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कहानी -11 पुरानी हवेली का रहस्यशहर से थोड़ा दूर, घने पेड़ों और सुनसान रास्तों के बीच एक पुरानी हवेली खड़ी थी। लोग उसे “भ...
20/04/2026

कहानी -11

पुरानी हवेली का रहस्य

शहर से थोड़ा दूर, घने पेड़ों और सुनसान रास्तों के बीच एक पुरानी हवेली खड़ी थी। लोग उसे “भूतों वाली हवेली” कहते थे। वर्षों से वह हवेली खाली पड़ी थी। उसकी टूटी खिड़कियाँ, जंग लगे दरवाजे और दीवारों पर उग आई काई उसे और भी डरावना बना देती थी।

गांव के लोग कहते थे कि रात के समय वहां अजीब आवाजें आती हैं—कभी किसी के रोने की, तो कभी किसी के हँसने की। कोई भी उस हवेली के पास जाने की हिम्मत नहीं करता था।

लेकिन गांव में रहने वाला 16 साल का लड़का आरव इन बातों पर विश्वास नहीं करता था। वह हमेशा कहता, “भूत-प्रेत कुछ नहीं होते, ये सब लोगों की कल्पना है।”

एक दिन उसने अपने दोस्तों से कहा, “मैं आज रात उस हवेली में जाऊँगा और सच का पता लगाऊँगा।” उसके दोस्त डर गए और उसे मना करने लगे, लेकिन आरव नहीं माना।

रात के करीब 10 बजे, हाथ में टॉर्च लेकर वह हवेली की ओर निकल पड़ा। जैसे-जैसे वह हवेली के करीब पहुंच रहा था, हवा तेज होती जा रही थी। पेड़ों की टहनियाँ आपस में टकराकर अजीब आवाजें कर रही थीं।

हवेली के सामने पहुंचकर उसने देखा कि बड़ा सा लोहे का दरवाजा आधा खुला हुआ है। उसने धीरे से उसे धक्का दिया, और दरवाजा “क्रीईक…” की आवाज के साथ खुल गया।

अंदर कदम रखते ही उसे एक ठंडी हवा का झोंका महसूस हुआ। दीवारों पर पुराने चित्र टंगे हुए थे, जिन पर धूल जमी थी। फर्श पर सूखे पत्ते और जाले फैले हुए थे।

अचानक उसे ऊपर की मंजिल से किसी के चलने की आवाज सुनाई दी।

“कौन है वहाँ?” आरव ने जोर से पूछा, लेकिन कोई जवाब नहीं आया।

उसका दिल थोड़ा तेज धड़कने लगा, लेकिन उसने खुद को संभाला और सीढ़ियों की ओर बढ़ा। जैसे ही वह ऊपर पहुंचा, उसे एक कमरा दिखा जिसका दरवाजा थोड़ा खुला था।

वह धीरे-धीरे उस कमरे की ओर बढ़ा और दरवाजा खोला।

कमरे के अंदर एक पुराना पलंग था और उसके पास एक लकड़ी की अलमारी। तभी अचानक उसे लगा जैसे कोई उसके पीछे खड़ा है।

वह तेजी से मुड़ा—लेकिन वहाँ कोई नहीं था।

अब उसका डर बढ़ने लगा था।

तभी अचानक अलमारी अपने आप खुल गई। अंदर से एक पुरानी डायरी नीचे गिर गई।

आरव ने कांपते हाथों से डायरी उठाई और पढ़ना शुरू किया।

डायरी में लिखा था:

“मेरा नाम सरिता है। इस हवेली में मेरा परिवार रहता था। एक रात कुछ लोगों ने हम पर हमला किया। उन्होंने हमें मार डाला और हमारी आत्माएँ इस हवेली में कैद हो गईं। जो भी यहाँ आता है, हम उसे चेतावनी देते हैं, लेकिन कोई हमारी मदद नहीं करता…”

यह पढ़कर आरव के रोंगटे खड़े हो गए।

तभी कमरे में अचानक ठंडी हवा चलने लगी और एक धीमी आवाज सुनाई दी—
“हमें… मुक्ति… दिलाओ…”

आरव डर गया, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। उसने कहा, “मैं आपकी मदद करूंगा, बताइए मुझे क्या करना होगा?”

