02/03/2026
आज़ विश्व नये संकट के मुहाने पर खड़ा हैं। यदि कुछेक देशों को छोड़ दें तो उसमें से एक भारत भी है।
राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से 2014 के पहले के हालात बेहद डरावने थे आए दिन हो रहे देश के अनेक जगहों पर हमले मन को विचलित कर देते थे।
जब कभी घर के सदस्य दिल्ली या अन्य महानगरों में जाते तो यकीन मानिए हफ्ते हफ्ते भर बैचेनी घबराहट होती रहती थी कि पता नहीं कब कहां बम ब्लास्ट हो जाए, हरवक्त भगवान का स्मरण करते हुए कि सकुशल घर वापस लौटें।
आज़ स्थिति बिल्कुल विपरीत है।
हरेक भारतीय निश्चिंत है अपने कार्य में अपनी नौकरी चाकरी घर परिवार व्यापार में मस्त हैं। कैसे?
ठीक वैसे ही जैसे एक परिवार में बीस सदस्य हो और सलाह समझ सबकी निर्णय एक का ही मान्य हो
माननीय मोदी जी को देखकर हमें याद आते अपने परिवारों के बड़े बुजुर्ग जिन्होंने कभी किसी के साथ भेदभाव नहीं किया।
उनके लिए परिवार हित ही प्राथमिक रहे।
निस्संदेह, इतने विशाल और विविधतापूर्ण देश में कुछ भूल-चूक या नीतिगत त्रुटियाँ हो सकती हैं।
लोकतंत्र में आलोचना और समीक्षा स्वाभाविक है।
परंतु यह भी सत्य है कि किसी भी कालखंड का मूल्यांकन करते समय केवल कमियों को ही नहीं, उपलब्धियों और सकारात्मक परिवर्तनों को भी देखना चाहिए।
सौ अच्छाइयों को नज़रअंदाज़ कर केवल एक कमी पर ध्यान केंद्रित करना संतुलित दृष्टिकोण नहीं कहलाएगा।
राष्ट्र निर्माण एक सतत प्रक्रिया है। इसमें सरकार, संस्थाएँ और नागरिक सभी की भूमिका समान रूप से महत्त्वपूर्ण होती है।
यदि नेतृत्व दिशा देता है तो जनता ऊर्जा देती है। जब दोनों के बीच विश्वास का संबंध बनता है, तभी स्थिरता और विकास संभव होता है।
इसलिए आवश्यक है कि हम उपलब्धियों को स्वीकार करें, कमियों को सुधारने का प्रयास करें और संवाद के माध्यम से आगे बढ़ें।
एक सशक्त राष्ट्र वही है जो आत्मविश्वास के साथ अपनी चुनौतियों का सामना करे और अपने सामूहिक हित को सर्वोपरि रखे।
Manoj singh
Crime news editor