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शब्दगाथा प्रकाशन समूह की यात्रा का एक और नया पन्ना। Third.draft की प्रस्तुति। Shalabh Kumar Gupta
10/06/2026

शब्दगाथा प्रकाशन समूह की यात्रा का एक और नया पन्ना। Third.draft की प्रस्तुति। Shalabh Kumar Gupta

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07/06/2026

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पिछले बरस आज ही के दिन दिलीप कुमार पाठक की प्रथम पुस्तक ‘मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया‘ के आवरण के माध्यम से प्रकाशन ...
04/06/2026

पिछले बरस आज ही के दिन दिलीप कुमार पाठक की प्रथम पुस्तक ‘मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया‘ के आवरण के माध्यम से प्रकाशन की ओर से एक तोहफ़ा दिया गया था।

इस बार भी ऐसा ही कुछ प्रयास था, क्योंकि लेखक द्वारा अगली पुस्तक प्रकाशन को सौंपी जा चुकी है, जो कि उनका उपन्यास विधा लेखन में उनका पहला प्रयास भी है। परन्तु अन्य प्रतिबद्धताओं के चलते अपनी तमाम कोशिशों के भी इस बार ये मुमकिन नहीं हो पाया है।

लेकिन आज पहली किताब की वर्षगांठ भी है, आंकड़ों की बाबत ख़बर आप सभी पाठकों तक पहले ही पहुंच चुकी थी कि इस किताब ने अपने प्रकाशन के साथ ही इतिहास बनाया है।

बहरहाल दिलीप कुमार पाठक जी को उनके अवतरण दिवस की ढेरों बधाईयां।

पाठकों के लिए विशेष : अगर आपने अभी तक ये पुस्तक नहीं ली है तो प्रकाशन से सीधे मंगवाने पर जो कि ₹ 275/- फ्री डिलीवरी है। इस अवसर पर सिर्फ आज रात बारह बजे तक आप इस पुस्तक को अतिरिक्त छूट में मात्र ₹ 249/- फ्री डिलीवरी प्राप्त कर सकते हैं।

ऑर्डर हेतु DM करें या हमारे आधिकारिक व्हाट्सएप नंबर 098677 65305 पर DKP लिखकर भेजें।

22/05/2026

विश्व अपराध कथा साहित्य के शैदाईयों में शायद ही कोई ऐसा होगा, जो डैशिएल हैमेट के नाम से अनजान हो। मगर हैमेट महज़ एक लेखक नहीं, बल्कि ज़ुर्म की दुनिया के पहले सच्चे गवाह थे। कागज़ पर स्याही बिखेरने से पहले उन्होंने ख़ुद ‘पिंकरटन डिटेक्टिव एजेंसी’ के लिए बरसों तक सड़कों पर असली मुज़रिमों का पीछा किया था। यही वज़ह रही कि जब उन्होंने कलम चलानी शुरू की, तो जासूसी उपन्यासों की रवायत हमेशा के लिए बदल गई। उन्होंने शरलॉक होम्स या अगाथा क्रिस्टी के किरदारों की तरह मख़मली कमरों में बैठकर पहेलियाँ नहीं सुलझाईं, बल्कि अदब को उस ज़हरीली हवा, धूल और बारूद के बीच ले गए, जहाँ ज़ुर्म पनपता है, पनाह लेता है। हैमेट का मानना था कि खून बहता है तो कपड़े गंदे होते हैं और जब इंसान बिखरता है, तो उसका ज़मीर घुटनों पर आ जाता है।

उनकी उँगली हमेशा वक़्त की नब्ज़ पर रही। 1920 के दशक का अमेरिका जिस पूंजीवाद, धोखे और सियासी सड़ांध के दौर से गुज़र रहा था, हैमेट ने उसे बिना किसी लाग-लपेट के पन्नों पर उतार दिया। उनके जासूस, चाहे वो ‘सैम स्पेड’ हो या ‘कॉन्टिनेंटल ऑप’, कोई दूध के धुले नायक नहीं थे। वे ख़ुद चालबाज़, बेरहम, हरजाई और थके, उकताए हुए लोग थे, जो जानते थे कि इस दुनिया में मुक़म्मल इंसाफ़ जैसी कोई चीज़ नहीं होती। हैमेट ने दुनिया को सिखाया कि असल जासूसी अंधेरी गलियों में लगने वाली ठोकरों और अपनों से मिलने वाले धोखे का नाम है।

