Enlightened Masters

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ॐ नमः शिवायः

सात चीजें जो क्वांटम भौतिकी के दृष्टिकोण से आपकी कंपन आवृत्ति को प्रभावित करती हैं।

क्वांटम भौतिकी में कंपन का मतलब है कि सब कुछ ऊर्जा है। हम कुछ निश्चित आवृत्तियों पर जीवंत प्राणी हैं। प्रत्येक कंपन एक भावना के बराबर है और दुनिया में "कंपन", कंपन (Vibrations) की केवल दो प्रजातियां हैं, सकारात्मक और नकारात्मक। कोई भी भावना आपको एक कंपन को प्रसारित करती है जो सकारात्मक या नकारात्

मक हो सकती है।

🌺 1--विचार🌺
प्रत्येक विचार ब्रह्मांड के लिए एक आवृत्ति का उत्सर्जन करता है और यह आवृत्ति वापस मूल में जाती है, इसलिए यदि आपके पास नकारात्मक विचार, हतोत्साह, उदासी, क्रोध, भय है, तो यह सब आपके पास आता है। यही कारण है कि यह इतना महत्वपूर्ण है कि आप अपने विचारों की गुणवत्ता का ध्यान रखें और सीखें कि कैसे अधिक सकारात्मक विचारों की खेती करें।

🌺 2--संगति🌺

आपके आसपास के लोग आपकी कंपन आवृत्ति को सीधे प्रभावित करते हैं। यदि आप खुश, सकारात्मक और दृढ़ लोगों के साथ खुद को घेरते हैं, तो आप इस कंपन में भी प्रवेश करेंगे। अब, अगर आप शिकायत करने वाले, गपशप करने वाले और निराशावादी लोगों से घिरे हैं, तो सावधान हो जाइए! वास्तव में, वे आपकी आवृत्ति को कम कर सकते हैं और इसलिए आपको अपने पक्ष में आकर्षण के कानून का उपयोग करने से रोकते हैं। ( Law of attraction)।

🌺 3--संगीत 🌺
संगीत बहुत शक्तिशाली है। यदि आप केवल संगीत सुनते हैं जो मृत्यु, विश्वासघात, उदासी, परित्याग के बारे में बात करता है, तो यह सब उस चीज़ में हस्तक्षेप करेगा जो आप महसूस कर रहे हैं। आपके द्वारा सुने जाने वाले संगीत के बोलों पर ध्यान दें, यह आपकी कंपन आवृत्ति को कम कर सकता है। और याद रखें: आप अपने जीवन में जैसा महसूस करते हैं वैसा ही आकर्षित करते हैं।

🌺 4--जिन चीजों को आप देखते हैं 🌺
जब आप दुर्भाग्य, मृत, विश्वासघात आदि से निपटने वाले कार्यक्रमों को देखते हैं, तो आपका मस्तिष्क इसे एक वास्तविकता के रूप में स्वीकार करता है और आपके शरीर में एक संपूर्ण रसायन विज्ञान जारी करता है, जो आपकी कंपन आवृत्ति को प्रभावित करता है। उन चीजों को देखें जो आपको अच्छा लगता है और आपको उच्च आवृत्ति पर कंपन करने में मदद करता है।

🌺 5--माहौल 🌺
चाहे वह घर पर हो या काम पर, अगर आप गंदे और गंदे माहौल में बहुत समय बिताते हैं, तो यह आपकी कंपन आवृत्ति को भी प्रभावित करेगा। अपने परिवेश को सुधारें, अपने परिवेश को व्यवस्थित करें और साफ करें। ब्रह्मांड दिखाओ कि आप अधिक प्राप्त करने के लिए फिट हैं। आपके पास जो पहले से है उसका ख्याल रखें!

🌺 6--शब्द 🌺
यदि आप चीजों और लोगों के बारे में गलत दावा करते हैं या बोलते हैं, तो यह आपकी कंपन आवृत्ति को प्रभावित करता है। अपनी आवृत्ति को उच्च रखने के लिए, दूसरों के बारे में शिकायत और बुरी बात करने की आदत को खत्म करना आवश्यक है। इसलिए नाटक और धमकाने से बचें। अपने जीवन के विकल्पों के लिए अपनी जिम्मेदारी मान लें!

🌺 7-- अहोभाव 🌺
आभार सकारात्मक रूप से आपकी कंपन आवृत्ति को प्रभावित करता है। यह एक ऐसी आदत है जिसे आपको अब अपने जीवन में एकीकृत करना चाहिए। हर चीज के लिए, अच्छी चीजों के लिए और जिसे आप बुरा मानते हैं, उसके लिए धन्यवाद देना शुरू करें, आपके द्वारा अनुभव किए गए सभी अनुभवों के लिए धन्यवाद। कृतज्ञता आपके जीवन में सकारात्मक चीजों के होने का द्वार खोलती है।

🕉🔱 शिव पुराण - श्रीरुद्र संहिता 🔱🕉🕉🔱 प्रथम खण्ड, उन्नीसवाँ अध्याय 🔱🕉▶️▶️ "गुणनिधि को कुबेर पद की प्राप्ति" ◀️◀️नारद जी न...
12/05/2026

🕉🔱 शिव पुराण - श्रीरुद्र संहिता 🔱🕉
🕉🔱 प्रथम खण्ड, उन्नीसवाँ अध्याय 🔱🕉
▶️▶️ "गुणनिधि को कुबेर पद की प्राप्ति" ◀️◀️

नारद जी ने प्रश्न किया :- हे ब्रह्माजी ! अब आप मुझे यह बताइए कि गुणनिधि जैसे महापापी मनुष्य को भगवान शिव द्वारा कुबेर पद क्यों और कैसे प्रदान किया गया? हे प्रभु! कृपा कर इस कथा को भी बताइए।

ब्रह्माजी बोले :- नारद ! शिवलोक में सारे दिव्य भोगों का उपभोग तथा उमा महेश्वर का सेवन कर, वह अगले जन्म में कलिंग के राजा अरिंदम का पुत्र हुआ। उसका नाम दम था। बालक दम की भगवान शंकर में असीम भक्ति थी। वह सदैव शिवजी की सेवा में लगा रहता था। वह अन्य बालकों के साथ मिलकर शिव भजन करता।

युवा होने पर उसके पिता अरिंदम की मृत्यु के पश्चात दम को राजसिंहासन पर बैठाया गया। राजा दम सब ओर शिवधर्म का प्रचार और प्रसार करने लगे। वे सभी शिवालयों में दीप दान करते थे। उनकी शिवजी में अनन्य भक्ति थी। उन्होंने अपने राज्य में रहने वाले सभी ग्रामाध्यक्षों को यह आज्ञा दी थी कि 'शिव मंदिर' में दीपदान करना सबके लिए अनिवार्य है। अपने गांव के आस-पास जितने शिवालय हैं, वहां सदा दीप जलाना चाहिए। राजा दम ने आजीवन शिव धर्म का पालन किया। इस तरह वे बड़े धर्मात्मा कहलाए। उन्होंने शिवालयों में बहुत से दीप जलवाए। इसके फलस्वरूप वे दीपों की प्रभा के आश्रय हो मृत्योपरांत अलकापुरी के स्वामी बने।

