11/05/2026
अपराध’ यह एक शब्द भर नहीं है, इसका अपना एक इतिहास है, जो अनादिकाल से समाज के समांतर चलता आ रहा है, घृणा, द्वेष , भय और यहाँ तक कि हास्य भी इसके रंग हैं। हत्या जहाँ भय उत्पन्न करती है, वहीं बलात्कार घृणा उत्पन्न करता है। पीढ़ी डर पीढ़ी चलने वाली दुश्मनी द्वेष का वो रंग पैदा करती है कि जाने कितने घरों के चिराग़ असमय ही बुझ जाते हैं । इससे इतर ठगी की छोटी घटनाएं हास्य भी उत्पन्न करती हैं कि फ़लाँ को कैसा बेवकूफ बनाया गया। इन सब रंगों से अलग एक अन्य रंग भी है और वो है बाहुबली बनने का नशा। यह जानते हुए भी कि अपराध का जीवन लंबा नहीं होता, यह युवाओं के लिए दुर्लभ स्वप्न होता है, जो किसी किसी का ही पूरा होता है। हालाँकि जिसका पूरा होता है, मिलता उसे भी कभी कुछ नहीं, पर फिर भी इसका क्रेज है और ताज्जुब की बात ये कि समाज बाहुबलियों को नफ़रत की निगाह से देखता भी नहीं। ऐसा ही एक युवा था डिप्टी, जिसने बाहुबली बनने का सपना देखा था। सपना देखा और सपना पूरा भी होगा, पर क्या उसे कुछ मिला? मिला तो क्या मिला? कोई तीन बरस पहले आए उपन्यास –‘डेड एंड’ के नायक ‘डिप्टी’ की कहानी वहीं ख़त्म मान ली गई थी। लेकिन ‘पिथोरा फाइल्स’ उस आदमी की वापसी की कहानी नहीं है, बल्कि उसके बचे रह जाने की कहानी है। इस तरह से बचे रहने की, जिसमें चमत्कार से कहीं ज्यादा अपनी शर्तों पर जीने की ज़िद का दख़ल होता है। डिप्टी, जो ‘डिप्टी भैया’ के रूप में धीरे-धीरे उन लोगों तक पहुँचता है, जिनसे उसका हिसाब बाकी है। उसकी ज़िंदगी में बदला उतना अहम नहीं, बल्कि उस दुनिया से टकराने का जज़्बा अहम है, जिसने उसे यहाँ तक पहुँचा दिया। इस सफ़र में डिप्टी ने बहुत कुछ खोया और खोता भी है – लोग, रिश्ते और भरोसा। लेकिन इसके बावजूद वह थमता नहीं। न वह अपने किए को सही ठहराता है, न उससे बचने की कोशिश करता है। ‘पिथोरा फाइल्स’ उसी ‘डिप्टी भैया’ की कहानी है, जो टूटने से कहीं ज्यादा हर बार किसी तरह खड़ा रह जाता है।
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