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कहते हैं, कुछ रिश्ते वक्त के पार भी सांस लेते रहते हैं। कुछ मोहब्बतें ऐसी होती हैं जो अधूरी रहकर भी अमर हो जाती हैं। अभि...
07/11/2025

कहते हैं, कुछ रिश्ते वक्त के पार भी सांस लेते रहते हैं। कुछ मोहब्बतें ऐसी होती हैं जो अधूरी रहकर भी अमर हो जाती हैं। अभिनेत्री और गायिका सुलक्षणा पंडित और महान अभिनेता संजीव कुमार का रिश्ता शायद ऐसा ही था। दोनों की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं—एक ऐसी दास्तान जो प्रेम, विरह, और दर्द के सागर में डूबी हुई है। हैरानी की बात तो यह है कि सुलक्षणा पंडित का निधन ठीक उसी तारीख को हुआ जिस दिन 40 साल पहले संजीव कुमार इस दुनिया को अलविदा कह गए थे — 6 नवंबर।

मौत की वही तारीख… क्या ये महज संयोग था या किस्मत की डोर?
71 वर्षीय सुलक्षणा पंडित पिछले कुछ समय से बीमार चल रही थीं और मुंबई के नानावटी अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। जिस दिन उनके निधन की खबर आई, उसी दिन यादों का एक तूफ़ान लोगों के मन में उमड़ पड़ा — वो यादें जब सुलक्षणा पंडित ने संजीव कुमार के लिए अपने दिल में जगह बनाई थी, मगर बदले में उन्हें मिला सिर्फ़ इंतज़ार और तन्हाई। दोनों का जन्म भी एक ही महीने में हुआ था — संजीव कुमार 9 जुलाई 1938 को और सुलक्षणा 12 जुलाई 1954 को। 16 साल का फर्क होने के बावजूद उनका रिश्ता दिल से जुड़ा था।

संगीत में जन्मी सुलक्षणा, सुरों की विरासत
सुलक्षणा का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जहां संगीत खून में बहता था। उनके पिता प्रताप नारायण पंडित एक जाने-माने संगीतज्ञ थे, और उनके चाचा पंडित जसराज भारतीय शास्त्रीय संगीत के महानतम स्तंभों में से एक थे। यही नहीं, उनके भाई जतिन-ललित की जोड़ी ने बॉलीवुड संगीत को एक नया आयाम दिया। बहन विजेयता पंडित ने फिल्मों में अभिनय किया, जबकि उनके पति आदर्श श्रीवास्तव भी संगीतकार थे। यह पूरा परिवार संगीत और कला का जीता-जागता रूप था।

नौ साल की उम्र में शुरुआत, सुरों से अभिनय तक का सफर
सुलक्षणा ने महज़ नौ साल की उम्र में फिल्म तक़दीर (1967) में गाना गाया। लता मंगेशकर के साथ कोरस में गाए गए गीत “सात समंदर पार से” में उनकी आवाज़ भी शामिल थी। धीरे-धीरे उन्होंने खुद को एक पार्श्व गायिका के रूप में स्थापित किया। 1975 में आई फिल्म संकल्प के गीत “तू ही सागर है, तू ही किनारा” के लिए उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला — उनके करियर का सबसे बड़ा सम्मान। उन्होंने रफ़ी साहब और किशोर कुमार जैसे दिग्गजों के साथ भी गाया।

किशोर दा की सलाह — “तुम हीरोइन बनो”
एक दौर में जब सुलक्षणा पंडित किशोर कुमार के साथ स्टेज परफॉर्मेंस करती थीं, तब किशोर दा ने उनसे कहा — “तुम्हारी आवाज़ ही नहीं, तुम्हारा चेहरा भी खूबसूरत है। तुम्हें फिल्मों में अभिनय करना चाहिए।” यह 1971 की बात थी। उसी समय किशोर दा अपनी फिल्म दूर का राही बना रहे थे और उन्होंने सुलक्षणा को उसके एक गीत “बेकरार दिल गाए जा” में मौका दिया। यह उनका पहला डुएट था और यहीं से उनके जीवन की दिशा बदल गई।

‘उलझन’ से पर्दे पर आगमन और संजीव कुमार से मुलाकात
चार साल बाद 1974 में फिल्म उलझन से सुलक्षणा ने बतौर अभिनेत्री डेब्यू किया। किस्मत देखिए, उनकी पहली ही फिल्म में नायक थे संजीव कुमार। शूटिंग के दौरान सुलक्षणा का दिल संजीव कुमार पर आ गया। उन्होंने अपने दिल की बात भी कह दी — शादी का प्रस्ताव रखा। लेकिन उस वक्त संजीव कुमार का दिल हेमा मालिनी के लिए धड़कता था। उन्होंने सुलक्षणा के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। सुलक्षणा का दिल टूट गया, मगर प्यार नहीं मरा। उन्होंने तय कर लिया कि वो किसी और से शादी नहीं करेंगी।

दो अधूरे लोग — एक हेमा के लिए तन्हा, एक संजीव के लिए विरह में जिंदा
संजीव कुमार हेमा मालिनी को नहीं पा सके, और सुलक्षणा पंडित संजीव कुमार के बिना रह नहीं सकीं। दोनों की ज़िंदगी तन्हाई में बीती। एक दिन किस्मत ने और बड़ा वार किया — 1985 में संजीव कुमार का निधन हो गया। उसी पल सुलक्षणा की दुनिया बिखर गई। वो मानसिक रूप से टूट गईं, लोगों से मिलना-जुलना छोड़ दिया। फिर कुछ साल बाद उनकी मां भी गुजर गईं और वो पूरी तरह अकेली हो गईं।

आखिरी गीत और मौन की ज़िंदगी
भाई के आग्रह पर 1996 में खामोशी: द म्यूज़िकल के लिए उन्होंने एक आखिरी गीत गाया — “सागर किनारे भी दो दिल हैं प्यासे।” इसके बाद उनकी आवाज़ फिर कभी सुनाई नहीं दी। वो दुनिया से कट गईं, अपने ही अतीत में जीने लगीं। शायद मन में कहीं ये उम्मीद बाकी थी कि एक दिन वो संजीव कुमार से फिर मिलेंगी — चाहे इस दुनिया में नहीं, पर किसी और लोक में जरूर।