इसी बेबाक और सियाह मिज़ाज की गवाह है उनकी मशहूर तिकड़ी–‘रेड हार्वेस्ट’, ‘द डेन कर्स’ और ‘माल्टीज़ फाल्कन’।

हिंदी जगत के लिए यह किसी तोहफ़े से कम नहीं है कि इन शाहकारों को सुश्री सबा ख़ान ने अपनी क़लम की नफ़ासत से सँवारा है। उन्होंने हैमेट की उस तेज़-तर्रार धारदार ज़ुबान और थ्रिलर के मिज़ाज को इस तरह ढाला है कि पढ़ते हुए आपको अनुवाद का अहसास तक नहीं होगा। अगर आप ज़ुर्म के पीछे छिपी इंसानी फ़ितरत के असली मुसाफ़िर हैं, तो हैमेट की यह जादुई और ख़तरनाक दुनिया आपका इंतज़ार कर रही है।

+91 9867765305 पर DH COMBO लिखकर भेजें। या फिर DM करें।


विश्व अपराध कथा साहित्य के शैदाईयों में शायद ही कोई ऐसा होगा, जो डैशिएल हैमेट के नाम से अनजान हो। मगर हैमेट महज़ एक लेखक...
22/05/2026

विश्व अपराध कथा साहित्य के शैदाईयों में शायद ही कोई ऐसा होगा, जो डैशिएल हैमेट के नाम से अनजान हो। मगर हैमेट महज़ एक लेखक नहीं, बल्कि ज़ुर्म की दुनिया के पहले सच्चे गवाह थे। कागज़ पर स्याही बिखेरने से पहले उन्होंने ख़ुद ‘पिंकरटन डिटेक्टिव एजेंसी’ के लिए बरसों तक सड़कों पर असली मुज़रिमों का पीछा किया था। यही वज़ह रही कि जब उन्होंने कलम चलानी शुरू की, तो जासूसी उपन्यासों की रवायत हमेशा के लिए बदल गई। उन्होंने शरलॉक होम्स या अगाथा क्रिस्टी के किरदारों की तरह मख़मली कमरों में बैठकर पहेलियाँ नहीं सुलझाईं, बल्कि अदब को उस ज़हरीली हवा, धूल और बारूद के बीच ले गए, जहाँ ज़ुर्म पनपता है, पनाह लेता है। हैमेट का मानना था कि खून बहता है तो कपड़े गंदे होते हैं और जब इंसान बिखरता है, तो उसका ज़मीर घुटनों पर आ जाता है।

उनकी उँगली हमेशा वक़्त की नब्ज़ पर रही। 1920 के दशक का अमेरिका जिस पूंजीवाद, धोखे और सियासी सड़ांध के दौर से गुज़र रहा था, हैमेट ने उसे बिना किसी लाग-लपेट के पन्नों पर उतार दिया। उनके जासूस, चाहे वो ‘सैम स्पेड’ हो या ‘कॉन्टिनेंटल ऑप’, कोई दूध के धुले नायक नहीं थे। वे ख़ुद चालबाज़, बेरहम, हरजाई और थके, उकताए हुए लोग थे, जो जानते थे कि इस दुनिया में मुक़म्मल इंसाफ़ जैसी कोई चीज़ नहीं होती। हैमेट ने दुनिया को सिखाया कि असल जासूसी अंधेरी गलियों में लगने वाली ठोकरों और अपनों से मिलने वाले धोखे का नाम है।

इसी बेबाक और सियाह मिज़ाज की गवाह है उनकी मशहूर तिकड़ी–‘रेड हार्वेस्ट’, ‘द डेन कर्स’ और ‘माल्टीज़ फाल्कन’।

हिंदी जगत के लिए यह किसी तोहफ़े से कम नहीं है कि इन शाहकारों को सुश्री सबा ख़ान ने अपनी क़लम की नफ़ासत से सँवारा है। उन्होंने हैमेट की उस तेज़-तर्रार धारदार ज़ुबान और थ्रिलर के मिज़ाज को इस तरह ढाला है कि पढ़ते हुए आपको अनुवाद का अहसास तक नहीं होगा। अगर आप ज़ुर्म के पीछे छिपी इंसानी फ़ितरत के असली मुसाफ़िर हैं, तो हैमेट की यह जादुई और ख़तरनाक दुनिया आपका इंतज़ार कर रही है।

