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कभी सलीम-जावेद का जो जलवा हुआ करता था फ़िल्म इंडस्ट्री में, उससे भी कहीं ज़्यादा इनका हुआ करता था। इनका क्या रुतबा रहा ह...
14/05/2026

कभी सलीम-जावेद का जो जलवा हुआ करता था फ़िल्म इंडस्ट्री में, उससे भी कहीं ज़्यादा इनका हुआ करता था। इनका क्या रुतबा रहा होगा इसका अंदाज़ा आप ऐसे लगाइए कि डिस्ट्रीब्यूटर्स इनसे पूछा करते थे कि अब आप कौन सी फ़िल्म लिख रहे हैं। जब ये बताते थे कि मैं फलां प्रोड्यूसर या बैनर के लिए ये कहानी लिख रहा हूं, वो फ़िल्म फौरन बिक जाती थी। बड़े-बड़े फ़िल्म निर्माता इनके आगे-पीछे घूमा करते थे उस ज़माने में। फ़िल्म इंडस्ट्री के बड़े-बड़े नाम, जिनमें डायरेक्टर, प्रोड्यूसर्स और एक्टर्स शुमार होते थे, वो उत्सुक रहते थे ये जानने के लिए कि ये साहब कौन सी फ़िल्म लिख रहे हैं।

ये हैं पंडित मुखराम शर्मा। 1950-60 के दशक का बॉलीवुड का बहुत बड़ा नाम। आज जन्मदिवस है पंडित जी का। 13 मई 1909 को उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर के पूठी गांव में पंडित मुखराम शर्मा का जन्म हुआ था। यानि हमारे मेरठ का गौरव हैं पंडित जी। ये और बात है कि मेरठ के अधिकतर लोग ही इनसे वाकिफ़ नहीं होंगे अब। मुझे खुद आज ही पता चला है कि पंडित मुखराम शर्मा मेरठ के रहने वाले थे। पंडित मुखराम शर्मा की कुछ प्रमुख फ़िल्मों के नाम लिखूं तो औलाद, वचन, एक ही रास्ता, साधना, धूल का फूल, घराना, दो कलियां, हमजोली, जीने की राह व और भी कई बढ़िया फ़िल्में उन्होंने लिखी थी।

1958 में आई पंडित मुखराम शर्मा की लिखी फ़िल्म साधना से जुड़ा एक रोचक क़िस्सा जानिए। पंडित जी चाहते थे साधना फ़िल्म बिमल रॉय बनाएं। पंडित जी का मानना था कि बंदिनी और सुजाता जैसी क्लासिक फ़िल्में बनाने वाले बिमर रॉय ही उनकी कहानी साधना के साथ पूरा न्याय कर सकेंगे। जब बिमल दा को ये बात पता चली तो उन्होंने पंडित मुखराम शर्मा को एक दिन मिलने को बुलाया। जब पंडित जी बिमल दा के पास पहुंचे तो बिमल दा उन्हें अपनी कार में ले गए। और कार में ही बिमल दा ने पंडित जी से साधना की कहानी सुनी। उन्हें कहानी पसंद आई। वो उस कहानी पर फिल्म बनाने को तैयार भी हो गए।

लेकिन बिमल दा ने एक बात भी पंडित मुखराम शर्मा से कही। दरअसल, पंडित जी चाहते थे कि फ़िल्म में हीरोइन वैयजयंतीमाला को लिया जाना चाहिए। बिमल दा को उससे भी कोई दिक्कत नहीं थी। मगर उन्होंने कहानी के अंत में बदलाव करने को कहा। बिमल दा का मानना था कि चूंकि कहानी में हीरोइन एक वेश्या है, तो जनता ये स्वीकार नहीं करेगी कि एक वेश्या किसी घर की बहू जन जाए। इसलिए आखिरी में वो वेश्या मर जाए, कहानी का अंत कुछ ऐसा होना चाहिए। पंडित जी ने जैसे ही बिमल दा की ये बात सुनी, उन्होंने फौरन उनसे गाड़ी रोकने को कहा। बिमल दा ने गाड़ी रोक ली।