6 नवंबर — जब इतिहास ने खुद को दोहराया
और फिर वही तारीख — 6 नवंबर। जिस दिन 40 साल पहले उनके जीवन का प्यार चला गया था, उसी दिन सुलक्षणा पंडित ने भी अपनी अंतिम सांस ली। क्या यह संयोग था या किसी अधूरे रिश्ते का पुनर्मिलन? शायद दोनों की आत्माएं वहीं कहीं एक-दूसरे को पा चुकी होंगी।

सुलक्षणा पंडित — वो नाम जो हमेशा ज़िंदा रहेगा
साल 2025 ने कई दिग्गज कलाकारों को हमसे छीन लिया, लेकिन सुलक्षणा पंडित की कहानी अलग है। उनकी ज़िंदगी एक याद दिलाती है — कि सच्चा प्यार सिर्फ़ पाने का नाम नहीं, बल्कि उस एहसास को निभाने का नाम है, जो ज़िंदगी से भी लंबा चलता है।

सुलक्षणा पंडित जी को शत-शत नमन। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।

06/11/2025

6 नवंबर 1985 का वो दिन, जब सिनेमा का सबसे संजीदा कलाकार दुनिया को छोड़ गया। मात्र 47 साल की उम्र में विदा लेने वाले संजीव कुमार की मौत ने सबको हिला दिया था। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात ये रही कि उनके पिता, दादा और भाई — तीनों की मौत भी लगभग एक जैसी परिस्थितियों में हुई थी।

क्या ये सिर्फ एक संयोग था, या वाकई कोई अदृश्य पारिवारिक श्राप जो पीढ़ियों से पीछा कर रहा था? उनके आखिरी दिनों की कहानी, संघर्ष और उस रहस्य से जुड़ी बातें जानने के लिए देखें पूरा वीडियो।

6 नवंबर 1985 – यह वही दिन था जब हिंदी सिनेमा के असली कलाकार संजीव कुमार ने मात्र 47 वर्ष की उम्र में इस दुनिया को अलविदा...
06/11/2025

6 नवंबर 1985 – यह वही दिन था जब हिंदी सिनेमा के असली कलाकार संजीव कुमार ने मात्र 47 वर्ष की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया। पर्दे पर जो शख्स हर किरदार को ज़िंदा कर देता था, असल ज़िंदगी में उतना ही खामोश और अकेला हो गया था। 25 साल का उनका सिनेमाई सफर किसी ब्लॉकबस्टर फिल्म से कम नहीं था। हर मोड़ पर नए रंग, नए किरदार और अनगिनत संघर्ष – यही उनकी असली कहानी थी।

संघर्ष से स्टारडम तक का सफर

हरिहर जेठालाल जरीवाला नाम का एक साधारण लड़का जब थिएटर की गलियों से फिल्मी दुनिया में कदम रखता है, तो किसी को अंदाज़ा भी नहीं होता कि एक दिन वह “संजीव कुमार” बन जाएगा। पिता की कम उम्र में मौत, मां का संघर्ष, और परिवार की जिम्मेदारी – इन सबके बीच उसने कभी मुस्कुराना नहीं छोड़ा। वही मुस्कान आगे चलकर उनके अभिनय की पहचान बन गई।

उनकी मां ने अपने जेवर गिरवी रखकर उन्हें शशधर मुखर्जी के एक्टिंग स्कूल में दाखिला दिलाया था। मां चाहती थीं कि बेटा डॉक्टर या वकील बने, पर जब उन्होंने बेटे की आंखों में अभिनय का जुनून देखा, तो उन्होंने खुद उसकी किस्मत उसी रास्ते पर भेज दी।

नाम जो बना पहचान

हरिहर जेठालाल ने थिएटर में काम करते हुए महसूस किया कि फिल्मों में उन्हें एक नया नाम चाहिए। मां के नाम ‘शांताबेन’ के ‘एस’ से शुरू करते हुए उन्होंने ‘कुमार’ जोड़ने का सोचा — पर दिलीप कुमार और अशोक कुमार जैसे बड़े नामों के बीच उन्होंने अपने लिए चुना “संजीव कुमार”। यह नाम उनके जीवन की सबसे बड़ी पहचान बन गया।

उनकी पहली फिल्म हम हिंदुस्तानी (1960) में केवल कुछ सेकेंड का क्लोज़अप था, लेकिन उन कुछ पलों में भी उन्होंने कैमरे से आंखें मिलाकर कहा – “मैं हूं, और मैं रहूंगा।” जल्द ही 1968 में संघर्ष और 1970 में खिलौना ने उन्हें वो ऊंचाई दी, जहां पहुंचने की ख्वाहिश हर अभिनेता करता है।

अभिनय की वह ऊँचाई जहां कोई सीमा नहीं थी

संजीव कुमार के अभिनय की सबसे बड़ी खूबी थी उसकी विविधता। आंधी, कोशिश, पति पत्नी और वो, अंगूर, शोले — हर किरदार अलग, हर रंग नया। एक ही वक्त में वे अनामिका में जया भादुड़ी के प्रेमी बनते हैं और परिचय में उनके पिता। वही जया जब शोले में उनकी बहू बनीं, तो दर्शकों ने देखा कि एक ही अभिनेता तीन पीढ़ियों का रिश्ता निभा सकता है।

नया दिन नई रात में उन्होंने नौ किरदार निभाकर साबित कर दिया कि अभिनय के नाम पर कोई सीमा नहीं होती। शतरंज के खिलाड़ी जैसी कला प्रधान फिल्म में सत्यजीत रे के साथ काम करना हो या पति पत्नी और वो जैसी कॉमेडी — संजीव कुमार हर शैली में फिट बैठते थे।

अकेलापन, प्यार और शराब का साया

कहते हैं, जितना गहरा कलाकार होता है, उतना ही अकेला भी। संजीव कुमार की ज़िंदगी इसका प्रमाण थी। हेमा मालिनी से उनका प्यार सबको पता था, पर यह रिश्ता अधूरा ही रह गया। नूतन और सुलक्षणा पंडित के साथ उनके संबंधों की चर्चा खूब हुई, पर उन्होंने कभी शादी नहीं की। धीरे-धीरे यह अकेलापन उन्हें शराब की तरफ ले गया।

37 की उम्र में उन्हें पहला हार्ट अटैक आया, पर उन्होंने काम नहीं छोड़ा। अमेरिका में ओपन हार्ट सर्जरी के बाद भी वे शूटिंग पर लौट आए। उनके दोस्त दिनेश हिंगू ने कहा था – “अगर उसने शादी की होती तो वह ज़्यादा दिन ज़िंदा रहता। उसे आराम करना नहीं आता था।”

