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"तुम मेरे साथ रहकर फिल्मों में फाइटर का काम करोगे। लेकिन ध्यान रखना। फिल्मों में फाइटिंग करना कई दफा काफी खतरनाक हो जाता...
23/10/2025

"तुम मेरे साथ रहकर फिल्मों में फाइटर का काम करोगे। लेकिन ध्यान रखना। फिल्मों में फाइटिंग करना कई दफा काफी खतरनाक हो जाता है। इसलिए सोच-समझकर ही कोई फैसला लेना।" एम.बी. शेट्टी साहब ने ये बात बिल्ला से कही थी। आज बिल्ला का जन्मदिन है। बिल्ला यानि माणिक ईरानी। अब ये इस दुनिया में न हीं हैं(आपको तो पता ही होगा।) लेकिन इनकी कहानी हमेशा रहेगी। किस्सा टीवी के पुराने साथी इनकी कहानी से वाकिफ़ होंगे। क्योंकि कई बार हम इनकी कहानी कह चुके हैं इस पेज के माध्यम से। नए साथियों के लिए एक बार फिर से पेश है बिल्ला की कहानी।

23 अक्टूबर 1953 को माणिक ईरानी मुंबई में पैदा हुए थे। ये पारसी थे। और स्ट्रीट बॉक्सर थे। स्ट्रीट बॉक्सिंग में बढ़िया नाम था इनका। स्ट्रीट बॉक्सिंग ने ही इन्हें फ़िल्मी दुनिया तक पहुंचाया था। जैसा कि शुरुआत में बताया गया है कि रोहित शेट्टी के पिता एम.बी. शेट्टी साहब थे जो माणिक ईरानी को फ़िल्मों तक लाए थे। पहले तो बतौर स्टंटमैन माणिक ईरानी ने फ़िल्मों में काम किया। फिर बॉडी डबल की हैसियत से। अमिताभ बच्चन के कई स्टंट्स माणिक जी ने ही किए थे। जैसे की फ़िल्म डॉन। डॉन में माणिक ने अमिताभ बच्चन के बॉडी डबल की हैसियत से काम किया था। और बाद में ये लोकल गुंडे के छोटे-मोटे किरदारों में नज़र आने लगे।

माणिक ईरानी के बारे में बहुत कुछ है जो आपको एज़ ए सिने लवर जानाना चाहिए। इनकी विस्तृत बायोग्राफ़ी इस लेख में आप पढ़ सकते हैं- https://shorturl.at/2PTfK यूं तो अपने करियर में माणिक ईरानी ने अधिकतर गुंडे-बदमाश के किरदार निभाए थे। मगर चंद फ़िल्में ऐसी भी रही हैं जिनमें माणिक ईरानी शरीफ़ इंसान के किरदारों में भी नज़र आए थे। वो फ़िल्में कौन सी थी? इस लेख में आपको जानने को मिलेगा। माणिक ईरानी के बेटे ने गोविंदा की किस मशहूर फ़िल्म में काम किया था? और इनके बेटे की मृत्यु कैसे हुई थी? ये भी आपको इस लेख में जानने को मिलेगा। व माणिक ईरानी के बारे में और कुछ रोचक बातें भी आपको पता चलेंगी इस लेख के माध्यम से। इसलिए ज़रूर पढ़िएगा। माणिक ईरानी जी को ससम्मान याद करते हुए किस्सा टीवी उन्हें नमन करता है।

ये साल 1954-55 के दौरान का किस्सा है। जयपुर में ऑल इंडिया रेडियो का स्टेशन तब शुरू ही हुआ था। उन दिनों असरानी साहब स्कूल...
20/10/2025

ये साल 1954-55 के दौरान का किस्सा है। जयपुर में ऑल इंडिया रेडियो का स्टेशन तब शुरू ही हुआ था। उन दिनों असरानी साहब स्कूल में थे। बच्चों के एक प्रोग्राम की शुरुआत होनी थी जिसके लिए दिल्ली से ऑल इंडिया रेडियो की एक टीम जयपुर आई थी। असरानी को भी वहां जाने का मौका मिला। असरानी साहब भी बच्चों के उस प्रोग्राम के लिए ऑडिशन देने पहुंचे थे। लेकिन दिल्ली की टीम ने असरानी साहब को देखते ही रिजेक्ट कर दिया। और जानते हैं क्यों रिजेक्ट किया था? क्योंकि उस वक्त असरानी जी के नाखून काफी बढ़े हुए थे।

असरानी साहब को हैरत हुई। उन्हें समझ में नहीं आया कि बिना उनसे कुछ बुलवाए, बिना कुछ पढ़वाए ही उन्हें रिजेक्ट कर दिया। और वजह बता रहे हैं कि नाखून बढ़ रहे हैं। असरानी साहब से अगले दिन नाखून काटकर आने को कहा गया। घर पहुंचकर ये यही सोचते रहे कि नाखून बढ़ने की वजह से उन्हें क्यों रिजेक्ट किया गया? खैर, अगले दिन नाखून काटकर, जूतों को पॉलिश करके और स्कूल ड्रैस को बढ़िया से इस्त्री कराकर असरानी साहब फिर से ऑल इंडिया रेडियो स्टेशन पहुंचे। उन्हें देखते ही ऑडिशन लेने वाली टीम खुश हो गई।

और तब उन्हें बताया कि 'स्टूडियो में जो बच्चे जाएंगे उन्हें खुद को प्रोपर तरीके से साफ रखना होता है।' फिर वक्त आया असरानी साहब के ऑडिशन का। असरानी से पूछा गया कि तुम क्या-क्या करते हो? गाना गाते हो या डांस करते हो। या एक्टिंग करते हो। असरानी ने जवाब दिया कि मैं तो सब करता हूं। तब इनसे गाना सुनाने को कहा। उस ज़माने में नागिन (1954) फिल्म के गीत बड़े लोकप्रिय हो रहे थे। खासतौर पर वो गीत जिसके बोल थे 'मन डोले मेरा तन डोले।' असरानी साहब ने जब वो गाना गाया तो इनसे कहा गया कि गाना तो तुम रहने दो। गाने में तो तुम्हारी आवाज़ नहीं जमेगी।

तब असरानी साहब ने उन्हें एक पैसेज पढ़कर सुनाया। और इनके पढ़ने का अंदाज़ उन्हें यूनीक लगा। इन्हें सिलेक्ट कर लिया गया। बच्चों का एक नाटक शुरू हुआ जिसमें असरानी साहब को एक बड़ा ही अनोखा किरदार दिया गया। उस किरदार का नाम था चोंच। एक ऐसा बच्चा जो हर मामले में अपनी चोंच घुसाता था। असरानी साहब आवाज़ पतली करके अपने डायलॉग्स बोला करते थे। वो किरदार बहुत लोकप्रिय हुआ। इतना लोकप्रिय की आकाशवाणी जयपुर ने उस नाटक को लाइव आयोजित भी किया। और चोंच का किरदार उसमें विशेष तौर पर रखा गया। यानि वास्तव में वहां से असरानी साहब का अभिनय सफर शुरु हुआ था।

