Singh anju chauhan

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12/09/2026

मां के चले जाने के बाद
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कितना कुछ बदल जाता है
जीवन में बेटियों के
बस एक मां के चले जाने के बाद

कि स्वीकारा नहीं जाता
जाने क्यों यह बदलाव?

नहीं होती हैं रौनकें कोई
न बचपन खिलखिलाता है
भले ही उम्र कितनी हो बेटियों की
तन से कम मगर मन से तो
बेटियां बूढी-सी बन जाती है।

कितना कुछ बदल जाता है
जीवन में बेटियों के
बस एक मां के चले जाने के बाद।

नहीं रास्ता निहारता कोई
ना सन्मार्ग बताया है कोई
बस किए गए श्रम में भी
नुक़्स निकालता हर कोई।

कितना कुछ बदल जाता है
जीवन में बेटियों के
बस एक मां के चले जाने के बाद।

उस अध्याय का बंद होना
कितना अज्ञानी बना जाता है
मासूमियत वाले शब्दों की जगह
जब छल-कपट से बचने का उत्तर
हर पन्ने में ढूंढना पड़ता है।

कितना कुछ बदल जाता है
जीवन में बेटियों के
बस एक मां के चले जाने के बाद....

वो ज़िद और वो मान-मनौव्वल
पल में छूमंतर हो जाता है
जिससे सुबह-शाम हर पहर का
गहरा नाता हुआ करता था।

कितना कुछ बदल जाता है
जीवन में बेटियों के
बस एक मां के चले जाने के बाद...

जो बेटियां कभी मां से अपनी
हर दु:ख-सुख साझा कर लेती है,
वही गहरे जख़्मों के टीस को
मुस्कानों से ढकने की कोशिश करती है।

कितना कुछ बदल जाता है
जीवन में बेटियों के
बस एक मां के चले जाने के बाद...

बचपन के अपने हर खिलौनों के
टूटने का सबसे पहले ज़िक्र
मां से ही कर जाती थी
मां के जाते ही बस
किसी के हाथों का खिलौना बन
खुद को टूटने से बचाने की
होड़ में ताउम्र ही लगी रह जाती है।

कितना कुछ बदल जाता है
जीवन में बेटियों के
बस एक मां के चले जाने के बाद...

मां के होने पर अपने घर क्या
मायके का भी कोने-कोने पर
जो हक़ अपना भी समझा करती है
जाते ही मां के जब
मां की आंचल को याद कर
गीली हाथों से अपने बैग से
अपना तौलिया मायके में निकालती है।

कितना कुछ बदल जाता है
जीवन में बेटियों के
बस एक मां के चले जाने के बाद....

जो बात-बात पर हंसी-ठिठोली
कितनी बातें कहती-सुनती तब
अब तो साफ चेहरे को भी कई बार धोकर
डबडबाई आंखों के आंसुओं को छुपाती है।

कितना कुछ बदल जाता है
जीवन में बेटियों के
बस एक मां के चले जाने के बाद।
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© आकांक्षा प्रिया

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.      दिनांक 14.09.2026 दिन मंगलवार तदनन्तर संवत २०८३ भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि की है–                  ...
12/09/2026

. दिनांक 14.09.2026 दिन मंगलवार तदनन्तर संवत २०८३ भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि की है–

“हरतालिका तीज”

भाद्रपद की शुक्ल पक्ष के तृतीया तिथि को हस्त नक्षत्र में कुमारी तथा सौभाग्यवती स्त्रियाँ पति सुख को प्राप्त करने के लिए भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं। इस व्रत को तीज, हरितालिका तीज, अखंड सौभाग्यवती व्रत इत्यादि के नाम से जाना जाता है। इस व्रत को करने से स्त्रियों को अखण्ड सौभाग्यवती का वरदान तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है।

महत्व

यह व्रत वास्तव में “सत्यम शिवम् सुंदरम” के प्रति आस्था और प्रेम का त्यौहार है, कहा जाता है की इसी दिन शिव और माँ पार्वती का पुनर्मिलन इसी दिन हुआ था। हरियाली तीज शिव-पार्वती के मिलन का दिन है। सुहागिनों द्वारा शिव-पार्वती जैसे सुखी पारिवारिक जीवन जीने की कामना का पर्व है।
वास्तव में हरतालिका तीज सुहागिनों का त्यौहार है लेकिन भारत के कुछ स्थानों में कुँवारी लड़कियाँ भी मनोनुकूल पति प्राप्त करने के लिए यह व्रत रखती हैं।

हरतालिका का अर्थ

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को यह पर्व मनाया जाता है। यह एक ऐसा समय है, जब प्रकृति अपने पूरे यौवन पर होती है, सभी ओर हरियाली ही हरियाली होती है, इस हरियाली की सुन्दरता, मधुरता मोहकता को देखकर भला कौन नहीं मंत्रमुग्ध हो जाएगा। इस मौसम में नव नव शाखा नवकिसलय नवपल्लव एक दूसरे से स्पर्श कर अपने प्यार का इजहार करते है और मानव जीवन को भी मधुर मिलन का एहसास कराते है।
कहा जाता है कि माता पार्वती महादेव को अपना पति बनाना चाहती थी इसके लिए पार्वती ने कठिन तपस्या भी की इसी तपस्या के दौरान पार्वती की सहेलियाँ पार्वती का हरण अर्थात अगवा कर ली थी इसी कारण इस व्रत को हरतालिका तीज कहा जाता है। हरत शब्द हरण शब्द से बना है हरण का अर्थ होता है अपहरण करना तथा आलिका का अर्थ होता है सखी इसी कारण इस तीज व्रत को हरतालिका तीज कहा जाता है।

