20/05/2026
नागौर की कानून व्यवस्था आज एक गंभीर और असहज प्रश्न खड़ा कर रही है - आखिर ऐसा क्या है जो पर्दे के पीछे चल रहा है, जिसे आम जनता पूरी तरह समझ नहीं पा रही?
एक एसपी का तबादला लगभग 60 दिनों में हो जाता है। दूसरे मुश्किल से 200 दिन टिक पाते हैं - मानो पहले दिन से ही नागौर में काम करने की इच्छा न रही हो। और उससे पहले के कार्यकाल पर जितना कम कहा जाए उतना बेहतर, क्योंकि कई मौकों पर पुलिस व्यवस्था व्यक्तिगत स्वार्थों और गैर-जिम्मेदार दबाव समूहों के आगे झुकती दिखाई दी।
क्या अवैध बजरी खनन, नशा तस्करी और संगठित नेटवर्क इतने प्रभावशाली हो चुके हैं कि प्रशासनिक स्थिरता ही संभव नहीं रह गई? और यदि नहीं, तो फिर वे कौन सी ताकतें हैं जो नागौर में स्थिर और निष्पक्ष प्रशासन नहीं चाहतीं?
बार-बार होने वाले तबादले जनता के विश्वास को कमजोर करते हैं। सवाल यह है कि इसका लाभ आखिर किसे मिल रहा है?
नागौर की जनता अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि कानून व्यवस्था पर सरकार की स्पष्ट प्राथमिकता और दृढ़ इच्छाशक्ति देखना चाहती है।