बिमल दा को लगा कि शायद पंडित मुखराम शर्मा को लघुशंका लगी होगी। लेकिन गाड़ी से उतरते ही पंडित जी ने बिमल दा को नमस्कार किया। और वो आगे बढ़ गए। यानि कहानी में कोई भी बदलाव करने को पंडित जी तैयार नहीं थे। बताया जाता है कि पंडित जी वहां से सीधे बी.आर. चोपडा़ से मिलने उनके ऑफ़िस पहुंच गए। उन्होंने बी.आर. चोपड़ा को अपनी कहानी सुनाई। बी.आर. चोपड़ा को भी कहानी बहुत पसंद आई। और उन्होंने तो पंडित मुखराम शर्मा से वादा भी किया कि वो फ़िल्म वैसी ही बनाएंगे जैसी की पंडित जी चाहते हैं। बी.आर. चोपड़ा ने अपना वादा निभाया भी था।

साधना बनी और रिलीज़ हुई। दर्शकों को साधना बहुत पसंद आई। बी.आर. चोपड़ा ने खुद साधना का निर्देशन भी किया था। संगीत दिया था उसमें दत्ता नायक ने। वैयजयंतीमाला के अपोज़िट हीरो थे सुनील दत्त। साहिर लुधियानवी ने फ़िल्म के सभी गीत लिखे थे। और इस फ़िल्म ने दो फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड्स अपने नाम किए थे। पहला था बेस्ट एक्ट्रेस जो वैयजयंतीमाला जी को मिला था। और दूसरा था बेस्ट स्टोरी, जो पंडित मुखराम शर्मा को मिला था। साधना को बेस्ट फ़िल्म, बेस्ट डायरेक्टर, बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस व बेस्ट लिरिसिस्ट कैटेगरी में भी नॉमिनेट किया गया था। मगर वो अवॉर्ड ये जीत ना सकी थी।

किसी दिन और विस्तार से पंडित मुखराम शर्मा के बारे में कोई लेख लिखूंगा। क्योंकि इनके बारे में भी बहुत कुछ है जानने के लिए। 25 अप्रैल 2000 को 92 साल की उम्र में पंडित मुखराम शर्मा का देहांत हुआ था। जीवन का आखिरी समय उन्होंने मेरठ स्थित अपने घर पर ही बिताया था। पंडित मुखराम शर्मा को क़िस्सा टीवी का नमन। शत शत नमन। पंडित मुखराम शर्मा जी के बारे में ये जानकारियां मुझे श्री अजय ब्रह्मात्मज के एक यूट्यूब वीडियो से मिली हैं।

साथियों ये लेख अगर आपको पसंद आया हो तो इसे लाइक-शेयर करना बिल्कुल भी मत भूलिएगा। तभी ऐसे लेख फेसबुक वाले अधिक लोगों तक पहुंचाते हैं। और तभी इस तरह की चीज़ें लिखने का उत्साह मिलता है मुझे। क़िस्सा टीवी को फॉलो भी कर लीजिए। और अपनी टिप्पणी ज़रूर दीजिएगा पंडित मुखराम शर्मा के बारे में।

India's Biggest Comedy Franchise is Back — Welcome to the Jungle! 😂🔥Akshay Kumar's most awaited Welcome to the Jungle is...
14/05/2026

India's Biggest Comedy Franchise is Back — Welcome to the Jungle! 😂🔥

Akshay Kumar's most awaited Welcome to the Jungle is releasing on 26 June 2026 — India's biggest comedy franchise is finally back! 👑💥

BICHHOO: धर्मेंद्र ने गुस्से में बंद करी और 17 साल बाद बॉबी देओल ने कैसे काम किया..     दोस्तों आज धर्मेंद्र और उनके छोट...
14/05/2026

