05/04/2026
अड़बर इस्तिमा, नूह!..... अक्सर देखा गया हे कि जिस गांव में इस्तिमा होता हे उसके आसपास के 2--4 किलोमीटर के दायरे वाले गावों में मेहमानों की बड़ी तादाद आती हे ओर आसपास के गावों में लगभग हर घर में शादी का सा माहौल होता हे, कहीं खाना बन रहा होता हे तो कहीं टेंट लगा होता हे ओर कुर्सियां बिछी हुई होती हैं, गांवो में अमीर गरीब सभी तरह के लोग होते हैं और अपनी हैसियत के हिसाब से उन मेहमानों का खाने पीने का व सोने का इंतजाम करते हैं चाहे भले ही उनपर ये बात नागवारा गुजरती हो, इसलिए हमें चाहिए कि किसी गांव में जाकर हम किसी पर बोझ ना बनें और खाना पीना व सोना जलसागाह में ही करें, बहुत से भाई ऐसे भी होते हैं जिनके घर पर सिर्फ दस आदमियों के रुकने का इंतजाम होता हे और उसके घर पर पचासो मेहमान सोने के लिए पहुँच जाते हैं, अब आप ही सोचो कि उसके दिल पर क्या गुजरेगी, ये भी देखा गया हे कि लोग जलसागाह में सिर्फ एक दो घंटे गुजारते हैं और आसपास के गावों में जाकर पलंग पर पैर फैलाकर व कुर्सीयों पर टांग पर टांग रखकर ऐसे बैठे रहते हैं जैसे इस्तिमा में ना आकर किसी बारात में आए हुए हों, इसलिए हमें चाहिए कि किसी पर उसकी हैसियत से ज्यादा बोझ ना डालें ओर कोशिश करें कि खाना पीना व सोना जलसागाह में ही रखें, रिश्तेदारी में आने के तो और भी मौक़े होते हैं आप उन मौकों पर खूब आइए, शायद मेरी इस बात से आप इत्तेफाक ना रखें मगर ये कड़वी सच्चाई हे........... ✍️