जगदंबा म्यूजिक एंड फिल्म्स। jagdamba Music & Film's

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Big thanks to Ramniwa Siyag, Sharvan Ram, Sethuram Janagal, Puram Moga Puran Moga, Premaram Thori Ummednager Rlp, Sanjay...
31/12/2025

Big thanks to Ramniwa Siyag, Sharvan Ram, Sethuram Janagal, Puram Moga Puran Moga, Premaram Thori Ummednager Rlp, Sanjay Divraya, Dinesh Vaishanv, Suresh Banjara Jodhiyasi, Kailash Chand Janagal Janagal, Magraj Jaat Dhatarwal

for all your support! Congrats for being top fans on a streak 🔥!

30/12/2025

सभी दोस्तो को नए साल की बहुत बधाई शुभकामनाएं।।
ऐसे भजन सुनने के लिए फॉलो करें और youtube https://youtube.com/?si=_-dUiPkS8LSjYS0X
पर जाए
#वायरल ❤️

Saving mashine
27/12/2025

Saving mashine

लाइट स्विच बोर्ड
27/12/2025

लाइट स्विच बोर्ड


25/12/2025
22/12/2025

*पेपर देते समय एक बच्चा गुमसुम सा था...*

*Madam : तुम confused क्यों हो ?*

*बच्चा : चुप रहा*

*Madam : क्या तुम पैन भूल गए ?*

*बच्चा फिर चुप रहा*

*Madam : क्या रोल नं भूल गए ?*

*बच्चा फिर चुपचाप रहा...*

*Madam : क्या कैल्कुलेटर भूल गये हो ?*

*बच्चा : अरे चुप हो जा मेरी माँ ! ! इधर मै पर्चियां गलत सब्जेक्ट की ले आया और तुझे पेन पेंसिल की आग लगी है...😡😡*
🤣🤣🤣🤣🤣🤣😂🤣🤣🤣😝

22/12/2025

ये है अपनी संस्कृति।।जो मुंह बोलती है #रतनखुड़ी #लाइफ

मित्रों …. आजकल एक चर्चा बड़े ज़ोर-शोर से चलन में है …. सोशल मीडिया की हर तीसरी पोस्ट इसी विषय पर है कि सरकार ने अरावली ...
21/12/2025

मित्रों …. आजकल एक चर्चा बड़े ज़ोर-शोर से चलन में है …. सोशल मीडिया की हर तीसरी पोस्ट इसी विषय पर है कि सरकार ने अरावली पर्वत शृंखला में सौ मीटर से कम ऊँचाइयों वाले क्षेत्रों को पर्वत मानने से इनकार कर दिया है और अरावली पर्वत शृंखला अब बस खत्म होने ही वाली है …. ऐसा लग रहा है मानो अरावली कोई साबुन की टिकिया हो, जिसे अगर ज़रा तेज़ी से रगड़ दिया गया तो दो मानसून भी नहीं झेलेगी.

भावना को थोड़ी देर के लिए साइड में रखिए और गणित को बीच में आने दीजिए …. पहली बात तो सौ मीटर से नीचे क्षेत्र को पर्वत श्रेणी से निकालना इस बात की घोषणा नहीं है कि अब वहाँ से कुछ भी खनन किया जा सकता है …. खनन तो आप बिना सरकार की अनुमति के मैदानी क्षेत्र से भी नहीं कर सकते …. फिर भी मान लेते हैं कि रोज़ अरावली से पाँच हज़ार ट्रक पत्थर भर कर भेजे जा रहे हैं (यह खनन आलरेडी चल रहा है) …. हर ट्रक में औसतन बीस टन माल …. यानी रोज़ एक लाख टन …. साल भर में लगभग साढ़े तीन करोड़ टन पत्थर …. सुनने में बहुत भयानक लगता है ना …. लगता है जैसे पहाड़ अगले हफ्ते तक सपाट मैदान बन जाएगा.

अब ज़रा अरावली के कद-काठी पर नज़र डालिए …. लगभग आठ सौ किलोमीटर लंबी …. पचास किलोमीटर चौड़ी …. और औसतन तीन सौ मीटर ऊँची …. इस पूरे पहाड़ का कुल वजन बैठता है करीब तीस हज़ार अरब टन …. अब वही पुराना स्कूल वाला सवाल लगाइए …. अगर हर साल साढ़े तीन करोड़ टन निकाला जाए तो पूरा अरावली खत्म होने में कितना समय लगेगा ??

