09/09/2026
11 सितंबर 1973 की रात... वृंदावन की गलियों में गहरी खामोशी पसरी हुई थी। रात के करीब दो बजे का वक्त था। शहर सो रहा था, मंदिरों के पट बंद थे और दूर कहीं किसी मंदिर की घंटी की हल्की आवाज रात की नीरवता को चीर रही थी। उसी वृंदावन में एक छोटा सा अस्पताल था, जिसकी एक खिड़की से पीली रोशनी बाहर झांक रही थी। अस्पताल के उस कमरे के बाहर कुछ भक्त चुपचाप खड़े थे। किसी की आंखों में आंसू थे, किसी के होंठों पर प्रार्थना और किसी के मन में एक डर था, जिसे कोई शब्द नहीं दे पा रहा था। कमरे के अंदर एक बूढ़ा शरीर स्ट्रेचर पर लेटा था। सांसें कमजोर थीं, शरीर थक चुका था, लेकिन चेहरे पर आश्चर्यजनक शांति थी। डॉक्टर बार-बार ऑक्सीजन मास्क लगाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन वह बूढ़ा संत हर बार अपने कमजोर हाथ से मास्क हटा देता। जैसे उसे पता हो कि अब इन सांसों को किसी मशीन के सहारे रोककर रखने की जरूरत नहीं है। जैसे वह अपने आखिरी सफर के लिए पहले ही तैयार हो चुका हो। वह साधारण बूढ़ा व्यक्ति नहीं था। वह थे नीम करौली बाबा, जिन्हें उनके भक्त प्रेम से महाराज जी कहते थे और जिनके जीवन से जुड़ी असंख्य चमत्कारिक और रहस्यमयी कथाएं आज भी सुनाई जाती हैं।
लेकिन वृंदावन के उस छोटे से अस्पताल तक पहुंचने की यह कहानी अचानक शुरू नहीं हुई थी। इसके पीछे दशकों की एक ऐसी यात्रा थी, जिसमें एक साधारण परिवार का बालक धीरे-धीरे एक ऐसे संत के रूप में प्रसिद्ध हुआ, जिसके नाम से आज दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में लोग परिचित हैं। इस कहानी की शुरुआत उत्तर प्रदेश के अकबरपुर नाम के एक गांव से जुड़ी मानी जाती है। एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे उस बालक का नाम लक्ष्मीनारायण शर्मा बताया जाता है। बचपन से ही उनके स्वभाव में एक अलग तरह की विरक्ति दिखाई देती थी। जहां दूसरे बच्चे सांसारिक चीजों और खेल-कूद में रुचि लेते थे, वहीं उनका मन अक्सर एकांत, साधना और आध्यात्मिक चिंतन की ओर खिंचता था। परिवार ने शायद कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि यह बच्चा आगे चलकर लाखों लोगों की श्रद्धा का केंद्र बनने वाला है।
कम उम्र में ही उनका विवाह कर दिया गया। उस समय समाज में बाल विवाह असामान्य नहीं था और परिवार की परंपरा के अनुसार उनका भी गृहस्थ जीवन शुरू हुआ। लेकिन उनके भीतर जैसे कोई दूसरी पुकार थी। विवाह के कुछ समय बाद वह घर से निकल पड़े। न कोई बड़ा सामान, न कोई निश्चित मंजिल और न ही किसी को यह पता कि वह कहां जा रहे हैं। बस एक रास्ता था और उस रास्ते पर चलता हुआ एक ऐसा युवक, जो शायद खुद को दुनिया से नहीं बल्कि अपने भीतर से खोजने निकला था।