BICHHOO: धर्मेंद्र ने गुस्से में बंद करी और 17 साल बाद बॉबी देओल ने कैसे काम किया..
दोस्तों आज धर्मेंद्र और उनके छोटे बेटे बॉबी देओल की एक फिल्म बिच्छू की बात करेंगे.. साल 2000 में रिलीज़ हुई बिच्छू फिल्म में बॉबी देओल ने काम किया था ..लेकिन खुद धर्मेंद्र ने भी साल 1983 में बिच्छू नाम से एक फिल्म बनाने की घोषणा करी थी.. जिसका प्रोडक्शन भी वह खुद ही करने वाले थे.. मतलब खुद धर्मेंद्र साल 1983 में रिलीज होने वाली बिच्छू फिल्म के प्रोड्यूसर थे... लेकिन किन्हीं कारणों से बिच्छू फिल्म को धर्मेंद्र को साल 1983 में बंद करना पड़ा ..आज साल 1983 में रिलीज होने वाली धर्मेंद्र की फिल्म बिच्छू की तो बात करेंगे ही और साथ में 7 जुलाई साल 2000 को रिलीज हुई बॉबी देओल की फिल्म बिच्छू की भी बात करेंगे #सोनी_सिंह_गिल
दोस्तों सबसे पहले बात करते हैं हम धर्मेंद्र की साल 1983 में रिलीज होने वाली फिल्म बिच्छू की.. जो प्रोजेक्ट बाद में शैलव्ड हो गया था..
सभी को पता है कि धर्मेंद्र अपनी जुबान के पक्के हैं और वह जब भी कोई फिल्म बनाते हैं तो दिल से उस फिल्म का निर्माण करते हैं.. धर्मेंद्र अब खुद फिल्म निर्माण में अपने हाथ आजमाना चाहते थे और यह फिल्म मतलब बिच्छू फिल्म उनकी पहली प्रोडक्शन की पहली फिल्म बनने वाली थी.. तो जब उन्होंने बिच्छू फिल्म बनाने की योजना बनाई तब शुरुआत में उन्होंने इसकी बात डायरेक्टर राज हौसला से करी थी और उन्हें ही बिच्छू फिल्म का डायरेक्शन भी संभाला था, साल 1983 की फिल्म बिच्छू में धर्मेंद्र ने बतौर हीरोइन शबाना आज़मी को कास्ट कर लिया और शूटिंग शुरू कर दी.. शूटिंग का पहला शेड्यूल भी हो चुका था.. लेकिन शायद खुदा को यह मंजूर नहीं था.. उनके डायरेक्टर राज खोसला की मृत्यु की खबर आ गई.. जिसकी वजह से कई दिनों बिच्छू फिल्म का प्रोजेक्ट ड्रॉप कर दिया गया ..लेकिन बाद में किसी ने धर्मेंद्र को सजेस्ट किया के उन्हें आरट फिल्मों की डायरेक्टर साई प्रांजी को डायरेक्शन संभल देना चाहिए और धर्मेंद्र ने भी साई परंजी के नाम से अच्छी फिल्में सुन रखी थी
साई प्राजी चश्मे बद्दूर, कथा और स्पर्श जैसी अच्छी आरट फिल्में बना चुकी थी.. धर्मेंद्र ने भी उनका नाम और उनके काम की अच्छी तारीफ़ सुन रखी थी..तो उन्होंने साइ प्राजी को बिच्छू फिल्म का डायरेक्शन संभल दिया.. एक बेहतरीन कांबिनेशन का दर्शक बेसब्री से इंतजार भी कर रहे थे... इस दौरान धर्मेंद्र को म्यूजिक की याद आई ..तो उन्हे शंकर जयकिशन का नाम जहन में आया क्योंकि बहुत सालों पहले उन्होंने उनसे वादा किया था कि जब भी वह फिल्म का निर्माण करेंगे तो इसी जोड़ी को बतौर म्यूजिक कास्ट करेंगे.. उन दिनों जयकृष्ण की मृत्यु हो चुकी थी लेकिन शंकर अभी भी कार्यरत थे ..तो उन्होंने शंकर को फिल्म के म्यूजिक का कार्य भार संभल दिया ..लेकिन दूसरी तरफ साई प्रांजी राजकमल को म्यूजिक का निर्देशन संभालना चाहती थी.. क्योंकि उन दिनों लता मंगेशकर का शंकर जयकिशन जोड़ी के साथ कुछ लफड़ा चल रहा था और वो लता जी से इस फिल्म में गाने भी गवाना चाहती थी और इसी बात को लेकर धर्मेंद्र और साई के बीच में कहां सुनी हो गई.. जिसका दबाव शंकर पर दिखाई देने लगा ..क्योंकि शंकर ने धर्मेंद्र से कहा के पाजी आप किसी दूसरे म्यूजिक डायरेक्टर को चुन लीजिए.. लेकिन धर्मेंद्र कहां किसी के दबाव में आने वाले थे ..उन्होंने ना तो साइ की बात मानी और ना ही शंकर की बात मानी.. उन्होंने इन सब चीजों से अलग- जाकर अपनी पहली फिल्म को बंद करना ही सही समझा
करीब 17 साल बाद धर्मेंद्र के भतीजे गुड्डू धनोवा ने एक फिल्म बनाने की योजना बनाई.. वो धर्मेंद्र के पास गए वो बॉबी देओल को अपनी फिल्म में लेना चाहते थे, तब धर्मेंद्र ने गुड्डू को दोबारा से बिच्छू नाम सुझाया.. तब गुड्डू ने बिच्छू नाम से फिल्म बनाने की योजना बनाई और उन्होंने इस फिल्म में धर्मेंद्र के छोटे बेटे बॉबी देओल को जीवा नाम का किरदार दिया और इस फिल्म में रानी मुखर्जी ने किरण नाम की लड़की की भूमिका निभाई थी और ये फिल्म साल 2000 में रिलीज हुई ..यह फिल्म 1994 में रिलीज हुई एक फ्रेंच फिल्म लियोन द प्रोफेशनल फिल्म से प्रेरित फिल्म थी इस फिल्म में लड़की की उम्र 12 साल से बढ़ाकर 22 साल कर दी गई थी..
लेकिन शायद आपको नहीं पता होगा इस फिल्म में रानी मुखर्जी ने जिस लड़की का किरदार निभाया है वह किरदार पहले तब्बू को ऑफर किया गया था.. तब्बू ही बतौर हीरोइन इस फिल्म की पहली च्वाइस थी लेकिन तब्बू ने कुछ कारणों की वजह से इस फिल्म को छोड़ दिया और बाद में यह फिल्म रानी मुखर्जी को ऑफर हुई.. तब तक बॉबी देओल रानी मुखर्जी के साथ बादल फिल्म में पहले काम कर चुके थे ..इसलिए यह फिल्म बॉबी देओल और रानी मुखर्जी की दूसरी फिल्म थी
ऐसा नहीं है कि साल 2000 में रिलीज हुई बिच्छू फिल्म के साथ कोई कॉन्ट्रोवर्सी नहीं जुड़ी है एक बहुत बड़ी कंट्रोवर्सी इस फिल्म के साथ भी हुई थी आपको शायद याद होगा कि इस फिल्म में रानी मुखर्जी एक टीनेजर लड़की का रोल निभा रही है और एक सीन में रानी को सिगरेट पीते हुए दिखाया गया है.. इसी बात पर बहुत बड़ा बवाल हो गया था.. कई क्रिटिक्स ने कहा था कि इसकी वजह से टीनएजर लड़कियों पर इसका बहुत बुरा प्रभाव जा सकता है
बॉबी देओल की बिच्छू फिल्म में म्यूजिक आनंद राज आनंद का था इस फिल्म का मशहूर गाना दिल टोटे टोटे हो गया हंसराज हंस ने गया था और यह गाना साल 2000 का 11वां सबसे ज्यादा बिकने वाला साउंडट्रैक एल्बम बना था ..करीब 16 लख यूनिट्स उस साल बिके थे
और साल 2000 में बिच्छू फिल्म को 7:30 करोड़ में बनाया गया था और इस फिल्म का भारत में नेट कलेक्शन 10.70 करोड़ों रुपए हुआ और वर्ल्ड वाइड करीब इस फिल्म ने 19 करोड रुपए की कमाई करी और इस फिल्म में बॉबी देओल के रोल की बहुत तारीफ भी हुई
और इस फिल्म के सीक्वल का भी ऐलान किया गया था 2014 में गुड्डू धनवा ने बिच्छू 2 नाम से फिल्म का ऐलान भी किया था और यह फिल्म भी बॉबी देओल के साथ ही बनाई जानी थी लेकिन आज तक यह फिल्म नहीं बन पाई .. रब्ब राखा!!!

