16/08/2026
बिहार में अंडरवर्ल्ड के इतिहास में मुजफ्फरपुर का अलग स्थान रहा है। इस धरती पर जहां कई क्रांतिकारियों ने जन्म लिया, वहीं अंडरवर्ल्ड के कई बड़े डॉन ने मुजफ्फरपुर को अपना ठिकाना बनाया। जिस दौर में भारत के बड़े माफियाओं के पास भी एके-47 जैसे अत्याधुनिक हथियार नहीं थे, उस दौर में मुजफ्फरपुर में इसकी गर्जना सुनी जाने लगी थी।
एके 47 से बिहार में संभवत: पहली हत्या 1990 में हुई थी। अंडरवर्ल्ड डॉन अशोक सम्राट ने अपने प्रिय रहे मिनी नरेश की हत्या का बदला लेने के लिए मुजफ्फरपुर के छाता चौक पर एके 47 की हनक दिखाई थी। बिहार में पहली बार एके 47 से हत्या हुई थी।
एके 47 की हनक का आलम यह था कि छाता चौक पर काजी मोहम्मदपुर थाने के ठीक सामने दिन दहाड़े मिनी नरेश की हत्या के मुख्य आरोपी डॉन चंद्रश्चर सिंह की हत्या की गई थी
इसके बाद न तो अशोक सम्राट ने पीछे मुड़कर देखा और न एके 47 की हनक ने। अंडरवर्ल्ड डॉन की लाश तो बिछती गई, लेकिन एके 47 की हनक आज तक कायम है। मुजफ्फरपुर के पूर्व मेयर समीर कुमार की हत्या ने एक बार फिर इस शहर में एके 47 के खौफ को कायम कर दिया है।
मुजफ्फरपुर में एके 47 की हनक और अंडरवर्ल्ड की कहानी जानने के लिए आपको थोड़ा पीछे की तरफ लेकर जाता हूं। ..
एलएस कॉलेज से शुरू होती है अंडरवर्ल्ड की कहानी
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि मुजफ्फरपुर में माफिया, गुंडागर्दी, अंडरवर्ल्ड चाहे कोई और नाम दे दीजिए, इसकी कहानी बिहार के सबसे प्रतिष्ठित कॉलेज लंगट सिंह महाविद्यालय से शुरू होती है। इस कॉलेज कैंपस से शुरू हुई वर्चस्व की जंग में अब तक सैकड़ों लाश गिर चुकी है। इसी कैंपस से निकले कई छात्रों ने अंडरवर्ल्ड में दशकों तक राज किया है।
1971-72 में पहली बार बम चला 1978 में पहली लाश गिरी कैंपस में
दरअसल उत्तर बिहार के सबसे बड़े शहर मुजफ्फरपुर को शैक्षणिक गढ़ भी माना जाता था। दो बड़े कॉलेज लंगट सिंह कॉलेज और रामदयालू कॉलेज के अलावा यहां बिहार यूनिवर्सिटी थी। जिसके कारण आसपास के सैकड़ों छात्र यहां शिक्षा ग्रहण करने आते थे।
इन छात्रों में क्षेत्रवाद और जातिवाद बुरी तरह हावी था। इसके कारण यहां पढ़ने वाले छात्र कई गुटों में विभाजित रहे। हजारों एकड़ में फैले लंगट सिंह कॉलेज कैंपस में शुरुआती दौर में तीन हॉस्टल थे। जिसमें ड्यूक हॉस्टल का अपना वर्चस्व था। हॉस्टल में 60 के दशक से वर्चस्व की जंग शुरू हुई।
जंग शुरू करने वालों में शामिल थे बेगूसराय और मुंगेर अंचल से आए छात्र। इनकी अदावत थी मुजफ्फरपुर जिले के स्थानीय युवाओं से। भुमिहार और राजपुतों के साथ शुरू हुई वर्चस्व की जंग में कैंपस में पहली लाश गिरी 1978 में। हालांकि इससे पहले साठ और सत्तर के दशक में भी कैंपस में मारपीट होती थी, पर किसी छात्र या दबंग की हत्या नहीं हुई थी।
कॉलेज कैंपस में पहली बार बम और गोली भी चलाई थी बेगुसराय के छात्र ने ही। साल 1971-72 में बेगुसराय निवासी कम्युनिस्ट नेता सुखदेव सिंह के पुत्र वीरेंद्र सिंह ने अपनी दबंगई कायम करने के लिए पहली बार कैंपस में बम और गोली चलाई थी। ड्यूक हॉस्टल पर बम और गोलियों से हमला किया गया था। इस वारदात के बाद एलएस कॉलेज कैंपस में हर दूसरे महीने बम के धमाके सुने जाने लगे। धीरे-धीरे वर्चस्व की लड़ाई तेज होती गई। साल 1978 में कॉलेज कैंपस में पहली लाश गिरी मोछू नरेश के रूप में। यह वर्चस्व की जंग में पहली हत्या थी।