कई वर्षों तक उनकी कोई स्पष्ट खबर परिवार को नहीं मिली। वह अलग-अलग स्थानों पर घूमते रहे। कभी जंगलों में, कभी नदी के किनारे, कभी किसी छोटे से गांव में और कभी किसी अजनबी के घर के बाहर बैठे हुए। इस दौरान लोग उन्हें अलग-अलग नामों से जानते रहे। कहीं उन्हें तलैया बाबा कहा गया, कहीं हांडीवाला बाबा और कहीं किसी अन्य नाम से पुकारा गया। उनके पास कोई स्थायी पहचान नहीं थी। लेकिन जहां भी जाते, लोगों के बीच उनके बारे में कोई न कोई कहानी जरूर जन्म लेती।
फिर एक दिन उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले के एक छोटे से रेलवे स्टेशन से जुड़ी वह घटना सामने आई, जिसने उनकी पहचान ही बदल दी। उस समय वह नीम करौरी नाम के स्टेशन पर ट्रेन में बैठे थे। उनके पास टिकट नहीं था। रेलवे कर्मचारियों ने उन्हें ट्रेन से उतार दिया। बाबा चुपचाप प्लेटफॉर्म पर उतर गए। ट्रेन के दरवाजे बंद हुए और इंजन चलाने की कोशिश की गई। लेकिन इंजन आगे नहीं बढ़ा। बार-बार कोशिश हुई, तकनीकी जांच हुई, लेकिन ट्रेन जैसे अपनी जगह से हिलने को तैयार नहीं थी।
कुछ समय बाद किसी ने सुझाव दिया कि उस साधु को वापस ट्रेन में बैठा दिया जाए। रेलवे कर्मचारियों ने उन्हें फिर ट्रेन में बैठने के लिए कहा। बाबा ने सहज भाव से ट्रेन में कदम रखा और जैसे ही वह अंदर पहुंचे, लोककथा के अनुसार इंजन फिर से चल पड़ा। इस घटना ने वहां मौजूद लोगों को हैरान कर दिया। यह वास्तव में तकनीकी खराबी थी, संयोग था या कुछ और, इसके बारे में अलग-अलग मत हैं। लेकिन उस दिन के बाद नीम करौरी स्टेशन का नाम और उस साधु की पहचान एक-दूसरे से जुड़ गई। धीरे-धीरे लोग उन्हें नीम करौली बाबा के नाम से जानने लगे।
इसके बाद बाबा उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के अलग-अलग इलाकों में घूमते रहे। धीरे-धीरे नैनीताल के पास कैंची नाम की जगह से उनका गहरा संबंध बन गया। पहाड़ों के बीच बसा वह स्थान आगे चलकर कैंची धाम के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यहां हनुमान जी का मंदिर और आश्रम विकसित हुआ और बाबा के आसपास भक्तों की संख्या बढ़ती चली गई। कोई अपनी समस्या लेकर आता, कोई बीमारी में प्रार्थना करता, कोई मानसिक उलझन लेकर बैठता और कोई सिर्फ बाबा के दर्शन के लिए पहुंच जाता।
बाबा के बारे में सबसे ज्यादा चर्चा उनके चमत्कारों की नहीं, बल्कि उनके व्यवहार की होती थी। वह अक्सर लोगों को भोजन कराने, जरूरतमंदों की सहायता करने और सेवा की प्रेरणा देने पर जोर देते थे। उनके भक्त मानते थे कि बाबा किसी व्यक्ति के मन की बात बिना बताए समझ लेते थे। कई लोग ऐसी घटनाएं सुनाते हैं जिनमें बाबा ने उनके जीवन की ऐसी बातें कह दीं जिन्हें सुनकर वे हैरान रह गए। इन कथाओं ने बाबा के प्रति लोगों की श्रद्धा को और मजबूत किया। हालांकि इन घटनाओं को प्रमाणित इतिहास की तरह नहीं, बल्कि भक्तों द्वारा सुनाए गए अनुभवों और धार्मिक कथाओं के रूप में समझना अधिक उचित है।
