03/06/2026
"29 कैदी के बीच एक जज कैदी"
गिरिबाला सिंह: एक जज, एक मां और एक मुजरिम।
कुछ दिन से पूरा देश इन्हीं की खबरें पढ़ और देख रहा है। अक्सर कोर्ट का जज जब कोर्ट में आता है, बल्कि रोज ही आता रहता है तो वो ये भूल जाता है कि वो मात्र एक जिम्मेदारी निभा रहा है, जब किसी भी व्यक्ति को हरदम जनता से नमस्कार मिलती है तब उसमें एक घमंड जागृत जो जाता है जो आप अनेक राजनीतिक एक्टर या फिल्म एक्टर के चेहरे पर देखते होंगे।
जब भी मै कभी कोर्ट गया हूं तब मैने पाया कि जो जज है वो सिर्फ एक जिम्मेदारी होना चाहिए था, सच का साथ देने वाला एक सामान्य व्यक्ति, लेकिन होता उल्टा है, इस तरह के व्यक्तियों को अपनी पोस्ट या कुर्सी का इतना रुतबा आ जाता है कि इसकी दुर्गंध को इन जैसे सभी व्यक्तित्व के चेहरे पर अपने भी कई बार महसूस किया होगा। जनता, वकील, मुजरिम, सभी हमेशा जज के हाथ जोड़ती है, उन्हें सिर्फ कुर्सी का सम्मान देती है और धीरे धीरे हम इस तरह के उच्च पद पर बैठने वालों के जीवन में अभिमान भर देते हैं, और शायद इसी अभिमान के कारण आज लोग जज, कमिश्नर, कलेक्टर, मिनिस्टर के पद पर आना चाहते हैं और इस चक्कर में जो कर्म उनके द्वारा निष्पक्षता से होना है वो कहीं छूट जाता है, चेहरे पर एक ठसक आ जाती है जो इनके रिटायर होने के बाद भी बनी रहती है, जिसे आप भी महसूस करते होंगे।
बहुत कम लोग मुझे ऐसे मिले हैं जिन्होंने इस ठसक को अपने अंदर नहीं घुसने दिया, जो हमेशा सच की राह पर चले, जिनके चेहरे पर कोई अहंकार नहीं आया, जैसे बलराज साहनी... वो बंदा कितना भी सफल हो गया लेकिन उसमें अहंकार का एक झलक भी कभी नहीं दिखाई दी।
इनकी बहु ने आत्महत्या की तो इन्हें चाहिए था कि ऊटपटांग हरकत ना करके सीधे पुलिस को बुलाना, फिर पुलिस के साथ थाने जाना, और पूरी रात थाने में ही बिताना, अगले दिन ये लिखकर आना कि जब आप मुझे बुलाएंगे मै थाने या कोर्ट आ जाऊंगी क्योंकि मैं एक जिम्मेदार व्यक्तित्व रही हूं और आज भी हूं...
लेकिन ऐसा हुआ नहीं, अपने तुरंत अग्रिम जमानत ली, क्योंकि आप जानती थीं कि अब मुझे जेल हो सकती थी, अरे यदि आपकी कोई गलती नहीं है तो कैसे कोई जेल भेजेगा, तो ये उनकी पहली गलती की खुद को बचाना... दूसरी ये कि बेटे को फरार कर देना। क्या यही सीखा इतने बड़े जज के कार्यकाल में की बेटे से कहा कि तू भाग जा मै अपने रुतबे से सब सम्हाल लूंगी बेटे की गलती हो या ना हो, इन्हें खुद थाने जाकर बेटे को तुरंत थाने बुलाना चाहिए था...
तीसरी गलती: साक्ष्यों से छेड़छाड़ की, जबकि उन्हें किसी चीज को हाथ लगाए बिना, पुलिस को सब सौंप देना चाहिए था, अरे होंगी आप जज किसी ज़माने में लेकिन आज तो आप एक सामान्य व्यक्ति हैं जिनके घर में बहु की लाश पाई गई है तो अब चालाकियां न करते हुए हर तरह से पुलिस और कानून की मदद करनी चाहिए थी...
काश आप ऐसा करतीं तो आपको टेंशन लेने की जरा भी जरूरत नहीं होती, आप इस हादसे को एक सर्कस नहीं बनातीं।
आज आपने खुद अनेकों मुसीबतें ओढ ली हैं, अब आपका सहज होकर मामले से बाहर आ जाना उतना आसान नहीं होगा, क्योंकि आप भूल गईं कि जज होने से पहले आप एक सामान्य व्यक्ति हैं। अब आपका पूरा जीवन यही लेसन लेने में बीतेगा की आप एक सामान्य व्यक्ति हैं।
निर्णय अब जो भी हो, आप के इस सर्कस से सीख लेनी चाहिए उन सभी उच्च पास आसीन लोगों को की कितनी भी ऊंचाई हो, आना एक दिन धरती पर ही है।
काश आप ये पहले से समझ जाती तो
चेहरे पर ये ठसक और अहंकार नहीं होता।
मैं और आप कोई जज नहीं जो केस पर बात करें, लेकिन हम एक साधारण इंसान हैं जो साधारण होना सिखा सकते हैं उनको जो असाधारण होने के कारण मुश्किलें पैदा कर लेते हैं।
इन्होंने एक वीडियो में कहा कि इनकी दिवंगत बहु पेड़ों में पानी नहीं डालती थी... भला बताओ ये यहां कहने की क्या ज़रूरत थी, पानी नहीं डालती थी तो करना ठीक हुआ क्या?
कोर्ट का निर्णय तो कोर्ट देगा लेकिन गिरिबाला का बयान और हरकतें तो जो कह रही हैं उन्हीं पर टिप्पणी लिखी गई है। कोर्ट अपनी कार्यवाही करेगा ही लेकिन इन्हें तो खुद गलत कदम नहीं उठाने चाहिए। कोर्ट बरी भी कर दे लेकिन "पेड़ों में पानी नहीं डालती थी" इस बात को कहने के लिए मैं तो बरी नहीं कर सकता, किसी की जान गई, आपको गमले याद आ रहे हैं।
आज 3 जून की अपडेट:
आज के दैनिक भास्कर की खबर से ज्ञात हुआ कि गिरिबाला उसी जेल में गई हैं जहां उनके द्वारा दंडित किए 29 कैदी हैं।
केस कुछ फिल्मी हो गया है।
"29 कैदी के बीच जज कैदी"