असरानी साहब को उस वक्त आकाशवाणी जयपुर की तरफ से कुछ पैसे भी मिला करते थे। शुरुआती अमाउंट था पांच रुपए। जो ठीक-ठाक था उस वक्त। असरानी साहब बताते हैं कि उस दौर में इनकी स्कूल फीस एक रुपए महीना थी। ऐसे में ये चार रुपए बचा लिया करते थे। बकौल असरानी, रेडियो स्टेशन ने उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया। वक्त गुज़रा और असरानी बच्चों के नाटकों के बाद बड़े नाटकों में भी अपनी आवाज़ देने लगे। समय के साथ असरानी साहब का मेहनताना भी बढ़ा। और अपने मेहनताने से उन्होंने जो सेविंग्स की थी उससे ही उन्होंने फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया में दाखिला लिया था।

असरानी साहब आज चले गए साथियों। 20 अक्टूबर 2025 को दिवाली के दिन असरानी जी का देहांत हो गया। ईश्वर असरानी जी को अपने सदचरणों में स्थान दें। असरानी जी को किस्सा टीवी का नमन। शत शत नमन।

साल 1971 की बात है। सनी देओल के दादा केवल किशन सिंह देओल अमृतसर जा रहे थे। रास्ते में ही उनके छोटे बेटे अजीत सिंह देओल क...
20/10/2025

साल 1971 की बात है। सनी देओल के दादा केवल किशन सिंह देओल अमृतसर जा रहे थे। रास्ते में ही उनके छोटे बेटे अजीत सिंह देओल की ससुराल पड़ी तो केवल किशन वहां रुक गए। अजीत देओल की ससुराल में ही केवल किशन जी को एक बड़ी प्यारी सी लड़की की तस्वीर दिखी। केवल किशन जी को तस्वीर वाली वो लड़की बहुत पसंद आई। उन्होंने उसके बारे में पूछताछ की तो पता चला कि ये लड़की लंदन में रहती है और इसकी जड़ें भारत से ही जुड़ी हैं।

केवल किशन जी ने सोच लिया कि जब सनी शादी के लायक हो जाएंगे तो वो इसी लड़की से सनी की शादी कराने का प्रयास करेंगे। और फिर अगले ही साल, यानि 1972 में केवल किशन देओल लंदन में छुट्टियां बिताने चले गए। वहां उन्होंने उस लड़की के घरवालों से मुलाकात की और अपने पोते सनी से उसकी शादी की बात पक्की कर ली। उस लड़की का नाम था लिंडा माहल। जिन्हें आज हम पूजा देओल के नाम से जानते हैं। लिंडा को पूजा नाम देने वाले भी सनी के दादा केवल किशन सिंह देओल ही थे।

साथियों आज हमारे सनी पाजी का जन्मदिन है। सनी पाजी आज 68 साल के हो गए हैं। 19 अक्टूबर 1957 को सनी देओल साहब का जन्म हुआ था। और सनी का जन्म क्या हुआ, धर्मेंद्र जी की किस्मत खुल गई। वो एक्टर बन गए। और धीरे-धीरे एक कामयाब फ़िल्मस्टार भी बन गए। जबकी सनी के पैदा सोने से पहले भी धरम जी एक बार एक्टर बनने मुंबई आए थे। मगर तब उन्हें वापस लौट जाना पड़ा था निराश होकर। इसलिए धरम जी अपने बेटे सनी को अपने लिए बहुत भाग्यशाली मानते हैं।

सनी पाजी की एक और रोचक कहानी जानिए। 90s में जब सनी देओल का करियर पीक पर था तब सनी देओल एक फिल्म के लिए 70 लाख रुपए चार्ज किया करते थे। अगर 2022-23 में महंगाई दर के साथ एडजस्ट करके देखें तो ये रकम 2 करोड़ 90 लाख रुपए बैठती है। उसी दौर में अमिताभ बच्चन एक फिल्म के लिए लगभग ढाई करोड़ रुपए चार्ज करते थे। पर चूंकि उस ज़माने में अमिताभ बच्चन बहुत कम फिल्मों में और सनी देओल ढेर सारी फिल्मों में काम कर रहे थे तो ऑटोमैटिकली सनी देओल उस वक्त सालाना कमाई के मामले में बॉलीवुड के सबसे बड़े स्टार थे।

सनी देओल को जन्मदिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

एक बेहतरीन फ़िल्म जो बॉक्स ऑफ़िस पर कुछ खास प्रदर्शन नहीं कर पाई थी। बहुत अधिक लोगों ने ये फ़िल्म सिनेमाघरों में देखी ही...
19/10/2025

एक बेहतरीन फ़िल्म जो बॉक्स ऑफ़िस पर कुछ खास प्रदर्शन नहीं कर पाई थी। बहुत अधिक लोगों ने ये फ़िल्म सिनेमाघरों में देखी ही नहीं। मगर बॉस, जब टेलिविज़न पर ये फ़िल्म आई तो कमाल हो गया। बहुत पसंद की गई ये फ़िल्म। कहने वाले इसे कल्ट रोमांटिक फ़िल्म भी कहते हैं अब। रहना है तेरे दिल में। आज 24 साल पूरे हो गए हैं इस फ़िल्म के। 19 अक्टूबर 2001 को ये फ़िल्म रिलीज़ हुई थी। बॉक्स ऑफ़िस इंडिया के अनुसार, इस फ़िल्म का बजट छह करोड़ रुपए था। और नेट कलैक्शन किया था इस फ़िल्म ने लगभग साढ़े पांच करोड़ रुपए। और ये फ़िल्म फ्लॉप हो गई थी। हालांकि कुछ जगहों पर इसे बिलॉ एवरेज भी बताया जाता है।

गौतम वसुदेव मेनन इस फ़िल्म के डायरेक्टर थे। उन्हीं की तमिल फ़िल्म मिन्नाले का रीमेक थी रहना है तेरे दिल में, जिसे शॉर्ट में RHTDM भी कहा जाता है। तमिल में ये फ़िल्म बहुत कामयाब रही थी। तमिल वर्ज़न में भी मुख्य भूमिका आर. माधवन ने ही निभाई थी। हिंदी वर्ज़न में आर. माधवन के अपोज़िट दिया मिर्ज़ा थी। ये दिया मिर्ज़ा की डेब्यू फ़िल्म थी। आर. माधवन की भी एज़ ए फुल फ्लैज्ड एक्टर ये पहली हिंदी फ़िल्म थी। इससे पहले साल 1996 में आई फ़िल्म 'इस रात की सुबह नहीं' में माधवन एक गाने में नज़र आए थे।

