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इन्सानियत किसी पार्टी या विचारधारा की मोहताज नहीं होती .--------------ये वाराणसी BJ-P के जिला उपाध्यक्ष हैं . सुरेश सिंह...
20/08/2026

इन्सानियत किसी पार्टी या विचारधारा की मोहताज नहीं होती .
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ये वाराणसी BJ-P के जिला उपाध्यक्ष हैं . सुरेश सिंह

इनके इलाके मे ही एक किडनी पेशेंट इनके संज्ञान मे आया .

इन्होंने तुरन्त उससे संपर्क किया ...
उसका आयुष्मान कार्ड बनवाया
मोबाइल आधार लिंक करवाया
डॉक्टरों से सम्पर्क किया
अपने तत्वाधान मे इलाज का इन्तेजाम किया .

और बाकी के तमाम पेपर वर्क अपनी निगरानी मे पूरे करवा कर उसका इलाज ऑपरेशन करवाया

और सारे पेपर वर्क करते करते उसकी लगभग 50 करोड़ की पुश्तैनी जमीन उसको बिना बताये अपने नाम लिखवा ली .
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😁😁😁😄😄

19/08/2026

भंवरी देवी प्रकरण लोहावट
कलेक्टर घेराव के दौरान हनुमानजी बेनीवाल के प्रति की गई टिप्पणी घोर निंदनीय है, भंवरी देवी के न्याय से भटक रहे है, आंदोलन राजनीतिक रूप ले चुका है!

जिराफ़ से कम नहीं है ये थार रेगिस्तान के ऊंट🤭🤗तारबंदी और बाड़ के ऊपर से खेत में खड़ी घास और फसल खा रहे है। ऊंटों ने मान ...
17/08/2026

जिराफ़ से कम नहीं है ये थार रेगिस्तान के ऊंट🤭🤗

तारबंदी और बाड़ के ऊपर से खेत में खड़ी घास और फसल खा रहे है। ऊंटों ने मान लिया है कि हाइवे के 100 मीटर में सब अपना है मित्तरर 😂🤣

|🇮🇳 स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 🇮🇳आजादी केवल एक शब्द नहीं, बल्कि अनगिनत वीरों के त्याग, संघर्ष और बलिदान का पर...
15/08/2026

|🇮🇳 स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 🇮🇳
आजादी केवल एक शब्द नहीं, बल्कि अनगिनत वीरों के त्याग, संघर्ष और बलिदान का परिणाम है। देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूमने वाले शहीदों से लेकर स्वतंत्रता संग्राम में अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले प्रत्येक सेनानी को आज नमन करने का दिन है।
15 अगस्त हमें अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों का भी स्मरण कराता है। आइए, इस पावन अवसर पर हम संकल्प लें कि देश की एकता और अखंडता को मजबूत करेंगे तथा संविधान, लोकतंत्र और आमजन के अधिकारों की रक्षा के लिए सदैव प्रतिबद्ध रहेंगे।
समस्त देशवासियों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।
जय हिंद 🇮🇳

बहू ने ससुर से कहा— 'बाबूजी, कल से मैं आपके कमरे में खाना नहीं रखूँगी।' बूढ़े ससुर ने वजह पूछी तो बहू बोली— ‎‎रात के करी...
12/08/2026

बहू ने ससुर से कहा— 'बाबूजी, कल से मैं आपके कमरे में खाना नहीं रखूँगी।' बूढ़े ससुर ने वजह पूछी तो बहू बोली—

‎रात के करीब साढ़े दस बजे थे।

‎घर के बाकी सभी लोग खाना खाकर अपने-अपने कमरों में जा चुके थे।

‎लेकिन रसोई में नैना अब भी खड़ी थी।

‎उसने स्टील की थाली में दो रोटियाँ, थोड़ी-सी दाल और सब्जी रखी और धीरे-धीरे अपने ससुर हरिशंकर जी के कमरे की तरफ बढ़ी।

‎दरवाजा आधा खुला था।

‎हरिशंकर जी चारपाई पर बैठे पुराने अखबार के पन्ने पलट रहे थे।

‎नैना ने थाली मेज पर रख दी।

‎"बाबूजी, खाना रख दिया है।"

‎हरिशंकर जी ने चश्मा उतारते हुए कहा—

‎"बहू, तू बैठ जा। आजकल तू बहुत थकी हुई लगती है।"

‎नैना कुछ पल खड़ी रही।

‎फिर उसने धीमे स्वर में कहा—

‎"बाबूजी... कल से मैं आपके कमरे में खाना नहीं रखूँगी।"

‎हरिशंकर जी के हाथ रुक गए।

‎"क्यों?"