1978 : मोछू नरेश की हत्या से शुरू हुआ खूनी संघर्ष
दबंग छात्र रहे मोछू नरेश की हत्या ने कॉलेज और यूनिवर्सिटी कैंपस को आतंक का गढ़ बना दिया। मोछू नरेश की हत्या में नाम आया बेगूसराय के कामरेड सुखदेव सिंह के पुत्र वीरेंद्र सिंह का।
कैंपस में हत्याओं की नींव डाली बेगूसराय के छात्रों ने ही। पर सबसे बड़ा तथ्य यह है कि सबसे अधिक लाश भी गिरी बेगुसराय के छात्रों की ही। मोछू नरेश के बाद कैंपस में दबंगई कायम की मिनी नरेश ने।
मोछू नरेश की गद्दी संभालते ही मिनी नरेश कैंपस में अपनी दहशत कायम की। उसे राजनीतिक और बाहरी संरक्षण भी मिला। जिसके कारण विरेंद्र सिंह को शांत होना पड़ा। पर अंदरूनी अदावत जारी रही। दोनों का ठिकाना कॉलेज और यूनिवर्सिटी हॉस्टल ही रहा।
1983 : मिनी नरेश का वर्चस्व
मोछू नरेश की गद्दी संभाल रहे मिनी नरेश ने कॉलेज कैंपस से ही अपना वर्चस्व कायम किया। उसे अशोक सम्राट जैसे अंडरवर्ल्ड डॉन का समर्थन प्राप्त था। यह वह दौर था जब बिहार यूनिवर्सिटी का कई सौ एकड़ में अपना कैंपस बन रहा था।
एलएस कॉलेज कैंपस से सटे इस नए साम्राज्य का विस्तार हो रहा था। इस साम्राज्य पर भी अपने अधिकार का जंग शुरू हो गया था। मिनी नरेश ने कई हॉस्टल और डिपार्टमेंट का ठेका भी लिया। इसमें मोटी कमाई हो रही थी।
अशोक सम्राट का अपने ऊपर हाथ होने के कारण मिनी नरेश ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1983 में मिनी नरेश ने ठेकेदार रामानंद सिंह की हत्या कर दी। इसी दौर में मोतिहारी से मुजफ्फरपुर में आ बसे चंदेश्वर सिंह अपना वर्चस्व कायम कर रहा था। उसके रास्ते का सबसे बड़ा कांटा बना था वीरेंद्र सिंह।
1983 में चंदेश्वर सिंह ने छाता चौक पर वीरेंद्र सिंह की हत्या कर मुजफ्फरपुर के डॉन के रूप में अपनी दस्तक दी।
ठेकेदारी की जंग एलएस कॉलेज और बिहार यूनिवर्सिटी कैंपस से शुरू हुई अंडरवर्ल्ड की कहानी से इतर कैंपस से बाहर भी अंडरवर्ल्ड की दूसरी कहानी चल रही थी।
इस कहानी के नायक थे बाहूबली अंडरवर्ल्ड डॉन अशोक सम्राट और एलएस कॉलेज कैंपस से ही निकले छोटन शुक्ला। वैशाली जिले के साधारण परिवार से आने वाले छोटन शुक्ला ने 12वीं की पढ़ाई के लिए एलएस कॉलेज में नामांकन करवाया। इसी वक्त उनके पिता की हत्या हो गई। कलम थामने के लिए उठे हाथ ने बंदूक थाम ली।
छोटन शुक्ला ने काफी तेजी से अंडरवर्ल्ड की दुनिया में अपनी दबंगता कायम की। यह वह दौर था जब पूरे तिरहुत प्रमंडल में ठेकेदारी में वर्चस्व की जंग चल रही थी। अशोक सम्राट का यहां एकछत्र राज था। उन्हें राजनीति संरक्षण मिला था बिहार के चर्चित नेता हेमंत शाही का। उधर मोतिहारी से मुजफ्फरपुर आए चंदेश्वर सिंह ने भी शहर में अपनी दहशत कायम कर ली थी। चंदेश्वर सिंह के ऊपर हाथ था उत्तर बिहार के सबसे दबंग नेता रघुनाथ पांडे का। चंदेश्वर सिंह के नाम से पूरा शहर कांपने लगा था। ठेकेदारी में सबसे अधिक पैसा था। इसलिए हर कोई इसमें वर्चस्व चाहता था। वर्चस्व की जंग में लाशें गिरनी शुरू हो गई थी। एक दूसरे के कारिंदों पर गोलियां दागी जाने लगी थी। पर सबसे बड़ी लाश गिरी चंदेश्वर सिंह के बेटे के रूप में।
1986 : चंदेश्वर सिंह के बेटे की हत्या
