16/05/2026
16/5/2026
द्वितीय विश्व युद्ध के महानायक लेफ्टिनेंट नरैण दास शर्मा की जयंती पर घडोह में भव्य समारोह; अदम्य साहस और देशप्रेम की गाथा को किया गया याद
"वीरता विरासत में नहीं मिलती, उसे अपने रक्त और पसीने से सींचना पड़ता है।"
धनेटा 16 मई 2026: हिमाचल की वीर प्रसूता भूमि के अनमोल रत्न और द्वितीय विश्व युद्ध के महानायक लेफ्टिनेंट नरैण दास शर्मा की जयंती आज जिला हमीरपुर के घडोह स्थित 'नरैण मेमोरियल पब्लिक स्कूल' में अत्यंत श्रद्धा और गौरव के साथ मनाई गई। इस अवसर पर स्कूल प्रबंधन के चेयरमैन ओम प्रकाश शर्मा, स्कूल की प्रधानाचार्य सुमन शर्मा, प्रबुद्ध नागरिकों और छात्र-छात्राओं ने देश के इस महान सपूत को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की और उनके दिखाए अनुशासन व राष्ट्रभक्ति के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
महज 18 वर्ष की आयु में शुरू की सैन्य यात्रा: 16 मई 1899 को हमीरपुर के गलोड़ क्षेत्र के गांव सरोठी में जन्मे लेफ्टिनेंट नरैण दास शर्मा के भीतर बचपन से ही माता-पिता (श्रीमती मानपरी एवं श्री दसौंधी राम) ने देशप्रेम के संस्कार बो दिए थे। वर्ष 1917 में, महज़ 18 वर्ष की अल्पायु में वे 'फर्स्ट बटालियन (प्रिंस ऑफ वेल्स ओन) 17वीं डोगरा रेजिमेंट' (वर्तमान में 13 डोगरा) में एक सैनिक के रूप में भर्ती हुए। अपनी उत्कृष्ट कर्तव्यनिष्ठा के बल पर वे 1937 में तत्कालीन सम्राट राजा जॉर्ज द्वारा कमीशन अधिकारी नियुक्त किए गए और 1944 में लेफ्टिनेंट के पद पर सुशोभित हुए।
रंगून जेल से 'असंभव पलायन' की ऐतिहासिक गाथा: द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) के दौरान म्यांमार (वर्मा) के मोर्चे पर उनका शौर्य सैन्य इतिहास का स्वर्णिम अध्याय बन गया। 24 फरवरी 1942 को सीटांग नदी के तट पर जापानी सेना के साथ हुए भीषण संघर्ष के बाद उन्हें बंदी बनाकर रंगून जेल डाल दिया गया था। जापानी सैनिकों की कड़ी चौकसी और जानलेवा हवाई हमलों के बीच, लेफ्टिनेंट शर्मा ने सितंबर 1944 में अपने 17 साथी अधिकारियों को जेल से सुरक्षित निकाला और मीलों पैदल चलकर भारत पहुंचने का वह असंभव कारनामा कर दिखाया, जिसने पूरी सैन्य दुनिया को हैरान कर दिया।
प्रतिष्ठित सैन्य पदकों से हुए सम्मानित: उनकी इस अदम्य बहादुरी और अद्वितीय वफादारी के लिए भारत सरकार द्वारा उन्हें प्रतिष्ठित 'मिलिट्री मेडल' (Military Medal) से नवाजा गया। इसके साथ ही द्वितीय विश्व युद्ध में उनकी सक्रिय भागीदारी के लिए उन्हें 'वॉर मेडल' और विशिष्ट अभियानों के सफल नेतृत्व के लिए 'कैम्पेन स्टार' प्रदान किया गया था। वर्ष 1946 में वे अपनी गौरवशाली सेवाओं के पश्चात सेवानिवृत्त हुए।
आने वाली पीढ़ियों के प्रेरणास्रोत: इस अवसर पर स्कूल प्रबंधन ने कहा कि लेफ्टिनेंट नरैण दास शर्मा केवल एक सैनिक नहीं थे, बल्कि वे हिमाचल के स्वाभिमान और साहस की वो मशाल हैं, जिसकी लौ हमेशा जलती रहेगी। उनके इन्हीं महान आदर्शों और स्मृतियों को जीवंत रखने के लिए 'नरैण मेमोरियल पब्लिक स्कूल, घडोह' निरंतर प्रयासरत है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के चरित्र और व्यक्तित्व का निर्माण राष्ट्रभक्ति के मजबूत आधार पर किया जा सके।