‎"बस... अब नहीं रख पाऊँगी।"

‎"क्या मैंने तुझसे कुछ कह दिया?"

‎"नहीं।"

‎"फिर राकेश से झगड़ा हुआ है?"

‎"नहीं बाबूजी।"

‎"घर में कोई परेशानी है?"

‎नैना की आँखें भर आईं।

‎वह बस इतना बोली—

‎"कल आपको सब पता चल जाएगा।"

‎और कमरे से बाहर चली गई।

‎हरिशंकर जी देर तक दरवाजे की तरफ देखते रहे।

‎उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अचानक ऐसा क्या हो गया।

‎अगली सुबह घर में अजीब-सी खामोशी थी।

‎राकेश ऑफिस जाने के लिए तैयार हो रहा था।

‎उसने पिता से पूछा—

‎"पापा, रात को आपने खाना खाया था?"

‎हरिशंकर जी ने सिर हिला दिया।

‎"हाँ बेटा।"

‎तभी नैना रसोई से बाहर आई।

‎उसके हाथ में एक फाइल थी।

‎उसने फाइल हरिशंकर जी के सामने रख दी।

‎"बाबूजी, इसमें अस्पताल के कागज हैं।"

‎हरिशंकर जी ने चश्मा लगाया।

‎पहले पन्ने पर नजर पड़ते ही उनका चेहरा सफेद पड़ गया।

‎"ये क्या है?"

‎नैना ने काँपती आवाज में कहा—

‎"आपकी बीमारी की रिपोर्ट।"

‎राकेश चौंक गया।

‎"कौन-सी बीमारी?"

‎नैना ने राकेश की तरफ देखा।

‎"तुम्हारे पापा पिछले चार महीने से ठीक नहीं हैं।"

‎"क्या?"

‎हरिशंकर जी ने तुरंत कहा—

‎"बहू, तूने राकेश को क्यों बताया?"

‎नैना की आँखों से आँसू निकल पड़े।

‎"क्योंकि अब मैं अकेले नहीं संभाल सकती।"

‎राकेश ने पिता का हाथ पकड़ लिया।

‎"पापा, आपको क्या हुआ है?"

‎हरिशंकर जी चुप रहे।

‎नैना ने फाइल आगे बढ़ाई।

‎"डॉक्टर ने कहा है कि बाबूजी का इलाज तुरंत शुरू होना चाहिए। लेकिन..."

‎राकेश की आवाज काँप गई।

‎"लेकिन क्या?"

‎नैना ने कहा—

‎"इलाज में बहुत पैसे लगेंगे।"

‎कमरे में सन्नाटा छा गया।

‎राकेश ने सिर पकड़ लिया।

‎"इतने पैसे कहाँ से आएँगे?"

‎नैना ने कुछ नहीं कहा।

‎हरिशंकर जी अचानक बोले—

‎"मेरी चिंता मत करो बेटा। जितने दिन भगवान ने लिखे हैं, उतने दिन जी लूँगा।"

‎राकेश गुस्से में बोला—

‎"आपको हमेशा यही कहना आता है! बचपन में मेरी फीस के लिए अपनी जमीन बेच दी, बहन की शादी में अपना घर गिरवी रख दिया... और अब अपनी बीमारी भी छिपा रहे हैं?"

‎हरिशंकर जी ने नजरें झुका लीं।

‎नैना चुपचाप कमरे से बाहर चली गई।

‎उस दिन राकेश ऑफिस नहीं गया।

‎पूरा दिन अस्पतालों के चक्कर लगाता रहा।

‎शाम को डॉक्टर ने कहा—

‎"इलाज संभव है, लेकिन देर नहीं करनी चाहिए।"

‎राकेश ने पूछा—

‎"कितना खर्च आएगा?"

‎डॉक्टर ने रकम बताई।

‎राकेश की आँखों के सामने अंधेरा छा गया।

‎इतनी बड़ी रकम उसके पूरे जीवन की बचत से भी ज्यादा थी।

‎वह घर लौटा तो नैना बरामदे में बैठी थी।

‎राकेश ने टूटे स्वर में पूछा—

‎"अब क्या करें?"