ठेकेदारी में वर्चस्व की जंग में सबसे बड़ी लाश गिरी 1986 में। चंदेश्वर सिंह के बेटे की हत्या उसके तिलक के दिन ही कर दी गई। हत्या की थी अशोक सम्राट ने। इस हत्या में मिनी नरेश का नाम भी सामने आया था। निशाने पर चंदेश्वर सिंह ही थे, लेकिन हत्या हो गई उनके बेटे की। शादी के घर में कोहराम मच गया था। बदले की आग में जल रहे चंदेश्वर सिंह मौके की तलाश में जुटा रहा। मौका मिला तीन साल बाद।
1989 : मिनी नरेश की हत्या
बिहार यूनिवर्सिटी कैंपस के पीजी ब्वॉयज हॉस्टल नंबर तीन से अपना गिरोह संचालित कर रहे मिनी नरेश ने कैंपस में एकाधिकार जमा लिया था। हाल यह था कि एलएस कॉलेज और यूनिवर्सिटी में मिनी नरेश का ही आदेश चलता था। एक दशक से अधिक समय तक मिनी नरेश ने कैंपस में राज किया। उस दौर में कैंपस में सरस्वती पूजा का जबर्दस्त क्रेज था। हजारों रुपए का चंदा जमा होता था। सबसे बड़ी और भव्य पूजा पीजी हॉस्टल नंबर पांच में होती थी। यह पूजा पूरी तरह मिनी नरेश के संरक्षण में होती थी। दस फरवरी 1989 को ठीक सरस्वती पूजा के दिन ही पीजी हॉस्टल नंबर पांच बम और गोलियों के धमाके से गूंज उठा। हर तरफ से बमों के धमाकों की आवाज आ रही थी। चंदेश्वर सिंह और उसके गुर्गों ने मिनी नरेश को संभलने का मौका तक नहीं दिया। सरस्वती पूजा के दिन कैंपस में मिनी नरेश की हत्या कर दी गई। बेगूसराय के राहतपुर निवासी मिनी नरेश की हत्या के बाद कई दिनों तक कैंपस खाली रहा। हॉस्टल विरान हो गए। किसी बड़ी अनहोनी की आशंका में क्लास तक नहीं चले। चंदेश्वर सिंह के अलावा इस हत्याकांड में पहली बार नाम आया छोटन शुक्ला का।
1990 : मिनी नरेश की हत्या का बदला
जिस फिल्मी और बेखौफ अंदाज में मिनी नरेश की हत्या हुई थी उसने बिहार के अंडरवर्ल्ड को हिला कर रख दिया था। बताया जाता है कि उस वक्त हॉस्टल नंबर पांच में हर जगह बम के छर्रे के निशान थे। करीब दो सौ बम दागे गए थे। मिनी नरेश की हत्या के बाद चंदेश्वर सिंह अंडरग्राउंड हो गए थे। मिनी नरेश के आका रहे अशोक सम्राट ने बदला लेने का खुला ऐलान कर रखा था। यही वह दौर था जब बिहार के अंडरवर्ल्ड में एके 47 पहुंच चुका था, लेकिन अब तक उसका इस्तेमाल नहीं हुआ था। अशोक सम्राट ने ठीक एक साल बाद 1990 में उसी फिल्मी अंदाज में ठीक सरस्वती पूजा के दिन ही छाता चौक पर दिनदहाड़े चंदेश्वर सिंह की हत्या कर दी। छाता चौक पर ही काजी मोहम्मदपुर थाना है। पर एके 47 की गूंज ने पुलिसवालों को भी ठिठकने पर मजबूर कर दिया। बिहार के अपराध के इतिहास में पहली बार एके 47 का इस्तेमाल हुआ था। चंदेश्वर सिंह को करीब 40 गोलियां मारी गई थी। इस हत्या ने एक झटके में अशोक सम्राट को उत्तर बिहार का बेताज बादशाह बना दिया। यह एके 47 की धमक ही थी पूरे बिहार का अंडरवर्ल्ड अशोक सम्राट के नाम से कांपने लगा था। मिनी नरेश की हत्या का बदला ले लिया गया था। चंदेश्वर सिंह की हत्या ने छोटन शुक्ला को विचलित कर दिया था। इसके बाद दोनों तरफ लाशें गिरने लगी। अशोक सम्राट और छोटन शुक्ला की अदावत खुलकर सामने आ गई थी। ठेकेदारी के वर्चस्व से शुरू हुई लड़ाई अब अंडरवर्ल्ड में बादशाहत तक आ गई थी। एक दूसरे के करीबियों को चुन चुन कर मारा जाना लगा। अगली बड़ी लाश गिरी थी गब्बर सिंह की। लंगट सिंह कॉलेज कैंपस में ठीक महात्मा गांधी की मूर्ति के सामने। इस लाश का तात्लुक भी बेगुसराय से ही था।.मुजफ्फरपुर के अंडरवर्ल्ड में एक तरफ अशोक सम्राट था, दूसरी तरफ छोटन शुक्ला।
#वो_माचिस_भी_हमारी_थी_वो_इवादत_भी_हमारा_था ,,
#वो_वादे_भी_हमारे_थे_वो_सिक्का_भी_हमारा_था...!!