गुरु और शिष्य की भावनात्मक कहानी

संजीव कुमार के गुरु ए.के. हंगल थे, जिन्होंने उन्हें पहला नाटक दिया था। जब हंगल साहब ने उन्हें बूढ़े का किरदार दिया, तो उन्होंने कहा – “मैं तो हीरो बनना चाहता हूं।” तब हंगल बोले – “हीरो तो कोई भी बन सकता है, पर एक्टर वही बनता है जो हर किरदार में ढल जाए।” और सच में, संजीव कुमार ने यह बात अपने जीवन से साबित कर दी।

6 नवंबर 1985 को जब हंगल साहब को उनके निधन की खबर मिली, तो वे वहीं सबके सामने फूट-फूटकर रो पड़े। उन्होंने कहा था – “आज मेरा सबसे होनहार शिष्य चला गया।”

दोस्ती, वफादारी और इंसानियत का प्रतीक

संजीव कुमार सिर्फ बेहतरीन अभिनेता ही नहीं, एक वफादार दोस्त भी थे। उन्होंने शत्रुघ्न सिन्हा और पूनम सिन्हा के टूटते रिश्ते को जोड़ा, अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी के बीच सुलह कराई। गुलज़ार उन्हें अपना सबसे खास दोस्त मानते थे। दोनों ने मौसम, आंधी, और नमकीन जैसी कालजयी फिल्में साथ कीं।

गुलज़ार ने लिखा – “संजीव के जाने के बाद मैंने कई दिन तक शूटिंग नहीं की। वह सिर्फ अभिनेता नहीं, मेरे घर का हिस्सा थे।”

आख़िरी सफ़र और अधूरी मोहब्बतें

संजीव कुमार का निधन उनकी मां की पुण्यतिथि के दिन ही हुआ — 6 नवंबर। वह दिन उनके लिए हमेशा भावनाओं से भरा होता था। वे मां की याद में हर साल अकेले रहते थे। पर उस साल वे खुद भी दुनिया छोड़ गए।

उनके निधन के बाद मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री ठहर सी गई थी। अगले दिन किसी भी स्टूडियो में शूटिंग नहीं हुई। शत्रुघ्न सिन्हा 48 घंटे तक उनके पार्थिव शरीर के पास बैठे रहे। और जब उनकी बहन अमेरिका से लौटीं, तब जाकर अंतिम संस्कार किया गया।

एक्टर जो सिर्फ एक्टर नहीं, एक मिसाल था

संजीव कुमार की पूरी ज़िंदगी अभिनय का एक पाठ है — संघर्ष, समर्पण, और जिद का पाठ। उन्होंने 153 फिल्मों में काम किया, दो राष्ट्रीय पुरस्कार जीते, और हर किरदार में कुछ ऐसा छोड़ा जो आज भी यादों में ज़िंदा है।

वो सादगी से रहते थे, बिना दिखावे के, बिना चमक-दमक के। शायद इसलिए उनका नाम आज भी उतनी ही श्रद्धा से लिया जाता है जितना उनके दौर के सुपरस्टार्स का।

संजीव कुमार की ज़िंदगी का हर पहलू — उनकी मुस्कान, उनका दर्द, उनका अकेलापन — एक फिल्म की तरह है, जो खत्म तो हो जाती है, पर असर छोड़ जाती है।

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क्या आपने कभी सोचा है कि हिंदी सिनेमा में सबसे पहले किस अभिनेता की फिल्में थिएटरों में लगातार 25 हफ्ते तक चलती रहीं? आज ...
06/11/2025

क्या आपने कभी सोचा है कि हिंदी सिनेमा में सबसे पहले किस अभिनेता की फिल्में थिएटरों में लगातार 25 हफ्ते तक चलती रहीं? आज जब हम “सिल्वर जुबली स्टार” का नाम सुनते हैं, तो सबसे पहले दिमाग में राजेंद्र कुमार का चेहरा उभर आता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि राजेंद्र कुमार से पहले भी एक ऐसा अभिनेता था, जिसकी फिल्में हफ्तों तक थिएटर में हाउसफुल चलती रहीं, और जिसने भारतीय सिनेमा को “सिल्वर जुबली स्टार” का खिताब सबसे पहले दिलाया। यह नाम था – करण दीवान।

पत्रकार से अभिनेता बनने तक का सफर

6 नवंबर 1917 को गुजरांवाला (अब पाकिस्तान) में जन्मे करण दीवान का असली नाम दीवान करण चोपड़ा था। यह वो दौर था जब फिल्मों में नाम बनाना आसान नहीं था। लेकिन करण दीवान का रास्ता कुछ अलग था — वह पत्रकार थे, और उर्दू फिल्म मैगज़ीन के एडिटर के रूप में काम करते थे। कहते हैं, कॉलेज के दिनों में ही उन्होंने पत्रकारिता शुरू कर दी थी। फिल्मों के बारे में लिखते-लिखते उन्हें एक्टिंग का शौक चढ़ गया, और यहीं से उनकी जिंदगी की दिशा बदल गई।

राजश्री प्रोडक्शंस से जुड़ाव और पहला मौका

करण दीवान की किस्मत उस वक्त पलटी जब उनकी मुलाकात हुई ताराचंद बड़जात्या से — वही शख्स जिन्होंने बाद में राजश्री प्रोडक्शंस की नींव रखी। ताराचंद उस समय लाहौर में फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर हुआ करते थे। करण ने उनसे अपनी एक्टिंग की इच्छा जताई और ताराचंद ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। फिर साल 1939 में करण दीवान कोलकाता पहुंचे और पंजाबी फिल्म ‘पूरण भगत’ से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की। यही फिल्म उनकी किस्मत का पहला दरवाजा बनी।

‘रतन’ ने बनाया स्टार, नौशाद के गाने से पाई पहचान

1944 में आई फिल्म ‘रतन’ ने करण दीवान को रातोंरात मशहूर कर दिया। इस फिल्म के निर्देशक उनके भाई जैमिनी दीवान थे, जबकि संगीत दिया था महान संगीतकार नौशाद ने। फिल्म का गाना “जब तुम ही चले परदेस” उस समय का चार्टबस्टर साबित हुआ और करण दीवान के नाम को लोगों के दिलों में बसा गया। यही नहीं, उन्होंने ‘पिया घर आजा’ और ‘मिट्टी के खिलौने’ जैसी फिल्मों में भी अपनी आवाज़ दी, जो सुपरहिट रहीं।

