12/08/2026
बहू ने ससुर से कहा— 'बाबूजी, कल से मैं आपके कमरे में खाना नहीं रखूँगी।' बूढ़े ससुर ने वजह पूछी तो बहू बोली—
रात के करीब साढ़े दस बजे थे।
घर के बाकी सभी लोग खाना खाकर अपने-अपने कमरों में जा चुके थे।
लेकिन रसोई में नैना अब भी खड़ी थी।
उसने स्टील की थाली में दो रोटियाँ, थोड़ी-सी दाल और सब्जी रखी और धीरे-धीरे अपने ससुर हरिशंकर जी के कमरे की तरफ बढ़ी।
दरवाजा आधा खुला था।
हरिशंकर जी चारपाई पर बैठे पुराने अखबार के पन्ने पलट रहे थे।
नैना ने थाली मेज पर रख दी।
"बाबूजी, खाना रख दिया है।"
हरिशंकर जी ने चश्मा उतारते हुए कहा—
"बहू, तू बैठ जा। आजकल तू बहुत थकी हुई लगती है।"
नैना कुछ पल खड़ी रही।
फिर उसने धीमे स्वर में कहा—
"बाबूजी... कल से मैं आपके कमरे में खाना नहीं रखूँगी।"
हरिशंकर जी के हाथ रुक गए।
"क्यों?"
"बस... अब नहीं रख पाऊँगी।"
"क्या मैंने तुझसे कुछ कह दिया?"
"नहीं।"
"फिर राकेश से झगड़ा हुआ है?"
"नहीं बाबूजी।"
"घर में कोई परेशानी है?"
नैना की आँखें भर आईं।
वह बस इतना बोली—
"कल आपको सब पता चल जाएगा।"
और कमरे से बाहर चली गई।
हरिशंकर जी देर तक दरवाजे की तरफ देखते रहे।
उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अचानक ऐसा क्या हो गया।
अगली सुबह घर में अजीब-सी खामोशी थी।
राकेश ऑफिस जाने के लिए तैयार हो रहा था।
उसने पिता से पूछा—
"पापा, रात को आपने खाना खाया था?"
हरिशंकर जी ने सिर हिला दिया।
"हाँ बेटा।"
तभी नैना रसोई से बाहर आई।
उसके हाथ में एक फाइल थी।
उसने फाइल हरिशंकर जी के सामने रख दी।
"बाबूजी, इसमें अस्पताल के कागज हैं।"
हरिशंकर जी ने चश्मा लगाया।
पहले पन्ने पर नजर पड़ते ही उनका चेहरा सफेद पड़ गया।
"ये क्या है?"
नैना ने काँपती आवाज में कहा—
"आपकी बीमारी की रिपोर्ट।"
राकेश चौंक गया।
"कौन-सी बीमारी?"
नैना ने राकेश की तरफ देखा।
"तुम्हारे पापा पिछले चार महीने से ठीक नहीं हैं।"
"क्या?"
हरिशंकर जी ने तुरंत कहा—
"बहू, तूने राकेश को क्यों बताया?"
नैना की आँखों से आँसू निकल पड़े।
"क्योंकि अब मैं अकेले नहीं संभाल सकती।"
राकेश ने पिता का हाथ पकड़ लिया।
"पापा, आपको क्या हुआ है?"
हरिशंकर जी चुप रहे।
नैना ने फाइल आगे बढ़ाई।
"डॉक्टर ने कहा है कि बाबूजी का इलाज तुरंत शुरू होना चाहिए। लेकिन..."
राकेश की आवाज काँप गई।
"लेकिन क्या?"
नैना ने कहा—
"इलाज में बहुत पैसे लगेंगे।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
राकेश ने सिर पकड़ लिया।
"इतने पैसे कहाँ से आएँगे?"
नैना ने कुछ नहीं कहा।
हरिशंकर जी अचानक बोले—
"मेरी चिंता मत करो बेटा। जितने दिन भगवान ने लिखे हैं, उतने दिन जी लूँगा।"
राकेश गुस्से में बोला—
"आपको हमेशा यही कहना आता है! बचपन में मेरी फीस के लिए अपनी जमीन बेच दी, बहन की शादी में अपना घर गिरवी रख दिया... और अब अपनी बीमारी भी छिपा रहे हैं?"
हरिशंकर जी ने नजरें झुका लीं।
नैना चुपचाप कमरे से बाहर चली गई।
उस दिन राकेश ऑफिस नहीं गया।
पूरा दिन अस्पतालों के चक्कर लगाता रहा।
शाम को डॉक्टर ने कहा—
"इलाज संभव है, लेकिन देर नहीं करनी चाहिए।"
राकेश ने पूछा—
"कितना खर्च आएगा?"
डॉक्टर ने रकम बताई।
राकेश की आँखों के सामने अंधेरा छा गया।
इतनी बड़ी रकम उसके पूरे जीवन की बचत से भी ज्यादा थी।
वह घर लौटा तो नैना बरामदे में बैठी थी।
राकेश ने टूटे स्वर में पूछा—
"अब क्या करें?"
नैना ने उसकी तरफ देखा।
"एक रास्ता है।"
"क्या?"
"मेरे पास जो थोड़ी-सी बचत है, वह निकाल लेते हैं।"
राकेश ने तुरंत मना कर दिया।
"नहीं। वह तुम्हारे भविष्य के लिए है।"
नैना बोली—
"जिस इंसान ने तुम्हारा भविष्य बनाया, उसके आज के लिए मेरा भविष्य किस काम का?"