ब्रह्माजी बोले :- हे नारद ! भगवान शिव का पूजन व उपासना महान फल देने वाली है। दीक्षित के पुत्र गुणनिधि ने, जो पूर्ण अधर्मी था, भगवान शिव की कृपा पाकर दिक्पाल का पद पा लिया था। अब मैं तुम्हें उसकी भगवान शिव के साथ मित्रता के विषय में बताता हूं।

नारद ! बहुत पहले की बात है। मेरे मानस पुत्र पुलस्त्य से विश्रवा का जन्म हुआ और विश्रवा के पुत्र कुबेर हुए। उन्होंने पूर्वकाल में बहुत कठोर तप किया। उन्होंने विश्वकर्मा द्वारा रचित अलकापुरी का उपभोग किया। मेघवाहन कल्प के आरंभ होने पर वे कुबेर के रूप में घोर तप करने लगे। वे भगवान शिव द्वारा प्रकाशित काशी पुरी में गए और अपने मन के रत्नमय दीपों से ग्यारह रुद्रों को उद्बोधित कर वे तन्मयता से शिवजी के ध्यान में मग्न होकर निश्चल भाव से उनकी उपासना करने लगे। वहां उन्होंने शिवलिंग की प्रतिष्ठा की। उत्तम पुष्पों द्वारा शिवलिंग का पूजन किया। कुबेर पूरे मन से तप में लगे थे। उनके पूरे शरीर में केवल हड्डियों का ढांचा और चमड़ी ही बची थी। इस प्रकार उन्होंने दस हजार वर्षों तक तपस्या की। तत्पश्चात भगवान शिव अपनी दिव्य शक्ति उमा के भव्य रूप के साथ कुबेर के पास गए। अलकापति कुबेर मन को एकाग्र कर शिवलिंग के सामने तपस्या में लीन थे।

भगवान शिव ने कहा :- अलकापते! मैं तुम्हारी भक्ति और तपस्या से प्रसन्न हूं। तुम मुझसे अपनी इच्छानुसार वर मांग सकते हो। यह सुनकर जैसे ही कुबेर ने आंखें खोलीं तो उन्हें अपने सामने भगवान नीलकंठ खड़े दिखाई दिए। उनका तेज सूर्य के समान था। उनके मस्तक पर चंद्रमा अपनी चांदनी बिखेर रहा था। उनके तेज से कुबेर की आंखें चौंधिया गईं। तत्काल उन्होंने अपनी आंखें बंद कर लीं।

वे भगवान शिव से बोले :- भगवन्! मेरे नेत्रों को वह शक्ति दीजिए, जिससे मैं आपके चरणारविंदों का दर्शन कर सकूं।

कुबेर की बात सुनकर भगवान शिव ने अपनी हथेली से कुबेर को स्पर्श कर देखने की शक्ति प्रदान की। दिव्य दृष्टि प्राप्त होने पर वे आंखें फाड़-फाड़कर देवी उमा की ओर देखने लगे। वे सोचने लगे कि भगवान शिव के साथ यह सर्वांग सुंदरी कौन है? इसने ऐसा कौन सा तप किया है जो इसे भगवान शिव की कृपा से उनका सामीप्य रूप और सौभाग्य प्राप्त हुआ है। वे देवी उमा को निरंतर देखते जा रहे थे। देवी को घूरने के कारण उनकी बायीं आंख फूट गई। शिवजी ने उमा से कहा- उमे! यह तुम्हारा पुत्र है। यह तुम्हें क्रूर दृष्टि से नहीं देख रहा है। यह तुम्हारे तप बल को जानने की कोशिश कर रहा है,

फिर भगवान शिव ने कुबेर से कहा :– मैं तुम्हारी तपस्या से बहुत प्रसन्न हूं। मैं तुम्हें वर देता हूं कि तुम समस्त निधियों और गुह्य शक्तियों के स्वामी हो जाओ। सुव्रतों, यक्षों और किन्नरों के अधिपति होकर धन के दाता बनो। मेरी तुमसे सदा मित्रता रहेगी और मैं तुम्हारे पास सदा निवास करूंगा अर्थात तुम्हारे स्थान अलकापुरी के पास ही मैं निवास करूंगा। कुबेर अब तुम अपनी माता उमा के चरणों में प्रणाम करो। ये ही तुम्हारी माता हैं।

ब्रह्माजी कहते हैं :– नारद! इस प्रकार भगवान शिव ने देवी से कहा- हे देवी! यह आपके पुत्र के समान है। इस पर अपनी कृपा करो। यह सुनकर उमा देवी बोली-वत्स! तुम्हारी, भगवान शिव में सदैव निर्मल भक्ति बनी रहे। बायीं आंख फूट जाने पर तुम एक ही पिंगल नेत्र से युक्त रहो। महादेव जी ने जो वर तुम्हें प्रदान किए हैं, वे सुलभ हैं। मेरे रूप से ईर्ष्या के कारण तुम कुबेर नाम से प्रसिद्ध होगे। कुबेर को वर देकर भगवान शिव और देवी उमा अपने धाम को चले गए। इस प्रकार भगवान शिव और कुबेर में मित्रता हुई और वे अलकापुरी के निकट कैलाश पर्वत पर निवास करने लगे।

नारद जी ने कहा :- ब्रह्माजी! आप धन्य हैं। आपने मुझ पर कृपा कर मुझे इस अमृत कथा के बारे में बताया है। निश्चय ही, शिव भक्ति दुखों को दूर कर समस्त सुख प्रदान करने वाली है।

▶️🙏🏻🆑🙏🏻 ओम् नमः शिवाय 🙏🏻🆑🙏🏻◀️
🔱 मंगलम भगवान शंभू, मंगलम रिषीबध्वजा 🔱
🔱 मंगलम पार्वती नाथो, मंगलाय तनो हर 🔱
🔱 ॐ नम: पार्वती पतये, हर हर महादेव 🔱
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संक्षिप्त श्रीस्कन्द महापुराण 〰️〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️〰️काशीखण्ड (पूर्वार्ध)महाराज दिवोदास के धर्मपूर्ण राज्य का वर्णन...(भाग 2) 〰️...
12/05/2026

संक्षिप्त श्रीस्कन्द महापुराण
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काशीखण्ड (पूर्वार्ध)