पूजन सामग्री

हरतालिका व्रत पूजा में निम्नलिखित सामग्री को एकदिन पूर्व ही इकट्ठा कर लेना चाहिए ताकि पूजा के समय किसी भी प्रकार की दिक्कत न हो।
सामग्री: पंचामृत (घी, दही, शक्कर, दूध, शहद) दीपक, कपूर, कुमकुम, सिंदूर,चन्दन, अबीर, जनेऊ, वस्त्र, श्री फल, कलश, बैल पत्र, शमी पत्र, धतूरे का फल एवं फूल, अकाँव का फूल, तुलसी, मंजरी।
काली मिट्टी अथवा बालू रेत, केले का पत्ता, फल एवं फूल। माता गौरी के लिए पूरा सुहाग का सामान जैसे - चूड़ी, बिछिया, बिंदी, कुमकुम, काजल, माहौर, मेहँदी, सिंदूर, कंघी, वस्त्र आदि लेनी चाहिए।

नियम विधि

यह व्रत तीन दिन का होता है प्रथम दिन व्रती नहाकर खाना खाती है जिसे नहा खा का दिन भी कहा जाता है तथा दूसरे दिन व्रती दिन भर उपवास रहकर संध्या समय में स्नान करके तथा शुद्ध वस्त्र धारण कर पार्वती तथा शिव की मिट्टी या रेत के प्रतिमा बनाकर गौरी-शंकर की पूजा करती है। तीसरे दिन व्रती अपना उपवास तोड़ती है तथा चढ़ाये गए पूजन सामग्री ब्राह्मण को देती है तथा पूजन में प्रयुक्त रेत मिट्टी आदि को जलप्रवाह करती है।
हरतालिका पूजा में शिव, पार्वती एवं गणेश जी की प्रतिमा रेत, बालू या काली मिट्टी की अपने हाथों से बनानी चाहिए। रंगोली तथा फूल से सजाना चाहिए। चौकी पर एक सातिया बनाकर उस पर थाल रखे तथा उस थाल में केले के पत्ते को रखना चाहिए उसके बाद तीनों प्रतिमा को केले के पत्ते पर स्थापित करना चाहिए। ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पढ़ने के लिये हमारा फेसबुक पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ को लाईक एवं फॉलो करें। अब आप हमारी पोस्ट व्हाट्सएप चैनल पर भी देख सकते हैं। चैनल लिंक हमारी फेसबुक पोस्टों में देखें। उसके बाद कलश के उपर श्रीफल अथवा दीपक जलाना चाहिए। कलश के मुँह पर लाल धागा बाँधना चाहिए। घड़े पर सातिया बनाकर उसपर अक्षत चढ़ाये तत्पश्चात जल चढ़ाना चाहिए। फिर कुमकुम, हल्दी, चावल, पुष्प से कलश का पूजन करना चाहिए।
कलश पूजा के उपरान्त गणपति पूजा, उसके बाद शिव जी तथा बाद में माता गौरी की पूजा करनी चाहिए। पूजा के दौरान सुहाग की पिटारी में सुहाग की साड़ी रखकर पार्वती को चढ़ानी चाहिए तथा शिवजी को धोती और अंगोछा चढ़ाना चाहिए। पूरे विधि-विधान से पूजा करने के बाद हरतालिका व्रत की कथा पढ़नी अथवा सुननी चाहिए।
कथा पढ़ने अथवा सुनने के बाद सर्वप्रथम गणेश जी कि आरती, फिर शिव जी की आरती तथा अंत में माता गौरी की आरती करनी चाहिए। आरती के बाद भगवान् की परिक्रमा। इस दिन रात भर जागकर गौरी शंकर की पूजा कीर्तन स्तुति इत्यादि करनी चाहिए।
दूसरे दिन प्रातः काल स्नान कर पूजा के बाद माता गौरी को जो सिंदूर चढ़ाया जाता हैं उस सिंदूर से सुहागन स्त्री सुहाग लेना चाहिए। उसके बाद चढ़ाये हुए प्रसाद या हलवा या क्षेत्र विशेष के विधान के अनुसार अपना उपवास तोड़ना चाहिए। उसके बाद सुहाग की सामग्री को किसी ब्राह्मणी तथा धोती और अंगोछा ब्राह्मण को दे देना चाहिए।

व्रत की ध्यान योग्य बातें

01. जो स्त्री या कन्या इस व्रत को एक बार करता है उसे प्रत्येक वर्ष पूरे विधि-विधान के साथ करना चाहिए।
02. पूजा का खंडन किसी भी सूरत में नहीं करना चाहिए।
03. इस दिन नव वस्त्र ही पहनना चाहिए।
04. हरतालिका तीज पूजन मंदिर तथा घर दोनों स्थान में किया जा सकता है।
05. इस दिन अन्न, जल या फल नही खाना चाहिए।