RHTDM फ़िल्म का म्यूज़िक भी बहुत प्यारा है। म्यूज़िक कंपोज़ किया था इस फ़िल्म का हरीश जयराज ने। उन्होंने ही तमिल वर्ज़न का भी म्यूज़िक कंपोज़ किया था। इस फ़िल्म का गीत 'ज़रा ज़रा' बहुत खूबसूरत है। बॉम्बे जयश्री जी ने ये गाना गाया है। और रोचक बात ये है कि बॉम्बे जयश्री जी ने तमिल व तेलुगू में भी ये गाना गाया है। आप कभी यूट्यूब पर सुनिएगा तमिल और तेलुगू वर्ज़न इस गाने के। वो भी बहुत सुकून देने वाले फ़ील होते हैं। भले ही समझ में कुछ ना आए। यही तो संगीत की ताक़त होती है।

IMDB पर बताया गया है कि इस फ़िल्म के प्रोड्यूसर इसका नाम कोई मिल गया रखना चाहते थे। और वो लगभग इस नाम को फ़ाइनल कर चुके थे। मगर जब उन्हें बड़ी हैरानी हुई जब ये बात उन्हें पता चली की कोई मिल गया टाइटल के राइट्स तो राकेश रोशन के पास हैं। और राकेश रोशन अपनी फ़िल्म पर काम शुरू भी कर चुके हैं। आखिरकार वासू भगनानी ने अपनी इस फ़िल्म का दूसरा नाम सोचना शुरू कर दिया। अपनी टीम के साथ काफ़ी ब्रेन स्टोर्मिंग की। और आखिरकार इस फ़िल्म का नाम तय हुआ 'रहना है तेरे दिल में।'

जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है, रहना है तेरे दिल में फ़िल्म एक्ट्रेस दिया मिर्ज़ा की डेब्यू फ़िल्म थी। दिया मिर्ज़ा को ये फ़िल्म तब मिली थी जब उन्होंने साल 2000 में मिस एशिया पैसेफ़िक का खिताब जीता था। उस वक्त दिया मिर्ज़ा का बहुत चर्चा हो रहा था मीडिया में। तो प्रोड्यूसर वासू भगनानी ने दिया मिर्जा़ को इस फ़िल्म में कास्ट करने का फ़ैसला किया। और दिया मिर्ज़ा ने भी एक कुशल अदाकारा की तरह रीना मल्होत्रा का किरदार निभाया। मगर ये बात बहुत लोगों को नहीं पता है कि दिया मिर्ज़ा से पहले इस फ़िल्म में काम करने के लिए एक्ट्रेस रिचा पलोड से भी बात की गई थी। लेकिन रिचा पलोट उस वक्त एक दूसरे प्रोजेक्ट में व्यस्त थी। तो उन्होंने इस फ़िल्म में काम करने से इन्कार कर दिया। तब ये फ़िल्म दिया मिर्ज़ा को मिली थी। वैसे ये भी बताना ज़रूरी है यहां कि बहुत लोगों ने दिया मिर्ज़ा की एक्टिंग को पसंद नहीं किया था। उन्हें क्रिटिसाइज़ किया था।

रहना है तेरे दिल में फ़िल्म से जुड़ा एक रोचक तथ्य ये भी है कि इसमें वासू भगनानी के बेटे जैकी भगनानी की भी एक झलक दिखाई दी है। फ़िल्म का वो सीन याद कीजिए जब माधवन दिया मिर्ज़ा के घर पर ढेर सारे फूल भिजवाते हैं। और कई सारे डिलीवरी बॉयज़ उनके घर पर फूल पहुंचाने आते हैं। उन डिलिवरी बॉयज़ में से एक थे जैकी भगनानी। जैकी भगनानी ने एक बार सोशल मीडिया के माध्यम से बताया था कि वो इस फ़िल्म से बतौर असिस्टेंट जुड़े थे। ये उनका पहला फ़िल्म प्रोजेक्ट था। और तब उनकी उम्र मात्र 15 साल थी। ये जैकी भगनानी ने खुद बताया है। लेकिन अगर आप गूगल पर जैकी भगनानी इन RHTDM सर्च करेंगे तो आपको जैकी की जो तस्वीर दिखाई देगी उसे देखकर लगता नहीं है कि जैकी तब 15 साल के रहे होंगे।

आज जानिए पुरानी वाली "बड़े मियां छोटे मियां" फिल्म से जुड़ी कुछ रोचक और अनसुनी बातें। डेविड धवन के डायरेक्शन में बनी "बड...
16/10/2025

आज जानिए पुरानी वाली "बड़े मियां छोटे मियां" फिल्म से जुड़ी कुछ रोचक और अनसुनी बातें। डेविड धवन के डायरेक्शन में बनी "बड़े मियां छोटे मियां" 16 अक्टूबर 1998 के दिन रिलीज़ हुई थी। यानि आज इस फिल्म के 27 साल पूरे हो गए हैं। गोविंदा और अमिताभ बच्चन की डबल जोड़ी वाली ये फिल्म दर्शकों को बेहद पसंद आई थी। खासतौर पर छोटे शहरों के दर्शकों का इस फिल्म ने बहुत मनोरंजन किया था। ये फिल्म वासू भगनानी ने प्रोड्यूस की थी। और इसकी स्टोरी, स्क्रीनप्ले व डायलॉग्स रूमी जाफरी ने लिखे थे। फिल्म का संगीत दिया था विजू शाह ने और सभी गीत लिखे थे समीर ने। फिल्म का गीत-संगीत काफी हिट रहा था।

फिल्म के प्रमुख कलाकारों की बात करें तो अमिताभ व गोविंदा के अलावा रवीना टंडन, राम्या कृष्णन, अनुपम खेर, परेश रावल, सतीश कौशिक, शरत सक्सेना, महावीर शाह, कादर खान, सुषमा सेठ, दिव्या दत्ता, असरानी, राकेश बेदी, अवतार गिल, रज़ाक खान, शहज़ाद खान, टीकू तल्सानिया, मनमौजी व विजू खोटे इस फिल्म में नज़र आए थे। जबकी माधुरी दीक्षित ने भी एक गाने में इस फिल्म में परफॉर्मेंस किया था जिसमें वो अमिताभ बच्चन और गोविंदा के साथ थिटरकी-ठुमकती नज़र आई थी। पूरे करियर में अमिताभ बच्चन व माधुरी दीक्षित इसके अलावा कभी किसी फिल्म के दृश्य में साथ नहीं दिखे हैं।