महाराज दिवोदास के धर्मपूर्ण राज्य का वर्णन...(भाग 2)
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दिवोदासके राष्ट्रमण्डलमें सभी पुरुष एकपत्नी-व्रती थे। स्त्रियोंमें कोई भी ऐसी नहीं थी जो पतिव्रता न हो। एक भी ब्राह्मण ऐसा नहीं था जिसने वेद-शास्त्रोंका अध्ययन न किया हो। कोई भी क्षत्रिय ऐसा न था जो शूरवीर न हो। एक भी वैश्य ऐसा नहीं दिखायी देता था जो अर्थोपार्जनके कर्ममें कुशल न हो। शूद्र अनन्य भावसे द्विजातियोंकी सेवामें लगे रहते थे। उनके राज्यमें अखण्ड ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले ब्रह्मचारी थे, जो सदा गुरुकुलके अधीन रहकर वेदविद्याके अध्ययनमें तत्पर थे। गृहस्थ लोग अतिथिसत्काररूपी धर्ममें कुशल, धर्मशास्त्रोंके मर्मज्ञ तथा सर्वदा शुभआचरणोंमें संलग्न रहनेवाले थे। तीसरे आश्रमको स्वीकार करनेवाले वानप्रस्थी वनमें उपलब्ध होनेवाली जीविकाके प्रति ही आदर रखते थे। ग्रामीण वार्ताओंके प्रति उनके मनमें कोई उत्सुकता न थी और वे वैदिकमार्गमें चलनेवाले थे। उनके राज्यमें रहनेवाले संन्यासी सब प्रकारकी आसक्तियोंसे रहित, जीवन्मुक्त, संग्रहशून्य, मन, वाणी और कर्मरूपी दण्डसे युक्त तथा सर्वथा निःस्पृह थे। दूसरे अनुलोम और विलोम "कर्मसे उत्पन्न होनेवाले मनुष्योंने भी अपनी पूर्वपरम्परासे प्रचलित धर्ममार्गका किंचिन्मात्र भी परित्याग नहीं किया था। राजा दिवोदास के राज्य में कोई भी सन्तानहीन, निर्धन, वृद्धों की सेवा न करने वाला तथा अकाल मृत्युसे मरनेवाला नहीं था। चंचल, वाचाल, वंचक, हिंसक, पाखण्डी, भाँड़, रँडुवे और मदिरा बेचनेवाले भी नहीं थे। सर्वत्र मन्त्रोंका घोष सुनायी देता था। पद-पदपर शास्त्रचर्चा सुनायी देती थी। सब ओर शुभ वार्तालाप होते और आनन्दसे मंगलगीत गाये जाते थे। मांसभक्षी, ऋण लेनेवाले और चोर भी उनके राज्यमें नहीं थे। पुत्र पिताके चरणोंकी पूजा, देवाराधना, उपवास, व्रत, तीर्थ और देवोपासनाको परम धर्म समझकर करते थे। नारियाँ अपने पतिके चरणोंकी पूजा, उनके वचनोंको सुनना और स्वामीकी आज्ञाका पालन करना अपना श्रेष्ठ धर्म समझती थीं। सब लोग अपने बड़े भाईकी सदा पूजा करते थे। सेवक प्रसन्नतापूर्वक अपने स्वामीके चरणकमलोंकी पूजा करते थे। छोटी जातिके लोग ऊँची जातिके लोगोंके गुण और गौरवकी शंसा करते थे। काशीपुरीके रहनेवाले सब मनुष्य तीनों समय वहाँके देवताओंकी बार-बार सेवा-पूजा करते थे। सब विद्वान् सब स्थानों पर अपनी मनोवांछित वस्तु पाकर सम्मानित होते थे। विद्वान् लोग तपस्वी महात्माओंकी, तपस्वी महात्मा जितेन्द्रिय पुरुषोंकी, जितेन्द्रिय महापुरुष ज्ञानियोंकी और ज्ञानीलोग शिवयोगियोंकी पूजा करते थे। ब्राह्मणोंके मुखरूपी अग्निमें दिन-रात विधिपूर्वक उत्तम रूपसे तैयार की हुई मन्त्रपूत एवं बहुमूल्य हविका हवन किया जाता था। दिवोदासके राज्यमें जहाँ-तहाँ सब ओर पग-पगपर शुद्ध द्रव्यराशिके द्वारा बावली, कुआँ और पोखरा खुदवानेवाले तथा बगीचे लगानेवाले धर्मात्मा पुरुष बहुत बड़ी संख्यामें थे। वहाँ सब जातिके लोग अनिन्द्य (उत्तम) सेवाकार्यसे सम्पन्न हो हृष्ट-पुष्ट दिखायी देते थे। इस प्रकार सर्वत्र शुद्ध एवं पवित्र बर्ताव करनेवाले उस भूपालके छिद्र ढूँढ़नेके लिये देवताओंने बहुत चेष्टा की, किंतु उन्हें थोड़ा-सा भी छिद्र नहीं प्राप्त हो सका।

क्रमशः...
शेष अगले अंक में जारी
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आनन्दरामायणम्〰️〰️🌼🌼〰️〰️श्रीसीतापतये नमःश्रीवाल्मीकि महामुनि कृत शतकोटि रामचरितान्तर्गतं ('ज्योत्स्ना' हृया भाषा टीकयाऽटी...
12/05/2026

आनन्दरामायणम्
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श्रीसीतापतये नमः

श्रीवाल्मीकि महामुनि कृत शतकोटि रामचरितान्तर्गतं ('ज्योत्स्ना' हृया भाषा टीकयाऽटीकितम्)

(जन्मकाण्डम्)

पंचम सर्गः

(रामरक्षा-महामंत्र)...(दिन 255)
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विष्णुदास ने कहा-हे गुरुदेव । जिस रामरक्षा मंत्र से वाल्मीकि ने कुश का अभिमंत्रण किया था, उसे हमको बताइए ।। १ ।।

क्योंकि मैंने सुना है कि वह रामरक्षामंत्र बड़ा पवित्र सुन्दर और बालकों को शान्ति प्रदान करने वाला है। शिवजी ने कहा-इस प्रकार शिष्य की प्रार्थना सुनकर श्रीरामदास कहने लगे है प्रिय शिष्य ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। मैं तुम्हें वह रामरक्षामन्त्र बतलाता हूँ, जिसे एक बार शिवजी ने पार्वती को स्वामिकार्तिकेय की रक्षा के लिए बतलाया था ॥ २ ॥ ३ ॥

श्रीशिवजी बोले- हे देवि ! आज षडानन के रक्षार्थ तुम्हें रामरक्षामन्त्र बतला रहा हूँ। अथ ध्यानम्। जिन रामचन्द्रजी के बायें हाथ में धनुष, दाहिने हाथ में एक बाण और पीठ पर बाणों से भरा हुआ तरकस है। जिनकी बायीं तथा दाहिनी ओर लक्ष्मण और सीता हैं। भक्तों के मन की पीड़ा नष्ट करने में निपुण श्रीरामचन्द्रजी का में भजन करता हूँ ॥ ४-६ ॥