70 से ज्यादा फिल्में, 20 जुबली हिट्स

करण दीवान ने अपने करियर में 70 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। इनमें से लगभग 20 फिल्मों ने सिल्वर जुबली मनाई। उनकी प्रमुख फिल्मों में ‘जीनत’, ‘लाहौर’, ‘दहेज’, ‘परदेस’, ‘बहार’, ‘मुसाफिरखाना’ और ‘तीन बत्ती चार रास्ता’ शामिल हैं। इतना ही नहीं, 1955 में आई ‘मुसाफिरखाना’ में उन्होंने जॉनी वॉकर और ओम प्रकाश जैसे दिग्गजों के साथ स्क्रीन शेयर की। इन फिल्मों की लगातार सफलता ने करण दीवान को “जुबली स्टार” बना दिया था — वह खिताब जो बाद में राजेंद्र कुमार ने लोकप्रिय बनाया।

शोहरत का शिखर और बदलते दौर का असर

1950 के दशक में करण दीवान अपने करियर के शिखर पर थे। उस समय वे एक साथ आठ-आठ फिल्मों की शूटिंग कर रहे थे। थिएटरों के बाहर उनके नाम से भीड़ लगती थी। लेकिन वक्त के साथ दर्शकों की पसंद बदली। 60 और 70 के दशक तक आते-आते उनकी लोकप्रियता घटने लगी। उन्होंने लीड रोल्स छोड़कर सपोर्टिंग किरदारों में खुद को ढाल लिया। हालांकि, उनका अभिनय हमेशा प्रभावी रहा। 1976 में उन्होंने फिल्मों से संन्यास ले लिया।

फिल्मी प्यार से घर तक का सफर

फिल्म ‘रतन’ की शूटिंग के दौरान करण दीवान की मुलाकात मराठी एक्ट्रेस और सिंगर मंजू से हुई। सेट पर शुरू हुआ ये रिश्ता जल्द ही शादी तक पहुंच गया। दोनों ने सात बच्चों — पांच बेटियों और दो बेटों — के साथ एक सुखी परिवार बनाया। मंजू ने शादी के बाद एक्टिंग छोड़ दी, जबकि करण दीवान ने सिनेमा को अपनी जिंदगी समर्पित कर दी।

आखिरी दिन और विरासत

2 अगस्त 1979 को करण दीवान का निधन हो गया। लेकिन उन्होंने भारतीय सिनेमा में वो छाप छोड़ी, जिसे भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने न केवल अभिनय में अपनी पहचान बनाई, बल्कि पत्रकारिता से लेकर गायन तक, हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा दिखाई।

आज जब हम “सिल्वर जुबली स्टार” का जिक्र करते हैं, तो याद रखना चाहिए — यह खिताब सबसे पहले करण दीवान ने कमाया था। उन्होंने ही साबित किया कि लगन, मेहनत और सही मौके के साथ कोई भी इंसान अपने सपनों को साकार कर सकता है।

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राजस्थान की भूमि ने सदियों से ऐसे योद्धाओं को जन्म दिया है जिन्होंने अपनी तलवारों से इतिहास लिखा। उन्हीं में से एक नाम ह...
06/11/2025

राजस्थान की भूमि ने सदियों से ऐसे योद्धाओं को जन्म दिया है जिन्होंने अपनी तलवारों से इतिहास लिखा। उन्हीं में से एक नाम है — महाराजा विजय सिंह राठौड़ (6 नवंबर 1729 – 17 जुलाई 1793)। मारवाड़ साम्राज्य के इस शासक की कहानी केवल सत्ता या युद्ध की नहीं, बल्कि चाल, षड्यंत्र और वफ़ादारी की ऐसी गाथा है जो इतिहास के पन्नों में गहराई से दर्ज है।

राजसिंहासन की पहली चढ़ाई और सत्ता का संघर्ष

विजय सिंह अपने पिता महाराजा बख्त सिंह की मृत्यु के बाद 21 सितंबर 1752 को गद्दी पर बैठे। यह वह दौर था जब मारवाड़ की सीमाओं पर लगातार बाहरी खतरे थे और आंतरिक विद्रोह भी सिर उठा रहे थे। उन्होंने अपने शासन के शुरुआती समय में अजमेर को पुनः अपने अधीन किया, और गोडवार (मेवाड़ से) तथा उमरकोट को सोढा शासकों से छीन लिया। परंतु यह सत्ता स्थिर नहीं रह सकी — राजनीतिक षड्यंत्रों ने उन्हें अस्थायी रूप से गद्दी से दूर कर दिया।

जग्गनाथ सिंह सांखला: वो मुसाहिब जिसने बदली किस्मत

महाराजा विजय सिंह के सबसे भरोसेमंद सलाहकार थे श्री जग्गनाथ सिंह सांखला, जिन्हें लोग “धाय भाई जगगजी” के नाम से जानते थे। यह वही व्यक्ति थे जिन्होंने संकट के समय में अपनी माता से पचास हजार रुपए उधार लेकर एक स्थायी सेना तैयार की थी। आर्थिक तंगी और विद्रोही ठिकानों के बीच उन्होंने मारवाड़ के हर क्षेत्र का भ्रमण कर पट्टायतों को नियत किया और उनसे रेख व चाकरी वसूली। कहा जाता है कि यदि जग्गनाथ सिंह न होते, तो मारवाड़ की सत्ता उस समय पूरी तरह बिखर जाती।

गुलाबराय की महत्वाकांक्षा और महल के भीतर का षड्यंत्र

विजय सिंह के जीवन में एक नाम बहुत रहस्यमय है — गुलाबराय, जो मूल रूप से ओसवाल जाति की एक बडारन (दासी) थीं। धीरे-धीरे वह महाराजा की पसंदीदा पासवान बनीं। इतिहासकार बताते हैं कि गुलाबराय अपने पुत्र वाभा तेजसिंह को उत्तराधिकारी बनाना चाहती थीं। परंतु मारवाड़ की परंपरा में दासी या पासवान की संतान को वाभा, चेला या खवासपुत्र कहा जाता था — जो राजसिंहासन के योग्य नहीं माने जाते थे। जब गुलाबराय ने इस पर ज़ोर दिया, तो महल के भीतर षड्यंत्रों की लहर दौड़ गई। परिणाम यह हुआ कि गुलाबराय की हत्या एक गहरे षड्यंत्र के तहत कर दी गई — और उनके पुत्र का सपना अधूरा रह गया।