बाबा की ख्याति धीरे-धीरे भारत की सीमाओं से बाहर भी पहुंचने लगी। अमेरिका के मनोविज्ञान के प्रोफेसर रिचर्ड एलपर्ट भारत आए। आगे चलकर उन्होंने रामदास नाम अपनाया और बाबा के साथ अपने अनुभवों को पश्चिमी दुनिया तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी पुस्तक "Be Here Now" के जरिए बाबा और भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं की चर्चा पश्चिमी दुनिया में भी हुई। अचानक एक ऐसा संत, जो साधारण कपड़ों और कंबल के साथ आश्रम में बैठता था, हजारों किलोमीटर दूर बैठे लोगों के लिए भी जिज्ञासा और आध्यात्मिक खोज का विषय बन गया।
लेकिन 1973 का साल आते-आते बाबा के जीवन में कुछ बदलने लगा था। उनके करीबी भक्तों ने महसूस किया कि बाबा पहले की तुलना में अधिक चीजें लोगों को देने लगे हैं। कभी अपना कंबल, कभी माला, कभी कोई छोटी वस्तु। ऐसा लगता था जैसे कोई यात्री लंबी यात्रा पर जाने से पहले अपना सामान दूसरों के बीच बांट रहा हो। कभी-कभी वह ऐसी बातें भी कहते जिनका अर्थ उस समय भक्त समझ नहीं पाते थे। उनके आसपास रहने वाले कुछ लोगों को महसूस होने लगा था कि बाबा किसी ऐसी तैयारी में हैं जिसके बारे में वह स्वयं जानते हैं, लेकिन दूसरों को अभी उसका अंदाजा नहीं है।
भक्त अक्सर ऐसी बातों को बाबा की सामान्य शैली समझकर टाल देते। आखिर बाबा हमेशा ही कुछ ऐसी बातें कहते रहते थे जिन्हें समझना आसान नहीं होता था। लेकिन इस बार उनके व्यवहार में एक अलग गंभीरता दिखाई देती थी। चेहरे पर वही शांति थी, लेकिन आंखों में जैसे किसी आने वाली विदाई का संकेत था। वह लोगों से मिलते, आशीर्वाद देते और फिर अचानक चुप हो जाते।
सितंबर 1973 की शुरुआत में बाबा वृंदावन पहुंचे। वृंदावन उनके लिए विशेष महत्व रखने वाला स्थान था। लेकिन इस बार उनका शरीर उनका साथ नहीं दे रहा था। स्वास्थ्य लगातार कमजोर हो रहा था। मधुमेह सहित कई स्वास्थ्य समस्याओं ने शरीर को काफी कमजोर कर दिया था। भक्त चाहते थे कि उनका इलाज कराया जाए। डॉक्टरों से सलाह लेने की कोशिश हुई, लेकिन बाबा का रवैया ऐसा था जैसे उन्हें अपने शरीर की चिंता दूसरों की तुलना में बहुत कम हो।
10 सितंबर की शाम उनकी तबीयत अचानक ज्यादा बिगड़ गई। सांस लेने में परेशानी बढ़ने लगी। आसपास मौजूद भक्त घबरा गए। आखिरकार उन्हें अस्पताल ले जाया गया। जिस संत के आसपास जीवन भर हजारों लोग समाधान खोजने आते रहे थे, उस रात उनके अपने भक्त ही उनके लिए किसी समाधान की तलाश में अस्पताल के बाहर खड़े थे।
अस्पताल के कमरे में डॉक्टरों ने इलाज शुरू किया। ऑक्सीजन देने की कोशिश की गई। लेकिन बाबा बार-बार मास्क हटा देते। डॉक्टरों के लिए यह समझना मुश्किल था कि मरीज सहयोग क्यों नहीं कर रहा। भक्तों की आंखों से आंसू बह रहे थे। कोई कह रहा था, "महाराज जी, कृपया इलाज होने दीजिए।" कोई हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना कर रहा था। लेकिन बाबा का चेहरा शांत था।
उनके होंठों से राम नाम निकल रहा था।
राम... राम... राम...