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अपराध’ यह एक शब्द भर नहीं है, इसका अपना एक इतिहास है, जो अनादिकाल से समाज के समांतर चलता आ रहा है, घृणा, द्वेष , भय और य...
11/05/2026

अपराध’ यह एक शब्द भर नहीं है, इसका अपना एक इतिहास है, जो अनादिकाल से समाज के समांतर चलता आ रहा है, घृणा, द्वेष , भय और यहाँ तक कि हास्य भी इसके रंग हैं। हत्या जहाँ भय उत्पन्न करती है, वहीं बलात्कार घृणा उत्पन्न करता है। पीढ़ी डर पीढ़ी चलने वाली दुश्मनी द्वेष का वो रंग पैदा करती है कि जाने कितने घरों के चिराग़ असमय ही बुझ जाते हैं । इससे इतर ठगी की छोटी घटनाएं हास्य भी उत्पन्न करती हैं कि फ़लाँ को कैसा बेवकूफ बनाया गया। इन सब रंगों से अलग एक अन्य रंग भी है और वो है बाहुबली बनने का नशा। यह जानते हुए भी कि अपराध का जीवन लंबा नहीं होता, यह युवाओं के लिए दुर्लभ स्वप्न होता है, जो किसी किसी का ही पूरा होता है। हालाँकि जिसका पूरा होता है, मिलता उसे भी कभी कुछ नहीं, पर फिर भी इसका क्रेज है और ताज्जुब की बात ये कि समाज बाहुबलियों को नफ़रत की निगाह से देखता भी नहीं। ऐसा ही एक युवा था डिप्टी, जिसने बाहुबली बनने का सपना देखा था। सपना देखा और सपना पूरा भी होगा, पर क्या उसे कुछ मिला? मिला तो क्या मिला? कोई तीन बरस पहले आए उपन्यास –‘डेड एंड’ के नायक ‘डिप्टी’ की कहानी वहीं ख़त्म मान ली गई थी। लेकिन ‘पिथोरा फाइल्स’ उस आदमी की वापसी की कहानी नहीं है, बल्कि उसके बचे रह जाने की कहानी है। इस तरह से बचे रहने की, जिसमें चमत्कार से कहीं ज्यादा अपनी शर्तों पर जीने की ज़िद का दख़ल होता है। डिप्टी, जो ‘डिप्टी भैया’ के रूप में धीरे-धीरे उन लोगों तक पहुँचता है, जिनसे उसका हिसाब बाकी है। उसकी ज़िंदगी में बदला उतना अहम नहीं, बल्कि उस दुनिया से टकराने का जज़्बा अहम है, जिसने उसे यहाँ तक पहुँचा दिया। इस सफ़र में डिप्टी ने बहुत कुछ खोया और खोता भी है – लोग, रिश्ते और भरोसा। लेकिन इसके बावजूद वह थमता नहीं। न वह अपने किए को सही ठहराता है, न उससे बचने की कोशिश करता है। ‘पिथोरा फाइल्स’ उसी ‘डिप्टी भैया’ की कहानी है, जो टूटने से कहीं ज्यादा हर बार किसी तरह खड़ा रह जाता है।

किताब अमेजन प्राइम पर उपलब्ध या 098677 65305 पर FILES लिखकर भेजें।

Link : https://amzn.in/d/0ebHGKVm

 की इस किताब ने सफलता के नए प्रतिमान स्थापित किए हैं। १००० से कुछ ऊपर प्रतियों की सेल, उसके बाद इधर कई महीनों से किताब आ...
10/05/2026

की इस किताब ने सफलता के नए प्रतिमान स्थापित किए हैं। १००० से कुछ ऊपर प्रतियों की सेल, उसके बाद इधर कई महीनों से किताब आउट ऑफ स्टॉक थी। तकनीकी रूप से ये तीसरा संस्करण है, मगर दूसरे संस्करण का ही रिप्रिंट है। किताब अमेजन प्राइम पर उपलब्ध हो गई है। इसके अतिरिक्त ₹ 275/- में फ्री डिलीवरी में ये सीधे हमारे आधिकारिक नंबर +91 9867765305 पर DEV लिखकर भेजें।