अंतिम वर्षों में अशांति और उत्तराधिकार की लड़ाई

महाराजा विजय सिंह के शासन के अंतिम वर्ष फिर से संघर्ष से भरे थे। उन्होंने चाहा कि उनका पोता मान सिंह गद्दी का वारिस बने। लेकिन नियति को कुछ और मंज़ूर था। 17 जुलाई 1793 को उनकी मृत्यु के बाद, जोधपुर में गृहयुद्ध छिड़ गया। पुत्रों और पौत्रों के बीच सत्ता की भूख ने पूरे राज्य को हिला दिया। अंततः भीम सिंह ने सिंहासन पर कब्ज़ा कर लिया, लेकिन उसका शासन कमजोर रहा। इस उत्तराधिकार युद्ध ने मारवाड़ को कई दशकों तक राजनीतिक अस्थिरता में झोंक दिया।

महाराजा विजय सिंह की विरासत

आज भी मारवाड़ के इतिहास में विजय सिंह का नाम एक सुधारक और योद्धा राजा के रूप में लिया जाता है। उन्होंने संकटग्रस्त राज्य को संभालने की कोशिश की, प्रशासन को पुनर्गठित किया और सैन्य व्यवस्था को मजबूत किया। उनके शासनकाल में सामाजिक ढांचे में कई बदलाव आए, और प्रशासनिक नीतियों ने आगे चलकर जोधपुर राज्य को स्थिरता दी। हालांकि उनकी ज़िंदगी महल के अंदरूनी षड्यंत्रों और बाहरी संघर्षों से भरी रही, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी।

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भारतीय सिनेमा और टेलीविज़न की दुनिया में जब भी किसी ऐसे व्यक्ति की बात होती है जिसने अपने काम से इतिहास रचा, तो उनमें सब...
05/11/2025

भारतीय सिनेमा और टेलीविज़न की दुनिया में जब भी किसी ऐसे व्यक्ति की बात होती है जिसने अपने काम से इतिहास रचा, तो उनमें सबसे पहले नाम आता है बी.आर. चोपड़ा का — पूरा नाम बलदेव राज चोपड़ा। वो एक ऐसे निर्देशक और निर्माता थे जिन्होंने ना सिर्फ सिनेमा बल्कि भारतीय टीवी के इतिहास को भी बदल दिया। लेकिन क्या आप जानते हैं कि बी.आर. चोपड़ा का फिल्मी सफर कितनी मुश्किलों से गुज़रा था? उनकी पहली फिल्म की शुरुआत तो हुई लाहौर में, मगर खत्म नहीं हो सकी।

लाहौर से मुंबई तक का सफर – संघर्ष से शुरू हुई कहानी

1947 में उन्होंने अपनी पहली फिल्म ‘चांदनी चौक’ शुरू की थी। पर उसी दौरान लाहौर में दंगे भड़क उठे। हालात इतने बिगड़ गए कि फिल्म की शूटिंग रोकनी पड़ी। देश बंट चुका था, और उन्हें सबकुछ पीछे छोड़कर मुंबई आना पड़ा। यहीं से उनकी नई शुरुआत हुई। 1948 में उन्होंने ‘करवट’ नाम की फिल्म बनाई, लेकिन यह पूरी तरह फ्लॉप रही। उस वक्त शायद कोई सोच भी नहीं सकता था कि यही व्यक्ति आने वाले वक्त में महाभारत जैसे भव्य टीवी शो का निर्माता बनेगा।

‘अफसाना’ से सफलता, ‘नया दौर’ से पहचान

बी.आर. चोपड़ा ने हार नहीं मानी। 1951 में उन्होंने दिग्गज अभिनेता अशोक कुमार के साथ ‘अफसाना’ बनाई और यह उनकी पहली हिट फिल्म साबित हुई। इस सफलता के बाद उन्होंने 1955 में अपना प्रोडक्शन हाउस बी.आर. फिल्म्स शुरू किया। इस बैनर के तहत उनकी पहली फिल्म ‘नया दौर’ आई, जिसमें दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला मुख्य भूमिकाओं में थे। फिल्म सुपरहिट रही और यहीं से चोपड़ा साहब ने बॉलीवुड में अपनी मजबूत पहचान बनाई।

उनकी फिल्मों का चयन हमेशा समाज से जुड़ा होता था — ‘गुमराह’, ‘कानून’, ‘साधना’, ‘पति पत्नी और वो’, ‘हमराज’, ‘निकाह’ जैसी फिल्में आज भी अपनी थीम और प्रस्तुति के लिए याद की जाती हैं। 1998 में उन्हें उनके सिनेमा योगदान के लिए भारत सरकार ने दादा साहब फाल्के अवार्ड से सम्मानित किया।

‘महाभारत’ – वह धारावाहिक जिसने भारत को एक साथ बैठा दिया

1988 में जब महाभारत दूरदर्शन पर प्रसारित हुआ, तो पूरे देश की सड़कों पर सन्नाटा छा जाता था। गांव-शहर के लोग एक साथ टीवी के सामने बैठ जाते थे। उस दौर में हर रविवार सुबह जैसे देश एक हो जाता था। यह केवल एक टीवी शो नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और कला का संगम था। इसकी लागत करीब 9 करोड़ रुपये थी, जो उस समय बहुत बड़ी रकम मानी जाती थी।

लॉकडाउन के समय जब महाभारत दोबारा टीवी पर आई, तो टीआरपी के सारे रिकॉर्ड टूट गए। यह साबित हुआ कि बी.आर. चोपड़ा की रचना समय से परे है।

गोविंदा को मिला था ‘महाभारत’ का ऑफर

क्या आपको पता है कि बी.आर. चोपड़ा की महाभारत में अभिनेता गोविंदा को भी अभिमन्यु की भूमिका ऑफर हुई थी? लेकिन उन्होंने अपनी मां की इच्छा के कारण यह रोल ठुकरा दिया। बाद में यह किरदार किसी और अभिनेता को दिया गया। गोविंदा ने बाद में बताया कि जब उन्होंने इनकार किया तो चोपड़ा साहब गुस्सा हो गए थे, लेकिन उन्होंने अपनी मां की बात को सर्वोपरि रखा। यह वाकया बताता है कि उस दौर के कलाकारों में परिवार और मूल्यों की कितनी अहमियत थी।