Who is your Favourite?
14/05/2026

Who is your Favourite?

अमिताभ से भी ऊंचा कद। बलिष्ठ शरीर और चेचक के निशानों वाला चेहरा। पर्सनैलिटी इनकी ऐसी थी जैसे कोई खतरनाक खलनायक हो। मगर फ...
14/05/2026

अमिताभ से भी ऊंचा कद। बलिष्ठ शरीर और चेचक के निशानों वाला चेहरा। पर्सनैलिटी इनकी ऐसी थी जैसे कोई खतरनाक खलनायक हो। मगर फ़िल्मों में इन्होंने एज़ हीरो भी काम किया और सपोर्टिंग एक्टर भी। विलेन भी ये कुछ फ़िल्मों में बने थे। बाद में फ़िल्म प्रोड्यूसर भी बने। नाम है इनका शेख मुख्तार।

आज शेख मुख्तार की डेथ एनिवर्सरी है। साल 1980 में आज ही के दिन, 12 मई को शेख मुख्तार जी का देहांत हुआ था। ये उस वक्त तक पाकिस्तान शिफ़्ट हो चुके थे। वहीं पर इनकी मृत्यु हुई थी। जबकी पैदा हुए थे ये साल 1914 की 24 दिसंबर को। दिल्ली के बल्लीमारान इलाके में इनका जन्म हुआ था।