लिंक : https://amzn.in/d/03w8nzSA





प्रिय पाठकों, प्री ऑर्डर वाले सभी सदस्यों की पुस्तकें उन तक पहुंच चुकी हैं। अगर आपने अभी तक ये पुस्तक नहीं ली हैं, तो आप...
29/04/2026

प्रिय पाठकों,

प्री ऑर्डर वाले सभी सदस्यों की पुस्तकें उन तक पहुंच चुकी हैं। अगर आपने अभी तक ये पुस्तक नहीं ली हैं, तो आप भी ₹ 285/- फ्री डिलीवरी में ये पुस्तक मंगवा सकते हैं।

ऑर्डर हेतु 098677 65305 पर FILES लिखकर भेजें।

बुलंदशहर की राजनीति, राजनीतिक गठजोड़, माफिया, और टकराव से भरा ये उपन्यास निश्चित तौर पर उस दौर से भी बहुत आगे की कहानी है जहां आपने राजवीर सिंह उर्फ डिप्टी भैया के उत्थान और पतन की पटकथा डेड एंड में पढ़ी थी। बहुत से पाठकों को उसके अंत से शिकायत हुई थी। मगर इस बार डिप्टी वापस आया है, नए घात प्रतिघात हैं, दुश्मनों के वार हैं, डिप्टी पर चोट है, उसकी अंतर्रात्मा की कचोट है। और फिर महत्वाकांक्षाओं का कब कोई छोर हुआ है?

मनोरंजन के सभी पैमानों पर खरा उतरता ये उपन्यास अब तुरंत उपलब्ध है।

आभार
शब्दगाथा प्रकाशन समूह।

बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में जब किशोर साहित्य में साहस और जिज्ञासा की नई लहर उठ रही थी, तभी एक चरित्र ने जन्म लिया...
28/02/2026

बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में जब किशोर साहित्य में साहस और जिज्ञासा की नई लहर उठ रही थी, तभी एक चरित्र ने जन्म लिया, जिसे हम सब ‘नैंसी ड्रियू’ के नाम से जानते हैं।

वह केवल एक काल्पनिक जासूस भर नहीं थी, वह स्वतंत्र सोच, तर्क बुद्धि और निर्भीक किशोर मन का प्रतीक बन गई। अपने समय की सामाजिक सीमाओं के बीच खड़ी यह किशोरी न केवल रहस्यों को सुलझाती है, सत्य की खोज करती है, बल्कि हर परिस्थिति में संयम बनाए रखती है।

हम-आप तमाम समेत दुनिया भर में कई पीढ़ियों ने उसके साथ रहस्यमय हवेलियों में क़दम रखा, गुमशुदा विरासतों की तलाश की और अनसुलझी पहेलियों को सुलझाया।
‘नैंसी ड्रियू’ ने यह सिद्ध किया कि जासूसी केवल रोमांच नहीं, बल्कि बुद्धि, साहस और नैतिकता का संगम है।

हमें निहायत ख़ुशी हो रही है कि अब वही क्लासिक रहस्य परंपरा हिंदी पाठकों के लिए उपलब्ध है। नैंसी ड्रियू की आरंभिक चार कृतियाँ शायद पहली बार हिंदी में प्रस्तुत की जा रही हैं। हमारा प्रयास है कि एक वैश्विक साहित्यिक विरासत अपनी भाषा में भी जीवित हो सके।
यह केवल अनुवाद नहीं है, एक सांस्कृतिक सेतु है। साथ ही बचपन की वो याद है जब आज के इस डिजिटल युग में मोबाइल की जगह ये किताबें हमारे हाथों में होती थीं।

अनुवादकों की दुनिया में आप सभी का विश्वास जीत चुकीं सबा खान जी ने इन चारों किताबों का अनुवाद किया है।

‘ब्लू लैंटर्न’ के माध्यम से हम इस प्रतिष्ठित शृंखला को हिंदी पाठकों के हाथों में उसी गंभीरता और सम्मान के साथ, जिसके वह योग्य है, सौंप रहे हैं।

दिए गए नंबर पर संदेश भेजें और अपनी प्रति सुरक्षित करें। किताबें उपलब्ध हैं।



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