चलिए अब "बड़े मियां छोटे मियां" फिल्म से जुड़ी कुछ रोचक बातें भी जान लेते हैं। विकीपीडिया की लिस्ट के मुताबिक, साल 1998 की चौथी सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्म थी बड़े मियां छोटे मियां। सैकनिल्क डॉट कॉम के अनुसार, लगभग 10 करोड़ रुपए के बजट में बनी इस फिल्म ने तकरीबन 19 करोड़ 05 लाख रुपए का नेट कलैक्शन किया था। 1998 की सर्वाधिक कमाई करने वाली फिल्मों की लिस्ट में पहले नंबर पर करण जौहर की "कुछ-कुछ होता है" रही थी जिसने 14 करोड़ रुपए के बजट में 46 करोड़ 88 लाख रुपए का ताबड़तोड़ कलैक्शन किया था।

इत्तेफाक से "कुछ कुछ होता है" भी उसी दिन रिलीज़ हुई थी जिस दिन "बड़े मियां छोटे मियां" रिलीज़ हुई थी। यानि 16 अक्टूबर 1998 को। आज आपको "कुछ कुछ होता है" फिल्म की अनसुनी कहानियां भी किस्सा टीवी पर ज़रूर पढ़ने को मिलेंगी। 1998 की दूसरी सर्वाधिक कमाई करने वाली फिल्म थी बॉबी देओल की सोल्जर जिसने 8 करोड़ रुपए के बजट में 21 करोड़ 23 लाख रुपए कमाए थे। जबकी तीसरे स्थान पर रही थी अजय देवगन की प्यार तो होना ही था जिसने 7 करोड़ 50 लाख रुपए के बजट में 21 करोड़ 52 लाख रुपए बॉक्स ऑफिस पर कलैक्ट किए थे। "बड़े मियां छोटे मियां"से नीचे यानि पांचवे स्थान पर उस साल सलमान खान की प्यार किया तो डरना क्या रही थी जिसने 8 करोड़ रुपए के बजट में 18 करोड़ 03 लाख रुपए का कलैक्शन किया था।

इस फिल्म में एक दृश्य है जिसमें देहात से आए अमिताभ-गोविंदा शराफत अली को लॉक-अप से छुड़ाने के लिए पुलिस वाले बनकर थाने पहुंच जाते हैं। और फिर वहां थाने के बाकी पुलिसकर्मियों को अपनी बहादुरी के फर्ज़ी किस्से सुनाते हैं। फिल्म में ये सीन "हमसा हो तो सामने आए" नाम के एक पाकिस्तानी स्टेज ड्रामा से हूबहू कॉपी किया गया है। वो नाटक पाकिस्तानी स्टैंड कॉमेडी के बादशाह कहे जाने वाले उमर शरीफ ने लिखा था। उन्होंने ही उस नाटक में एक्टिंग भी की थी।

IMDB पर लिखा है कि एक इंटरव्यू में गुलशन ग्रोवर ने इस फिल्म के बारे में बात करते हुए बताया था कि उन्हें एक दफा डेविड धवन ने बताया था कि जब अमिताभ बच्चन गोविंदा के साथ "बड़े मियां छोटे मियां" फिल्म के कुछ दृश्य फिल्मा रहे थे तो उनमें आत्मविश्वास की कमी हो गई थी। बच्चन साहब ने डेविड धवन से कहा था कि काफी कोशिशें करने के बावजूद भी वो गोविंदा जैसा आउटपुट नहीं दे पा रहे हैं। वो दौर वैसे भी अमिताभ बच्चन के करियर का सबसे बुरा दौर था। उन्होंने फिल्मों में वापसी की थी। लेकिन उनकी कुछ फिल्में बहुत बुरी तरह से फ्लॉप हो गई थी। ऐसे में हो सकता है सच में उनके भीतर आत्मविश्वास की कमी हो गई हो। वैसे, ये फिल्म तो ज़बरदस्त हिट रही थी। और इसकी कामयाबी से बच्चन साहब को काफी फायदा हुआ था।

"बड़े मियां छोटे मियां" के बाद अगले साल यानि 1999 में आई लाल बादशाह वो आखिरी फिल्म थी जिसमें अमिताभ बच्चन साहब ने कोई लीड किरदार निभाया था। लेकिन इसके बाद उन्होंने फिल्मों में सेंट्रिक व कैरेक्टर रोल्स निभाने शुरू कर दिए।

इस फिल्म में एक सीन है जिसमें अमिताभ बच्चन और गोविंदा की दोनों जोड़ियां कादर खान के ढाबे पर चाय-नाश्ता करने पहुंच जाते हैं। उस सीन में कादर खान का भी डबल रोल दिखाया गया है। खैर, तो वो सीन वास्तव में 1992 में आई जैकी चैन की एक फिल्म से प्रेरित है जिसका नाम है ट्विन ड्रैगन्स। ट्विन ड्रैगन्स में भी जैकी चैन का भी डबल रोल है। उस फिल्म में भी दोनों जैकी चैन एक होटल में जा बैठते हैं और उनकी वजह से वेटर बहुत कन्फ्यूज़ हो जाता है।

जिस वक्त ये फिल्म रिलीज़ हुई थी उससे काफी वक्त पहले से गोविंदा अपने करियर के शिखर पर थे। गोविंदा उन दिनों बहुत बिज़ी रहते थे। लेकिन जब गोविंदा को डेविड धवन ने ये फिल्म ऑफर की तो उन्होंने फौरन इस फिल्म को स्वीकार कर लिया। क्योंकि वो अमिताभ बच्चन के साथ काम करने का मौका छोड़ना नहीं चाहते थे। वैसे तो गोविंदा हम फिल्म में अमिताभ के साथ काम कर चुके थे। लेकिन उसमें गोविंदा का रोल अमिताभ बच्चन के रोल के जितना मजबूत नहीं था। लेकिन इस फिल्म में गोविंदा को अमिताभ की टक्कर का रोल ऑफर किया गया था। कहा जाता है कि खुद अमिताभ बच्चन चाहते थे कि गोविंदा को उनके साथ इस फिल्म में लिया जाए। इसलिए ताकि उनके करियर की डूबती नैया को गोविंदा की लोकप्रियता का सहारा मिल सके। और ऐसा हुआ भी। गौरतलब है कि इसके बाद आज तक किसी और फिल्म में अमिताभ-गोविंदा साथ नज़र नहीं आए हैं।

जैसा कि ऊपर ज़िक्र किया जा चुका है कि "कुछ कुछ होता है" फिल्म भी उसी दिन रिलीज़ हुई थी जिस दिन "बड़े मियां छोटे मियां" रिलीज़ हुई थी, तो फिल्म इंडस्ट्री के कई लोगों ने करण जौहर को सलाह दी थी कि वो बड़े मियां छोटे मियां के साथ अपनी फिल्म ना रिलीज़ करें। क्योंकि अमिताभ और गोविंदा की डबल जोड़ी उनकी फिल्म पर भारी पड़ सकती है। लेकिन करण जौहर ने किसी की नहीं मानी। उन्होंने अपनी फिल्म की रिलीज़ डेट चेंज नहीं की। दोनों फिल्में जब रिलीज़ हुई तो बॉक्स ऑफिस पर पहले सप्ताह "बड़े मियां छोटे मियां" ही दबदबा रहा। लेकिन "कुछ कुछ होता है" लंबी रेस का घोड़ा साबित हुई।