‎नैना ने उसकी तरफ देखा।

‎"एक रास्ता है।"

‎"क्या?"

‎"मेरे पास जो थोड़ी-सी बचत है, वह निकाल लेते हैं।"

‎राकेश ने तुरंत मना कर दिया।

‎"नहीं। वह तुम्हारे भविष्य के लिए है।"

‎नैना बोली—

‎"जिस इंसान ने तुम्हारा भविष्य बनाया, उसके आज के लिए मेरा भविष्य किस काम का?"

‎राकेश की आँखें भर आईं।

‎लेकिन नैना ने अभी पूरा सच नहीं बताया था।

‎अगले दिन हरिशंकर जी को अस्पताल में भर्ती कर दिया गया।

‎ऑपरेशन की तारीख तय हो गई।

‎रात को राकेश अस्पताल के बाहर बैठा रो रहा था।

‎नैना उसके पास आई।

‎उसने अपने हाथ की चूड़ियाँ उतारकर राकेश की हथेली पर रख दीं।

‎राकेश घबरा गया।

‎"ये क्यों?"

‎नैना बोली—

‎"इन्हें बेच देना।"

‎"नैना, नहीं!"

‎"बाबूजी का इलाज होगा।"

‎राकेश ने उसका हाथ पकड़ लिया।

‎"ये तुम्हारी माँ की निशानी हैं।"

‎नैना की आँखें भर आईं।

‎"मेरी माँ ने शादी के समय कहा था— 'बेटी, ये चूड़ियाँ तभी उतारना जब जिंदगी में कोई बहुत बड़ा कारण हो।'"

‎वह अस्पताल के कमरे की तरफ देखने लगी।

‎"मुझे लगता है... आज उससे बड़ा कारण कोई नहीं है।"

‎राकेश ने नैना को गले लगा लिया।

‎लेकिन अगले दिन ऑपरेशन से पहले हरिशंकर जी ने नैना को अकेले बुलाया।

‎उन्होंने पूछा—

‎"बहू, मेरी वजह से तू अपनी चूड़ियाँ बेच रही है?"

‎नैना चौंक गई।

‎"आपको कैसे पता?"

‎हरिशंकर जी मुस्कुराए।

‎"बेटी की आँखों से बाप सब समझ जाता है।"

‎फिर उन्होंने अपनी तकिए के नीचे से एक लिफाफा निकाला।

‎"इसे रख ले।"

‎नैना ने लिफाफा खोला।

‎अंदर बैंक की रसीदें थीं।

‎उसमें लगभग उतनी ही रकम थी, जितनी ऑपरेशन के लिए चाहिए थी।

‎नैना हैरान रह गई।

‎"बाबूजी... आपने इतने पैसे कहाँ से जमा किए?"

‎हरिशंकर जी ने धीमे से कहा—

‎"चार साल से अपनी पेंशन में से हर महीने थोड़ा-थोड़ा बचा रहा था।"

‎"लेकिन क्यों?"

‎हरिशंकर जी की आँखें नम हो गईं।

‎"तेरे लिए।"

‎नैना स्तब्ध रह गई।

‎"मेरे लिए?"

‎"हाँ।"

‎उन्होंने काँपते हाथ से उसका सिर सहलाया।

‎"मुझे पता था कि एक दिन मेरे जाने के बाद इस घर में तुझे लोग बहू कहेंगे... लेकिन मैं चाहता था कि अगर कभी तुझे अपने पैरों पर खड़े होने के लिए पैसों की जरूरत पड़े, तो तू किसी के सामने हाथ न फैलाए।"

‎नैना फूट-फूटकर रोने लगी।

‎हरिशंकर जी बोले—

‎"मैंने अपने बेटे को पढ़ाया था ताकि वह अच्छा इंसान बने। लेकिन तूने साबित कर दिया कि मेरी परवरिश बेकार नहीं गई।"

‎नैना ने लिफाफा उनके सीने से लगा दिया।

‎"बाबूजी, ये पैसे आपके इलाज में लगेंगे।"

‎हरिशंकर जी मुस्कुराए।

‎"मेरी बहू अगर मेरे लिए अपनी माँ की आखिरी निशानी उतार सकती है... तो क्या मैं उसके लिए अपनी पेंशन नहीं बचा सकता?"