शेख मुख़्तार के पिता का नाम था चौधरी अशफ़ाक अहमद। वो रेलवे पुलिस में ऑफ़िसर थे। पिता चाहते थे कि ये भी एक दिन रेलवे पुलिस में नौकरी करें। मगर इन्हें बनना था एक्टर। इसलिए एक दिन घर से भागकर ये कलकत्ता चले गए। कलकत्ता में ये एक थिएटर ग्रुप से जुड़ गए और कई दिनों तक इन्होंने स्टेज पर ही एक्टिंग की।

कलकत्ता में ही महबूब खान से शेख मुख्तार की जान-पहचान हो गई थी। एक दिन महबूब खान ही शेख मुख्तार को अपने साथ बॉम्बे ले आए। महबूब खान ने शेख मुख्तार को अपनी फ़िल्म एक ही रास्ता में ब्रेक दिया। ये फ़िल्म साल 1939 में रिलीज़ हुई थी। इसी फ़िल्म से एक और कलाकार का डेब्यू हुआ था। लीड हीरो वही कलाकार था।

सालों बाद उस कलाकार का बेटा भी बॉलीवुड में बहुत बड़ा स्टार बना। उस कलाकार का नाम था अरुण कुमार आहूजा। अरुण जी के बेटे गोविंदा कितने बड़े स्टार रहे हैं ये दुनिया जानती है। खैर, शेेख मुख्तार की बात हो रही थी। तो शेख मुख्तार ने फिर कई फ़िल्मों में काम किया। और फ़िल्मों से शेख मुख्तार साहब ने खूब पैसा कमाया।

उन पैसों से शेख मुख्तार खुद भी फ़िल्में प्रोड्यूस करने लगे। कई फ़िल्में इन्होंने प्रोड्यूस की थी। मगर शेख मुख्तार को तगड़ा घाटा करा गई नूरजहां नाम की एक फ़िल्म। उस फ़िल्म में इन्होंने मीना कुमारी व प्रदीप कुमार को हीरो-हीरोइन लिया था। अपनी सारी जमा-पूंजी तो शेख मुख्तार ने इस फ़िल्म में लगाई ही, मोटा कर्ज़ भी इस फ़िल्म को पूरा करने के लिए ले लिया।

मगर जब ये फ़िल्म रिलीज़ हुई तो दर्शकों को पसंद नहीं आई। फ़िल्म फ्लॉप हो गई। नूरजहां फ्लॉप हुई तो शेख मुख्तार कर्ज़ के बोझ तले दब गए। कर्ज़ देने वाले उनके घर आने लगे। कर्ज़ ना चुका पाने की स्थिति में शेख मुख्तार को बेइज्ज़त करने लगे। कुछ ने तो जान से मारने की धमकी तक दे दी। कर्ज़ से परेशान शेख मुख्तार पाकिस्तान चले गए।

कुछ लोग कहते हैं कि शेख मुख्तार कर्ज़ से जान बचाने के लिए पाकिस्तान भागे थे। और जाने से पहले वो अपनी फ़िल्म नूरजहां का प्रिंट अपने साथ ले गए थे। ये सोचकर कि पाकिस्तान में फ़िल्म को रिलीज़ करके वहां कुछ पैसा कमा लिया जाएगा। मगर वो पाकिस्तान में अपनी फ़िल्म रिलीज़ ना करा सके। सदमे में उनकी आंख की रोशनी चली गई। और फिर जान भी गई।

लेकिन शेख मुख्तार से जुड़े कई लोग दावा करते हैं कि शेख मुख्तार किसी का पैसा लेकर नहीं भागे थे। वो अपना सारा कर्ज़ चुकाकर गए थे। और कर्ज़ चुकाने के लिए उन्होंने अपनी सारी प्रॉपर्टी बेच दी थी। वो पाकिस्तान में अंधे भी नहीं हुए थे। हां, फ़िल्म वहां रिलीज़ नहीं हो पाई थी। शेख मुख्तार की मौत डायबिटीज़ की वजह से हुई थी।

इस तस्वीर में कौन-कौन से कलाकार है, पहचानिए और बताइए..?
14/05/2026

इस तस्वीर में कौन-कौन से कलाकार है, पहचानिए और बताइए..?