विनियोग के अनन्तर- सौ करोड़ श्लोकों में विस्तार से वर्णित भगवान् राम के चरित्र का एक-एक अक्षर महान् पापों का भी नाश करता है। नीलकमल की नाई श्याम तथा राजीवलोचन, जिनके आस-पास लक्ष्मण तवा जानकीजी विराज रही हैं। जिनका मस्तक जटा-मुकुट से अलंकृत है। तलवार, तरकस, धनुष औय बाण को लिये जो राक्षसों को यमराज सदृश भीषण दीखते है। जो जगत्‌ की रक्षा के निमित्त अपने इच्छानुसार जगतीतल पर अवतीर्ण हुए हैं, ऐसे राम का ध्यान करके सब कामनाओं को पूर्ण करने तथा पापों का नाश करने वाले रामरक्षा मन्त्र का पाठ करे। राघव यह रामचन्द्रजी का नाम मेरे सिर की रक्षा करे ॥ ७-१० ॥

दशरवात्मज ललाट की रक्षा करें। कौसल्येय नेत्रों की, विश्वामित्रप्रिय कानों की, मखत्राता नाक की और सौमित्र वत्सल मुख की रक्षा करें ॥ ११ ॥

विद्यानिधि जिल्ह्वा की, भरत वंदित कंठ की, दिव्यायुध दोनों कन्धो कि, भग्नेशकार्मुक भुजाओं को, सीतापति हाथों की, जामदग्न्यजित् हृदय की, रघुवर पार्श्वभाग की, इक्ष्वा-कुनन्दन पेट की, खरध्वंसी शरीर के मध्यभाग की, जांबवदाश्रय नाभि की, सुग्रीवेश कमर की, हनुमत्प्रभु हड्डियों की, रघूत्तम दोनों घुटनों की, रक्षःकुलांतकृत् गुदा कि और दशमुखान्तक मेरी जाँघों की रक्षा करें ।। १२-१५ ॥

विभीषण को राज देने वाले पैरों कि और राम सारे शरीर की रक्षा करें। जो मनुष्य राम के बल से परिपूर्ण इस रामरक्षामंत्र का पाठ करता है वह चिरायु, सुखी, पुत्रवान्, विजयी और विनयी होता है ।। १६ ।

क्रमशः...
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श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️।। श्रीहरिः ।।* श्रीगणेशाय नमः *।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।(सम्भवपर्व) एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायःकृप...
12/05/2026

श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।

(सम्भवपर्व)

एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

कृपाचार्य, द्रोण और अश्वत्थामा की उत्पत्ति तथा द्रोण को परशुरामजी से अस्त्र-शस्त्र की प्राप्ति की कथा...(दिन 387)
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स रामस्य धनुर्वेदं दिव्यान्यस्त्राणि चैव ह। श्रुत्वा तेषु मनश्चक्रे नीतिशास्त्रे तथैव च ।। ५२ ।।

द्रोणने यह सुनकर कि परशुरामजीके पास सम्पूर्ण धनुर्वेद तथा दिव्यास्त्रोंका ज्ञान है, उन्हें प्राप्त करनेकी इच्छा की। इसी प्रकार उन्होंने उनसे नीति-शास्त्रकी शिक्षा लेनेका भी विचार किया ।। ५२ ।।

ततः स व्रतिभिः शिष्यैस्तपोयुक्तैर्महातपाः । वृतः प्रायान्महाबाहुर्महेन्द्रं पर्वतोत्तमम् ।। ५३ ।।

फिर ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले तपस्वी शिष्योंसे घिरे हुए महातपस्वी महाबाहु द्रोण परम उत्तम महेन्द्र पर्वतपर गये ।। ५३ ।।

ततो महेन्द्रमासाद्य भारद्वाजो महातपाः । क्षान्तं दान्तममित्रघ्नमपश्यद् भृगुनन्दनम् ।। ५४ ।।

महेन्द्र पर्वतपर पहुँचकर महान् तपस्वी द्रोणने क्षमा एवं शम-दम आदि गुणोंसे युक्त शत्रुनाशक भृगुनन्दन परशुरामजीका दर्शन किया ।। ५४ ।।

ततो द्रोणो वृतः शिष्यैरुपगम्य भृगूद्वहम् ।
आचख्यावात्मनो नाम जन्म चाङ्गिरसः कुले ।। ५५ ।।

तत्पश्चात् शिष्योंसहित द्रोणने भृगुश्रेष्ठ परशुरामजीके समीप जाकर अपना नाम बताया और यह भी कहा कि 'मेरा जन्म आंगिरस कुलमें हुआ है' ।। ५५ ।।

निवेद्य शिरसा भूमौ पादौ चैवाभ्यवादयत् । ततस्तं सर्वमुत्सृज्य वनं जिगमिषु तदा ।। ५६ ।।

जामदग्न्यं महात्मानं भारद्वाजोऽब्रवीदिदम् । भरद्वाजात् समुत्पन्नं तथा त्वं मामयोनिजम् ।। ५७ ।।

आगतं वित्तकामं मां विद्धि द्रोणं द्विजर्षभ ।

इस प्रकार नाम और गोत्र बताकर उन्होंने पृथ्वीपर मस्तक टेक दिया और परशुरामजीके चरणोंमें प्रणाम किया। तदनन्तर सर्वस्व त्यागकर वनमें जानेकी इच्छा रखनेवाले महात्मा जमदग्निकुमारसे द्रोणने इस प्रकार कहा- 'द्विजश्रेष्ठ ! मैं महर्षि भरद्वाजसे उत्पन्न उनका अयोनिज पुत्र हूँ। आपको यह ज्ञात हो कि मैं धनकी इच्छासे आया हूँ। मेरा नाम द्रोण है' ।। ५६-५७३ ।।

तमब्रवीन्महात्मा स सर्वक्षत्रियमर्दनः ।। ५८ ।।

यह सुनकर समस्त क्षत्रियोंका संहार करनेवाले महात्मा परशुराम उनसे यों बोले ।। ५८ ।।

स्वागतं ते द्विजश्रेष्ठ यदिच्छसि वदस्व मे ।
एवमुक्तस्तु रामेण भारद्वाजोऽब्रवीद् वचः ।। ५९ ।।

रामं प्रहरतां श्रेष्ठं दित्सन्तं विविधं वसु ।
अहं धनमनन्तं हि प्रार्थये विपुलव्रत ।। ६० ।।

'द्विजश्रेष्ठ ! तुम्हारा स्वागत है। तुम जो कुछ भी चाहते हो, मुझसे कहो।' उनके इस प्रकार पूछनेपर भरद्वाजकुमार द्रोणने नाना प्रकारके धन-रत्नोंका दान करनेकी इच्छावाले, योद्धाओंमें श्रेष्ठ परशुरामसे कहा- 'महान् व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! मैं आपसे ऐसे धनकी याचना करता हूँ, जिसका कभी अन्त न हो' ।। ५९-६० ।।

