14/05/2026
कभी सलीम-जावेद का जो जलवा हुआ करता था फ़िल्म इंडस्ट्री में, उससे भी कहीं ज़्यादा इनका हुआ करता था। इनका क्या रुतबा रहा होगा इसका अंदाज़ा आप ऐसे लगाइए कि डिस्ट्रीब्यूटर्स इनसे पूछा करते थे कि अब आप कौन सी फ़िल्म लिख रहे हैं। जब ये बताते थे कि मैं फलां प्रोड्यूसर या बैनर के लिए ये कहानी लिख रहा हूं, वो फ़िल्म फौरन बिक जाती थी। बड़े-बड़े फ़िल्म निर्माता इनके आगे-पीछे घूमा करते थे उस ज़माने में। फ़िल्म इंडस्ट्री के बड़े-बड़े नाम, जिनमें डायरेक्टर, प्रोड्यूसर्स और एक्टर्स शुमार होते थे, वो उत्सुक रहते थे ये जानने के लिए कि ये साहब कौन सी फ़िल्म लिख रहे हैं।
ये हैं पंडित मुखराम शर्मा। 1950-60 के दशक का बॉलीवुड का बहुत बड़ा नाम। आज जन्मदिवस है पंडित जी का। 13 मई 1909 को उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर के पूठी गांव में पंडित मुखराम शर्मा का जन्म हुआ था। यानि हमारे मेरठ का गौरव हैं पंडित जी। ये और बात है कि मेरठ के अधिकतर लोग ही इनसे वाकिफ़ नहीं होंगे अब। मुझे खुद आज ही पता चला है कि पंडित मुखराम शर्मा मेरठ के रहने वाले थे। पंडित मुखराम शर्मा की कुछ प्रमुख फ़िल्मों के नाम लिखूं तो औलाद, वचन, एक ही रास्ता, साधना, धूल का फूल, घराना, दो कलियां, हमजोली, जीने की राह व और भी कई बढ़िया फ़िल्में उन्होंने लिखी थी।
1958 में आई पंडित मुखराम शर्मा की लिखी फ़िल्म साधना से जुड़ा एक रोचक क़िस्सा जानिए। पंडित जी चाहते थे साधना फ़िल्म बिमल रॉय बनाएं। पंडित जी का मानना था कि बंदिनी और सुजाता जैसी क्लासिक फ़िल्में बनाने वाले बिमर रॉय ही उनकी कहानी साधना के साथ पूरा न्याय कर सकेंगे। जब बिमल दा को ये बात पता चली तो उन्होंने पंडित मुखराम शर्मा को एक दिन मिलने को बुलाया। जब पंडित जी बिमल दा के पास पहुंचे तो बिमल दा उन्हें अपनी कार में ले गए। और कार में ही बिमल दा ने पंडित जी से साधना की कहानी सुनी। उन्हें कहानी पसंद आई। वो उस कहानी पर फिल्म बनाने को तैयार भी हो गए।
लेकिन बिमल दा ने एक बात भी पंडित मुखराम शर्मा से कही। दरअसल, पंडित जी चाहते थे कि फ़िल्म में हीरोइन वैयजयंतीमाला को लिया जाना चाहिए। बिमल दा को उससे भी कोई दिक्कत नहीं थी। मगर उन्होंने कहानी के अंत में बदलाव करने को कहा। बिमल दा का मानना था कि चूंकि कहानी में हीरोइन एक वेश्या है, तो जनता ये स्वीकार नहीं करेगी कि एक वेश्या किसी घर की बहू जन जाए। इसलिए आखिरी में वो वेश्या मर जाए, कहानी का अंत कुछ ऐसा होना चाहिए। पंडित जी ने जैसे ही बिमल दा की ये बात सुनी, उन्होंने फौरन उनसे गाड़ी रोकने को कहा। बिमल दा ने गाड़ी रोक ली।
बिमल दा को लगा कि शायद पंडित मुखराम शर्मा को लघुशंका लगी होगी। लेकिन गाड़ी से उतरते ही पंडित जी ने बिमल दा को नमस्कार किया। और वो आगे बढ़ गए। यानि कहानी में कोई भी बदलाव करने को पंडित जी तैयार नहीं थे। बताया जाता है कि पंडित जी वहां से सीधे बी.आर. चोपडा़ से मिलने उनके ऑफ़िस पहुंच गए। उन्होंने बी.आर. चोपड़ा को अपनी कहानी सुनाई। बी.आर. चोपड़ा को भी कहानी बहुत पसंद आई। और उन्होंने तो पंडित मुखराम शर्मा से वादा भी किया कि वो फ़िल्म वैसी ही बनाएंगे जैसी की पंडित जी चाहते हैं। बी.आर. चोपड़ा ने अपना वादा निभाया भी था।
साधना बनी और रिलीज़ हुई। दर्शकों को साधना बहुत पसंद आई। बी.आर. चोपड़ा ने खुद साधना का निर्देशन भी किया था। संगीत दिया था उसमें दत्ता नायक ने। वैयजयंतीमाला के अपोज़िट हीरो थे सुनील दत्त। साहिर लुधियानवी ने फ़िल्म के सभी गीत लिखे थे। और इस फ़िल्म ने दो फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड्स अपने नाम किए थे। पहला था बेस्ट एक्ट्रेस जो वैयजयंतीमाला जी को मिला था। और दूसरा था बेस्ट स्टोरी, जो पंडित मुखराम शर्मा को मिला था। साधना को बेस्ट फ़िल्म, बेस्ट डायरेक्टर, बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस व बेस्ट लिरिसिस्ट कैटेगरी में भी नॉमिनेट किया गया था। मगर वो अवॉर्ड ये जीत ना सकी थी।
किसी दिन और विस्तार से पंडित मुखराम शर्मा के बारे में कोई लेख लिखूंगा। क्योंकि इनके बारे में भी बहुत कुछ है जानने के लिए। 25 अप्रैल 2000 को 92 साल की उम्र में पंडित मुखराम शर्मा का देहांत हुआ था। जीवन का आखिरी समय उन्होंने मेरठ स्थित अपने घर पर ही बिताया था। पंडित मुखराम शर्मा को क़िस्सा टीवी का नमन। शत शत नमन। पंडित मुखराम शर्मा जी के बारे में ये जानकारियां मुझे श्री अजय ब्रह्मात्मज के एक यूट्यूब वीडियो से मिली हैं।
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