माहात्म्य कथा

पार्वतीजी को पूर्व जन्म का स्मरण कराने के लिए महादेव शिव ने इस प्रकार कहा–
‘हे गौरी ! पर्वतराज हिमालय पर भागीरथी के तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में अधोमुखी होकर कठिन तप किया था। इस दौरान तुमने अन्न का त्याग कर रखा था तथा केवल हवा तथा सूखे पत्ते चबाकर तपस्या की थी।
माघ की शीतलता में तुमने लगातार जल में प्रवेश कर तप किया था। वैशाख की तप्त गर्मी में पंचाग्नि से शरीर को तपाया। श्रावण की मुसलाधार वर्षा में खुले आसमान के नीचे बिना अन्न, जल ग्रहण किये व्यतीत किया। तुम्हारी इस तपस्या को देखकर तुम्हारे पिता बहुत दु:खी और नाराज रहते थे। ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पढ़ने के लिये हमारा फेसबुक पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ को लाईक एवं फॉलो करें। अब आप हमारी पोस्ट व्हाट्सएप चैनल पर भी देख सकते हैं। चैनल लिंक हमारी फेसबुक पोस्टों में देखें। एक दिन तुम्हारी तपस्या और पिता की नाराजगी को देखकर नारद जी तुम्हारे आये।
तुम्हारे पिता नारद जी आने का कारण पूछा तब नारद जी बोले–‘हे गिरिराज ! मुझे भगवान विष्णु भेजा है। आपकी कन्या की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर विष्णु भगवान उससे विवाह करना चाहते है। बताये आपकी इच्छा है।’
नारदजी की बात से पर्वतराज बहुत ही प्रसन्न होकर बोले–‘श्रीमान ! यदि स्वयं विष्णु मेरी कन्या का वरण करना चाहते है तो मुझे क्या आपत्ति हो सकती है। वे तो साक्षात् परब्रह्म है। यह तो सभी पिता की इच्छा होती है कि उसकी पुत्री सुख-संपत्ति से युक्त पति के घर की लक्ष्मी बने।’
नारदजी तुम्हारे पिता की स्वीकृति पाकर विष्णुजी के पास गए और उन्हें विवाह तय होने का शुभ समाचार सुनाया। किन्तु जब तुम्हें इस शादी के सम्बन्ध में पता चला तो तुम बहुत दु:खी हुई। तुम्हें दु:खी देखकर तुम्हारी एक सहेली ने तुम्हारे दुःख का कारण पूछा तब तुम बोली–‘मैंने सच्चे मन से भगवान शिव का वरण किया है, परन्तु मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णुजी के साथ तय कर दिया है। मैं धर्मसंकट में हूँ। अब मेरे पास प्राण त्यागने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं बचा है।’
तुम्हारी सखी ने कहा–‘प्राण त्यागने का यहाँ कोई कारण नहीं लगता। दुःख के समय धैर्य से काम लेना चाहिए। वास्तव में भारतीय नारी जीवन की सार्थकता इसी में है कि एक बार स्त्री जिसे पुरुष मन से पति रूप में वरण कर लिया, जीवनपर्यन्त सच्चे मन तथा तन से निर्वहन करे। सच्ची आस्था और एकनिष्ठा के सामने तो भगवान भी असहाय हैं। मैं तुम्हें घने वन में ले चलती हूँ जो साधना स्थल भी है और जहाँ तुम्हारे पिता तुम्हें ढूंढ़ भी नहीं पायेंगे। मुझे पूरा विश्वास है कि भगवान् अवश्य ही तुम्हारी इच्छा की पूर्ति करेंगे।’
अपनी सखी के साथ तुम जंगल में चली गई। इधर तुम्हारे पिता तुम्हे घर में नहीं देखकर बड़े चिंतित और दु:खी हुए। वे सोचने लगे कि मैंने तो विष्णु जी से अपनी पुत्री का विवाह तय कर दिया हैं। यदि भगवान विष्णु बारात लेकर आ गये और कन्या घर पर नहीं मिली तो बहुत ही अपमान होगा।
ऐसा विचार कर पिता ने तुम्हारी खोज शुरू करवा दी। तुम्हारी खोज होती रही उधर तुम अपनी सहेली के साथ नदी के तट पर के गुफा में मेरी आराधना में लीन रहने लगी।
भाद्रपद में शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि तथा हस्त नक्षत्र था। उस दिन तुमने रेत के शिवलिंग का निर्माण किया। रात भर मेरी स्तुति में गीत गाकर जागरण किया तुम्हारी इस कठोर तपस्या के प्रभाव से मैं शीघ्र ही प्रसन्न होकर तुम्हारे पास आ गया और तुमसे वर माँगने को कहा।
तब अपनी तपस्या के फलीभूत मुझे अपने समक्ष पाकर तुमने कहा–‘मैं सच्चे मन से आपको पति के रूप में वरण कर चुकी हूँ। यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर यहाँ आये है तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लीजिये। तब ‘तथास्तु’ कहकर मैं कैलाश पर्वत पर लौट गया प्रात: होते ही तुमने पूजा की समस्त सामग्री नदी में प्रवाहित करके अपनी सखी सहित व्रत का वरण किया।
उसी समय गिरिराज अपने बंधु-बाँधवो के साथ तुम्हे ढूँढते हुए वहाँ पहुँचे। तुम्हारी मन तथा तन की दशा देखकर अत्यंत दु:खी हुए और तुम्हारी इस कठोर तपस्या का कारण पूछा। तब तुम बोली–‘पिताजी मैंने अपने जीवन का अधिकांश वक्त कठोर तपस्या में बिताया है। मेरी इस तपस्या का एकमात्र उद्देश्य महादेवजी को पति रूप में प्राप्त करना था। आज मैं अपनी तपस्या फल पा चुकी हूँ। आप मेरा विवाह विष्णुजी से करने का निश्चय किया इसलिए मैं अपने अराध्य महादेव शिवजी की तलाश में घर से चली गई। अब मैं इसी शर्त पर घर लौटूँगी की आप मेरा विवाह महादेव जी के साथ ही करेंगे।’
पर्वतराज ने तुम्हारी इच्छा स्वीकार कर ली और तुम्हें घर वापस ले आए। किंचित समय उपरांत उन्होंने पूरे विधि-विधान के साथ तुम्हारा विवाह मेरे साथ किया।’
महादेव शिव ने पुनः कहा–‘हे पार्वती ! भाद्रपद की शुक्ल तृतीया को तुमने मेरी पूजा-अर्चना करके जो व्रत किया था, उसी के फलस्वरुप हम दोनों का विवाह संभव हो पाया। अतः इस व्रत का महत्त्व यही है कि जो स्त्री तथा कन्या पूरी निष्ठा के साथ व्रत करती है उसको मैं मनोवांछित फल प्रदान करता हूँ।’
० ० ०

॥ॐ नमः.शिवाय्॥
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11 सितंबर 1973 की रात... वृंदावन की गलियों में गहरी खामोशी पसरी हुई थी। रात के करीब दो बजे का वक्त था। शहर सो रहा था, मं...
09/09/2026