राम उवाच

हिरण्यं मम यच्चान्यद् वसु किंचिदिह स्थितम् । ब्राह्मणेभ्यो मया दत्तं सर्वमेतत् तपोधन ।। ६१ ।।

तथैवेयं धरा देवी सागरान्ता सपत्तना । कश्यपाय मया दत्ता कृत्स्ना नगरमालिनी ।। ६२ ।।

परशुरामजी बोले- तपोधन! मेरे पास यहाँ जो कुछ सुवर्ण तथा अन्य प्रकारका धन था, वह सब मैंने ब्राह्मणोंको दे दिया। इसी प्रकार ग्राम और नगरोंकी पंक्तियोंसे सुशोभित होनेवाली समुद्रपर्यन्त यह सारी पृथ्वी महर्षि कश्यपको दे दी है ।। ६१-६२ ।।

शरीरमात्रमेवाद्य ममेदमवशेषितम् । अस्त्राणि च महार्हाणि शस्त्राणि विविधानि च ।। ६३ ।।

अब मेरा यह शरीरमात्र बचा है। साथ ही नाना प्रकारके बहुमूल्य अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञान अवशिष्ट है ।। ६३ ।।

अस्त्राणि वा शरीरं वा वरयैतन्मयोद्यतम् । वृणीष्व किं प्रयच्छामि तुभ्यं द्रोण वदाशु तत् ।। ६४ ।।

अतः तुम अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञान अथवा यह शरीर माँग लो। इसे देनेके लिये मैं सदा प्रस्तुत हूँ। द्रोण! बोलो, मैं तुम्हें क्या दूँ? शीघ्र उसे कहो ।। ६४ ।।

द्रोण उवाच

अस्त्राणि मे समग्राणि ससंहाराणि भार्गव । सप्रयोगरहस्यानि दातुमर्हस्यशेषतः ।। ६५ ।।

द्रोणने कहा- भृगुनन्दन ! आप मुझे प्रयोग, रहस्य तथा संहारविधिसहित सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञान प्रदान करें ।। ६५ ।।

तथेत्युक्त्वा ततस्तस्मै प्रादादस्त्राणि भार्गवः । सरहस्यव्रतं चैव धनुर्वेदमशेषतः ।। ६६ ।।

तब 'तथास्तु' कहकर भृगुवंशी परशुरामजीने द्रोणको सम्पूर्ण अस्त्र प्रदान किये तथा रहस्य और व्रतसहित सम्पूर्ण धनुर्वेदका भी उपदेश किया ।। ६६ ।।

प्रतिगृह्य तु तत्सर्वं कृतास्त्रो द्विजसत्तमः ।
प्रियं सखायं सुप्रीतो जगाम द्रुपदं प्रति ।। ६७ ।।

वह सब ग्रहण करके द्विजश्रेष्ठ द्रोण अस्त्र-विद्याके पूरे पण्डित हो गये और अत्यन्त प्रसन्न हो अपने प्रिय सखा द्रुपदके पास गये ।। ६७ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि द्रोणस्य भार्गवादस्त्रप्राप्तौ ऊनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १२९ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें द्रोणको परशुरामजीसे अस्त्र-विद्याकी प्राप्तिविषयक एक सौ उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२९ ।।

क्रमशः...
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🙏🏻 जय श्रीहरिः 🙏 जय श्रीकृष्ण 🙏🌷 मीरा चरित, विस्तार से -भाग 46 🌷▶️▶️▶️ राणा का  षड्यन्त्र ◀️◀️◀️महाराणाका क्रोध धीरे-धीर...
12/05/2026

🙏🏻 जय श्रीहरिः 🙏 जय श्रीकृष्ण 🙏
🌷 मीरा चरित, विस्तार से -भाग 46 🌷
▶️▶️▶️ राणा का षड्यन्त्र ◀️◀️◀️

महाराणाका क्रोध धीरे-धीरे प्रकट हुआ। एक दिन चार दासियोंके साथ उदयकुँवर बाईसाने आकर मीरासे कहा—'भाभी म्हाँरा! श्रीजीने आपकी सेवामें ये दासियाँ भेजी हैं।'

'बाईसा ! मेरी क्या सेवा है? मेरे पास तो एक–दो ही पर्याप्त हैं। यहाँ तो पहलेसे ही अधिक है । ' – मीराने हँसकर कहा।

'क्यों, भरण-पोषणके लिये जागीर कम हो तो श्रीजीसे निवेदन करूँ ?"

'अरे नहीं, कृपा है प्रभुकी । लालजीसाने भेजी हैं तो छोड़ पधारो ।'

पन्द्रह – बीस दिन पश्चात् ही मीराकी खास दासी मिथुलाकी सारी देहमें दाह उत्पन्न हो गया। वह रह – रह करके नहाती और गीले वस्त्र पहने रहती। बार–बार गला सूखता और वह पानी पीते—पीते थक जाती । देहमें जैसे लपटें फूटती हों। वैद्यजी आये । परीक्षा करके कहा–'छोरी बचेगी नहीं। जान-अनजानमें पेटमें विष उतर गया है।'

उस दिन मीरा मन्दिरमें नहीं पधारीं । दासियोंके साथ समवेत स्वरमें कीर्तनके बोलोंसे महल गूंजता रहा । रसोई बंद रही। मिथुलाका सिर गोदमें लेकर मीरा गाने लगीं

सुण लीजो बीनती मोरी, मैं सरण गही प्रभु तोरी ।
तुम तो पतित अनेक उधारे, भव सागर से तारे ।।

और

हरि मेरे जीवन प्राण अधार ।
और आसरो नाहीं तुम बिन तीनूँ लोक मँझार ।।

थाँ बिण मोहिं कछु न सुहावै निरख्यो सब संसार ।
मीरा कहे मैं दासी रावरी दीजो मती बिसार ।।

'बाईसा हुकम !' मिथुलाने टूटते स्वरमें कहा – 'आशीर्वाद दीजिये कि जन्म-जन्मान्तरमें भी इन्हीं चरणोंकी सेवा प्राप्त हो !'

‘मिथुला!' मीराने उसके सिरपर हाथ फेरते हुए कहा—'तू भाग्यवान् है । प्रभु अपनी सेवामें तुझे बुला रहे हैं। उनका ध्यान कर, मनमें उनका नाम जप । दूसरी ओरसे मन हटा ले । जाते समय यात्राका लक्ष्य ही ध्यानमें रहना चाहिये, अन्यथा यात्रा निष्फल होती है। ले मुंँह खोल, चरणामृत ले !'