#मुजफ्फरपुर_अंडरवर्ल्ड की इनसाइड स्टोरी-2
90 के दशक में मिनी नरेश और चंदेश्वर सिंह की हत्या ने मुजफ्फरपुर में एक अलग तरह का माहौल पैदा कर दिया था। लोग हमेशा सशंकित रहते थे कि कब किसकी लाश गिर जाए। सबसे ज्यादा दहशत का माहौल लंगट सिंह कॉलेज और बिहार यूनिवर्सिटी कैंपस में रहता था। किसी के साथ हाथापाई की मामूली खबर उड़ते ही धड़ाधड़ क्लासरूम में बंद हो जाते थे। कक्षाएं स्वत: स्थगित हो जाती थी। वर्चस्व की जंग अब जाति से ऊपर उठकर पूरी तरह क्षेत्रवाद की जद में आ चुकी थी। भूमिहार वर्सेज भूमिहार की जंग शुरू हो गई थी।
एक तरफ मुंगेर अंचल से आए भूमिहारों का ग्रुप था, जिसमें बेगुसराय के भूमिहार सबसे अधिक दबंग थे। वीरेंद्र सिंह, अशोक सम्राट से लेकर मिनी नरेश तक सभी इसी अंचल से आए दबंग थे। दूसरी तरफ तिरहूत अंचल के भूमिहार थे, जिसका प्रतिनिधित्व रघुनाथ पांडे, छोटल शुक्ला, भुटकुन शुक्ला जैसे दबंग कर रहे थे। भूमिहारों की इस आपसी लड़ाई का सबसे बड़ा फायदा उठाया बृजबिहारी प्रसाद ने। बृजबिहारी भी कैंपस की ही पैदाइश थे, लेकिन यह कैंपस लंगट सिंह कॉलज और बिहार यूनिवर्सिटी का कैंपस नहीं था। वह कैंपस था मुजफ्फरपुर इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी यानि एमआईटी का। दोनों कैंपस शहर के दो छोर पर था।
बिहार यूनिवर्सिटी कैंपस में बर्चस्व की जंग में भूमिहार आपस में लड़ रहे थे, वहीं शहर के दूसरी छोर पर बसे एमआईटी कैंपस से निकलकर बृजबिहारी ने पूरे बैरिया क्षेत्र में बेहद कम समय में अपनी दबंगई कायम कर ली थी। भूमिहारों की आपसी लड़ाई का सबसे अधिक फायदा बृज बिहारी प्रसाद ने ही उठाया। वह दलितों, पिछड़ों और बनियों का सबसे बड़ा मसीहा बन कर उभरा। तमाम पिछड़ी जातियों को उसने संगठित कर अपना साम्राज्य खड़ा कर लिया। बता दूं कि यही वो समय था जब बिहार की राजनीति में लालू यादव भी अपनी चरम पर थे।
#1991गब्बर_सिंह_की_हत्या ,
उधर, इस बीच यूनिवर्सिटी कैंपस में लाशों का गिरना जारी रहा। मिनी नरेश की हत्या के बाद यूनिवर्सिटी और लंगट सिंह कॉलेज कैंपस में नया नाम उभरा गब्बर सिंह का। 1991 में हिन्दी फिल्म आई थी 100 डेज। इसी फिल्म का एक गाना था..गब्बर सिंह यह कहकर गया जो डर गया वो मर गया। कैंपस में इस गाने ने गब्बर सिंह को चमकाने में और मदद की।
बगल में बाल्टी में रखा था बम
सबसे आश्चर्य इस बात का था कि गब्बर सिंह को भी पता था कि आज उस पर हमला होने वाला है। वह भी पूरी तैयारी के साथ कैंपस में था। खुले कैंपस में चबूतरे पर बैठकर वह धूप सेंक रहा था। जहां उसकी हत्या हुई ठीक वहीं पर बाल्टी में उसने बम रखा हुआ था। मेरा अपना मानना है कि गब्बर सिंह के भी दिलो दिमाग पर भी वही गाना छाया हुआ था..