उत्तर आता है लगभग आठ लाख साल !!!

हाँ हाँ …. आठ लाख साल …. इसमें कोई टाइपिंग एरर नहीं है …. आठ हज़ार नहीं …. अस्सी हज़ार नहीं …. पूरे आठ लाख साल …. चाहें तो कैलकुलेटर उठा कर कैलकुलेट कर लें.

अब यहीं से मामला गंभीर नहीं बल्कि व्यंग्यात्मक हो जाता है …. जिस देश में एक फाइल पाँच साल में आगे सरकती है …. एक सड़क दस साल में पूरी होती है …. एक पुल उद्घाटन से पहले दो बार टूट जाता है …. वहाँ हम यह मान कर बैठे हैं कि अरावली अगले दो दशकों में गायब हो जाएगी …. भाई साहब, यहाँ योजनाएँ जल्दी खत्म नहीं होतीं, पहाड़ क्या चीज़ है.

वास्तविक समस्या यह नहीं है कि अरावली खत्म हो जाएगी …. वास्तविक समस्या यह है कि हम हर स्थानीय नुकसान को पूरे पहाड़ की मृत्यु घोषित कर देते हैं …. नूंह में एक पहाड़ी कटी तो हेडलाइन बन गई “अरावली खत्म” …. अलवर में एक खदान दिखी तो सोशल मीडिया पर शोक संदेश शुरू …. कोई यह नहीं पूछता कि कितना हिस्सा कटा …. किस ज़ोन में कटा …. कुल अरावली का कितने प्रतिशत …. यहाँ सवालों की जगह भावनाएँ बोलती हैं और भावनाओं को डेटा की ज़रूरत नहीं होती.

यह ठीक वैसा ही है जैसे दिल्ली में एक पेड़ गिर जाए और हम घोषणा कर दें कि भारत अब जंगल विहीन देश हो गया …. हाँ, यह बात बिल्कुल सही है कि कुछ इलाक़ों में भारी स्थानीय तबाही हो रही है …. भूजल नीचे जा रहा है …. जंगल सिकुड़ रहे हैं …. गाँवों का माइक्रो-क्लाइमेट बदल रहा है …. लेकिन इस सच्चाई को “अरावली कल खत्म हो जाएगी” जैसे नारों में बदल देना न तो विज्ञान है और न ही समझदारी.

अरावली कोई मोमबत्ती नहीं है जिसे एक झोंके में बुझाया जा सके …. यह दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत शृंखलाओं में से एक है …. इसने महाद्वीपों को टूटते देखा है …. समुद्रों को आते-जाते देखा है …. हिमयुग देखे हैं …. डायनासोर देखे हैं …. और अगर किस्मत अच्छी रही तो कुछ और मानव पीढ़ियाँ भी देख लेगी.

डर अगर होना चाहिए तो इस बात का होना चाहिए कि हमारे कस्बे की पहाड़ी कहाँ गई …. हमारे गाँव का पानी क्यों सूख गया …. हमारे बच्चों की हवा में धूल क्यों बढ़ गई …. लेकिन यह डर बहुत लोकल है …. इसमें न तो बड़ा नारा बनता है और न ही ट्रेंडिंग हैशटैग …. इसलिए हम एक विशाल काल्पनिक डर पाल लेते हैं कि “अरावली खत्म हो रही है”.

निष्कर्ष बिल्कुल सीधा है …. अरावली हमारी घबराहट से नहीं मरती …. वह हमारी नीतियों, हमारी अनियंत्रित लालच और हमारी स्थानीय लापरवाही से बीमार होती है …. घबराहट का इलाज नारे से नहीं, ज्ञान से होता है …. और ज्ञान यह कहता है कि अरावली हमसे कहीं ज़्यादा पुरानी, ज़्यादा धैर्यवान और ज़्यादा मज़बूत है.

बाक़ी आप निश्चिंत रहिए …. अरावली आपके डर से पहले भी खड़ी थी …. और शायद आपके डर के बाद भी खड़ी रहेगी.

इस विषय पर आपके क्या विचार हैं ?? कमेंट्स करके बताइयेगा अवश्य !

पोस्ट शेयर करने के लिए किसी प्रकार की रोक टोक नहीं है इसलिए बिंदास शेयर करें 👍

आपका अपना …. #पारुल_सहगल_साथी 😊

20/12/2025

रतन खुड़ी।। एक समय इनका नाम था
#रतनखुड़ी

14/12/2025

बहुत ही सुंदर आवाज जुग जुग जियो

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