14/04/2026
🌙 करते करते…
करते करते…
इंसान एक दिन थक जाता है।
सबके लिए करते करते…
कोशिश करते करते…
अपनों के लिए जीते जीते…
खुद कहीं पीछे छूट जाता है।
वो जीता है
उनकी खुशी के लिए…
हर दिन कोशिश करता है
उन्हें मुस्कुराने के लिए…
पर धीरे धीरे
खुद से दूर होता जाता है।
सबको समझाते समझाते —
ऐसा मत करो…
वैसा मत करो…
वो खुद ही
अंदर से टूट जाता है।
दिल में बहुत कुछ होता है…
पर कह नहीं पाता…
और जब कभी
गुस्सा बाहर आता है…
तो लोग कहते हैं —
तुम बदल गए हो…
कोई ये नहीं समझता
कि वो गुस्सा नहीं…
थकान होती है।
जब तक तुम
किसी के लिए अच्छे हो…
तब तक सब ठीक लगता है…
पर जैसे ही तुम
खुद के लिए खड़े होते हो…
तुम गलत लगने लगते हो।
लोग सुनते हैं…
पर समझते नहीं।
अपनी गलती
देखना तो दूर…
महसूस तक नहीं करते।
हर किसी को लगता है —
वो सही है…
और सामने वाला गलत।
और धीरे धीरे…
बात करना भी बंद हो जाता है।
याद नहीं…
भूल गया…
ऐसे ही शब्दों के बीच
रिश्ते खो जाते हैं।
और इंसान…
सबके लिए जीते जीते…
खुद को खो देता है।