जैसे जीवन भर जिस नाम का स्मरण किया, उसी नाम को लेकर अब वह अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहे हों।
कुछ भक्तों का मानना था कि बाबा ने अपनी मृत्यु का समय पहले ही संकेतों में बता दिया था। उन्होंने तारीख या समय को लेकर जो बातें कही थीं, उन्हें उस समय किसी ने गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन अब जब वह रात सामने थी, तो उनके पुराने शब्द भक्तों को याद आने लगे। हर छोटी बात का अर्थ अचानक बदल गया। जो वाक्य पहले साधारण लगते थे, अब विदाई की घोषणा जैसे प्रतीत हो रहे थे।
और फिर वह रात आई, जिसे उनके भक्त आज भी याद करते हैं।
11 सितंबर 1973 की सुबह होने से पहले वृंदावन के उस अस्पताल के कमरे में बाबा का शरीर शांत हो चुका था। एक ऐसी यात्रा समाप्त हो गई थी, जिसे उनके भक्त सिर्फ एक मनुष्य का जीवन नहीं मानते थे। बाहर खड़े भक्तों के लिए यह विश्वास करना कठिन था कि जिस व्यक्ति को वे हर समस्या का समाधान समझते थे, वह अब उनके सामने शरीर के रूप में मौजूद नहीं है।
किसी की आंखों में आंसू थे। कोई जमीन पर बैठ गया। कोई राम नाम लेने लगा। किसी ने बाबा के चरणों की ओर देखा और बस चुप रह गया। खबर फैलते ही दूर-दूर से भक्त वृंदावन की ओर आने लगे। कैंची धाम और वृंदावन दोनों जगहों पर शोक का वातावरण छा गया।
बाबा का अंतिम संस्कार वृंदावन में किया गया और उनकी समाधि आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र मानी जाती है। समय गुजरता गया। मौसम बदलते गए। पीढ़ियां बदल गईं। लेकिन बाबा की कहानियां लोगों के बीच सुनाई जाती रहीं।
और यहीं से उनकी कहानी का सबसे रहस्यमय अध्याय शुरू होता है।
क्योंकि बाबा का शरीर 1973 में समाप्त हो गया था, लेकिन उनके प्रति लोगों की श्रद्धा समाप्त नहीं हुई। बल्कि कई वर्षों बाद उनकी कहानी ऐसे लोगों तक पहुंची, जिनसे बाबा की कभी प्रत्यक्ष मुलाकात ही नहीं हुई थी।
इन्हीं में सबसे चर्चित नामों में से एक है स्टीव जॉब्स का।
स्टीव जॉब्स भारत आए और कैंची धाम भी पहुंचे। लेकिन जब वह वहां पहुंचे, तब बाबा इस दुनिया में नहीं थे। जिस व्यक्ति के दर्शन की तलाश में वह भारत आए थे, उसका शरीर वर्षों पहले पंचतत्व में विलीन हो चुका था। फिर भी कैंची धाम का वातावरण और वहां की आध्यात्मिक परंपरा उनके लिए महत्वपूर्ण अनुभव बना। बाद के वर्षों में जॉब्स की भारत यात्रा और आध्यात्मिक खोज की चर्चा अक्सर कैंची धाम के संदर्भ में की गई।
फिर समय ने एक और दिलचस्प मोड़ लिया।
फेसबुक के सह-संस्थापक मार्क जुकरबर्ग भी जीवन के एक कठिन दौर में भारत आए और कैंची धाम पहुंचे। यह यात्रा भी उस समय की थी जब उनकी कंपनी और व्यक्तिगत जीवन एक चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहे थे। कहा जाता है कि स्टीव जॉब्स ने उन्हें भारत जाने और इस तरह की यात्रा करने की सलाह दी थी। जुकरबर्ग ने बाद में इस यात्रा का उल्लेख करते हुए बताया कि भारत की उस यात्रा ने उन्हें अपने बारे में और अपनी कंपनी के भविष्य को लेकर एक अलग तरह की स्पष्टता दी।
सोचिए, एक संत जिनसे स्टीव जॉब्स की कभी प्रत्यक्ष मुलाकात नहीं हुई और जिनसे मार्क जुकरबर्ग की भी मुलाकात संभव ही नहीं थी, क्योंकि बाबा 1973 में ही शरीर छोड़ चुके थे। फिर भी दशकों बाद उनकी कहानी दुनिया के तकनीकी क्षेत्र के दो बेहद प्रभावशाली लोगों की जीवन यात्राओं से जुड़ गई।