‎ऑपरेशन सफल रहा।

‎तीन दिन बाद हरिशंकर जी ने आँखें खोलीं।

‎सबसे पहले उन्हें नैना दिखाई दी।

‎उन्होंने धीमे से पूछा—

‎"बहू... अब खाना मेरे कमरे में रखेगी?"

‎नैना रोते हुए मुस्कुराई।

‎"हाँ बाबूजी। जिंदगी भर रखूँगी।"

‎हरिशंकर जी ने आँखें बंद कर लीं।

‎उनकी आँखों के कोने से एक आँसू निकलकर तकिए पर गिर पड़ा।

‎राकेश पास खड़ा सब देख रहा था।

‎उसने पिता के पैर पकड़ लिए।

‎"पापा... आपने सारी जिंदगी हम दोनों को दिया। हमने आपको क्या दिया?"

‎हरिशंकर जी ने बेटे के सिर पर हाथ रखा।

‎"एक बहू दी है मुझे... जो बेटी बन गई। इससे ज्यादा क्या चाहिए?"

‎कुछ महीने बाद हरिशंकर जी पूरी तरह स्वस्थ होकर घर लौटे।

‎नैना ने उसी रात उनके कमरे में खाना रखा।

‎थाली में दो रोटियाँ थीं, दाल थी और वही हरी सब्जी थी जो उन्हें सबसे ज्यादा पसंद थी।

‎हरिशंकर जी ने मुस्कुराकर पूछा—

‎"बहू, अब कभी मेरा खाना बंद तो नहीं करेगी?"

‎नैना उनके पास बैठ गई।

‎उसने उनका हाथ पकड़कर कहा—

‎"नहीं बाबूजी... उस दिन मैं खाना बंद नहीं करना चाहती थी।"

‎हरिशंकर जी ने पूछा—

‎"फिर?"

‎नैना मुस्कुराई और बोली—

‎"मैं चाहती थी कि आप पहली बार समझें कि घर में सिर्फ आपकी पेंशन की जरूरत नहीं है... आपकी जरूरत है।"

‎हरिशंकर जी की आँखें भर आईं।

‎उन्होंने बहू का सिर अपने सीने से लगा लिया।

‎और उस रात उस छोटे-से घर में किसी ने खाना जल्दी खत्म नहीं किया।

‎क्योंकि कई बार थाली में रखा खाना पेट नहीं भरता...

‎किसी का साथ यह एहसास भरता है कि दुनिया में अभी भी कोई है, जिसके लिए हम जरूरी हैँ... 🙏👍🥰🌳⭐





कुछ साथी लिख रहे है कि विश्नोई समाज के बीजेपी नेता , मंत्री , विधायक लोहावट स्थित धरना स्थल पर क्यों नही आ रहे है.....अर...
11/08/2026

कुछ साथी लिख रहे है कि विश्नोई समाज के बीजेपी नेता , मंत्री , विधायक लोहावट स्थित धरना स्थल पर क्यों नही आ रहे है.....अरे! भाइयों वो आ भी जाएंगे तो क्या हो जाएगा.....थोड़े दिन पहले जैसलमेर में बीजेपी के ही छात्र संगठन ABVP ने एक थानेदार को हटाने के लिए धरना दिया था वहां पर जैसलमेर से आने वाले बीजेपी के दोनों विधायक भी धरने पर बैठे थे पर एक थानेदार को नही हटा पाए तो क्या आपको ऐसा लगता है कि बिश्नोई समाज के बीजेपी नेता , मंत्री , विधायक लोहावट धरना स्थल पर आकर बहन भंवरी के हत्याकांड का खुलासा करवा देंगे.....बीजेपी को उसके नेताओं को अच्छे से पता है कि चूनावों के समय नामसझ जनता से धर्म के नाम पर , राष्ट्रवाद के नाम पर , जातिवाद के नाम पर वोट ले लेंगे तो अब जनता रो रही है तो रोने दो.....जब तक हम पार्टी भक्ति में लीन होकर धर्मवाद , राष्ट्रवाद जैसे खोखले नारों पर वोट देते रहेंगे तब तक मुसीबत के समय कोई हमारा क्यों ही सारथी बनेगा..!!

पूर्व मंत्री राजेंद्र सिंह गुढ़ा ने नारा लगाया, सीआई तेरी कब्र खुदेगी!सीआई नाराज़ हो गया। बोला, मेरी कब्र क्यों खुदेगी?गुढ़...
09/08/2026

पूर्व मंत्री राजेंद्र सिंह गुढ़ा ने नारा लगाया, सीआई तेरी कब्र खुदेगी!
सीआई नाराज़ हो गया। बोला, मेरी कब्र क्यों खुदेगी?
गुढ़ा ने और भी ज़ोर-ज़ोर से नारे लगवाए, सीआई तेरी कब्र खुदेगी!