11 सितंबर 1973 की रात... वृंदावन की गलियों में गहरी खामोशी पसरी हुई थी। रात के करीब दो बजे का वक्त था। शहर सो रहा था, मंदिरों के पट बंद थे और दूर कहीं किसी मंदिर की घंटी की हल्की आवाज रात की नीरवता को चीर रही थी। उसी वृंदावन में एक छोटा सा अस्पताल था, जिसकी एक खिड़की से पीली रोशनी बाहर झांक रही थी। अस्पताल के उस कमरे के बाहर कुछ भक्त चुपचाप खड़े थे। किसी की आंखों में आंसू थे, किसी के होंठों पर प्रार्थना और किसी के मन में एक डर था, जिसे कोई शब्द नहीं दे पा रहा था। कमरे के अंदर एक बूढ़ा शरीर स्ट्रेचर पर लेटा था। सांसें कमजोर थीं, शरीर थक चुका था, लेकिन चेहरे पर आश्चर्यजनक शांति थी। डॉक्टर बार-बार ऑक्सीजन मास्क लगाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन वह बूढ़ा संत हर बार अपने कमजोर हाथ से मास्क हटा देता। जैसे उसे पता हो कि अब इन सांसों को किसी मशीन के सहारे रोककर रखने की जरूरत नहीं है। जैसे वह अपने आखिरी सफर के लिए पहले ही तैयार हो चुका हो। वह साधारण बूढ़ा व्यक्ति नहीं था। वह थे नीम करौली बाबा, जिन्हें उनके भक्त प्रेम से महाराज जी कहते थे और जिनके जीवन से जुड़ी असंख्य चमत्कारिक और रहस्यमयी कथाएं आज भी सुनाई जाती हैं।

लेकिन वृंदावन के उस छोटे से अस्पताल तक पहुंचने की यह कहानी अचानक शुरू नहीं हुई थी। इसके पीछे दशकों की एक ऐसी यात्रा थी, जिसमें एक साधारण परिवार का बालक धीरे-धीरे एक ऐसे संत के रूप में प्रसिद्ध हुआ, जिसके नाम से आज दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लोग परिचित हैं। इस कहानी की शुरुआत उत्तर प्रदेश के अकबरपुर नाम के एक गांव से जुड़ी मानी जाती है। एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे उस बालक का नाम लक्ष्मीनारायण शर्मा बताया जाता है। बचपन से ही उनके स्वभाव में एक अलग तरह की विरक्ति दिखाई देती थी। जहां दूसरे बच्चे सांसारिक चीजों और खेल-कूद में रुचि लेते थे, वहीं उनका मन अक्सर एकांत, साधना और आध्यात्मिक चिंतन की ओर खिंचता था। परिवार ने शायद कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि यह बच्चा आगे चलकर लाखों लोगों की श्रद्धा का केंद्र बनने वाला है।

कम उम्र में ही उनका विवाह कर दिया गया। उस समय समाज में बाल विवाह असामान्य नहीं था और परिवार की परंपरा के अनुसार उनका भी गृहस्थ जीवन शुरू हुआ। लेकिन उनके भीतर जैसे कोई दूसरी पुकार थी। विवाह के कुछ समय बाद वह घर से निकल पड़े। न कोई बड़ा सामान, न कोई निश्चित मंजिल और न ही किसी को यह पता कि वह कहां जा रहे हैं। बस एक रास्ता था और उस रास्ते पर चलता हुआ एक ऐसा युवक, जो शायद खुद को दुनिया से नहीं बल्कि अपने भीतर से खोजने निकला था।

कई वर्षों तक उनकी कोई स्पष्ट खबर परिवार को नहीं मिली। वह अलग-अलग स्थानों पर घूमते रहे। कभी जंगलों में, कभी नदी के किनारे, कभी किसी छोटे से गांव में और कभी किसी अजनबी के घर के बाहर बैठे हुए। इस दौरान लोग उन्हें अलग-अलग नामों से जानते रहे। कहीं उन्हें तलैया बाबा कहा गया, कहीं हांडीवाला बाबा और कहीं किसी अन्य नाम से पुकारा गया। उनके पास कोई स्थायी पहचान नहीं थी। लेकिन जहां भी जाते, लोगों के बीच उनके बारे में कोई न कोई कहानी जरूर जन्म लेती।

फिर एक दिन उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले के एक छोटे से रेलवे स्टेशन से जुड़ी वह घटना सामने आई, जिसने उनकी पहचान ही बदल दी। उस समय वह नीम करौरी नाम के स्टेशन पर ट्रेन में बैठे थे। उनके पास टिकट नहीं था। रेलवे कर्मचारियों ने उन्हें ट्रेन से उतार दिया। बाबा चुपचाप प्लेटफॉर्म पर उतर गए। ट्रेन के दरवाजे बंद हुए और इंजन चलाने की कोशिश की गई। लेकिन इंजन आगे नहीं बढ़ा। बार-बार कोशिश हुई, तकनीकी जांच हुई, लेकिन ट्रेन जैसे अपनी जगह से हिलने को तैयार नहीं थी।

कुछ समय बाद किसी ने सुझाव दिया कि उस साधु को वापस ट्रेन में बैठा दिया जाए। रेलवे कर्मचारियों ने उन्हें फिर ट्रेन में बैठने के लिए कहा। बाबा ने सहज भाव से ट्रेन में कदम रखा और जैसे ही वह अंदर पहुंचे, लोककथा के अनुसार इंजन फिर से चल पड़ा। इस घटना ने वहां मौजूद लोगों को हैरान कर दिया। यह वास्तव में तकनीकी खराबी थी, संयोग था या कुछ और, इसके बारे में अलग-अलग मत हैं। लेकिन उस दिन के बाद नीम करौरी स्टेशन का नाम और उस साधु की पहचान एक-दूसरे से जुड़ गई। धीरे-धीरे लोग उन्हें नीम करौली बाबा के नाम से जानने लगे।

इसके बाद बाबा उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के अलग-अलग इलाकों में घूमते रहे। धीरे-धीरे नैनीताल के पास कैंची नाम की जगह से उनका गहरा संबंध बन गया। पहाड़ों के बीच बसा वह स्थान आगे चलकर कैंची धाम के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यहां हनुमान जी का मंदिर और आश्रम विकसित हुआ और बाबा के आसपास भक्तों की संख्या बढ़ती चली गई। कोई अपनी समस्या लेकर आता, कोई बीमारी में प्रार्थना करता, कोई मानसिक उलझन लेकर बैठता और कोई सिर्फ बाबा के दर्शन के लिए पहुंच जाता।