अमिताभ बच्चन के अपोज़िट इस फिल्म में एक्ट्रेस राम्या कृष्णन हैं। ये वही राम्या कृष्णन हैं जिन्होंने बाहुबली फिल्म में राजमाता शिवगामी देवी का किरदार भी निभाया है। कहते हैं कि गोविंदा की सिफारिश पर राम्या कृष्णन को ये फिल्म मिली थी। दरअसल, पहले ये रोल जूही चावला को ऑफर हुआ था। लेकिन किन्हीं कारणों से जूही चावला चाहकर भी इस फिल्म में काम ना कर सकी। ऐसे में गोविंदा ने प्रोड्यूसर वासू भगनानी को राम्या कृष्णन का नाम सुझाया जो उनके साथ एक साल पहले आई बनारसी बाबू में काम कर चुकी थी। ये इकलौती फिल्म है जिसमें राम्या कृष्णन अमिताभ बच्चन के अपोज़िट हैं।

डायरेक्टर डेविड धवन के साथ ये अमिताभ बच्चन की पहली फिल्म थी। इसके बाद डेविड धवन के डायरेक्शन में अमिताभ बच्चन ने साल 2002 में आई "हम किसी से कम नहीं" फिल्म में काम किया था।

"कुछ कुछ होता है" फिल्म की 10 अनसुनी और रोचक कहानियां। करण जौहर की "कुछ कुछ होता है" फिल्म के आज 27 साल पूरे हो गए हैं। ...
16/10/2025

"कुछ कुछ होता है" फिल्म की 10 अनसुनी और रोचक कहानियां। करण जौहर की "कुछ कुछ होता है" फिल्म के आज 27 साल पूरे हो गए हैं। सैकनिल्क के अनुसार कुछ कुछ होता है फ़िल्म का बजट 14 करोड़ रुपए था। और कमाई 46 करोड़ 88 लाख रुपए थी। कुछ कुछ होता है साल 1998 की सबसे सफ़ल फ़िल्म थी। चलिए, इस मौके पर "कुछ कुछ होता है" फिल्म की 10 अनसुनी और रोचक कहानियां जानते हैं।

पहली- रानी मुखर्जी उस वक्त 19 साल की थी जब उन्होंने "कुछ कुछ होता है" फिल्म साइन की थी। इत्तेफाक से आदित्य चोपड़ा ने करण जौहर को रानी मुखर्जी को कास्ट करने की सलाह दी थी। उस वक्त खुद रानी ने भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन आदित्य चोपड़ा से ही उनकी शादी होगी। खैर, करण जौहर को रानी मुखर्जी की आवाज़ पसंद नहीं आ रही थी। वो चाहते थे कि रानी मुखर्जी के डायलॉग्स किसी और से डब कराए जाएं। लेकिन रानी मुखर्जी ने अपने डायलॉग्स खुद रिकॉर्ड करने की गुज़ारिश करण से की। करण ने उनकी बात मानी और डायलॉग्स उन्हें ही डब करने दिए। रानी के डायलॉग्स काफी पसंद किए गए।

दूसरी- फिल्म के एक गाने में काजोल शाहरुख खान के साथ साइकिल चलाते नज़र आती हैं। उस गाने की शूटिंग के दौरान काजोल साइकिल पर अपना कंट्रोल खो बैठी और ज़मीन पर ज़ोर से गिरी। उनके घुटने में काफी चोट लग गई थी।

तीसरी- सलमान खान इस फिल्म में अमन मेहरा के रोल में दिखे हैं। करण जौहर को इस रोल की कास्टिंग के लिए बहुत जतन करने पड़े थे। पहले उन्होंने ये रोल सैफ अली खान को ऑफर किया था। लेकिन सैफ ने इसे निभाने से इन्कार कर दिया। उनके बाद करण ने आमिर खान से इस रोल को निभाने की बात की। लेकिन आमिर ने भी इस रोल को ठुकरा दिया। आमिर खान शाहरुख के सामने कोई हल्का कैरेक्टर नहीं निभाना चाहते थे। मगर जब करण ने सलमान को ये रोल ऑफर किया तो उन्होंने फौरन इस रोल को स्वीकार कर लिया।

चौथी- "कुछ कुछ होता है" में रानी मुखर्जी के किरदार का नाम टीना है। करण जौहर ने इस किरदार को टीना नाम अपने बचपन के क्रश ट्विंकल खन्ना से प्रेरित होकर दिया था। दरअसल, ट्विंकल खन्ना का एक नाम टीना भी है। करण जौहर बचपन से ही ट्विंकल पर फिदा थे। कहा तो ये भी जाता है कि जब उन्होंने इस फिल्म की शूटिंग शुरू की थी तो टीना का रोल भी उन्होंने ट्विंकल खन्ना को ही ऑफर किया था। लेकिन ट्विंकल ने ये रोल निभाने से इन्कार कर दिया था। और इसका अफसोस उन्हें आज भी है।

वैसे, कुछ लोग कहते हैं कि ट्विंकल खन्ना ने वो रोल स्वीकार कर लिया था और 11 दिन की शूटिंग भी की थी। लेकिन ये गलत है। ट्विंकल ने खुद कहा है कि उन्होंने टीना का रोल शुरू में ही रिजेक्ट कर दिया था। ट्विंकल के इन्कार करने के बाद करण जौहर ने वो रोल करिश्मा कपूर व ऐश्वर्या राय को भी ऑफर किया। लेकिन उन दोनों ने भी वो रोल निभाने से मना कर दिया। आखिरकार आदित्य चोपड़ा की सिफारिश पर रानी मुखर्जी को वो रोल मिल गया।

पांचवी- "कुछ कुछ होता है" करण जौहर की डायरेक्टोरियल डेब्यू फिल्म थी। और पहली ही फिल्म से करण जौहर फिल्म इंडस्ट्री के टॉप डायरेक्टर्स की लिस्ट में शुमार हो गए। लेकिन जब करण जौहर ने कोई फिल्म डायरेक्ट करने का फैसला किया था तब उनके पास दो कहानियां थी। वो उन दो कहानियों में से किसी एक को डायरेक्ट करने वाले थे। आखिरकार उन्होंने दोनों कहानियों को आपस में मर्ज किया और "कुछ कुछ होता है" नाम से एक नई कहानी तैयार हुई।