आवाज फिर आई—
“हमारी अस्थियाँ… पीछे के बगीचे में दबी हैं… उन्हें मुक्त करो…”

अगले ही पल सब शांत हो गया।

आरव तुरंत नीचे आया और हवेली के पीछे गया। वहाँ जमीन थोड़ी उभरी हुई थी। उसने वहां खुदाई शुरू की।

कुछ देर बाद उसे एक पुराना बक्सा मिला। उसने उसे खोला तो उसमें हड्डियाँ और कुछ पुराने गहने थे।

आरव समझ गया कि यही उस परिवार के अवशेष हैं।

अगले दिन वह गांव के पंडित जी को लेकर आया और पूरे विधि-विधान से उन अस्थियों का अंतिम संस्कार किया।

जैसे ही अंतिम संस्कार पूरा हुआ, हवेली के आस-पास का माहौल बदल गया। अब वहाँ डर नहीं बल्कि शांति महसूस हो रही थी।

उस रात आरव को सपना आया। उसमें एक महिला मुस्कुराते हुए बोली—
“धन्यवाद… अब हम मुक्त हैं…”

अगले दिन जब गांव वाले हवेली के पास गए, तो उन्हें वह पहले जैसी डरावनी नहीं लगी। धीरे-धीरे लोगों का डर खत्म हो गया।

कुछ समय बाद उस हवेली की मरम्मत करवाई गई और वह एक सुंदर घर बन गया।

आरव की बहादुरी की कहानी पूरे गांव में फैल गई। अब लोग उसे डरपोक नहीं, बल्कि साहसी और समझदार लड़का मानने लगे।

सीख:
कई बार डर के पीछे कोई सच्चाई छिपी होती है। अगर हम हिम्मत और समझदारी से काम लें, तो हर रहस्य को सुलझाया जा सकता है।
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କାହାଣୀ -12ଡାକ ବଙ୍ଗଳା ର ରହସ୍ୟ ମଧୁପୁର ନାମରେ ଗୋଟିଏ ଗାଁ ସେଇଠି  ଥିଲା ଗୋଟିଏ ପୁରୁଣା ଡାକ ବଙ୍ଗଳା। ଏହାକୁ ଦେଖିଲେ ଲାଗୁଥିଲା, ଯେମିତି ସ...
11/04/2026

କାହାଣୀ -12
ଡାକ ବଙ୍ଗଳା ର ରହସ୍ୟ

ମଧୁପୁର ନାମରେ ଗୋଟିଏ ଗାଁ ସେଇଠି ଥିଲା ଗୋଟିଏ ପୁରୁଣା ଡାକ ବଙ୍ଗଳା। ଏହାକୁ ଦେଖିଲେ ଲାଗୁଥିଲା, ଯେମିତି ସମୟ ଏଠି ଅଟକି ଯାଇଛି। ଭଙ୍ଗା କାନ୍ଥ , ପୁରୁଣା କବାଟ ଆଉ ଝରି ପଡ଼ୁଥିବା ଛାତ—ସବୁ କିଛି ଏକ ଅଜଣା ଭୟ ତିଆରି କରୁଥିଲା।

ଲୋକେ କହୁଥିଲେ, “ସନ୍ଧ୍ୟା ପରେ ସେଠାକୁ ଯିବ ନାହିଁ… ସେଠି କିଛି ଅଛି।”

ଗାଁର ଛୋଟ ଛୋଟ ପିଲାମାନେ ମଧ୍ୟ ସେଠାକୁ ଯିବାକୁ ଡରୁଥିଲେ। କିନ୍ତୁ ରାହୁଲ ନାମର ଗୋଟିଏ ଯୁବକ ଏହି ସବୁ କଥାକୁ ବିଶ୍ୱାସ କରୁନଥିଲା। ସେ ସହରରୁ ଆସିଥିଲା ଏବଂ ଏମିତି ଭୂତ-ପ୍ରେତ ର କାହାଣୀକୁ ଗୋଟିଏ ମିଥ୍ୟା ଭାବୁଥିଲା।