यही शायद नीम करौली बाबा की कहानी का सबसे अनोखा पहलू है।
किसी व्यक्ति की शक्ति केवल उसके जीवित रहते हुए उसके आसपास मौजूद लोगों की संख्या से नहीं मापी जाती। कभी-कभी किसी व्यक्ति के विचार, उसका जीवन और उसकी कही हुई बातें उसके जाने के बाद भी लोगों को प्रभावित करती रहती हैं। बाबा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उनके भक्तों के लिए वह आज भी केवल अतीत की एक कहानी नहीं हैं। उनके लिए बाबा आज भी आस्था का नाम हैं।
कैंची धाम में आज भी लोग दूर-दूर से आते हैं। कोई मनोकामना लेकर आता है। कोई अपने जीवन की उलझन लेकर आता है। कोई बाबा के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने आता है और कोई बस उस वातावरण को महसूस करने आता है, जिसके बारे में उसने वर्षों से सुना है।
वहां पहुंचकर शायद सबसे ज्यादा महसूस होता है कि आध्यात्मिक स्थान केवल इमारतों से नहीं बनते। उन्हें लोगों की आस्था बनाती है। हजारों लोगों की प्रार्थनाएं, लाखों लोगों की स्मृतियां और वर्षों से चली आ रही परंपराएं किसी स्थान को एक अलग पहचान दे देती हैं।
नीम करौली बाबा की सबसे चर्चित शिक्षाओं में सेवा और प्रेम को विशेष महत्व दिया जाता है। उनके भक्त बताते हैं कि बाबा अक्सर लोगों को भोजन कराने और जरूरतमंदों की सहायता करने के लिए प्रेरित करते थे। शायद यही वजह है कि उनके नाम से जुड़े आश्रमों और भंडारों में आज भी सेवा की परंपरा दिखाई देती है।
उनकी कहानी में चमत्कारों की बहुत सी कथाएं हैं। किसी के लिए वे चमत्कार हैं, किसी के लिए संयोग और किसी के लिए आध्यात्मिक अनुभव। लेकिन अगर इन सब कथाओं को एक तरफ रख दें, तो बाबा के जीवन से जुड़ी एक बात बहुत स्पष्ट दिखाई देती है—उन्होंने लोगों को अपने से बड़ा किसी और उद्देश्य की ओर देखने की प्रेरणा दी।
और शायद इसी वजह से उनकी कहानी आज भी जिंदा है।
वृंदावन की उस रात को याद कीजिए। एक अस्पताल का छोटा सा कमरा। कमजोर होती सांसें। चिंतित डॉक्टर। रोते हुए भक्त। और बीच में एक ऐसा संत, जिसके चेहरे पर मृत्यु का डर नहीं बल्कि अजीब सी शांति थी।
जिस व्यक्ति ने पूरी जिंदगी लोगों को यह समझाने की कोशिश की कि शरीर नश्वर है और आत्मिक यात्रा उससे कहीं बड़ी है, वह स्वयं उसी सत्य के सामने खड़ा था।
बाहर दुनिया के लिए वह एक बुजुर्ग संत का अंतिम समय था।
लेकिन उनके भक्तों के लिए वह सिर्फ शरीर का अंत था।
क्योंकि उनका विश्वास था कि बाबा कहीं गए नहीं हैं।
वह अपने भक्तों की स्मृतियों में हैं। उनकी प्रार्थनाओं में हैं। कैंची धाम की घंटियों में हैं। भंडारे में परोसे जाने वाले भोजन में हैं। किसी जरूरतमंद की मदद करने वाले हाथों में हैं और उस व्यक्ति के भीतर हैं जो मुश्किल समय में भी किसी दूसरे के लिए खड़ा हो जाता है।
शायद यही वजह है कि 1973 की वह रात बीत गई, लेकिन कहानी खत्म नहीं हुई।
साल गुजरते गए। बाबा की समाधि पर श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ती गई। कैंची धाम की पहचान दुनिया भर में फैलती गई। उनकी तस्वीरें दूर-दूर तक पहुंचीं। उनके बारे में किताबें लिखी गईं। उनके भक्तों ने अपने अनुभव सुनाए। और हर अनुभव ने इस कहानी में एक नया अध्याय जोड़ दिया।
लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल आज भी वही है—क्या किसी संत की शक्ति उसके शरीर के साथ समाप्त हो जाती है?