जूही चावला ने ठुकराया था द्रौपदी का रोल

बी.आर. चोपड़ा की महाभारत के लिए पहले बॉलीवुड सितारों को कास्ट करने की योजना थी। द्रौपदी की भूमिका जूही चावला को ऑफर हुई थी, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। बाद में यह रोल रूपा गांगुली को मिला, जिन्होंने इसे अमर कर दिया।

‘महाभारत’ की मेकिंग के अनकहे किस्से

आपको जानकर हैरानी होगी कि इस सीरियल के लिए करीब 15,000 लोगों ने ऑडिशन दिया था। उनमें से सिर्फ 1,500 को स्क्रीन टेस्ट के लिए बुलाया गया। ज्यादातर कलाकार नए थे — बस राज बब्बर और देबाश्री रॉय जैसे कुछ चेहरे जाने-पहचाने थे। अर्जुन का रोल पहले जैकी श्रॉफ को देने का विचार था, पर बाद में फिरोज खान को यह भूमिका मिली, जो बाद में अपने किरदार के नाम से ही ‘अर्जुन’ कहलाए।

द्रौपदी के चीरहरण सीन में 250 मीटर लंबी साड़ी का प्रयोग हुआ था, जबकि रूपा गांगुली ने 6 मीटर की साड़ी पहनी थी। और माया महल वाले सीन में पानी के कुंड को असली नहीं, बल्कि थर्मोकोल पाउडर से बनाया गया था। इतने बारीकी से काम करने वाली टीम ने ही इस शो को अमर बना दिया।

महाभारत के पीछे मुस्लिम कथावाचक और गहरा शोध

बी.आर. चोपड़ा चाहते थे कि उनके शो में कथावाचक की आवाज़ मजबूत और प्रभावशाली हो। इसके लिए उन्होंने डॉ. राही मासूम रज़ा को चुना — जो एक मुस्लिम लेखक थे। उन्होंने अपने लेखन से साबित किया कि धर्म और कला की कोई सीमाएं नहीं होतीं। शोध टीम ने महाभारत पर आधारित कई भाषाओं की किताबें पढ़ीं, ताकि हर दृश्य में सटीकता रहे।

बी.आर. चोपड़ा की विरासत

बी.आर. चोपड़ा की आखिरी फिल्म ‘भूतनाथ’ थी। 5 नवंबर 2008 को मुंबई में उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी बनाई महाभारत और उनके फिल्मी योगदान ने उन्हें अमर कर दिया। आज भी जब लोग टीवी पर महाभारत देखते हैं, तो सिर्फ पात्र नहीं, बल्कि बी.आर. चोपड़ा की आत्मा महसूस करते हैं।

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हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर में कई चेहरे आए और गए, लेकिन कुछ ऐसे भी रहे जिनकी मौजूदगी पर्दे पर किसी जादू से कम नहीं थी। र...
05/11/2025

हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर में कई चेहरे आए और गए, लेकिन कुछ ऐसे भी रहे जिनकी मौजूदगी पर्दे पर किसी जादू से कम नहीं थी। रहमान उन्हीं में से एक थे — वो अभिनेता जिनके बारे में कहा जाता था कि “वो अपनी आंखों से अभिनय करते थे।” उनकी आंखों की गहराई में भावनाओं का सागर छलकता था। 1940 से लेकर 1970 के दशक तक, रहमान ने हिंदी फिल्मों को कई यादगार किरदार दिए। ‘प्यार की जीत’, ‘बड़ी बहन’, ‘परदेस’, ‘प्यासा’, ‘साहिब बीबी और गुलाम’ जैसी फिल्मों में उनका प्रदर्शन आज भी सिनेमा प्रेमियों के दिलों में जिंदा है।

लाहौर की गलियों से शुरू हुई एक नई उड़ान

23 जून 1921 को लाहौर की रॉयल पश्तून फैमिली में जन्मे रहमान का जीवन शुरू से ही संघर्ष और सपनों से भरा था। वो पढ़ाई में भी बेहतरीन थे और शुरुआती दिनों में उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन वो फिल्मी पर्दे का हिस्सा बनेंगे। कॉलेज खत्म करने के बाद उन्होंने इंडियन एयरफोर्स में बतौर पायलट ट्रेनिंग ली और नौकरी भी मिल गई। उस दौर में एयरफोर्स का हिस्सा बनना किसी सपने से कम नहीं था। लेकिन रहमान का सपना कुछ और था — वो अपने भीतर छिपे कलाकार को उड़ान देना चाहते थे।

जब आसमान छोड़ा, एक्टिंग का आसरा चुना

एयरफोर्स में नौकरी करने के बावजूद रहमान का मन वहां नहीं टिक पाया। उनके अंदर फिल्मों की दुनिया का आकर्षण बढ़ता गया। कहा जाता है कि उनकी कद-काठी, तेज आवाज और सलीकेदार व्यक्तित्व ने उन्हें हमेशा महसूस कराया कि वो पर्दे पर चमकने के लिए ही बने हैं। एक दिन उन्होंने एक बड़ा फैसला लिया — उन्होंने एयरफोर्स की सुरक्षित नौकरी छोड़ दी और मुंबई का रुख किया। 1940 के दशक की मुंबई (तब बॉम्बे) में फिल्मों की दुनिया का ग्लैमर हर किसी को खींचता था, लेकिन रहमान यहां अभिनय के जुनून के साथ आए थे।

तीसरे असिस्टेंट से हीरो बनने की अनोखी कहानी

मुंबई पहुंचकर रहमान ने डायरेक्टर विश्राम बेडेकर के साथ बतौर थर्ड असिस्टेंट डायरेक्टर काम शुरू किया। लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था। एक दिन विश्राम बेडेकर अपनी फिल्म के लिए ऐसे व्यक्ति की तलाश में थे जो पश्तूनी पगड़ी बांध सके। रहमान खुद पश्तून थे, उन्हें यह कला बखूबी आती थी। यही छोटी सी बात उनके लिए बड़ा मौका बन गई। बेडेकर ने रहमान को स्क्रीन टेस्ट के लिए बुलाया और उनकी शख्सियत देखते ही फिल्म में ले लिया। यहीं से रहमान के एक्टिंग करियर की शुरुआत हुई — एक ऐसी शुरुआत, जिसने हिंदी सिनेमा को एक शानदार अभिनेता दिया।