गब्बर सिंह यह कहकर गया जो डर गया वो मर गया। इसीलिए वह बेखौफ अंदाज में अपने दुश्मनों को चुनौती देते हुए वहां खुले चबूतरे पर बैठा था। पर अपराधियों ने गांधी उद्यान में पीछे से उसपर हमला किया। एक के बाद एक कई बम दागे गए और गब्बर सिंह के आतंक का खात्मा हुआ। इसके बाद तो जैसे कैंपस में हत्याओं का दौर शुरू हो गया। चुन-चुनकर एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वियों की हत्या शुरू हुई। कई-कई दिनों तक कॉलेज और यूनिवर्सिटी बंद रहे। कॉलेज और यूनिवर्सिटी का हॉस्टल अपराधियों की पनाहगार बनी। हाल यह था कि पुलिस भी हॉस्टल के अंदर जाने से घबराती थी। इन दबंग छात्रों को अशोक सम्राट, छोटन शुक्ला, रघुनाथ पांडे, हेमंत शाही जैसे लोगों का अघोषित संरक्षण भी मिला था। मानस चौधरी और बबलू त्रिवेदी का उत्थान इसी दौर में हुआ था।
#प्रोफेसर_बागेश्वरी_बाबू_की_हत्या_ने_चौंकाया,
यही वह दौर था जब पूरे बिहार में शिक्षकों पर भी हमले शुरू हुए। ट्यूशन और कोचिंग करने वाले प्रोफेसरों से रंगदारी वसूली जाने लगी। सबसे सम्मानजनक पेशा समझा जाने वाले प्रोफेसर्स डर के साए में रहने लगे। प्रोफेसर्स से रंगदारी मानने की घटना ने पूरे बिहार को हिला कर रख दिया। इसी बीच लंगट सिंह कॉलेज कैंपस में वरिष्ठ प्रोफेसर बागेश्वरी बाबू की हत्या हो गई। कॉलेज हॉस्टल में अवैध रूप से रह रहे आउट साइडर्स के खिलाफ उनकी सख्ती और विरोध छात्रों को रास नहीं आई। मनोविज्ञान के प्रोफेसर वागेश्वरी प्रसाद सिंह दबंग छात्रों का मनोविज्ञान पढ़ नहीं सके। वे लंगट सिंह कॉलेज के ड्यूक हॉस्टल के अधीक्षक भी थे। उन्होंने हॉस्टल को अपराध मुक्त करने की ठानी और कड़ी कार्रवाई की। पुलिस की भी उन्होंने मदद ली। पर जानबूझकर या फिर बाहर बैठे आकाओं के इशारे पर मुजफ्फरपुर पुलिस ने कभी हॉस्टल के अंदर कदम नहीं रखा। प्रो. बागेश्वरी प्रसाद अकेले संघर्ष करते रहे। पर दबंग छात्रों ने उन्हें ही रास्ते से हटा दिया। साल 1994 में कार्तिक पूर्णिमा के दिन कॉलेज कैंपस में मॉर्निंग वॉक कर रहे बागेश्वरी बाबू को गोली मार दी गई। इस हत्या ने जहां एक तरफ कैंपस में अपराधियों के हौसले बुलंद कर दिए, वहीं दूसरी तरफ शिक्षकों में भय का माहौल पैदा हो गया। जो चंद शिक्षक कैंपस को अपराध मुक्त बनाने का संकल्प लेकर खड़े थे, उन्होंने चुप रहने में ही भलाई समझी। यह कैंपस के इतिहास की पहली और आखिरी घटना थी जिसमें किसी शिक्षक की हत्या कैंपस के अंदर की गई। इस हत्या का परिणाम यह हुआ कि बागेश्वरी बाबू शहीद माने गए और आम छात्रों में दबंगों के खिलाफ आक्रोश पैदा हुआ। एक निर्दोष शिक्षक की हत्या ने आम छात्रों का एक तरह से कहें तो हृदय परिवर्तन किया और कैंपस की गुंडगार्दी अपने आप कम होती गई। पुलिस की सख्ती भी बढाई गई। कैंपस में पुलिस चौकी खुल गई। दबंग छात्र कैंपस के बाहर से अपनी गतिविधियों का संचालन करने लगे। हालांकि मानस चौधरी और बबलू त्रिवेदी गैंग के बीच यदा कदा झड़प की खबरें आती रही। इसी दौर में लंगट सिंह कॉलेज के दो हॉस्टल बंद कर दिए गए। लंगट हॉस्टल और न्यू हॉस्टल को सीआरपीएफ के हवाले कर दिया गया। यहां सीआरपीएफ कैंप बना दिया गया। सिर्फ ड्यूक हॉस्टल में ही छात्रों के लिए जगह उपलब्ध थी। सीआरपीएफ कंपनी के कैंपस में आ जाने के बाद निश्चित तौर पर कैंपस में संगठित अपराधियों के गैंग पर लगाम लगी ..
