13/07/2026
"मैं नास्तिक क्यों हूँ" (Why I am an Atheist) शहीद भगत सिंह द्वारा जेल में लिखा गया एक बेहद प्रसिद्ध और ऐतिहासिक निबंध है। उन्होंने इसे 1930 में लाहौर सेंट्रल जेल में लिखा था, और यह पहली बार 1931 में 'द पीपल' अखबार में प्रकाशित हुआ था।
आइए आपके तीनों सवालों के जवाबों को गहराई से समझते हैं:
1. नास्तिक का मतलब क्या है?
सरल शब्दों में, नास्तिक (Atheist) उस व्यक्ति को कहते हैं जो किसी भी ईश्वर, भगवान, या अलौकिक शक्ति (Supernatural Power) के अस्तित्व को नहीं मानता।
आस्तिक: जो मानते हैं कि इस दुनिया को बनाने और चलाने वाली कोई दिव्य शक्ति (भगवान) है।
नास्तिक: जो मानते हैं कि प्रकृति और ब्रह्मांड अपने नियमों से चलते हैं, और इसके पीछे किसी अदृश्य भगवान का हाथ नहीं है। वे केवल उसी चीज़ पर विश्वास करते हैं जिसे तर्क (Logic) और विज्ञान (Science) से साबित किया जा सके।
2. भगत सिंह के नास्तिक होने के मुख्य कारण
जेल में रहने के दौरान उनके एक धार्मिक साथी (बाबा रणधीर सिंह) ने उनसे कहा था कि "तुम अपने घमंड के कारण भगवान को नहीं मान रहे हो।" इसी का जवाब देने के लिए भगत सिंह ने यह निबंध लिखा और साबित किया कि उनका नास्तिकता का फैसला किसी घमंड की वजह से नहीं, बल्कि गहरे अध्ययन और तर्क पर आधारित था।
उनके नास्तिक होने के मुख्य कारण निम्नलिखित थे:
दुनिया में अन्याय और दुख
भगत सिंह का तर्क था कि अगर ईश्वर सर्वशक्तिमान और दयालु है, तो उसने दुनिया में इतना दुख, गरीबी और भुखमरी क्यों पैदा की? उन्होंने पूछा कि भगवान अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर किए जा रहे अत्याचारों को क्यों नहीं रोकता? यदि वह सब कुछ देख रहा है, तो वह चुप क्यों है?
अंधविश्वास और भाग्य का विरोध
वे मानते थे कि धर्म इंसानों को कमजोर बनाता है। लोग अपने दुखों को "भाग्य का खेल" या "भगवान की मर्जी" मानकर चुपचाप सह लेते हैं, जिससे उनके अंदर अन्याय के खिलाफ लड़ने की हिम्मत खत्म हो जाती है।
तर्क और वैज्ञानिक सोच (Rationalism)
भगत सिंह मार्क्सवाद (Marxism) और समाजवाद के विचारों से गहराई से प्रभावित थे। उन्होंने दुनिया के महान विचारकों को पढ़ा था। उनका मानना था कि किसी भी बात को सिर्फ इसलिए नहीं मान लेना चाहिए क्योंकि वह किसी पवित्र किताब में लिखी है या पूर्वजों ने कही है। हर चीज़ को तर्क की कसौटी पर कसा जाना चाहिए।
भगत सिंह के शब्दों में:
"जो कोई भी प्रगति के लिए खड़ा है, उसे पुराने विश्वास के हर पहलू की आलोचना करनी होगी, उसमें अविश्वास जताना होगा और उसे चुनौती देनी होगी।"
भगत सिंह के लिए नास्तिकता कोई फैशन नहीं था। मौत के बिल्कुल करीब होने के बावजूद (फांसी की सजा मिलने के बाद भी), उन्होंने ईश्वर के सामने सिर झुकाने या प्रार्थना करने से साफ इनकार कर दिया। उनका मानना था कि वे अपने सिद्धांतों के साथ जिए हैं और उन्हीं के साथ मरेंगे। #भगतसिंह_के_विचार
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