छठी- "कुछ कुछ होता है" फिल्म के यूं तो सभी गाने हिट थे। लेकिन इसका टाइटल ट्रैक सबसे ज़्यादा पसंद किया गया था जिसके बोल थे "तुम पास आए। यूं मुस्कुराए।" आपको जानकर हैरत होगी कि इस गाने की धुन एक्टर जुगल हंसराज ने सबसे पहले क्रिएट की थी। जुगल हंसराज एक दिन नहा रहे थे जब नहाते-नहाते उनके ज़ेहन में कुछ शब्द आने लगे और उन्होंने उन शब्दों को गुनगुनाना शुरू कर दिया। वो शब्द फिल्म के ऑरिजिनल गाने से काफी अलग थे। जुगल ने उन शब्दों का ज़िक्र करण जौहर से किया। करण जौहर को वो शब्द और गाने का जुगल हंसराज का स्टाइल, दोनों पसंद आए। करण ने गीतकार समीर और संगीतकार जतिन-ललित से जुगल हंसराज द्वारा क्रिएट की गई उस धुन व शब्दों का ज़िक्र किया। और उन्होंने तैयार किया "कुछ कुछ होता है" फिल्म का वो आइकॉनिक सॉन्ग।

सातवीं- राहुल और अंजलि के कैरेक्टर के लिए करण जौहर की पहली पसंद शाहरुख-काजोल ही थे। इन दोनों कलाकारों ने डीडीएलजे के वक्त करण जौहर से वादा किया था कि जब करण अपनी पहली फिल्म बनाएंगे तो दोनों उसमें काम करेंगे। दोनों कलाकारों ने अपना वादा निभाया भी।

आठवीं- फिल्म में छोटी अंजलि का किरदार निभाने वाली एक्ट्रेस सना सईद ने कुछ इमोशनल सीन्स के लिए ग्लिसरीन आंखों में डालने से मना कर दिया था। ऐसे में करण जौहर के लिए मुश्किल खड़ी हो गई। क्योंकि उन सीन्स में अंजलि को रोता हुए दिखना ज़रूरी था। पर चूंकि सना सईद बच्ची थी तो वो ज़बरदस्ती उसकी आंखों में ग्लिसरीन डालना नहीं चाहते थे। तब करण को एक तरकीब सूझी। उन्होंने सना सईद को बात-बात पर डांटना शुरू कर दिया। इससे सना सईद को बहुत दुख पहुंचा। और वो सच में रोने लगी। सीन अच्छी तरह से शूट हो गया। इस किस्से का ज़िक्र बज़फीड ने अपनी एक स्टोरी में किया है।

नौंवी- "कुछ कुछ होता है" फिल्म में छोटे सरदार जी का कैरेक्टर एक्टर परजान दस्तूर ने निभाया था। उन छोटे सरदार जी ने पूरी फिल्म में एक ही लाइन बोली जो है "तुस्सी जा रहे हो, तुस्सी मत जाओ।" हैरत की बात ये है कि इस लाइन में भी परजान दस्तूर की ऑरिजिनल आवाज़ नहीं है। वो आवाज़ एक दूसरे चाइल्ड आर्टिस्टस से रिकॉर्ड कराई गई थी जिसका नाम है केवल्य छेदा।

दसवीं- फिल्म में एक सीन है जिसमें "द नीलम शो" में शाहरुख खान अपनी बेटी अंजलि के लिए कुछ बोलते हैं। उस सीन से कुछ पहले एक और सीन दिखाई देता है जिसमें एक लड़का एक लड़की से कहता है कि वो लड़की उसकी लाइफ से चली जाए क्योंकि उसे एक दूसरी लड़की मिल चुकी है। उस लड़के का किरदार निभाने वाला वो एक्टर कोई और नहीं, निखिल आडवाणी हैं जिन्होंने बाद में शाहरुख खान को "कल हो ना हो" फिल्म में डायरेक्ट भी किया। जबकी उसकी नई गर्लफ्रेंड थी फराह खान। फराह ने भी शाहरुख को आगे चलकर मैं हूं ना, ओम शांति ओम व हैप्पी न्यू ईयर जैसी फिल्मों में डायरेक्ट किया।

पियर्स ब्रॉसन ने एक बार अपनी पत्नी को दफनाने के कुछ ही घंटों बाद एक रोमांटिक सीन शूट किया — क्योंकि उनके पास रुकने की आर...
15/10/2025

पियर्स ब्रॉसन ने एक बार अपनी पत्नी को दफनाने के कुछ ही घंटों बाद एक रोमांटिक सीन शूट किया — क्योंकि उनके पास रुकने की आर्थिक गुंजाइश नहीं थी।
कैमरे के सामने उन्होंने मुस्कराहट दिखाई, और फिर होटल लौटकर अकेले रोते रहे।

दुनिया की नजरों में वो आत्मसंयम की मिसाल थे — एक सधा हुआ, अडिग सीक्रेट एजेंट। लेकिन उस आत्मसंयम के पीछे एक ऐसा दर्द छुपा था जिसे अनुशासन की मूर्त रूप में ढाला गया था।

टक्सीडो पहनने से बहुत पहले, ब्रॉसन आयरलैंड के नावन नामक कस्बे से एक ऐसा लड़का था जो टपकती छतों के नीचे सोता था। पिता ने उन्हें छोड़ दिया था, और उन्हें अनजान लोगों ने पाला। वह सिनेमा की हल्की-फुल्की रोशनी में फिल्मी सितारों को देखते थे, पर कभी यकीन नहीं हुआ कि वह खुद कभी ऐसे बन सकते हैं। हमारे पास कुछ नहीं था," उन्होंने कहा। लेकिन मेरे पास सपने थे — और वही सब कुछ थे।"

वह लगभग संयोगवश मशहूर हो गए। जब 1980 के दशक में *रेमिंगटन स्टील* से वह घर-घर का नाम बन गए, तो अचानक वह अमेरिकी टेलीविज़न का आकर्षक चेहरा बन गए — चतुर, हाजिरजवाब, और शालीन।
लेकिन कैमरे के पीछे, उनकी ज़िंदगी ऐसी त्रासदी से जूझ रही थी जिसके लिए कोई स्क्रिप्ट उन्हें तैयार नहीं कर सकती थी। उनकी पत्नी, कैसेंड्रा हैरिस — वही महिला जिन्होंने उन्हें एक संघर्षशील थिएटर ग्रुप में खोजा था — अंडाशय के कैंसर से जूझ रही थीं।

चार वर्षों तक उन्होंने उनका पूरा ध्यान रखा। हर अपॉइंटमेंट पर उन्हें खुद ले जाते, IV ड्रिप बदलना सीखा, और हर अनहोनी साँस को पहचानना सीखा। उन्होंने डॉक्टरों से समय की भीख मांगी।
मैं उसका नर्स था, साथी था, प्रेमी था," उन्होंने बाद में कहा। और मैं यह सब हमेशा करता, अगर मौका मिलता।"