ଗୋଟେ ଦିନ ସେ ନିଶ୍ଚୟ କଲା—
“ଆଜି ରାତିରେ ମୁଁ ଡାକ ବଙ୍ଗଳାରେ ରହିବି, ଦେଖିବି କଣ ରହସ୍ୟ ଅଛି।”

ଗାଁଲୋକେ ତାକୁ ବହୁତ ବାରଣ କଲେ।
“ବାପା, ଯାଅନି… ଆଗରୁ ମଧ୍ୟ କେହି ଗଲେ, ପୁଣି ଫେରିଲେ ନାହିଁ,” ଜଣେ ବୃଦ୍ଧ କହିଲେ।

କିନ୍ତୁ ରାହୁଲ ହସିକି କହିଲା, “ମୁଁ ଡରୁନି।”

ସେଇ ରାତିରେ ସେ ଗୋଟିଏ ଟର୍ଚ୍ଚ ମୋବାଇଲ ଆଉ ଗୋଟିଏ ବ୍ୟାଗ ନେଇ ଡାକ ବଙ୍ଗଳାକୁ ପହଞ୍ଚିଗଲା। ସୂର୍ଯ୍ୟ ଅସ୍ତ ହେଇଗଲାଣି, ଚାରିପଟେ ଅନ୍ଧାର ଛାଇଗଲା। ବଙ୍ଗଳାର ଭିତରେ ପ୍ରବେଶ କରିବାମାତ୍ରେ ଗୋଟିଏ ଥଣ୍ଡା ପବନ ତାଙ୍କ ଶରୀରକୁ ସ୍ପର୍ଶ କଲା।

“ହୁଁ… କିଛି ନୁହେଁ,” ସେ ନିଜକୁ ନିଜେ ଧୀର କଲା।

ସେ ଭିତରକୁ ଯାଇ ଗୋଟିଏ ପୁରୁଣା କୋଠାରେ ବସିଗଲା। କାନ୍ଥ ରେ ଅଜଣା ଚିହ୍ନ ଥିଲା, ଯେମିତି କେହି କିଛି ଲେଖି ଯାଇଛି। ସେ ଟୋର୍ଚ୍ଚ ଲଗାଇ ଦେଖିଲା—
“ଏଠାରୁ ଫେରିଯାଅ…”

ତାଙ୍କ ମନରେ ଟିକେ ଭୟ ଆସିଲା, କିନ୍ତୁ ସେ ତାହାକୁ ଅନାଦର କଲା।

ରାତି ଯେତେ ଗଡ଼ିବାକୁ ଲାଗିଲା, ବଙ୍ଗଳା ଭିତରେ ଅଜଣା ଶବ୍ଦ ଆସିବା ଆରମ୍ଭ ହେଲା—
କବାଟ ଆପେ ଆପେ ଖୋଲୁଛି, ଆଉ ବନ୍ଦ ହେଉଛି ଝରକା ଧଡ଼ ଧଡ଼ କରୁଛି, ଏବଂ ଦୂରରୁ ଯେମିତି କେହି ହସୁଛି।

ରାହୁଲ ଭୟଭୀତ ହେଲା, କିନ୍ତୁ ସେ ଆଉ ଦୃଢ଼ ହେଇ ଆଗକୁ ଚାଲିଲା।

ହଠାତ୍ ଗୋଟିଏ ଘରରୁ ଆଲୋକ ଦେଖାଗଲା।

“ଏଠି କିଏ?” ସେ ଡାକିଲା।

କିଛି ଉତ୍ତର ମିଳିଲା ନାହିଁ।

ସେ ଧୀରେ ଧୀରେ ସେଇ ଘରକୁ ପଶିଲା। ଭିତରେ ଗୋଟିଏ ପୁରୁଣା ଚୌକି ଉପରେ ଗୋଟିଏ ଲୋକ ବସିଥିଲେ। ସେ ଧଳା ପୋଷାକ ପିନ୍ଧିଥିଲେ ଏବଂ ତାଙ୍କ ମୁହଁ ସ୍ପଷ୍ଟ ଦେଖାଯାଉନଥିଲା।