बाबा के बारे में सबसे ज्यादा चर्चा उनके चमत्कारों की नहीं, बल्कि उनके व्यवहार की होती थी। वह अक्सर लोगों को भोजन कराने, जरूरतमंदों की सहायता करने और सेवा की प्रेरणा देने पर जोर देते थे। उनके भक्त मानते थे कि बाबा किसी व्यक्ति के मन की बात बिना बताए समझ लेते थे। कई लोग ऐसी घटनाएं सुनाते हैं जिनमें बाबा ने उनके जीवन की ऐसी बातें कह दीं जिन्हें सुनकर वे हैरान रह गए। इन कथाओं ने बाबा के प्रति लोगों की श्रद्धा को और मजबूत किया। हालांकि इन घटनाओं को प्रमाणित इतिहास की तरह नहीं, बल्कि भक्तों द्वारा सुनाए गए अनुभवों और धार्मिक कथाओं के रूप में समझना अधिक उचित है।

बाबा की ख्याति धीरे-धीरे भारत की सीमाओं से बाहर भी पहुंचने लगी। अमेरिका के मनोविज्ञान के प्रोफेसर रिचर्ड एलपर्ट भारत आए। आगे चलकर उन्होंने रामदास नाम अपनाया और बाबा के साथ अपने अनुभवों को पश्चिमी दुनिया तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी पुस्तक "Be Here Now" के जरिए बाबा और भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं की चर्चा पश्चिमी दुनिया में भी हुई। अचानक एक ऐसा संत, जो साधारण कपड़ों और कंबल के साथ आश्रम में बैठता था, हजारों किलोमीटर दूर बैठे लोगों के लिए भी जिज्ञासा और आध्यात्मिक खोज का विषय बन गया।

लेकिन 1973 का साल आते-आते बाबा के जीवन में कुछ बदलने लगा था। उनके करीबी भक्तों ने महसूस किया कि बाबा पहले की तुलना में अधिक चीजें लोगों को देने लगे हैं। कभी अपना कंबल, कभी माला, कभी कोई छोटी वस्तु। ऐसा लगता था जैसे कोई यात्री लंबी यात्रा पर जाने से पहले अपना सामान दूसरों के बीच बांट रहा हो। कभी-कभी वह ऐसी बातें भी कहते जिनका अर्थ उस समय भक्त समझ नहीं पाते थे। उनके आसपास रहने वाले कुछ लोगों को महसूस होने लगा था कि बाबा किसी ऐसी तैयारी में हैं जिसके बारे में वह स्वयं जानते हैं, लेकिन दूसरों को अभी उसका अंदाजा नहीं है।

भक्त अक्सर ऐसी बातों को बाबा की सामान्य शैली समझकर टाल देते। आखिर बाबा हमेशा ही कुछ ऐसी बातें कहते रहते थे जिन्हें समझना आसान नहीं होता था। लेकिन इस बार उनके व्यवहार में एक अलग गंभीरता दिखाई देती थी। चेहरे पर वही शांति थी, लेकिन आंखों में जैसे किसी आने वाली विदाई का संकेत था। वह लोगों से मिलते, आशीर्वाद देते और फिर अचानक चुप हो जाते।

सितंबर 1973 की शुरुआत में बाबा वृंदावन पहुंचे। वृंदावन उनके लिए विशेष महत्व रखने वाला स्थान था। लेकिन इस बार उनका शरीर उनका साथ नहीं दे रहा था। स्वास्थ्य लगातार कमजोर हो रहा था। मधुमेह सहित कई स्वास्थ्य समस्याओं ने शरीर को काफी कमजोर कर दिया था। भक्त चाहते थे कि उनका इलाज कराया जाए। डॉक्टरों से सलाह लेने की कोशिश हुई, लेकिन बाबा का रवैया ऐसा था जैसे उन्हें अपने शरीर की चिंता दूसरों की तुलना में बहुत कम हो।

10 सितंबर की शाम उनकी तबीयत अचानक ज्यादा बिगड़ गई। सांस लेने में परेशानी बढ़ने लगी। आसपास मौजूद भक्त घबरा गए। आखिरकार उन्हें अस्पताल ले जाया गया। जिस संत के आसपास जीवन भर हजारों लोग समाधान खोजने आते रहे थे, उस रात उनके अपने भक्त ही उनके लिए किसी समाधान की तलाश में अस्पताल के बाहर खड़े थे।

अस्पताल के कमरे में डॉक्टरों ने इलाज शुरू किया। ऑक्सीजन देने की कोशिश की गई। लेकिन बाबा बार-बार मास्क हटा देते। डॉक्टरों के लिए यह समझना मुश्किल था कि मरीज सहयोग क्यों नहीं कर रहा। भक्तों की आंखों से आंसू बह रहे थे। कोई कह रहा था, "महाराज जी, कृपया इलाज होने दीजिए।" कोई हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना कर रहा था। लेकिन बाबा का चेहरा शांत था।

उनके होंठों से राम नाम निकल रहा था।

राम... राम... राम...

जैसे जीवन भर जिस नाम का स्मरण किया, उसी नाम को लेकर अब वह अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहे हों।

कुछ भक्तों का मानना था कि बाबा ने अपनी मृत्यु का समय पहले ही संकेतों में बता दिया था। उन्होंने तारीख या समय को लेकर जो बातें कही थीं, उन्हें उस समय किसी ने गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन अब जब वह रात सामने थी, तो उनके पुराने शब्द भक्तों को याद आने लगे। हर छोटी बात का अर्थ अचानक बदल गया। जो वाक्य पहले साधारण लगते थे, अब विदाई की घोषणा जैसे प्रतीत हो रहे थे।

और फिर वह रात आई, जिसे उनके भक्त आज भी याद करते हैं।

11 सितंबर 1973 की सुबह होने से पहले वृंदावन के उस अस्पताल के कमरे में बाबा का शरीर शांत हो चुका था। एक ऐसी यात्रा समाप्त हो गई थी, जिसे उनके भक्त सिर्फ एक मनुष्य का जीवन नहीं मानते थे। बाहर खड़े भक्तों के लिए यह विश्वास करना कठिन था कि जिस व्यक्ति को वे हर समस्या का समाधान समझते थे, वह अब उनके सामने शरीर के रूप में मौजूद नहीं है।