पर्दे पर अभिनय नहीं, एहसास बन गए रहमान

रहमान के अभिनय में एक सादगी थी, एक गहराई थी। उनकी आंखों से भाव निकलते थे और आवाज में जादू था। गुरुदत्त की फिल्मों में उनका काम आज भी मिसाल है। ‘प्यासा’, ‘साहिब बीबी और गुलाम’, ‘चौदहवीं का चांद’ और ‘वक्त’ जैसी फिल्मों में उन्होंने ऐसे किरदार निभाए जो आज भी लोगों को याद हैं। पर्दे पर उनकी मौजूदगी में एक शालीनता थी, जो उन्हें अपने दौर के बाकी अभिनेताओं से अलग करती थी।

प्यार, दिल टूटना और अधूरी चाहतें

कहा जाता है कि फिल्मों की शूटिंग के दौरान रहमान को मशहूर अभिनेत्री सुरैया से प्यार हो गया था। उनकी मासूमियत और आवाज ने सुरैया का ध्यान खींचा, लेकिन किस्मत फिर से रहमान के खिलाफ थी। सुरैया का दिल पहले ही देव आनंद के लिए धड़कता था। रहमान ने अपने दिल की बात कभी ज़ोर से नहीं कही, लेकिन ये अधूरी मोहब्बत उनके जीवन की एक खामोश कहानी बन गई।

जब जादुई आवाज ने भी साथ छोड़ दिया

रहमान की पहचान सिर्फ उनके अभिनय से नहीं, बल्कि उनकी आवाज से भी थी। उस आवाज में एक मिठास, एक वजन था, जो हर डायलॉग को जीवंत बना देता था। लेकिन वक्त ने उनके साथ क्रूर मज़ाक किया। 1977 तक रहमान तीन हार्ट अटैक झेल चुके थे। इसके बाद उन्हें गले का कैंसर हो गया — जिसकी बड़ी वजह थी उनकी शराब की आदत। इस बीमारी ने उनकी आवाज छीन ली। जो व्यक्ति अपनी आवाज से लाखों दिलों को जीतता था, वही अंत में बोल तक नहीं सका।

वो खामोशी जो हमेशा गूंजती रहेगी

लंबी बीमारी से जूझते हुए 5 नवंबर 1984 को रहमान ने दुनिया को अलविदा कह दिया। वो अपने आखिरी दिनों में बिल्कुल खामोश हो चुके थे — उनकी वही जादुई आवाज, जिसने उन्हें पहचान दी थी, उनके साथ नहीं रही। रहमान का अंत जितना दर्दनाक था, उनका सफर उतना ही प्रेरणादायक। उन्होंने आसमान की ऊंचाइयों से उतरकर फिल्मों की दुनिया में नई उड़ान भरी थी।

एक ऐसा कलाकार जो आज भी याद किया जाता है

रहमान सिर्फ एक अभिनेता नहीं थे, वो उस दौर के सिनेमा की आत्मा थे। उनकी आंखों का जादू, उनकी आवाज की मिठास और उनकी शालीनता आज भी हिंदी सिनेमा की पहचान है। Old is Gold Films के सुनहरे पन्नों में रहमान का नाम हमेशा उसी गरिमा के साथ दर्ज रहेगा, जैसे वो पर्दे पर दिखते थे — शांत, सजीले और सम्मोहक।

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04/11/2025

क्या आपने कभी सोचा है कि इंसान कंप्यूटर से तेज़ कैसे सोच सकता है? 1960 के दशक में भारत की एक महिला ने दुनिया को हैरान कर दिया था — शकुंतला देवी। जिन्हें "ह्यूमन कंप्यूटर" कहा गया, वो सिर्फ गणित नहीं सुलझाती थीं, वो संख्याओं से खेलती थीं। बिना कैलकुलेटर, बिना कंप्यूटर, सिर्फ अपने दिमाग की शक्ति से उन्होंने ऐसे-ऐसे गणितीय सवाल हल किए जिनमें मशीनें भी फेल हो गईं।

आखिर कैसे करती थीं वो ये कमाल? क्या उनका दिमाग सच में सामान्य नहीं था या इसके पीछे कोई गहरा रहस्य छिपा है? जानिए उनकी अद्भुत कहानी, जो आपको सोचने पर मजबूर कर देगी कि इंसान की असली सीमा आखिर कहाँ तक है।

कथक का इतिहास अधूरा रह जाएगा यदि उसमें शंभू महाराज का नाम न लिया जाए। लखनऊ घराने के इस महान कलाकार ने कथक को जो ऊँचाई दी...
04/11/2025