“କିଏ ତୁମେ?” ରାହୁଲ ପଚାରିଲା।

ସେ ଲୋକ ଧୀରେ ମୁଣ୍ଡ ଉଠାଇଲେ। ତାଙ୍କ ଆଖି ଲାଲ ଆଉ ମୁହଁରେ ଅଜଣା ହସ।

“ତୁମେ ଆସିଗଲା… ମୁଁ ଅପେକ୍ଷା କରୁଥିଲି,” ସେ କହିଲେ।

ରାହୁଲର ହୃଦୟ ଜୋରେ ଧଡ଼କିବାକୁ ଲାଗିଲା।

“ମୁଁ ଏଠାରେ ବର୍ଷ ହେଲା ଅଟକି ରହିଛି… ଯେଉଁମାନେ ଆସନ୍ତି, ସେମାନେ ଫେରିପାରନ୍ତି ନାହିଁ,” ସେ ଭୟଙ୍କର ସ୍ୱରରେ କହିଲେ।

ହଠାତ୍ ଘରର କବାଟ ବନ୍ଦ ହୋଇଗଲା। ଟୋର୍ଚ୍ଚ ଲିଭିଗଲା। ଚାରିପଟେ ଅନ୍ଧାର।

ରାହୁଲ ଭୟରେ ଚିତ୍କାର କଲା—
“ମୋତେ ଛାଡ଼ିଦିଅ!”

ସେ ଲୋକ ହସିଲେ—
“ଏବେ ତୁମେ ମଧ୍ୟ ଏଠିରେ ରହିବାକୁ ପଡ଼ିବ…”

ସେତେବେଳେ ହଠାତ୍ ରାହୁଲର ମନରେ ତାଙ୍କ ମାଆଙ୍କ କଥା ଆସିଲା—
“କେବେ ଭୟକୁ ଜିତିବାକୁ ହେଲେ ଭଗବାନଙ୍କୁ ସ୍ମରଣ କର।”

ସେ ଆଖି ବନ୍ଦ କରି ଭଗବାନଙ୍କ ନାମ ନେଲା।

କିଛି ସମୟ ପରେ ସବୁ କିଛି ଶାନ୍ତ ହୋଇଗଲା। ଟୋର୍ଚ୍ଚ ପୁଣି ଜଳିଗଲା। ଘର ଖାଲି—କେହି ନାହିଁ।

କବାଟ ଆପେ ଆପେ ଖୋଲିଗଲା।

ରାହୁଲ ଦେଖିଲା—ବାହାରେ ସକାଳ ହୋଇଯାଇଛି।

ସେ ତୁରନ୍ତ ସେଠାରୁ ଦୌଡ଼ି ଗାଁକୁ ଆସିଲା। ଗାଁଲୋକେ ତାକୁ ଦେଖି ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ ହେଲେ।

“ତୁ ଫେରିଆସିଲୁ?” ସେମାନେ ପଚାରିଲେ।

ରାହୁଲ ଶାନ୍ତ ସ୍ୱରରେ କହିଲା—
“ହଁ… କିନ୍ତୁ ସେଠି କିଛି ଅଛି… ଆମେ ଯାହା ଦେଖୁନାହୁଁ।”

ସେଇ ଦିନରୁ ରାହୁଲ ଆଉ କେବେ ସେହି ବଙ୍ଗଳାକୁ ଯାଇନି। ଗାଁଲୋକେ ମଧ୍ୟ ସେଠାରୁ ଦୂରେ ରହିବାକୁ ଲାଗିଲେ।

ଶିକ୍ଷା:
କେତେକ ଜିନିଷ ଆମେ ଦେଖିପାରୁନାହୁଁ, କିନ୍ତୁ ସେମାନେ ଅଛନ୍ତି। ଅହଙ୍କାର ଛାଡ଼ି ସାବଧାନ ରହିବା ଭଲ।