जब 1991 में वह चल बसीं, तब भी उन्होंने काम करना नहीं छोड़ा — क्योंकि वो रुक नहीं सकते थे।
"मैं उस तरह शोक नहीं मना पाया जैसा चाहता था," उन्होंने कबूल किया। आप दुनिया को नहीं बता सकते कि आप टूट चुके हैं। लोग वो नहीं देखना चाहते। उन्हें शो चाहिए।"

पियर्स ब्रॉसन की असली कहानी प्रसिद्धि नहीं है — बल्कि वह सहनशीलता है, जो सुंदरता का मुखौटा पहनकर सामने आई।

कुछ वर्षों बाद, वह *गोल्डनआई* के सेट पर उतरे — नए जेम्स बॉन्ड के रूप में, शॉन कॉनरी के ‘परफेक्ट रिप्लेसमेंट’ कहे गए।
लेकिन जो कोई नहीं देख पाया, वो था उनका अंदर का दर्द — उस चमकदार चेहरे के पीछे छुपी थकान।
बॉन्ड ने मुझे बचाया, उन्होंने एक बार कहा। उसने मुझे कुछ ऐसा दिया जिसके लिए मैं खड़ा रह सकूं, जब मैं अंदर से बिखर रहा था।"

लेकिन दुःख गायब नहीं होता — वो बदलता है।
वह तीन बच्चों के पिता बने, जिनमें से दो कैसेंड्रा की पहली शादी से थे, और उनका दर्द भी उन्होंने अपना बना लिया।

फिर सालों बाद, वही त्रासदी दोहराई गई। उनकी बेटी शार्लट को भी वही कैंसर हो गया जिसने उसकी मां को छीन लिया था।
उसने वर्षों तक लड़ाई लड़ी — और हार गई।

जब पत्रकारों ने पूछा कि वह कैसे आगे बढ़ते रहे, उन्होंने कहा:
मेरे पास आस्था है। मेरे पास पेंटिंग है। और मेरे पास प्यार है। लेकिन आप कभी पूरी तरह उबरते नहीं — आप बस चलते रहते हैं।"

कैमरे के बाहर, वो वो प्लेबॉय नहीं हैं जैसा कभी टैबलॉइड्स ने बताया था।
वह घंटों पेंटिंग करते हैं — ऐसी रहस्यमयी, बेचैन कर देने वाली तस्वीरें जिनमें चेहरों की झलक कैसेंड्रा से मिलती है।
वह महिलाओं के स्वास्थ्य शोध के लिए करोड़ों का दान देते हैं।
भूतों को चुप कराने के लिए कविताएँ लिखते हैं।

इंटरव्यू में अक्सर ऐसा लगता है जैसे वो भटक जाते हैं — जैसे दो दुनियाओं में जी रहे हों: एक जो उन्हें पूजती है, और दूसरी जिसे दुःख ने गढ़ा।
उन्होंने एक बार कहा था:
कुछ लोग दीवारों के पीछे छिपते हैं। मैं किरदारों के पीछे छिपता हूँ। लेकिन दरारें हमेशा दिख जाती हैं।

शायद यही कारण है कि लोग उनसे जुड़ाव महसूस करते हैं — क्योंकि उनका आकर्षण कृत्रिम नहीं लगता।
वो दर्द में पकी हुई गरिमा है, और ज़ख्मों पर चढ़ी हँसी।

पियर्स ब्रॉसन जेम्स बॉन्ड इसलिए नहीं बने क्योंकि वो अजेय थे।
वो इसलिए बने क्योंकि वो जानते थे कि सब कुछ खोकर भी, टाई बाँधकर और हाथ स्थिर रखकर कैसे खड़ा रहा जाता है।

उन्होंने एक बार चुपचाप कहा था:
जब आप मौत को देख चुके होते हैं, तब ज़िंदगी में एक मिठास आ जाती है जिसे शब्दों में नहीं बताया जा सकता।

ये किसी फिल्म की लाइन नहीं है।
यह एक ऐसे इंसान की बात है — जिसने हर शब्द को जिया है।

एक दिन ज़ाहिदा 'रात और दिन' नामक फिल्म की शूटिंग देखने गई। उस फिल्म में ज़ाहिदा की बुआ नरगिस काम कर रही थी। और फिल्म में...
09/10/2025

एक दिन ज़ाहिदा 'रात और दिन' नामक फिल्म की शूटिंग देखने गई। उस फिल्म में ज़ाहिदा की बुआ नरगिस काम कर रही थी। और फिल्म में ज़ाहिदा के पिता अख्तर हुसैन ही पैसा लगा रहे थे। जिस स्टूडियो में रात और दिन की शूटिंग चल रही थी, उसमें ही एक दूसरे फ्लोर पर देवानंद अपनी फिल्म तीन देवियां की शूटिंग कर रहे थे। शूटिंग से ब्रेक लेकर देवानंद नरगिस से मिलने आए। उस वक्त ज़ाहिदा भी नरगिस के पास ही थी।

और उसी वक्त देवानंद ने ज़ाहिदा को पहली दफा देखा था। देवानंद को जब पता चला कि ज़ाहिदा नरगिस की भतीजी हैं तो उन्होंने ज़ाहिदा से पूछा कि क्या तुम फिल्मों में काम करना पसंद करोगी। अब चूंकि फिल्मों में काम करना ज़ाहिदा का बचपन का ख्वाब था तो इन्कार करने का तो कोई सवाल ही नहीं था। सो ज़ाहिदा ने देव साहब से कहा, ज़रूर। क्यों नहीं। ज़ाहिदा का जवाब सुनकर देव साहब काफी खुश हुए। और कुछ दिनों बाद देव साहब पहुंच गए ज़ाहिदा के घर।

उन्होंने ज़ाहिदा को अपनी फिल्म प्रेम पुजारी में सैकेंड लीड एक्ट्रेस का रोल ऑफर किया। प्रेम पुजारी से ही देव साहब बतौर डायरेक्टर अपनी एक नई पारी फिल्म इंडस्ट्री में शुरू करने जा रहे थे। ज़ाहिदा ने जब अपना रोल सुना तो वो उन्हें काफी पसंद आया। और उन्होंने प्रेम पुजारी में काम करने के लिए हामी भर दी। फिल्म की शूटिंग शुरू हुई। और दुनिया के कई देशों में इस फिल्म के लिए ज़ाहिदा को देव साहब व फिल्म यूनिट के साथ ट्रैवल करना पड़ा।

लेकिन काफी मेहनत करने के बावजूद भी प्रेम पुजारी की शूटिंग कंप्लीट करने में देवानंद को बहुत वक्त लगा। इसी बीच डायरेक्टर एल.बी.लछमन भी ज़ाहिदा के पास अनोखी रात फिल्म का ऑफर ले आए। उस फिल्म में संजीव कुमार और परीक्षित साहनी थे। फिल्म के डायरेक्टर थे असित सेन। जबकी फिल्म की कहानी लिखी थी ऋषिकेश मुखर्जी ने। ज़ाहिदा ने अनोखी रात साइन कर
ली।