मुझे एक सिपाही मित्र ने बताया कि सीआई नारे से नाराज़ नहीं थे। वे तो इस बात से नाराज़ थे कि हिन्दू हूँ तो मेरी कब्र क्यों खुदेगी? अपना तथ्य तो सही कर लो!

अब अगर धर्म के हिसाब से नारा लगाया जाता कि सीआई तेरी चिता जलेगी तो चिता तो शहीदों की जलती है और उन पर मेले लगते हैं! कैसी विडंबना है कि मृत्यु का संस्कार एक ही जैसा दु:ख या शोक उपजाता है; लेकिन कब्र खुदना तो बरबाद हो जाना है और चिता जलना बलिदान होना या एक संस्कार वाला काम।

एक सिपाही ने मुझे बोध करवाया कि भारतीय कम्युनिस्टों का ईजाद किया यह नारा "तेरी कब्र खुदेगी" कितना सांप्रदायिक और हिन्दूवादी है।

आज तक इस पहलू पर कभी किसी का ध्यान ही नहीं गया।

आज किसी काम से वंश निम्बलकोट जाना हुआ। रास्ते में एक पानी की टंकी पर नज़र पड़ी, जहाँ लिखा था—"पेपर लीक से  #युवा परेशान,...
07/08/2026

आज किसी काम से वंश निम्बलकोट जाना हुआ। रास्ते में एक पानी की टंकी पर नज़र पड़ी, जहाँ लिखा था—

"पेपर लीक से #युवा परेशान, नहीं सहेगा #राजस्थान।" 😄

पढ़कर हँसी भी आई और विडंबना भी लगी।

जिस नारे को लेकर सरकार बनी थी, आज उसी सरकार के कार्यकाल में पेपर लीक की इतनी चर्चाएँ और विवाद रहे कि वही नारा अब दीवार पर व्यंग्य जैसा लगने लगा।

लगता है इस दीवार ने समय के साथ राजनीति का पूरा यू-टर्न देख लिया। 😅
#पेपर_लीक #राजस्थान #युवा #राजनीतिक_व्यंग्य
Bhajanlal Sharma जी इसके ऊपर कम से कम चुना करवा दो

नागौर जिले में जब ज्योति मिर्धा  MP थी और डीडवाना से रूपारामजी डूडी MLA, तो सबसे पहले इनके बीच कलह हुई तो कॉंग्रेस पार्ट...
06/08/2026

नागौर जिले में जब ज्योति मिर्धा MP थी और डीडवाना से रूपारामजी डूडी MLA, तो सबसे पहले इनके बीच कलह हुई तो कॉंग्रेस पार्टी के 2 गुट बने कॉंग्रेस (J) कॉंग्रेस (R)
फिर हनुमान जी बेनीवाल को लेकर आये रूपाराम जी और आज Hanuman Beniwal l का वर्चस्व पुरे उतरी भारत में है
और उनकी खुद की पार्टी है तो जेसे भी मोका मिलेगा तो उनकी तरफ से तो congress BJP कि काट लाजमी है या दोनों पार्टियां अपने कार्यो से उन्हें कटाक्ष का मोका ना दे
नागौर में बीजेपी कॉंग्रेस दोनों ने मोका मिलते ही हनुमान बेनीवाल से गठबंधन किया तो यहां अपने आप हनुमान जी बेनीवाल सर्वश्रेष्ट हो गए !