किसी की आंखों में आंसू थे। कोई जमीन पर बैठ गया। कोई राम नाम लेने लगा। किसी ने बाबा के चरणों की ओर देखा और बस चुप रह गया। खबर फैलते ही दूर-दूर से भक्त वृंदावन की ओर आने लगे। कैंची धाम और वृंदावन दोनों जगहों पर शोक का वातावरण छा गया।

बाबा का अंतिम संस्कार वृंदावन में किया गया और उनकी समाधि आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र मानी जाती है। समय गुजरता गया। मौसम बदलते गए। पीढ़ियां बदल गईं। लेकिन बाबा की कहानियां लोगों के बीच सुनाई जाती रहीं।

और यहीं से उनकी कहानी का सबसे रहस्यमय अध्याय शुरू होता है।

क्योंकि बाबा का शरीर 1973 में समाप्त हो गया था, लेकिन उनके प्रति लोगों की श्रद्धा समाप्त नहीं हुई। बल्कि कई वर्षों बाद उनकी कहानी ऐसे लोगों तक पहुंची, जिनसे बाबा की कभी प्रत्यक्ष मुलाकात ही नहीं हुई थी।

इन्हीं में सबसे चर्चित नामों में से एक है स्टीव जॉब्स का।

स्टीव जॉब्स भारत आए और कैंची धाम भी पहुंचे। लेकिन जब वह वहां पहुंचे, तब बाबा इस दुनिया में नहीं थे। जिस व्यक्ति के दर्शन की तलाश में वह भारत आए थे, उसका शरीर वर्षों पहले पंचतत्व में विलीन हो चुका था। फिर भी कैंची धाम का वातावरण और वहां की आध्यात्मिक परंपरा उनके लिए महत्वपूर्ण अनुभव बना। बाद के वर्षों में जॉब्स की भारत यात्रा और आध्यात्मिक खोज की चर्चा अक्सर कैंची धाम के संदर्भ में की गई।

फिर समय ने एक और दिलचस्प मोड़ लिया।

फेसबुक के सह-संस्थापक मार्क जुकरबर्ग भी जीवन के एक कठिन दौर में भारत आए और कैंची धाम पहुंचे। यह यात्रा भी उस समय की थी जब उनकी कंपनी और व्यक्तिगत जीवन एक चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहे थे। कहा जाता है कि स्टीव जॉब्स ने उन्हें भारत जाने और इस तरह की यात्रा करने की सलाह दी थी। जुकरबर्ग ने बाद में इस यात्रा का उल्लेख करते हुए बताया कि भारत की उस यात्रा ने उन्हें अपने बारे में और अपनी कंपनी के भविष्य को लेकर एक अलग तरह की स्पष्टता दी।

सोचिए, एक संत जिनसे स्टीव जॉब्स की कभी प्रत्यक्ष मुलाकात नहीं हुई और जिनसे मार्क जुकरबर्ग की भी मुलाकात संभव ही नहीं थी, क्योंकि बाबा 1973 में ही शरीर छोड़ चुके थे। फिर भी दशकों बाद उनकी कहानी दुनिया के तकनीकी क्षेत्र के दो बेहद प्रभावशाली लोगों की जीवन यात्राओं से जुड़ गई।

यही शायद नीम करौली बाबा की कहानी का सबसे अनोखा पहलू है।

किसी व्यक्ति की शक्ति केवल उसके जीवित रहते हुए उसके आसपास मौजूद लोगों की संख्या से नहीं मापी जाती। कभी-कभी किसी व्यक्ति के विचार, उसका जीवन और उसकी कही हुई बातें उसके जाने के बाद भी लोगों को प्रभावित करती रहती हैं। बाबा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उनके भक्तों के लिए वह आज भी केवल अतीत की एक कहानी नहीं हैं। उनके लिए बाबा आज भी आस्था का नाम हैं।

कैंची धाम में आज भी लोग दूर-दूर से आते हैं। कोई मनोकामना लेकर आता है। कोई अपने जीवन की उलझन लेकर आता है। कोई बाबा के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने आता है और कोई बस उस वातावरण को महसूस करने आता है, जिसके बारे में उसने वर्षों से सुना है।

वहां पहुंचकर शायद सबसे ज्यादा महसूस होता है कि आध्यात्मिक स्थान केवल इमारतों से नहीं बनते। उन्हें लोगों की आस्था बनाती है। हजारों लोगों की प्रार्थनाएं, लाखों लोगों की स्मृतियां और वर्षों से चली आ रही परंपराएं किसी स्थान को एक अलग पहचान दे देती हैं।

नीम करौली बाबा की सबसे चर्चित शिक्षाओं में सेवा और प्रेम को विशेष महत्व दिया जाता है। उनके भक्त बताते हैं कि बाबा अक्सर लोगों को भोजन कराने और जरूरतमंदों की सहायता करने के लिए प्रेरित करते थे। शायद यही वजह है कि उनके नाम से जुड़े आश्रमों और भंडारों में आज भी सेवा की परंपरा दिखाई देती है।

उनकी कहानी में चमत्कारों की बहुत सी कथाएं हैं। किसी के लिए वे चमत्कार हैं, किसी के लिए संयोग और किसी के लिए आध्यात्मिक अनुभव। लेकिन अगर इन सब कथाओं को एक तरफ रख दें, तो बाबा के जीवन से जुड़ी एक बात बहुत स्पष्ट दिखाई देती है—उन्होंने लोगों को अपने से बड़ा किसी और उद्देश्य की ओर देखने की प्रेरणा दी।

और शायद इसी वजह से उनकी कहानी आज भी जिंदा है।

वृंदावन की उस रात को याद कीजिए। एक अस्पताल का छोटा सा कमरा। कमजोर होती सांसें। चिंतित डॉक्टर। रोते हुए भक्त। और बीच में एक ऐसा संत, जिसके चेहरे पर मृत्यु का डर नहीं बल्कि अजीब सी शांति थी।