゚viralシ ゚

15/03/2026

Feel the music ゚viralシfypシ゚viral シ Subhalaxmi Mohapatra

कहानी -9 “पराठे का महान संघर्ष”एक बार की बात है, एक छोटे से रसोईघर में आटा, आलू, नमक और मसाले बैठे-बैठे अपनी किस्मत पर च...
15/03/2026

कहानी -9

“पराठे का महान संघर्ष”

एक बार की बात है, एक छोटे से रसोईघर में आटा, आलू, नमक और मसाले बैठे-बैठे अपनी किस्मत पर चर्चा कर रहे थे। आटा बोला, “भाई, मेरी किस्मत देखो! रोज़ कोई मुझे गूंथता है, बेलता है, फिर तवे पर सेक देता है। मेरी तो ज़िंदगी ही गोल-गोल घूम रही है।”

तभी आलू ने गहरी सांस ली और बोला, “अरे आटे भाई, तुम तो फिर भी बाहर से अच्छे दिखते हो। मेरी हालत देखो! पहले मुझे उबालते हैं, फिर मसल देते हैं, फिर मसाला डालकर मेरे अंदर राजनीति कर देते हैं।”

इतने में नमक हंस पड़ा। वह बोला, “तुम दोनों इतना दुख क्यों मना रहे हो? असली ताकत तो मेरे पास है। अगर मैं ना रहूँ तो तुम दोनों का स्वाद कोई नहीं पूछेगा।”

मिर्च तुरंत उछल पड़ी और बोली, “अरे नमक जी, इतना घमंड मत करो। अगर मैं ना रहूँ तो लोगों को मज़ा ही नहीं आएगा। थोड़ा तीखापन भी ज़रूरी है।”

रसोई में बैठे ये सब ऐसे बहस कर रहे थे जैसे संसद चल रही हो। हर कोई खुद को सबसे ज़रूरी साबित करने में लगा था।

तभी रसोई में एक आवाज़ आई — “आज नाश्ते में आलू पराठा बनाओ!”

यह सुनते ही सब चुप हो गए। अब असली परीक्षा शुरू होने वाली थी।

आटे को गूंथा गया, आलू को मसल दिया गया, नमक और मिर्च को अंदर भेज दिया गया। फिर आटे ने आलू को अपने अंदर छिपा लिया।

आटा बोला, “देखो आलू भाई, अब तुम मेरे अंदर रहोगे।”
आलू बोला, “हाँ, लेकिन नाम तो मेरा ही होगा — आलू पराठा!”

आटा थोड़ा दुखी हो गया। वह बोला, “काम मैं करूँ, मेहनत मैं सहूँ, और नाम तुम्हारा?”

तवे पर रखा गया तो घी भी आ गया। घी बोला, “भाइयों, झगड़ा मत करो। अगर मैं ना आऊँ तो तुम सूखे ही रह जाओगे।”

पराठा धीरे-धीरे सुनहरा होने लगा। उसकी खुशबू पूरे घर में फैल गई।

तभी प्लेट में बैठा दही बोला, “देखो भाई, दुनिया में नाम किसका होगा यह मायने नहीं रखता। असली खुशी तो तब है जब सब मिलकर किसी को खुश करें।”

इतने में घर का छोटा बच्चा आया और खुशी से बोला, “वाह! मेरा फेवरेट आलू पराठा!”

बच्चे ने एक कौर खाया और मुस्कुरा दिया।

यह देखकर आटा, आलू, नमक, मिर्च और घी सब समझ गए कि उनकी मेहनत सफल हो गई।

और तब आटा धीरे से बोला, “चलो भाई, नाम चाहे आलू का हो, लेकिन मज़ा तो टीमवर्क में ही है।”

व्यंग्य की सीख:
दुनिया में कई बार मेहनत कोई और करता है और नाम किसी और का हो जाता है। लेकिन अगर सब मिलकर काम करें तो स्वाद ज़िंदगी का भी उतना ही अच्छा बन जाता है जितना गरमागरम आलू पराठा। 😄🥔🫓

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