विज्ञान शायद इसका कोई निश्चित उत्तर न दे पाए। इतिहास भी हर धार्मिक अनुभव को प्रमाणित नहीं कर सकता। लेकिन आस्था के पास अपना उत्तर है।
भक्त कहते हैं—नहीं।
शरीर जाता है, लेकिन विश्वास नहीं जाता।
आवाज शांत हो जाती है, लेकिन संदेश रह जाता है।
इंसान चला जाता है, लेकिन उसके कर्म लोगों के बीच जीवित रह सकते हैं।
और शायद नीम करौली बाबा की कहानी इसी विश्वास पर खड़ी है।
11 सितंबर 1973 की उस रात अस्पताल के कमरे में सांसें थम गई थीं, लेकिन एक ऐसी कहानी ने जन्म लिया जो आज भी लाखों लोगों के बीच सुनाई जाती है। एक साधारण परिवार में जन्मे बच्चे से लेकर एक ऐसे संत तक की यात्रा, जिनका नाम आज कैंची धाम के साथ लिया जाता है। एक ऐसा जीवन जिसमें रहस्य भी है, आस्था भी है, सेवा भी है और अनगिनत भक्तों की भावनाएं भी।
और शायद इसीलिए जब कोई आज कैंची धाम जाता है, तो वह सिर्फ एक मंदिर देखने नहीं जाता। वह उस भावना को महसूस करने जाता है, जिसने दशकों बाद भी लोगों को उस स्थान तक खींचकर रखा है।
हो सकता है किसी को वहां चमत्कार दिखाई दे।
हो सकता है किसी को सिर्फ शांति मिले।
हो सकता है किसी को अपने सवालों का जवाब मिले।
और हो सकता है किसी को कुछ भी असाधारण दिखाई न दे।
लेकिन फिर भी वह लौटते समय अपने भीतर कुछ बदला हुआ महसूस करे।
शायद यही किसी आध्यात्मिक स्थान की सबसे बड़ी शक्ति होती है।
और नीम करौली बाबा के भक्त आज भी यही मानते हैं कि जिसे बाबा की जरूरत होती है, वह किसी न किसी रास्ते से उनके दरबार तक पहुंच ही जाता है।
कभी किसी कहानी के जरिए।
कभी किसी तस्वीर के जरिए।
कभी किसी भक्त की जुबान से।
और कभी अचानक मन में उठी उस पुकार के जरिए, जिसका कारण खुद इंसान भी नहीं समझ पाता।
बाबा का शरीर 1973 में वृंदावन में शांत हो गया था।
लेकिन उनकी कहानी आज भी चल रही है।
कैंची की पहाड़ियों से लेकर वृंदावन की गलियों तक।
भारत से लेकर अमेरिका तक।
भक्तों की प्रार्थनाओं से लेकर उन लोगों की जिज्ञासा तक, जो पहली बार उनका नाम सुनते हैं।
शायद यही वजह है कि इतने वर्षों बाद भी जब नीम करौली बाबा का नाम लिया जाता है, तो हजारों लोगों की आंखों में श्रद्धा दिखाई देती है।
और शायद उस रात अस्पताल के कमरे में गूंजता राम नाम आज भी इस कहानी का सबसे गहरा संदेश है।
राम... राम... राम...
क्योंकि अंत में शरीर चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, सांसें एक दिन रुकती हैं। नाम, कर्म और लोगों के दिलों में छोड़ी हुई यादें ही आगे चलती हैं।
और अगर नीम करौली बाबा की कहानी से कोई एक बात अपने जीवन में लेनी हो, तो शायद वह यही होगी—दूसरों की सेवा करो, जरूरतमंद की मदद करो, भोजन बांटो, प्रेम करो और अपने भीतर के अहंकार को छोटा करते जाओ।
क्योंकि शायद किसी संत की सबसे बड़ी विरासत कोई चमत्कार नहीं होती।
उसकी सबसे बड़ी विरासत होती है—उसके जाने के बाद भी लोगों के भीतर अच्छाई का जिंदा रहना।
नीम करौली बाबा की स्मृति को नमन।
जय श्री राम।
जय हनुमान।
नीम करौली बाबा महाराज की जय।