'बाईसा हुकम ! देहमें बहुत जलन हो रही है। ध्यान टूट-टूट जाता है।'

'पीड़ा देहकी है मिथुला ! तू तो प्रभुकी दासी है। पीड़ाकी क्या मजाल है तेरे पास तक पहुँचने की ? वस्त्र फटनेसे जैसे देहको पीड़ा नहीं होती, वैसे ही देहकी पीड़ा आत्माको स्पर्श नहीं करती पगली ! इस पदके अनुसार ध्यान कर तू —

जब सों मोहिं नंदनंदन दृष्टि पर्यो माई ।

तब तें लोक परलोक कछु ना सोहाई ।। १ ।।

मोरन की चन्द्रकला सीस मुकुट सोहे।
केसर को तिलक भाल तीन लोक मोहे ।। २ ।।

कुंडल की झलक अलक कपोलन पै छाई ।
मानो मीन सरवर तजि मकर मिलन आई ।। ३ ।।

कुटिल भृकुटि तिलक भाल चितवन में टोना ।
खंजन अरु मधुप मीन भूले मृग छौना ॥ ४॥

सुन्दर अति नासिका सुग्रीव तीन रेखा |
नटवर प्रभु भेष धरें रूप अति विसेषा || ५॥

अधर बिम्ब अरुण नैन मधुर मंद हाँसी ।
दसन दमक दाड़िम दुति चमके चपला सी ॥ ६ ॥

छुद्र घंटि किंकणी अनूप धुनि सुहाई ।
गिरधर के अंग अंग मीरा बलि जाई । ॥ ७ ॥

'जय.... ज.... य.... श्री.... कृ.... ष्ण... !' – मिथुलाके प्राण पिंजर छोड़ गये । चंपा, चमेली, गोमती और मंगला आदि दासियोंने अपनी स्वामिनीके चारों ओर जैसे घेरा-सा बना लिया ।

मिथुलाकी मृत्युने उन्हें पुकारकर कह दिया कि आनेवाली दासियाँ कैसी हैं। उनका बस चलता तो वे उन्हें ड्योढ़ीमें ही प्रवेश न करने देती, किन्तु बाईसा तो फरमाती हैं कि जो आवे, उसे आने दो और जो जाना चाहे, जाने दो।

एक दिन चम्पा मीराके बिछौनेको समेट रही थी। उसने देखा कि चद्दरके नीचे काँचके टुकड़े बिछे हुए हैं। उसका हृदय उछलकर मुँहको आ गया। दौड़ती हुई वह भीतरी महलमें पहुँची। मीरा स्नान कर रही थीं । उसने विकलता भरे स्वरमें पुकारा – 'बाईसा हुकम ! बाईसा हुकम !'

उसका आकुल स्वर सुन मीराने उसकी ओर मुँह फेरकर पूछा— क्या हुआ चम्पा! तू इतनी घबरा क्यों रही है ?'

'आपको कहीं चोट तो नहीं आयी? काँच तो नहीं चुभा आपको?”

‘कैसे, कहाँ लगती चोट मुझे और काँच ही कहाँ चुभते ? दिनमें ही कोई स्वप्न देख लिया है तूने ?' – मीराने हँसकर कहा।

उनकी बात अनसुनी करके चम्पाने उनकी पीठ, पैर, हाथ सब अच्छी तरह देखे। फिर आश्वस्त होकर आँखोंमें आँसू लिये, भरे कंठसे वह बोली — ‘आपके बिछौनेमें काँचकी किरचैं बिछी हैं। रातको पौढ़ते समय चुभी होंगी।'

'मुझे तो कुछ नहीं चुभा चम्पा! प्रभुके साथ जब मैंने पलंगपर पैर रखा तो बिछौनेपर फूलोंके चित्र बने हुए थे। तू मत घबरा, मेरे प्रभुकी लीलाका पार नहीं है। बड़े कौतुकी हैं मेरे नाथ! तू जा, अपना काम कर ।'

'रातको बिछौना किसने सँवारा ?'

‘मैंने!’—गंगाने कहा।

‘इसके बाद रामूड़ी, राजूड़ी, गुलाब, भूरी, इनमेंसे क्या कोई भीतर गयी थी?'

'नहीं, पर हाँ गुलाब गयी थी पालो रखवा।'

'क्या वह तू नहीं रख सकती थी हिया–फूटी ! वह राँड़ पानीमें कुछ मिलाकर आयी होगी तो ? जा, जाकर धोनेके मिस कलसी फोड़ दे।'

‘अब इन चारोंको झाडू–बुहारी, जाजिम झड़कने, बर्तन माँजने और भीतरी ड्योढ़ीके पहरेपर ही रखो।'— चमेलीने कहा।

'यह रॉड़ भूरकाँ है न! जरूर कोई टोटका–टमना जानती है। देखो न, उसकी आँखें कैसी लाल–लाल रहती है।'— गोमतीने कहा—'कुँवराणीसा, कुँवराणीसा कह–कह करके पास–पास खिसकती जाती है। बाईसा हुकम तो बिल्कुल भोली हैं।'

'नहीं, बाईसा हुकमके सब काम अब हम ही करेंगी।'

उन्होंने सारे कार्य स्वतः बाँट लिये। मेड़तेसे आये श्रीगजाधरजी जोशीका वर्षभरके पश्चात् देहान्त हो गया। एक–एक करके मीराके सारे बाहरी अवलम्ब टूट गये। श्रीजोशीजीके बेटे मन्दिरमें भगवान्‌की पूजा-अर्चना करने लगे।

जय श्री राधे....
🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉
🕉🆑🕉ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🕉🆑🕉
🕉 नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय धीमहि 🕉
🕉 प्रधुम्नायनिरुध्धाय नमः संकर्षणाय च 🕉
🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉

🕉 अच्छाइयों और बुराइयों का वास हमारे भीतर हैं। 🟧प्रभु से दूर जाते ही बुराइयां हमें घेर लेती हैं और हमारा पतन सुनिश्‍चित ...
12/05/2026

🕉 अच्छाइयों और बुराइयों का वास हमारे भीतर हैं। 🟧

प्रभु से दूर जाते ही बुराइयां हमें घेर लेती हैं और हमारा पतन सुनिश्‍चित हो जाता है जबकि प्रभु के सानिध्य में आते ही अच्छाइयां हमारे भीतर से उभर कर आती हैं और बुराइयां हमारे भीतर शान्‍त हो जाती हैं । पूरा लेख नीचे पढ़ें -

प्रभु से दूर जाते ही हमारा पतन और विनाश सुनिश्‍चित हो जाता है । इसलिए प्रभु सानिध्य में सब समय रहना ही हमारे श्रेष्‍ठ हित में है । प्रभु से दूर जाते ही हमारा पतन और विनाश क्‍यों सुनिश्चित होता है, क्‍योंकि प्रभु से दूर होते ही बुराइयां हमें घेर लेती है, दबोच लेती है । जब तक हम प्रभु के सानिध्य में थे, बुराइयां अपना सिर नहीं उठा पाई थी ।