राकेश की आँखें भर आईं।
लेकिन नैना ने अभी पूरा सच नहीं बताया था।
अगले दिन हरिशंकर जी को अस्पताल में भर्ती कर दिया गया।
ऑपरेशन की तारीख तय हो गई।
रात को राकेश अस्पताल के बाहर बैठा रो रहा था।
नैना उसके पास आई।
उसने अपने हाथ की चूड़ियाँ उतारकर राकेश की हथेली पर रख दीं।
राकेश घबरा गया।
"ये क्यों?"
नैना बोली—
"इन्हें बेच देना।"
"नैना, नहीं!"
"बाबूजी का इलाज होगा।"
राकेश ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"ये तुम्हारी माँ की निशानी हैं।"
नैना की आँखें भर आईं।
"मेरी माँ ने शादी के समय कहा था— 'बेटी, ये चूड़ियाँ तभी उतारना जब जिंदगी में कोई बहुत बड़ा कारण हो।'"
वह अस्पताल के कमरे की तरफ देखने लगी।
"मुझे लगता है... आज उससे बड़ा कारण कोई नहीं है।"
राकेश ने नैना को गले लगा लिया।
लेकिन अगले दिन ऑपरेशन से पहले हरिशंकर जी ने नैना को अकेले बुलाया।
उन्होंने पूछा—
"बहू, मेरी वजह से तू अपनी चूड़ियाँ बेच रही है?"
नैना चौंक गई।
"आपको कैसे पता?"
हरिशंकर जी मुस्कुराए।
"बेटी की आँखों से बाप सब समझ जाता है।"
फिर उन्होंने अपनी तकिए के नीचे से एक लिफाफा निकाला।
"इसे रख ले।"
नैना ने लिफाफा खोला।
अंदर बैंक की रसीदें थीं।
उसमें लगभग उतनी ही रकम थी, जितनी ऑपरेशन के लिए चाहिए थी।
नैना हैरान रह गई।
"बाबूजी... आपने इतने पैसे कहाँ से जमा किए?"
हरिशंकर जी ने धीमे से कहा—
"चार साल से अपनी पेंशन में से हर महीने थोड़ा-थोड़ा बचा रहा था।"
"लेकिन क्यों?"
हरिशंकर जी की आँखें नम हो गईं।
"तेरे लिए।"
नैना स्तब्ध रह गई।
"मेरे लिए?"
"हाँ।"
उन्होंने काँपते हाथ से उसका सिर सहलाया।
"मुझे पता था कि एक दिन मेरे जाने के बाद इस घर में तुझे लोग बहू कहेंगे... लेकिन मैं चाहता था कि अगर कभी तुझे अपने पैरों पर खड़े होने के लिए पैसों की जरूरत पड़े, तो तू किसी के सामने हाथ न फैलाए।"
नैना फूट-फूटकर रोने लगी।
हरिशंकर जी बोले—
"मैंने अपने बेटे को पढ़ाया था ताकि वह अच्छा इंसान बने। लेकिन तूने साबित कर दिया कि मेरी परवरिश बेकार नहीं गई।"
नैना ने लिफाफा उनके सीने से लगा दिया।
"बाबूजी, ये पैसे आपके इलाज में लगेंगे।"
हरिशंकर जी मुस्कुराए।
"मेरी बहू अगर मेरे लिए अपनी माँ की आखिरी निशानी उतार सकती है... तो क्या मैं उसके लिए अपनी पेंशन नहीं बचा सकता?"
ऑपरेशन सफल रहा।
तीन दिन बाद हरिशंकर जी ने आँखें खोलीं।
सबसे पहले उन्हें नैना दिखाई दी।
उन्होंने धीमे से पूछा—
"बहू... अब खाना मेरे कमरे में रखेगी?"
नैना रोते हुए मुस्कुराई।
"हाँ बाबूजी। जिंदगी भर रखूँगी।"
हरिशंकर जी ने आँखें बंद कर लीं।
उनकी आँखों के कोने से एक आँसू निकलकर तकिए पर गिर पड़ा।
राकेश पास खड़ा सब देख रहा था।
उसने पिता के पैर पकड़ लिए।
"पापा... आपने सारी जिंदगी हम दोनों को दिया। हमने आपको क्या दिया?"
हरिशंकर जी ने बेटे के सिर पर हाथ रखा।
"एक बहू दी है मुझे... जो बेटी बन गई। इससे ज्यादा क्या चाहिए?"
कुछ महीने बाद हरिशंकर जी पूरी तरह स्वस्थ होकर घर लौटे।
नैना ने उसी रात उनके कमरे में खाना रखा।
थाली में दो रोटियाँ थीं, दाल थी और वही हरी सब्जी थी जो उन्हें सबसे ज्यादा पसंद थी।
हरिशंकर जी ने मुस्कुराकर पूछा—
"बहू, अब कभी मेरा खाना बंद तो नहीं करेगी?"
नैना उनके पास बैठ गई।
उसने उनका हाथ पकड़कर कहा—
"नहीं बाबूजी... उस दिन मैं खाना बंद नहीं करना चाहती थी।"
हरिशंकर जी ने पूछा—
"फिर?"
नैना मुस्कुराई और बोली—
"मैं चाहती थी कि आप पहली बार समझें कि घर में सिर्फ आपकी पेंशन की जरूरत नहीं है... आपकी जरूरत है।"
हरिशंकर जी की आँखें भर आईं।
उन्होंने बहू का सिर अपने सीने से लगा लिया।
और उस रात उस छोटे-से घर में किसी ने खाना जल्दी खत्म नहीं किया।
क्योंकि कई बार थाली में रखा खाना पेट नहीं भरता...
किसी का साथ यह एहसास भरता है कि दुनिया में अभी भी कोई है, जिसके लिए हम जरूरी हैँ... 🙏👍🥰🌳⭐