कैंपस में भले ही शांति थी, लेकिन कैंपस के बाहर वर्चस्व की जंग बद्स्तुर जारी थी। बृजबिहारी दलितों और पिछड़ी जातियों का रॉबिन हुड बन चुका था। उसकी सीधी अदावत भूमिहार दबंगों से थी। बृजबिहारी को जहां एक तरफ शहर के बनियों का समर्थन हासिल था, वहीं पटना की राजनीति में भी उसने पैठ बना ली थी। उधर मिनी नरेश की हत्या और उसकी हत्या का बदला लेने के बाद अशोक सम्राट भी मुजफ्फरपुर में कम दिलचस्पी रखने लगा था। इसका सीधा फायदा मिला छोटन शुक्ला को। छोटन शुक्ला से अधिक दहशत उसके छोटे भाई भुटकुल शुक्ला की थी।
#जातियों_में_बंटा_अंडरवर्ल्ड
90 के दशक के शुरुआती वर्षों में जबर्दस्त मारकाट के बाद भूमिहारों को अहसास हो गया था कि आपसी रंजीश में उनकी स्थिति कमजोर हो रही है। क्योंकि चुनचुन कर पहले तो बेगुसराय के भूमिहारों को मारा गया फिर स्थानीय भूमिहारों पर भी हमले हुए। राजनीतिक रूप से भी यहां दो गुट थे। एक गुट का प्रतिनिधित्व कर रहे थे रघुनाथ पांडेय, जबकि दूसरे गुट के सरताज थे ललितेश्वर प्रसाद शाही। इन्हें लोग एलपी शाही के नाम से अधिक जानते थे। इन्हीं के एकलौते थे बेटे थे हेमंत शाही। पूरे तिरहूत इलाके में हेमंत शाही अपने पिता के दम पर एकछत्र राज चाहते थे। हर छोटे बड़े ठेकों और निलामी में उनका सीधा हस्तक्षेप था। इस वक्त तक वो वैशाली से एमएलए बन चुके थे। जबकि पिता एलपी शाही केंद्र की राजनीति में उभार पर थे। एलपी शाही 1980 में बिहार विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए थे और वर्ष 1984 में मुजफ्फरपुर से लोकसभा सदस्य निर्वाचित हुए। वर्ष 1988 में वे राजीव गांधी के मंत्रिमंडल में केंद्रीय शिक्षा एवं संस्कृति मंत्री रहे। शुक्ला ब्रदर्श के ऊपर एलपी शाही और हेमंत शाही का हाथ था।
#मार्च_1992_हेमंत_शाही_की_हत्या,
मुजफ्फरपुर का अंडर वर्ल्ड चुपचाप अपनी अदावत और वर्चस्व की जंग में जुटा था। छोटन शुक्ला और बृजबिहारी पर हमले के बाद कोई सीधी लड़ाई में नहीं उलझ रहा था, क्योंकि बृजबिहारी और छोटन शुक्ला दोनों ही राजनीति की तरफ पैरा बढ़ा चुके थे। इसी बीच एक बड़ी वारदात ने बिहार की राजनीति में भूचाल ला दिया। वैशाली जिले के गोरौल प्रखंड में एक टेंडर विवाद में गांव के ही पिछड़ी जाति के दबंगों ने एमएलए हेमंत शाही की दिनदहाड़े हत्या कर दी। 28 मार्च 1992 को हेमंत शाही एक मेले के टेंडर को लेकर गोरौल प्रखंड में थे। यहीं उनका गांव के ही पिछड़ी जाती के लोगों से विवाद हुआ। वे टेंडर को हथियाना चाहते थे, लेकिन हेमंत शाही अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर टेंडर अपने पक्ष में करना चाहते थे। आपसी विवाद बढ़ने के बाद पिछड़ी जाती के दबंगों ने ब्लॉक आॅफिस में हेमंत शाही पर फायर झोंक दिया। दोनों तरफ से गोलियां चली। हेमंत शाही बूरी तरह घायल हुए। उन्हें उनके समर्थकों ने जिप्सी में लादकर मुजफ्फरपुर पहुंचाया, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। 30 मार्च को उनकी मौत हो गई। इस मौत ने मुजफ्फरपुर को सुलगा दिया। जमकर आगजनी हुई। सरकारी वाहन फूंक दिए गए। कई दिनों तक शहर बंद रहा। हर तरफ दहशत का माहौल था। अनजाने भय से लोग सहमे हुए थे। क्षेत्र के अगड़ी जाति के सबसे बड़े और दबंग पॉलिटिशियन की हत्या हो चुकी थी।
#बाहूबली_आनंद_मोहन_की_इंट्री,