राम और श्याम 1996 की भारतीय हिंदी-भाषा की एक्शन फिल्म है जो राजू मावानी द्वारा निर्देशित और निर्मित है। यह फिल्म जय राज ...
13/05/2026

राम और श्याम 1996 की भारतीय हिंदी-भाषा की एक्शन फिल्म है जो राजू मावानी द्वारा निर्देशित और निर्मित है। यह फिल्म जय राज प्रोडक्शन के बैनर तले रिलीज हुई थी और सम्राट मुखर्जी और मानेक बेदी के अभिनय की शुरुआत हुई थी। यह फिल्म बॉलीवुड एक्शन शैली से संबंधित है और 1990 के दशक के दौरान हिंदी सिनेमा में लोकप्रिय व्यावसायिक रूप से संचालित एक्शन नाटकों की लहर का हिस्सा थी।

वैज्ञानिक रोशनी रमन ने खोज ली एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक सूत्र। लेकिन उसका अपहरण "जबर" गिरोह द्वारा कर लिया गया और बाद में "तातार" द्वारा एक और राष्ट्र विरोधी डॉन "ततार" द्वारा बलपूर्वक ले लिया गया। तातार एक बहुत शक्तिशाली व्यक्ति है जिसके पेरोल पर पुलिस और राजनेता हैं। पुलिस की हरकतों से बाज नहीं आ पाई रोशनी की माँ और एक युवक को "राम" नियुक्त किया रोशनी का पता लगाने और बचाव करने के लिए उधर, जबर श्याम को रोशनी को ढूंढ कर उसके पास लाने के लिए रखता है। दोनों पुरुषों को अब न केवल एक दूसरे का सामना करना चाहिए, बल्कि अजेय तातार भी करना चाहिए।

अंजू महेन्द्रू को अधिकतर राजेश खन्ना चैप्टर के माध्यम से याद करता है बॉलीवुड।लेकिन पुराने उद्योग गपशप कॉलम के अंदर चुपचा...
13/05/2026

अंजू महेन्द्रू को अधिकतर राजेश खन्ना चैप्टर के माध्यम से याद करता है बॉलीवुड।
लेकिन पुराने उद्योग गपशप कॉलम के अंदर चुपचाप फंस गया एक और भुलाया हुआ रिश्ता था:
अमजद खान के भाई इम्तियाज़ खान के साथ उसके साल।

और ईमानदारी से?
बहुत कम लोगों को अब यह जोड़ी याद भी है।

70 के दशक की शुरुआत में राजेश खन्ना के साथ उनके अशांत अलगाव के बाद, अंजू कथित तौर पर 1972 के आसपास इम्तियाज़ खान के करीब हो गई
प्रसिद्ध खान परिवार से लंबा, हड़ताली, पूरी पुरानी-बॉलीवुड अभिजात ऊर्जा के साथ।

कुछ समय के लिए, वे बॉम्बे के फिल्मी-सामाजिक सर्किट का बहुत हिस्सा थे।
पार्टियां। उद्योग दोस्ती। शांत ग्लैमर
उस तरह का रिश्ता जो मैगज़ीन के कवर से ज्यादा फुसफुसाहट में मौजूद था।

लेकिन विस्फोटक राजेश-अंजू गाथा के विपरीत, यह अजीब तरह से कम मात्रा में रहा।
कोई नाटकीय सार्वजनिक युद्ध नहीं। कोई विशाल सुर्खियां नहीं।
बस एक रिश्ता जो धीरे धीरे दशक के अंत तक फीका पड़ गया।

और शायद यही है जो इसे अब दिलचस्प बनाता है।

क्योंकि पुराना बॉलीवुड बड़े किंवदंतियों के पीछे छिपे इन आधे-भूले भावुक दृश्यों से भरा था।
लोग सुपरस्टार के दिल टूटने को याद करते हैं।
बीच के शांत अध्याय किसी को याद नहीं है।

इसके अलावा, छोटी फ़िल्मी विडंबना:
इम्तियाज़ उसी परिवार से ताल्लुक रखते थे जिसने गब्बर सिंह में हिंदी सिनेमा को अपना सबसे तेज खलनायक दिया था... फिर भी उनका अपना रोमांटिक इतिहास बॉलीवुड की स्मृति में लगभग अदृश्य रह गया।

बहुत विंटेज बॉम्बे, ईमानदारी से।
सिगरेट के धुएं, स्टूडियो पार्टियों, और पुराने फिल्मफेयर पृष्ठों में गायब रिश्ते।

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