जिस व्यक्ति ने पूरी जिंदगी लोगों को यह समझाने की कोशिश की कि शरीर नश्वर है और आत्मिक यात्रा उससे कहीं बड़ी है, वह स्वयं उसी सत्य के सामने खड़ा था।

बाहर दुनिया के लिए वह एक बुजुर्ग संत का अंतिम समय था।

लेकिन उनके भक्तों के लिए वह सिर्फ शरीर का अंत था।

क्योंकि उनका विश्वास था कि बाबा कहीं गए नहीं हैं।

वह अपने भक्तों की स्मृतियों में हैं। उनकी प्रार्थनाओं में हैं। कैंची धाम की घंटियों में हैं। भंडारे में परोसे जाने वाले भोजन में हैं। किसी जरूरतमंद की मदद करने वाले हाथों में हैं और उस व्यक्ति के भीतर हैं जो मुश्किल समय में भी किसी दूसरे के लिए खड़ा हो जाता है।

शायद यही वजह है कि 1973 की वह रात बीत गई, लेकिन कहानी खत्म नहीं हुई।

साल गुजरते गए। बाबा की समाधि पर श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ती गई। कैंची धाम की पहचान दुनिया भर में फैलती गई। उनकी तस्वीरें दूर-दूर तक पहुंचीं। उनके बारे में किताबें लिखी गईं। उनके भक्तों ने अपने अनुभव सुनाए। और हर अनुभव ने इस कहानी में एक नया अध्याय जोड़ दिया।

लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल आज भी वही है—क्या किसी संत की शक्ति उसके शरीर के साथ समाप्त हो जाती है?

विज्ञान शायद इसका कोई निश्चित उत्तर न दे पाए। इतिहास भी हर धार्मिक अनुभव को प्रमाणित नहीं कर सकता। लेकिन आस्था के पास अपना उत्तर है।

भक्त कहते हैं—नहीं।

शरीर जाता है, लेकिन विश्वास नहीं जाता।

आवाज शांत हो जाती है, लेकिन संदेश रह जाता है।

इंसान चला जाता है, लेकिन उसके कर्म लोगों के बीच जीवित रह सकते हैं।

और शायद नीम करौली बाबा की कहानी इसी विश्वास पर खड़ी है।

11 सितंबर 1973 की उस रात अस्पताल के कमरे में सांसें थम गई थीं, लेकिन एक ऐसी कहानी ने जन्म लिया जो आज भी लाखों लोगों के बीच सुनाई जाती है। एक साधारण परिवार में जन्मे बच्चे से लेकर एक ऐसे संत तक की यात्रा, जिनका नाम आज कैंची धाम के साथ लिया जाता है। एक ऐसा जीवन जिसमें रहस्य भी है, आस्था भी है, सेवा भी है और अनगिनत भक्तों की भावनाएं भी।

और शायद इसीलिए जब कोई आज कैंची धाम जाता है, तो वह सिर्फ एक मंदिर देखने नहीं जाता। वह उस भावना को महसूस करने जाता है, जिसने दशकों बाद भी लोगों को उस स्थान तक खींचकर रखा है।

हो सकता है किसी को वहां चमत्कार दिखाई दे।

हो सकता है किसी को सिर्फ शांति मिले।

हो सकता है किसी को अपने सवालों का जवाब मिले।

और हो सकता है किसी को कुछ भी असाधारण दिखाई न दे।

लेकिन फिर भी वह लौटते समय अपने भीतर कुछ बदला हुआ महसूस करे।

शायद यही किसी आध्यात्मिक स्थान की सबसे बड़ी शक्ति होती है।

और नीम करौली बाबा के भक्त आज भी यही मानते हैं कि जिसे बाबा की जरूरत होती है, वह किसी न किसी रास्ते से उनके दरबार तक पहुंच ही जाता है।

कभी किसी कहानी के जरिए।

कभी किसी तस्वीर के जरिए।

कभी किसी भक्त की जुबान से।

और कभी अचानक मन में उठी उस पुकार के जरिए, जिसका कारण खुद इंसान भी नहीं समझ पाता।

बाबा का शरीर 1973 में वृंदावन में शांत हो गया था।

लेकिन उनकी कहानी आज भी चल रही है।

कैंची की पहाड़ियों से लेकर वृंदावन की गलियों तक।

भारत से लेकर अमेरिका तक।

भक्तों की प्रार्थनाओं से लेकर उन लोगों की जिज्ञासा तक, जो पहली बार उनका नाम सुनते हैं।

शायद यही वजह है कि इतने वर्षों बाद भी जब नीम करौली बाबा का नाम लिया जाता है, तो हजारों लोगों की आंखों में श्रद्धा दिखाई देती है।

और शायद उस रात अस्पताल के कमरे में गूंजता राम नाम आज भी इस कहानी का सबसे गहरा संदेश है।

राम... राम... राम...

क्योंकि अंत में शरीर चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, सांसें एक दिन रुकती हैं। नाम, कर्म और लोगों के दिलों में छोड़ी हुई यादें ही आगे चलती हैं।

और अगर नीम करौली बाबा की कहानी से कोई एक बात अपने जीवन में लेनी हो, तो शायद वह यही होगी—दूसरों की सेवा करो, जरूरतमंद की मदद करो, भोजन बांटो, प्रेम करो और अपने भीतर के अहंकार को छोटा करते जाओ।

क्योंकि शायद किसी संत की सबसे बड़ी विरासत कोई चमत्कार नहीं होती।

उसकी सबसे बड़ी विरासत होती है—उसके जाने के बाद भी लोगों के भीतर अच्छाई का जिंदा रहना।

नीम करौली बाबा की स्मृति को नमन।

जय श्री राम।

जय हनुमान।

नीम करौली बाबा महाराज की जय।

"मशीनें थक गईं, विज्ञान हैरान है... उज्जैन में खड़े हनुमान जी का साक्षात चमत्कार!""क्रेन के बेल्ट टूटे, जेसीबी बेअसर... ...
08/09/2026