बुराइयां और अच्छाइयां हमारे भीतर निवास करती है । दोनों अपने अनुकूल समय में अपने पैर फैलाती है । जब हम प्रभु के सानिध्य में होते हैं तो अच्छाइयां उभर कर आती हैं और बुराइयां छिप जाती हैं । प्रभु के सानिध्य में हम पाठ-पूजा के लिए जल्‍दी उठने लगते हैं, हम प्रभु के भोग में अर्पण सात्विक पदार्थ प्रसाद रूप में पाते हैं । सदाचार, नीति, सत्‍य हमारे भीतर जग जाते हैं । व्‍यक्ति में जितने सतोगुण बढ़ते हैं उसकी भक्ति उतनी बढ़ी है, ऐसा मानना चाहिए । इसका दूसरा अर्थ यह है कि अगर व्‍यक्ति भक्ति का ढोंग कर रहा है, आडम्‍बर कर रहा है तो उसके भीतर सतोगुण का विकास नहीं होगा । ऐसे में उसके ढोंग या आडम्‍बर की पोल भी खुल जाती है ।

पर जब हम प्रभु से दूर जाते हैं तो हमारे भीतर की अच्छाइयां छिपने लगती हैं क्‍योंकि बुराइयों का हमला होने वाला होता है, इसलिए अच्छाइयां मैदान छोड़ देती हैं । फिर बुराइयां हमें आकर घेरती हैं । आलस्‍य, ढोंग, दिखावा, द्वेष, असत्‍य, हिंसा इत्‍यादि, बड़ी लम्‍बी सेना है बुराइयों की । इनका सेनापति अहंकार है । एक छोटे से उदाहरण से हम इसे समझ सकते हैं । एक गरीब व्‍यक्ति था, सदाचारी था, नित्‍य स्‍वयं पूजा-पाठ करता था, प्रभु के सानिध्य में रहता था इसलिए सात्विक था । उसमें कोई अवगुण नहीं थे । धीरे-धीरे उसकी मित्रता एक व्‍यक्ति से हुई । दोनों ने साथ में व्‍यापार किया । कमाई होने लगी । गरीबी जाती रही । अब दिन दूनी रात चौगुनी कमाई हो रही थी । उसका स्‍वयं का पूजा-पाठ कम होने लगा, ज्‍यादा समय व्‍यापार में, धन कमाने में लगने लगा । मन में लालच आया । उसने मित्र को व्‍यापार से अलग कर दिया और उसका हक मार लिया । मित्रता द्वेष में बदल गई । अब वह मोटी कमाई के लिए झूठ बोलने, बेईमानी करने लगा । ढोंग, दिखावा जीवन में आ गया । असत्‍य बोलना उसका स्‍वभाव बन गया । अनैतिक कमाई अब उसे प्रिय लगने लगी । वह व्‍यापार में कामयाबी के लिए हिंसा तक पर उतर आया । अब उसके घर में पूजा-पाठ दिखावे के लिए होने लगे । कभी-कभी डर के कारण पूजा-अनुष्‍ठान करवाने लगा । पूजा में स्‍वयं का मन न लगने के कारण सात्विकता नहीं बची । सब तामसी हो गया ।

इस उदाहरण में आप देखेंगे कि जैसे-जैसे उस व्‍यक्ति के पास सम्‍पन्‍नता आने लगी, लालच के कारण वह धन कमाने को प्रधानता देने लगा और प्रभु से दूर होता गया । जैसे ही प्रभु से दूर होने लगा एक-एक करके बुराइयों ने उसे दबोच लिया । बुराइयां एक-एक करके अपना आसन जमाने लगी । जब असत्‍य जीवन में आता है तो वह सत्‍य को ठोकर मार कर आता है यानी बुराइयां आएगी तो अच्छाइयों को धकेल कर आएगी ।

सिद्धांत स्‍पष्‍ट है कि प्रभु से दूर जाते ही, प्रभु से विमुख होते ही हम पतनमुखी हो जाते हैं । जब तक जीवन में प्रभु का सानिध्य था, अच्छाइयां हमारे साथ थी, बुराइयां हमारी भीतर दबी बैठी थी और उनका अस्तित्‍व न के बराबर था । जैसे ही हमने माया को पकड़ा और प्रभु को छोड़ा तो अच्छाइयां कमजोर पड़ने लगी और बुराइयों ने अपना आक्रमण कर उन्‍हें धराशायी कर दिया ।

अब दूसरा उदाहरण लें तो हम समझेंगे कि प्रभु के समीप आने से कैसे बुराइयां भागती है और अच्छाइयों का कैसे उदय होता है । उसी व्‍यक्ति का उदाहरण लें जो बुरा बन गया था । खूब पैसा कमाने के बाद उसने पाया कि उसका स्वास्थ्य बिगड़ गया । दसों दवाइयां सुबह-शाम लेनी पड़ती । मोटापा आ गया, श्‍वास फूलने लगी, नाना बीमारियों ने उसे घेर लिया । पत्‍नी से मन मुटाव हो गया, बच्‍चे गलत आदतों से घिर गए, व्‍यापार में अब दिक्‍कत आने लगी, सरकारी विभागों ने भी शिकंजा कसा और सब तरफ से वह घिर गया । अब उसे प्रभु की याद आई ।

एक रात स्वप्न में उसने देखा कि वह कितना सात्विक व्‍यक्ति था, भजनानंदी था । फिर कैसे माया की चपेट में आया और शरीर, परिवार सब खो दिया, व्‍यापार अब परेशानियों का सबब बन गया । फिर उसे अपना अंत दिखा कि नर्क में कितनी प्रकार की यातनाएं वह झेल रहा है और त्राहि त्राहि कर रहा है । तभी उसकी नींद खुली और उसने प्रतिज्ञा करी कि अब वह अपना जीवन प्रभु को समर्पित करेगा ।

वह कुछ समय के लिए तीर्थों में गया, प्रभु की कथा सुनी, जीवन में सत्‍संग और भजन वापस आया और उसने जीवनयापन के लिए जितना जरूरी था अपना व्‍यापार उतना समेट कर बची हुई पूँजी को एक ट्रस्ट बनाकर धर्म कार्य में लगा दिया । अब वह नित्‍य पूजा-पाठ और भजन करता, सात्विक भोजन, सात्विक दिनचर्या और प्रभु कार्य के रूप में जन सेवा में अपना समय और संसाधन लगाने लगा । उसके भीतर सात्विक गुण सब लौट आए क्‍योंकि प्रभु को उसने दोबारा पा लिया था ।

