15/12/2025
टूटे जूतों की आवाज़
राहुल रोज़ सुबह उसी टूटी हुई चप्पल में स्कूल जाता था,
जिसका तला हर कदम पर उसकी गरीबी का शोर करता था।
क्लास में बच्चे नए बैग, नए जूते लेकर आते,
और राहुल अपने सपनों को किताबों के बीच छुपा लेता।
पिता मज़दूरी करते थे,
हाथों में छाले और आँखों में थकान,
माँ दूसरों के घर बर्तन माँजती थी,
पर बेटे की आँखों में पढ़ाई का उजाला कभी बुझने नहीं दिया।
रात को बिजली चली जाती,
तो राहुल दीये की लौ में पढ़ता,
हवा से काँपती उस लौ की तरह
उसका मन भी डरता—कहीं हालात बुझा न दें।
एक दिन स्कूल की फ़ीस न भर पाने पर
उसे बाहर खड़ा कर दिया गया।
वो रोया नहीं, बस उस दिन
उसने अपने सपने और मज़बूती से पकड़ लिए।
वक़्त बदला…
वही हाथ जो कभी फ़ीस के काग़ज़ थामते काँपते थे,
आज डिग्री थामे आत्मविश्वास से भरे थे।
माँ की आँखों में आँसू थे,
पिता के चेहरे पर पहली बार सुकून।
आज राहुल के पास महंगे जूते हैं,
पर उसने वो टूटी चप्पल संभाल कर रखी है—
क्योंकि उसे याद दिलाती है
कि संघर्ष शोर करता है,
पर जीत हमेशा ख़ामोश होती है।
अगर चाहें तो मैं इसे छोटी कहानी, ग्रामीण पृष्ठभूमि, या और ज़्यादा भावुक अंदाज़ में भी लिख सकता हूँ।