19/09/2026
हमारे संतों ने कर्म को ही पूजा माना : दत्तात्रेय होसबाले
भोपाल। संत शिरोमणि रविदास जी की 650वीं जयंती के अवसर पर भोपाल के रवीन्द्र भवन में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि भारतीय संत परंपरा ने कर्म को ही पूजा का स्वरूप माना है। शरीर से किया जाने वाला श्रम भी आराधना है। पूजा केवल मंदिर में जाकर किसी देवता के समक्ष पुष्प अर्पित करने तक सीमित नहीं है। व्यक्ति यदि अपने कर्म को पूरी निष्ठा, शुद्ध मन और आराधना के भाव से करता है, तो वही कर्म साधना का रूप ले लेता है।
महाभारत में वर्णित धर्मव्याध की कथा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि धर्म का संबंध किसी विशेष कार्य अथवा सामाजिक पहचान से नहीं है। व्यक्ति जिस कर्म में संलग्न है, उसे पूरी निष्ठा, कर्तव्यबोध और ईमानदारी से करना ही धर्म का महत्वपूर्ण स्वरूप है। कर्म की महानता उसके बाहरी स्वरूप से नहीं, बल्कि उसे करने वाले व्यक्ति की दृष्टि और निष्ठा से निर्धारित होती है।
• कर्म की गरिमा ही व्यक्ति की महानता का आधार ~
दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि समाज में कोई कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता। कार्य के प्रति निष्ठा, मन की शुद्धता और व्यवहार की श्रेष्ठता ही व्यक्ति को महान बनाती है। महर्षि वेदव्यास का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि महानता जन्म या पेशे से निर्धारित नहीं होती। मछुआरे परिवार में जन्म लेने वाला व्यक्ति भी अपने कर्म और ज्ञान के बल पर महर्षि वेदव्यास बन सकता है।
उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को उसके कार्य अथवा सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर छोटा समझना दृष्टि का दोष है। समाज की वास्तविक शक्ति इस बात में है कि वह प्रत्येक व्यक्ति के भीतर निहित संभावनाओं को पहचानते हुए उसे आगे बढ़ने का अवसर दे।
• सामाजिक ऊँच-नीच को समन्वय और आत्मीयता से दूर करना होगा ~
सरकार्यवाह जी ने कहा कि समाज में समय के साथ आई ऊँच-नीच की प्रवृत्तियों को सही दृष्टि और समन्वय के माध्यम से दूर करना होगा। इसके लिए विभिन्न वर्गों के बीच आत्मीयता बढ़ाना आवश्यक है। श्रम साधक मिलन इसी दिशा में एक छोटा, किंतु महत्वपूर्ण प्रयास है।
उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति दूसरे के जीवन, उसके श्रम और उसकी परिस्थितियों को समझता है, तो सामाजिक दूरी घटती है और आत्मीयता बढ़ती है। सामाजिक समरसता केवल भाषणों से निर्मित नहीं होती; इसके लिए एक-दूसरे के जीवन से जुड़ना और साथ खड़ा होना आवश्यक है।
• हम राष्ट्रांगभूता हैं, राष्ट्र के अंग हैं ~