इसी बीच मुजफ्फरपुर अंडरवर्ल्ड में इंट्री हुई कोसी क्षेत्र के बाहूबली आनंद मोहन की। इन्हें साथ मिला शुक्ला ब्रदर्श का। 1980 में आनंद मोहन ने अपनी पार्टी का गठन किया था। नाम रखा था क्रांतिकारी समाजवादी पार्टी। इसी पार्टी से उन्होंने लोकसभा का चुनाव लड़ा पर कभी चुनाव जीत न सके। 1990 में उन्होंने जनता दल से विधानसभा का चुनाव लड़ा और विजयी हुए। इसी दौर में वो छोटन शुक्ला के संपर्क में आए और तिरहुत क्षेत्र में अपनी पार्टी के साथ पांव जमाना चाहा। आनंद मोहन और छोटन शुक्ला की दोस्ती ने मुजफ्फरपुर के अंडरवर्ल्ड के इतिहास में भूमिहार और राजपूत जातियों का मिलन करवाया। पहली बार भूमिहार और राजपूत एक साथ अपने अस्तित्व की लड़ाई में साथ आए। उधर, एमएलए हेमंत शाही की हत्या के बाद खाली हुई सीट पर दोबारा चुनाव हुए। खुले तौर पर लड़ाई भूमिहार और यादवों की थी। छोटन शुक्ला, आनंद मोहन की जोड़ी ने हेमंत शाही की पत्नी वीणा शाही को भारी मतों से चुनाव जितवाया। जनता दल से अलग होकर 1993 में आनंद मोहन ने बिहार पीपुल्स पार्टी की स्थापना की। साल 1994 में आनंद मोहन ने वैशाली लोकसभा सीट के उपचुनाव में इसी पार्टी के बैनर तले अपनी पत्नी लवली आनंद को खड़ा किया। छोटन शुक्ला का इस क्षेत्र में पूरा दबदबा था। लवली आनंद को खुलकर समर्थन मिला। वो चुनाव जीत गई। दरअसल छोटन शुक्ला आनंद मोहन के जरिए राजनीति में आने की पूरी तैयारी कर चुके थे। भूमिहार और राजपूत जातियों के गठबंधन ने बिहार में सियासी भूचाल ला दिया था। सबसे अधिक परेशान लालू प्रसाद यादव थे। क्योंकि तिरहूत क्षेत्र में उन्हें अपनी स्थिति कमजोर लगने लगी थी। 1995 में बिहार विधानसभा के चुनाव होने थे।
#छोटन_शुक्ला_का_राजनीतिक_कद,
छोटन शुक्ला की सबसे बड़ी खासियत सभी को मिलाकर चलने की थी। इसका उन्हें फायदा भी मिला। पहली बार राजपूत और भूमिहार एक साथ थे। इसका सीधा फायदा छोटन शुक्ला के राजनीतिक कद को मिल रहा था। उनका राजनीतिक कद लगातार बढ़ रहा था। वहीं पूरे बिहार में छोटन शुक्ला के छोटे भाई भुटकुन शुक्ला की तूती बोल रही थी। कई मामलों में वह जेल में भी थे, लेकिन भुटकुल शुक्ला के बारे में कई किंवदंतियां आज भी मुजफ्फरपुर की फिजाओं में तैरती रहती हैं। कहा जाता था कि भुटकुन शुक्ला अपने दुश्मनों से बचने के लिए खुद ही जेल में रहते थे। जब उन्हें बाहर आना होता था आते थे, फिर वहीं चले जाते थे। मुजफ्फरपुर सेंट्रल जेल ही उनका सुरक्षित ठिकाना था। यह भी कहा जाता है कि वो सिर्फ किसी की हत्या करने के लिए बाहर आते थे। इसी तरह की किंवदंतियों ने भुटकुन शुक्ला को अंडरवर्ल्ड का बेताज बादशाह बना दिया था।
उधर, धीरे धीरे छोटन शुक्ला राजनीति की ओर मुखातिब हो रहे थे। उनकी नजर 1995 के बिहार विधानसभा चुनाव पर थी। यह बात उनके दुश्मनों को नागवार गुजर रही थी। छोटन शुक्ला ने पूर्वी चंपारण के केशरिया विधानसभा जो एक भूमिहार बाहुल्य क्षेत्र था, वहां से चुनाव लड़ने की पूरी तैयारी की थी। वो आनंद मोहन की पार्टी बिहार पीपुल्स पार्टी के उम्मीदवार थे।
#वर्ष_1994_छोटन_शुक्ला_की_हत्या,
बिहार विधानसभा के चुनाव नजदीक थे। भूमिहार और राजपूत एकता ने यादवों की नींद उड़ा रखी थी। सबसे अधिक परेशान बृजबिहारी प्रसाद थे। बृजबिहारी ने अकेले दम पर पूरे तिरहूत क्षेत्र को पिछड़ी जातियों की राजनीति का गढ़ बना दिया था। मुजफ्फरपुर की राजनीति भूमिहार बनाम बनिया की होती है। 1985 से 1995 तक रघुनाथ पांडे ने इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। जबकि 1995 से 2010 तक विजेंद्र चौधरी विधायक रहे। विजेंद चौधरी ने बृजबिहारी के दम पर ही चुनाव जीता था। छोटन शुक्ला लगातार अपने क्षेत्र का दौरा कर रहे थे। अपने क्षेत्र में जाने का एक ही रास्ता था, वह रास्ता मुजफ्फरपुर के दूसरे क्षेत्र होकर जाता था। इस क्षेत्र में बृजबिहारी का राज था। 4 दिसम्बर 1994 को जब छोटन शुक्ला अपने साथियों के साथ अपने विधानसभा क्षेत्र से चुनावी बैठक और प्रचार कर लौट रहे थे तो बृजबिहारी गली में चारों तरफ से घेरकर उनपर एके 47 की बौछार कर दी गई। छोटन शुक्ला के साथ उनके बॉडिगार्ड भी मारे गए। सीधा आरोप बृजबिहारी पर लगा। बताते हैं कि छोटन शुक्ला की हत्या के बाद शहर के एक छोर पर कई घरों में चुल्हा नहीं जला, जबकि बृजबिहारी के क्षेत्र में पटाखों की गूंज सुनाई दी। जश्न हुआ।