कथक का इतिहास अधूरा रह जाएगा यदि उसमें शंभू महाराज का नाम न लिया जाए। लखनऊ घराने के इस महान कलाकार ने कथक को जो ऊँचाई दी, वह आने वाले युगों तक स्मरणीय रहेगी। उनका नाम सुनते ही आज भी ताल, भाव और नज़ाकत का संगम याद आ जाता है। कहा जाता है कि शंभू महाराज का जन्म 1912 में हुआ, परंतु कथक केंद्र द्वारा 2004 में उनका शताब्दी वर्ष मनाए जाने से स्पष्ट होता है कि वे संभवतः 1904 में जन्मे थे। उनके भतीजे गुरु मुन्‍नालाल शुक्ल भी यही मानते हैं। उनका पहला सार्वजनिक प्रदर्शन 1926 में लखनऊ के ऑल इंडिया म्यूज़िक कॉन्फ़्रेंस में हुआ था—यह कोई साधारण अवसर नहीं था, बल्कि उस समय का सबसे प्रतिष्ठित मंच था। इतनी कम उम्र में इस मंच पर आना बताता है कि वे किशोर नहीं, बल्कि यौवन की दहलीज़ पर थे। इसलिए 1912 की बजाय 1904 ही अधिक सत्य प्रतीत होता है।
दिल्ली की ओर यात्रा और कला की नई शुरुआत
1955 में संगीत नाटक अकादमी की संस्थापक सचिव निर्मला जोशी (कुछ स्रोतों में कपिला वात्स्यायन का नाम मिलता है) के निमंत्रण पर शंभू महाराज दिल्ली आ गए। यहाँ उन्होंने सुमित्रा चारत राम द्वारा स्थापित श्रीराम भारती कला केंद्र में कथक सिखाना प्रारंभ किया। यह वह समय था जब दिल्ली की सांस्कृतिक भूमि पर नई कलात्मक चेतना अंकुरित हो रही थी, और शंभू महाराज ने अपनी कला से उसे दिशा दी।
कला की विरासत और बचपन की कहानियाँ
शंभू महाराज का परिवार स्वयं एक संगीत-नृत्य परंपरा था। उनके पिता कल्का प्रसाद तबले के उस्ताद थे, और उनके बड़े चाचा बिंदादीन, जिन्हें 'नटवर कृष्ण' कहा जाता था, कथक के सच्चे जादूगर थे। मंच पर आते ही बिंदादीन, कृष्ण का रूप धारण कर लेते—कभी प्रेमी, कभी शरारती, तो कभी उद्धारक। बिंदादीन ने विवाह नहीं किया, पर एक रियासत की बेगम उनकी मुख्य संरक्षक थीं। कहा जाता है जब वे उनसे विदा हुए तो हीरे-मोती से लदे लौटे, लेकिन उनकी असली विरासत थी 150 से अधिक ठुमरियों की रचना। दुर्भाग्य से जब शंभू केवल 10 वर्ष के थे, तभी बिंदादीन का देहांत हो गया। पिता पहले ही दो वर्ष की अवस्था में गुजर चुके थे।
अच्छन महाराज का प्रभाव और नवयुवक शंभू की साधना
बिंदादीन से सर्वाधिक सीखने वाले उनके भतीजे अच्छन महाराज (जो बिरजू महाराज के पिता थे) बने, जिन्होंने आगे चलकर शंभू और लच्छू महाराज को प्रशिक्षित किया। अच्छन महाराज का शंभू पर गहरा प्रभाव था। जब अच्छन को रामपुर दरबार में नवाब हामिद अली खान के दरबारी नर्तक के रूप में आमंत्रित किया गया, तो शंभू भी उनके साथ गए। वहाँ उन्होंने मोहम्मद अली खान, हैदर खान, मुश्ताक हुसैन खान, अहमद जान थिरकवा और फिदा हुसैन खान जैसे महान कलाकारों से सान्निध्य प्राप्त किया। लखनऊ लौटने पर शंभू अक्सर अपने भाई के साथ तबला बजाते थे—कभी वे तबला बजाते, कभी अच्छन।
पहला मंच और पहचान की शुरुआत
1926 का वह साल कथक के इतिहास में दर्ज है, जब युवा शंभू महाराज ने लखनऊ में ऑल इंडिया म्यूज़िक कॉन्फ़्रेंस में अपने नृत्य से सबका मन मोह लिया। उनकी तैयारी और निपुणता देखकर उन्हें स्वर्ण पदक मिला। इसके बाद तो उन्हें लगातार मंच मिलने लगे और कथक की दुनिया में उनका नाम चमक उठा।
भाव का महारथी – जब कथक बना कविता का रूप
लखनऊ घराना सदैव भाव पर केंद्रित रहा है। बिंदादीन और अच्छन महाराज की तरह शंभू महाराज भी भाव के उस्ताद थे। परंतु उनकी प्रेरणा का स्रोत थे दिल्ली घराने के नसीर खान। वे उनके अंतरंग मित्र थे और शंभू महाराज अक्सर उन्हीं की ठुमरियों पर नृत्य करते। उनका मानना था कि बिंदादीन की ठुमरियाँ मध्यम लय में बेहतर होती हैं, पर उनमें ‘भाव का विस्तार’ सीमित था। इसलिए उन्होंने एक नई शैली विकसित की—बैठकर नृत्य करने की, जिससे नृत्य में सौंदर्य और भावनात्मक गहराई दोनों बढ़ गए। उन्हें ध्रुपद शैली बहुत कठोर और औपचारिक लगती थी—“वह नृत्य नहीं, मार्चिंग की ताल लगती है,” वे कहते थे।
कथक और शंभू महाराज का दृष्टिकोण
1957 में दिल्ली में एक सम्मेलन में उन्होंने अपनी शिष्या माया राव के साथ बिंदादीन की ठुमरी ‘निरतत धंग’ पर युगल नृत्य किया। माया राव ने उन्हें ‘कथक थ्रू द एजेज़’ नामक बैले में भी शामिल किया, पर वे कहते थे—“कथक एक व्यक्तिगत कला है, इसे सामूहिक रूप में प्रस्तुत करना इसके सौंदर्य को कम कर देता है।” उनका मानना था कि आजकल नृत्य में ‘सहनशक्ति’ को कला का मापदंड बना दिया गया है—“अगर कोई 10 घंटे नाचे तो दूसरा 12, पर क्या यही कला है?” वे कहते, “जब मैं मरूँगा, कथक का एक युग समाप्त होगा। जो कथक मैं नाचता हूँ, वह कविता, स्त्रियों और मदिरा की उस नशीली दुनिया से उपजा है—और वह अब खो चुकी है।”
अंतिम दिवस और अमर विरासत
4 नवंबर 1970 को दिल्ली में गले के कैंसर से शंभू महाराज का निधन हुआ। उनके अंतिम क्षणों में उनके भतीजे बिरजू महाराज सहित उनके शिष्य मौजूद थे। उनकी कला आज भी जीवित है—माया राव, उमा शर्मा, कुमुदिनी लाखिया, बेला अर्नब और उनके पुत्र राम तथा किशन मोहन के माध्यम से। कथक की हर ताल, हर मुद्राओं में आज भी उनका प्रभाव झलकता है। वे केवल नर्तक नहीं थे, वे ‘नृत्य सम्राट’ थे—और यह उपाधि उन्हें सदा के लिए अमर करती है।

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04/11/2025

“दान में पति नहीं चाहिए…” — ये एक वाक्य सुनने में हल्का लगता है, मगर इसके पीछे निम्मी की वो कहानी है जो आज तक अनकही रही। दिलीप कुमार और मधुबाला की प्रेमकथा तो हर कोई जानता है, लेकिन निम्मी का नाम इस कहानी में उतना ही गहराई से जुड़ा था।

कहा जाता है, निम्मी दिलीप साहब से बेइंतेहा मोहब्बत करती थीं, मगर जब उन्हें अहसास हुआ कि दिलीप का दिल किसी और के लिए धड़कता है, तो उन्होंने चुपचाप अपने एहसास दफन कर दिए। ये कहानी है उस अदाकारा की, जिसने प्यार में सब कुछ खो दिया, लेकिन अपनी गरिमा नहीं। क्या निम्मी की ये चुप्पी त्याग थी या मजबूरी? देखिए पूरी सच्चाई इस वीडियो में।

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