एक इंटरव्यू में इस फिल्म के बारे में बात करते हुए ज़ाहिदा ने कहा था कि उस वक्त संजीव कुमार बी-ग्रेड एक्टर हुआ करते थे। वो संजीव कुमार के साथ काम नहीं करना चाहती थी। लेकिन जब उन्हें पता चला कि फिल्म को ऋषिकेश मुखर्जी ने लिखा है। और डायरेक्टर असित सेन होंगे तो उन्होंने फिल्म में काम करने के लिए हामी भर दी। प्रेम पुजारी की शूटिंग रुकी हुई थी। इसलिए ज़ाहिदा ने अनोखी रात की शूटिंग शुरू कर दी। शूटिंग कंप्लीट हुई और साल 1968 में अनोखी रात रिलीज़ भी हो गई। जबकी ज़ाहिदा की साइन की हुई पहली फिल्म, यानि देवानंद की प्रेम पुजारी अनोखी रात के दो साल बाद साल 1970 में रिलीज़ हुई।

आज ज़ाहिदा जी का जन्मदिन है। 9 अक्टूबर 1944 को इनका जन्म हुआ था। पूरा नाम है इनका ज़ाहिदा हुसैन। बहुत पहले ही ये फ़िल्मी दुनिया से खुद को दूर कर चुकी हैं। ज़ाहिदा हुसैन जी को जन्मदिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

"संजय दत्त गंदी-गंदी गालियां बकने लगे। वो बुरी तरह से भड़के हुए थे। और उनके गुस्से की वजह थी गोविंदा। हालांकि गोविंदा को...
09/10/2025

"संजय दत्त गंदी-गंदी गालियां बकने लगे। वो बुरी तरह से भड़के हुए थे। और उनके गुस्से की वजह थी गोविंदा। हालांकि गोविंदा को संजय दत्त कुछ नहीं कह सके। लेकिन उन्होंने एक असिस्टेंट को बहुत गालियां सुनाई।" ये बात बताई रजत बेदी ने एक पोडकास्ट में। ये जोड़ी नंबर वन फ़िल्म का किस्सा है। और रजत बेदी ने भी जोड़ी नंबर वन में एक छोटा सा रोल निभाया था। जोड़ी नंबर 1 साल 2001 में आई थी। डेविड धवन उस फ़िल्म के डायरेक्टर थे। जबकी धीरजलाल शाह ने ये फ़िल्म प्रोड्यूस की थी। रजत बेदी के किरदार का नाम था टाइगर।

ये वो दौर था जब गोविंदा का करियर ढलान की तरफ़ आना शुरू हो गया था। मगर इस समय तक गोविंदा पर काम की कमी नहीं होती थी। वो कई-कई फ़िल्में एक साथ कर रहे थे। और चार-पांच शिफ़्टों में काम करते थे। इस वजह से गोविंदा उस वक्त अधिकतर समय शूटिंग पर टाइम से पहुंच ही नहीं पाते थे। रजत बेदी ने जो किस्सा बताया है वो कुछ यूं है कि एक दिन एक सीन शूट होना था। और सुबह 7 बजे उसकी शूटिंग शुरू हो जानी थी। बकौल रजत बेदी, वो और संजय दत्त सुबह छह बजे ही सेट पर पहुंच गए थे। उस वक्त तक अन्य स्टाफ़ भी नहीं आया था।

7 बजे तक सब आ गए। मगर गोविंदा नहीं आए। गोविंदा का इंतज़ार किया गया। मगर वो नहीं आए। कई घंटे हो गए। गोविंदा सेट से नदारद थे। डेविड धवन ने गोविंदा के बारे में पूछताछ की तो उस वक्त पता चला कि गोविंदा अपने घर पर है। उन्होंने एक आदमी को गोविंदा को लेने उनके घर भेज दिया। वो आदमी भी बेचारा काफ़ी देर तक गोविंदा के घर के बाहर बैठा रहा। इस वक्त तक कई घंटे हो चुके थे। सेट पर सब परेशान थे। और जब दोपहर के 2 बज गए तो संजय दत्त को गुस्सा आने लगा। वो भड़कने लगे। उनके मुंह से गालियां निकलने लगी।

मगर संजय दत्त, रजत बेदी, डेविड धवन व सेट पर मौजूद अन्य लोग उस वक्त बहुत ज़्यादा शॉक्ड रह गए जब उन्हें पता चला कि गोविंदा तो अपने घर पर भी नहीं हैं। वो वास्तव में हैदराबाद में हैं। और फ्लाइट लेकर हैदराबाद से मुंबई आ रहे हैं। रजत बेदी ने बताया कि उन दिनों गोविंदा 4-5 शिफ़्टों में काम करते थे। और तब किसी को पता नहीं होता था कि गोविंदा किस फ़िल्म के सेट पर होंगे। कहां मौजूद होंगे। दोपहर तीन बजे के आस-पास उस दिन गोविंदा जोड़ी नंबर वन के सेट पर पहुंचे। आते ही वो शूटिंग करने को तैयार हो गए। और एक असिस्टेंट ने संजय दत्त को वो सीन दिखाया जो उस दिन शूट होना था।

संजय ने जब वो सीन देखा तो उन्हें रियलाइज़ हुआ कि इसमें गोविंदा के डायलॉग्स कम हैं। उनके डायलॉग्स ज़्यादा हैं। संजय ने असिस्टेंट से कहा कि इस सीन को बदला जाए। मगर शायद असिस्टेंट ने मुश्किल जताई होगी। तो गोविंदा के बहुत देर से आने के कारण भरे बैठे संजय दत्त उस बेचारे असिस्टेंट पर चिल्ला पड़े। उसे भद्दी-भद्दी गालियां बकने लगे। संजय उसे सीन बदलने को कह रहे थे। संजय उससे कह रहे थे,"ये लाइनें तुम गोविंदा को दो। मैं ये नहीं करूंगा।" संजय को गुस्से में देखकर हर कोई खामोश था। बहुत से लोग तो सहमे हुए भी थे। कोई कुछ नहीं बोल सका।

आखिरकार संजय के कहने पर सीन बदला गया। पूरा सीन फिर से लिखा गया। और गोविंदा को ज़्यादा डायलॉग्स दिए गए इस बार। यहां रजत बेदी ने गोविंदा की तारीफ़ करते हुए कहा कि जब शूटिंग शुरू हुई तो मात्र दो घंटो में गोविंदा ने वो पूरा सीन कंप्लीट कर लिया। गोविंदा एक बेहतरीन परफॉर्मर हैं।

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