अब रही बात कॉंग्रेस पार्टी की तो खुद अपना जनाधार खो रही हैं आज कि बात ही ले लो 3 बार के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत एसएमएस हॉस्पिटल गये पर Shubham rewar ने अपना अनशन नहीं तोड़ा और Govind Singh Dotasra, टीका राम जुली, Mukesh Bhakar उसका अनशन तुड़वा कर आ गये तो 3 बार के मुख्यमंत्री Ashok Gehlot कि क्या बात रहीं होगी और सचिन पायलट तो धीरे-धीरे अपना वज़ूद खुद खो रहे हैं
Chetan Dudi MLA का चुनाव अपने निजी कार्यकर्ताओं कि वजह से हारे थे उनके निजी कार्यकर्ता खुद को इतना बड़ा मानने लग गये थे कि आम आदमी को Chetan Dudi से मिलने के लिए उनके निजी कार्यकर्ता को पहले खुश करना पड़ता था! तुम लोग ये जो खुद को चेतन डूडी का left right hand मानते हो ना आपने अपने नेता को MLA का चुनाव हरवाया था... समझ गए तुम लोग
"हनुमान बेनीवाल का कोई वज़ूद नहीं था 2024 में उनको पेसे चाहिए" ये कहने वाले Chetan Dudi के निजी कार्यकर्ताओं लोकसभा से पहले विधानसभा और पंचायत के चुनाव में अकेली कॉंग्रेस का Didwana में वज़ूद साबित करना फिर लंबी लंबी बातें लिखना !

RUPA RAM DUDI AMAR RAHE


आज दिल की बात लिख रहा हूँ क्योंकि वर्षों से पार्टी और संगठन को करीब से देखा है।जब 2018 में RLP का संघर्ष शुरू हुआ था तब ...
04/08/2026

आज दिल की बात लिख रहा हूँ क्योंकि वर्षों से पार्टी और संगठन को करीब से देखा है।

जब 2018 में RLP का संघर्ष शुरू हुआ था तब मंचों के आसपास वही कर्मठ कार्यकर्ता दिखाई देते थे जो दिन-रात पार्टी के लिए मेहनत करते थे। उनके पास ना बड़ी गाड़ियाँ थीं, ना पैसा था, ना बड़े-बड़े पोस्टर थे, लेकिन उनमें संगठन के प्रति समर्पण था। वे कार्यक्रमों की व्यवस्था संभालते थे, भीड़ को नियंत्रित करते थे और अगर कोई असामाजिक तत्व माहौल खराब करने की कोशिश करता था तो उसे तुरंत बाहर कर देते थे। इसी मेहनत का परिणाम था कि हुंकार रैलियाँ सफल हुईं और पार्टी लगातार आगे बढ़ी।

लेकिन समय के साथ कुछ ऐसे लोग संगठन में सक्रिय हुए जिनका उद्देश्य पार्टी को मजबूत करना नहीं बल्कि खुद को नेता साबित करना था। कई पुराने कार्यकर्ताओं को अपमानित किया गया, उन्हें कमतर आँका गया और धीरे-धीरे वे संगठन से दूर होते गए। जो कार्यकर्ता वर्षों तक पार्टी का झंडा उठाकर चलता रहा, उसके बारे में कहा गया कि उसके पास गाड़ी नहीं है, पैसा नहीं है, वह क्या कर सकता है। जबकि सच्चाई यह है कि संगठन बड़े पोस्टरों और दिखावे से नहीं, बल्कि समर्पित कार्यकर्ताओं की मेहनत से खड़ा होता है।

मैंने भी कई बार यह महसूस किया कि कुछ लोगों ने जानबूझकर पुराने कार्यकर्ताओं की छवि खराब करने की कोशिश की। फिर भी मैंने कभी अपनी विचारधारा नहीं बदली। आज भी मेरी निष्ठा उसी सोच और संघर्ष के साथ है जिसने हमें राजनीति में एक अलग पहचान दी। मेरा उद्देश्य किसी पद या व्यक्तिगत लाभ का नहीं है। मेरा उद्देश्य केवल लोगों तक हनुमान बेनीवाल जी की कार्यशैली, संघर्ष और विचारों को पहुँचाना है।

पार्टी को यहाँ तक पहुँचाने में हजारों कर्मठ कार्यकर्ताओं का योगदान है। तीन विधायक, सांसद, जिला परिषद सदस्य और पंचायत समिति सदस्य किसी एक व्यक्ति की वजह से नहीं बने, बल्कि कार्यकर्ताओं के वर्षों के संघर्ष का परिणाम हैं। इसलिए संगठन में उन लोगों का सम्मान होना चाहिए जिन्होंने कठिन समय में पार्टी का साथ दिया, न कि केवल उन लोगों का जो अवसर देखकर आए हैं।

आज भी विश्वास है कि सच्चा कार्यकर्ता कभी हारता नहीं। समय आने पर मेहनत और समर्पण की पहचान जरूर होती है। हम संगठन को मजबूत करने के लिए पहले भी काम करते थे, आज भी कर रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे।

जय हनुमान।
जय RLP।
Rashtriya Loktantrik Party

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