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छोटन शुक्ला की हत्या के बाद मुजफ्फरपुर एक बार फिर सुलग उठा। जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की वो घटना घट गई। बिहार की राजनीति में एक भुचाल आ गया। छोटन शुक्ला की शवयात्रा निकाली गई। एनएच-24 होकर उनकी शवयात्रा उनके पैतृक गांव की ओर प्रस्थान कर रही थी। खबड़ा होकर यह शवयात्रा निकाली थी। हजारों हजार की संख्या में छोटन शुक्ला के समर्थक इस शवयात्रा में शामिल थे। इसी बीच गोपालगंज के जिलाधिकारी जी कृष्णैया की गाड़ी वहां से गुजर रही थी। भीड़ से साइड लेने के लिए ड्राइवर ने हॉर्न बजाया। आक्रोशित भीड़ और उग्र हो गई। किसी ने यह नहीं देखा कि कार में कौन बैठा है। बत्ती लगी गाड़ी देखकर भीड़ ने तोड़फोड़ शुरू कर दी। देखते-देखते चंद मिनट में गोपालगंज के जिलाधिकारी की भीड़ ने हत्या कर दी। उन्हें बेहद करीब से गोली मारी गई थी। बिहार में मॉब लिंचिंग की यह सबसे बड़ी घटना थी। पूरे बिहार में तहलका मच गया। इस हत्याकांड की गूंज दिल्ली तक पहुंच गई। स्पेशल टीम ने बिहार में कैंप किया। पूरे देश में अंडरवर्ल्ड डॉन छोटन शुक्ला और जिलाधिकारी जी कृष्णैया की हत्या गूंजने लगी। जिलाधिकारी हत्या के मुख्य आरोपी भुटकुन शुक्ला, आनंद मोहन, लवली आनंद, मुन्ना शुक्ला को बनाया गया। साथ ही कई अन्य लोगों पर भी मुकदमा दर्ज किया गया।
छोटन शुक्ला की हत्या ने मुजफ्फरपुर के अंडरवर्ल्ड के साथ-साथ पूरे बिहार के अंडरवर्ल्ड को अंदर से हिला कर रख दिया था। छोटे भाई भुटकुन शुक्ला के क्रोध से पूरा अंडरवर्ल्ड वाकिफ था। छोटन शुक्ला की हत्या के बाद बिहार का अंडरवर्ल्ड साजिशों और गैंगवार में उलझता ही गया।
दिसम्बर 1994 में छोटन शुक्ला की हत्या
बाद में छोटन शुक्ला ने राजनीति में आने का फैसला किया। छोटन शुक्ला ने 1995 के विधानसभा चुनाव में आनंद मोहन की पार्टी- बीपीपा से टिकट हासिल किया। वे केसरिया से चुनाव मैदान में उतरे थे। दिसम्बर 1994 छोटन शुक्ला अपने साथियों के साथ चुनाव प्रचार कर लौट रहे थे। लगभग नौ बजे रात में संजय सिनेमा के पास ओवरब्रिज पर जैसे ही उनकी गाड़ी पहुंची अपराधियों ने अंधाधुंध फायरिंग कर दी। मौके पर ही छोटन शुक्ला की मौत हो गयी। इस हत्या का आरोप बृजबिहारी प्रसाद पर लगा। छोटन शुक्ला की हत्या के बाद उनके भाई भुटकुन शुक्ला ने गैंग की कमान संभाली। भुटकुन शुक्ला ने अपने भाई की हत्या का बदला लेने के लिए कई लाशें गिरायीं। इसी क्रम में भुटकुन ने बृजबिहारी के खास आदमी ओंकार सिंह को दिनदहाड़े गोलियों से भून डाला था।
इसके बाद बृजबिहारी प्रसाद ने भी पलटवार किया। कहा जाता है कि बृज बिहारी ने भुटकुन शुक्ला के शागिर्द दीपक सिंह को मिला लिया। दीपक सिंह ने भुटकुन शुक्ला को घर में मार डाला। इस हत्याकांड ने बृजबिहारी प्रसाद हत्याकांड की नींव डाल दी। कहा जाता है कि इसके बाद बिहार और पूर्वांचल के तमाम बाहुबलियों की मीटिंग हुई जिसमें बृजबिहारी प्रसाद को मारने की योजना बनायी गयी थी।
13 जून 1998 को बृजबिहारी प्रसाद की हत्या
शुक्ला बंधुओं की हत्या के बाद बृज बिहारी प्रसाद पर खतरा मंडराने लगा था। 1998 में बृज बिहारी प्रसाद राबड़ी सरकार में मंत्री थे। लेकिन मेधा घोटला में आरोपी बनाये जाने के बाद उन्हें जेल भेज दिया गया था। इलाज के नाम बृजबिहारी प्रसाद IGIMS भर्ती हो गये थे। बिहार सरकार ने बृज प्रसाद की सुरक्षा के लिए दो दर्जन कार्बाइनधारी सुरक्षाबल मुहैया कराये थे। इसके बावजूद 13 जून 1998 को अस्पताल परिसर में बृजबिहारी प्रसाद को AK-47 से भून दिया गया था। इस हत्या का आरोप श्रीप्रकाश शुक्ल, मुन्ना शुक्ला राजन तिवारी, मंटू तिवारी, सूरजभान, कैप्टन सुनील समेत अन्य लगा था। बाद में पटना हाईकोर्ट से सभी आरोपी बरी हो गये थे।
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