"मशीनें थक गईं, विज्ञान हैरान है... उज्जैन में खड़े हनुमान जी का साक्षात चमत्कार!""क्रेन के बेल्ट टूटे, जेसीबी बेअसर... सती गेट पर अडिग खड़े हैं संकटमोचन!""आस्था Vs आधुनिक तकनीक, महाबली के संकल्प के आगे नतमस्तक हुआ प्रशासन।
उज्जैन के 'चमत्कारी' खड़े हनुमान जी की पूरी कहानी 🚩
मध्य प्रदेश की पवित्र धार्मिक नगरी उज्जैन, जहाँ कण-कण में बाबा महाकाल और सनातन की पौराणिक गाथाएं रची-बसी हैं, वहाँ हाल ही में एक ऐसा हैरतअंगेज घटनाक्रम सामने आया जिसने आस्था और आधुनिक विज्ञान के बीच एक नया अध्याय लिख दिया।
उज्जैन में आगामी सिंहस्थ महाकुंभ को ध्यान में रखते हुए मध्य प्रदेश सरकार और स्थानीय प्रशासन पूरे शहर में सड़कों के चौड़ीकरण और सौंदर्यीकरण का काम बड़े पैमाने पर कर रहा है।कंठाल चौराहे से गोपाल मंदिर मार्ग को चौड़ा करने की योजना के तहत कई पुराने निर्माणों को हटाया जाना था। इसी दायरे में सती गेट के पास स्थित करीब 170 साल पुराना ऐतिहासिक 'चमत्कारी खड़े हनुमान जी' का मंदिर भी आ गया। उज्जैन नगर निगम और जिला प्रशासन ने तय किया कि यातायात को सुगम बनाने के लिए मंदिर के ढांचे को हटाया जाएगा और हनुमान जी की मुख्य प्रतिमा को आदरपूर्वक पास ही स्थित टैंक चौक' पर शिफ्ट किया जाएगा।
सितंबर 2026 के पहले सप्ताह में नगर निगम की टीम भारी पुलिस बल के साथ सती गेट पहुंची। शुरुआती कार्रवाई के तहत मंदिर के बाहरी पक्के निर्माण, दीवारों और ऊपर की छत को जेसीबी और पोकलेन मशीनों की मदद से पूरी तरह सुरक्षित रूप से ढहा दिया गया। बाहरी ढांचा टूटने के बाद जब मूल गर्भगृह में स्थापित हनुमान जी की मुख्य प्रतिमा को उठाकर 'टंकी चौक' भेजने की बारी आई, तो असली चुनौती शुरू हुई।
प्रशासन की अलग-अलग तकनीकी टीमों ने विशालकाय क्रेन और मजबूत बेल्ट की मदद से करीब 8 फीट ऊंची प्रतिमा को आधार से अलग करके उठाने की कोशिश की।
लगातार 40 से 48 घंटों से अधिक समय तक कई आधुनिक मशीनों को काम पर लगाया गया। तमाम कोशिशों के बावजूद हनुमान जी की यह खड़ी प्रतिमा अपने स्थान से 1 इंच भी नहीं हिली। इस भारी खिंचाव के दौरान मशीनों के बेल्ट तक जवाब दे गए, लेकिन मूर्ति अडिग रही।🙏
जैसे ही यह खबर पूरे उज्जैन और सोशल मीडिया पर फैली कि भारी-भरकम मशीनें भी बजरंगबली की मूर्ति को उठाकर 'टंकी चौक' नहीं ले जा पा रही हैं, सती गेट चौराहे पर हजारों श्रद्धालुओं और हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं का हुजूम उमड़ पड़ा।भक्तों ने इसे बाबा का साक्षात चमत्कार और दिव्य संकेत माना कि 'प्रभु स्वयं अपनी जगह छोड़कर नहीं जाना चाहते'। आक्रोशित और भावुक भक्तों ने वहीं मलबे के बीच बैठकर ढोल-मंजीरों के साथ अखंड हनुमान चालीसा का पाठ शुरू कर दिया और मांग की कि मंदिर को इसी स्थान पर रहने दिया जाए।
विवाद बढ़ता देख मौके पर पुरातत्व विभाग के विशेषज्ञों की टीम को बुलाया गया । पुरातत्वविदों ने जांच में पाया कि यह प्रतिमा केवल ऊपरी सतह पर नहीं रखी है बल्कि जमीन के भीतर बहुत गहराई तक एक बेहद मजबूत ऐतिहासिक नींव से जुड़ी हुई है । यह मूर्ति मालवा के बेसाल्ट पत्थर से बनी है और इसकी बनावट राजा भोज (परमार वंश) के शासनकाल (करीब 1000 साल पुरानी) की परंपरा से मेल खाती है। मंदिर की सेवा और देखभाल पंडित महेश बैरागी के परिवार की 5 पीढ़ियां मिलकर करती आ रही हैं।
विशेषज्ञों ने प्रशासन को कड़ी चेतावनी दी कि यदि क्रेन या अन्य मशीनों से ज़बरदस्ती प्रतिमा को खींचा या झटका दिया गया, तो यह दुर्लभ और प्राचीन मूर्ति बीच से खंडित (टूट) सकती है या इसमें गंभीर दरारें आ सकती हैं ।
पुरातत्व विभाग की तकनीकी चेतावनी और जनता के भारी विरोध को देखते हुए उज्जैन प्रशासन ने टंकी चौक पर मूर्ति शिफ्ट करने की कार्रवाई को तत्काल प्रभाव से पूरी तरह रोक दिया है।
हनुमान जी की मुख्य प्रतिमा अभी भी अपने मूल स्थान सती चौक पर ही विराजमान है।
प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि वे जनता की धार्मिक आस्था का पूरा सम्मान करते हैं। अब ज़मीन के नीचे मूर्ति के आधार की वास्तविक बनावट और गहराई का पता लगाने के लिए अत्याधुनिक 3D ग्राउंड स्कैनिंग तकनीक का सहारा लिया जाएगा। तकनीकी विशेषज्ञों से सुरक्षित शिफ्टिंग की हरी झंडी मिलने और मंदिर के पुजारियों को लिखित गारंटी देने के बाद ही प्रशासन टंकी चौक पर नए मंदिर निर्माण की दिशा में कोई अगला कदम उठाएगा।

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