letters, 11. Alternative Traditions, 12. Ambedkar and Buddhism, 13. The History of My Going for Refuge, 14. The Taste of Freedom, 15. New Currents in Western Buddhism, 17. A Guide to the Buddhist Path, 18. Learning to Walk, 19. Vision and Transformation, 20. The Buddha's Victory, 21. Facing Mount Kanchenjunga, 22. The Drama of Cosmic Enlightenment, 23. Wisdom Beyound Words, 24. The Priceless Jewel, 25. Who is the Buddha?, 26. In the Realm of the Lotus, 27. Peace is a Fire, 28. The Inconceivable Emancipation, 29. Complet Poems 1941-1994, 30. Tranforming Self and World, 31. The FWBO and 'Protestant Buddhism', 32. The Meaning of Orthodoxy in Buddhism, 33. Mind Reactive and Creative, 34. Going for Refuge, 35. My Relation to the Order, 36. Buddhism and the West, 37. Forty-Three Years Ago, 38. The Meaning of conversion in Buddhism, 39. Was the Buddha a Bhikkhu? 40. Ritual and Devotion in Buddhism, 41. Buddhism today & tomorrow.
टाइपिंग : *धम्ममित्र कपिल प्रियदर्शी*
26/08/2026
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