प्रभु से दूर जाते ही हमारा पतन और विनाश और प्रभु के समीप आते ही हमारा उत्थान, बस इतनी-सी बात हमारे मन और मस्तिष्क में बैठ जाए तो हम सदैव प्रभु के पास, प्रभु के सानिध्य में रहने के अवसर और बहाने खोजते नजर आएंगे । मानव जीवन की सफलता का रहस्‍य इसी में छिपा हुआ है ।

जीवन में ऐसा हो जाए तो प्रभु सानिध्य के प्रभाव से हमारे विचार, हमारा अंतःकरण सब पवित्र होने लगते हैं । प्रभु के सानिध्य का प्रभाव देखें कि हमारे भीतर एक गोलाकार रेखा सर्वदा और सदैव के लिए खिंच जाती है और हम उस लक्ष्‍मण-रेखा के भीतर सुरक्षित हो जाते हैं । बुराइयों का समूह जैसे द्वेष, ईर्ष्या, काम, लोभ, हिंसा, असत्‍य इत्‍यादि इस गोलाकार रेखा के अंदर प्रवेश नहीं कर सकते । इस गोलाकार रेखा के अंदर विद्यमान अच्छाइयां जैसे सत्‍य, सदाचार, नीति बाहर नहीं जा पाते एवं हमसे चिपके रहते हैं । प्रभु की यह कृपा-रेखा हमें जीवन भर निश्‍चिंत और जीवन के बाद हमारा प्रभु धाम जाना निश्‍चित कर देती है ।

इसलिए भक्ति के द्वारा प्रभु सानिध्य पाने का अविलम्‍ब प्रयास जीवन में करना चाहिए क्‍योंकि प्रभु का सानिध्य हमें बुराइयों के कूप्रभाव से बचाता है और अच्छाइयों को हमसे चिपकाए रखता है । अच्छाइयां रहेगी तो पुण्य बढ़ेंगे और बुराइयां दूर रहेगी तो हम पाप से बच पाएंगे । यही मानव जीवन की सफलता का राज है ।

🕉 हरिओम तत सत 🕉
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🕉🌼 चिन्तन.... प्रतीक्षा, परीक्षा, समीक्षा 🌼🕉तीन बातें भक्त के जीवन में जरूर होनी चाहिएं, प्रतीक्षा, परीक्षा और समीक्षा। ...
12/05/2026

🕉🌼 चिन्तन.... प्रतीक्षा, परीक्षा, समीक्षा 🌼🕉

तीन बातें भक्त के जीवन में जरूर होनी चाहिएं, प्रतीक्षा, परीक्षा और समीक्षा।

प्रतीक्षा- भक्ति के मार्ग में प्रतीक्षा बहुत आवश्यक है। प्रभु जरूर आयेंगे, कृपा करेंगे, ऐसा विश्वास रखते हुए प्रतीक्षा करें। बहुत बड़ी प्रतीक्षा के बाद शबरी की कुटिया में प्रभु आये थे।

परीक्षा- संसार की परीक्षा करते रहें। इस संसार में सब अपने कारणों से जी रहे हैं। किसी के भी महत्वाकांक्षा के मार्ग पर बाधा बनोगे वही तुम्हारा अपना, पराया हो जायेगा। संसार का तो प्रेम भी छलावा है। संसार को जितना जल्दी समझ लो तो अच्छा है ताकि प्रभु के मार्ग पर तुम जल्दी आगे बढ़ो।

समीक्षा- अपनी समीक्षा रोज करते रहो, आत्मचिन्तन करो। जीवन उत्सव कैसे बने? प्रत्येक क्षण उल्लासमय कैसे बने? जीवन संगीत कैसे बने, यह चिन्तन जरूर करना। कुछ छोड़ना पड़े तो छोड़ने की हिम्मत करना और कुछ पकड़ना पड़े तो पकड़ने की हिम्मत रखना। अपनी समीक्षा से ही आगे के रास्ते दिखेंगे।

मानव जीवन की सार्थकता में संत तथा परमात्मा दोनों का संयोग आवश्यक है। परमात्मा ने मानव को दृष्टि प्रदान किया है, लेकिन संत उसे दृष्टिकोण प्रदान करता है। ताकि मानव ब्रह्म ज्ञान की ओर अग्रसर हो सके। रामचरित मानस तीन शब्दों से मिलकर बना है। जिसमें चरित्र का महत्व प्रधान है। इससे सिद्ध होता है कि ब्रह्म का साक्षात्कार करने के लिए जीव को चरित्र की आवश्यकता है। मानस रूपी गंगा नौ रसों से भरी हुई है, जो सर्वव्यापी है।

रामानंदाचार्य ने रामचरित मानस के तीन स्त्री पात्रों का वर्णन करते हुए कहा कि सती ने भगवान की परीक्षा लेने का प्रयास किया, जिससे उन्हें देह त्याग करना पड़ा। वहीं सुपर्णखा ने भगवान राम की समीक्षा की, जिसके परिणाम स्वरूप उसे अपनी नामक कटवानी पड़ी। लेकिन शबरी ने भगवान की प्रतीक्षा की। इसलिए उसे भगवान का साक्षात्कार हुआ।
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🕉🌼 अनेक शब्दों के लिए एक शब्द 🌼🕉

1. जिसका जन्म नहीं होता - अजन्मा
2. पुस्तकों की समीक्षा करने वाला समीक्षक , आलोचक
3. जिसे गिना न जा सके - अगणित
4. जो कुछ भी नहीं जानता हो -अज्ञ
5. जो बहुत थोड़ा जानता हो- अल्पज्ञ
6. जिसकी आशा न की गई हो - अप्रत्याशित
7. जो इन्द्रियों से परे हो - अगोचर
8. जो विधान के विपरीत हो - अवैधानिक
9. जो संविधान के प्रतिकूल हो - असंवैधानिक
10. जिसे भले -बुरे का ज्ञान न हो - अविवेकी
11. जिसके समान कोई दूसरा न हो - अद्वितीय
12. जिसे वाणी व्यक्त न कर सके - अनिर्वचनीय
13. जैसा पहले कभी न हुआ हो - अभूतपूर्व
14. जो व्यर्थ का व्यय करता हो - अपव्ययी
15. बहुत कम खर्च करने वाला - मितव्ययी
16. सरकारी गजट में छपी सूचना - अधिसूचना
17. जिसके पास कुछ भी न हो - अकिंचन
18. दोपहर के बाद का समय - अपराह्न
19. जिसका निवारण न हो सके - अनिवार्य
20. देहरी पर रंगों से बनाई गई चित्रकारी - अल्पना
21. आदि से अन्त तक- आघन्त
22. जिसका परिहार करना सम्भव न हो - अपरिहार्य
23. जो ग्रहण करने योग्य न हो - अग्राह्य
24. जिसे प्राप्त न किया जा सके - अप्राप्य
25. जिसका उपचार सम्भव न हो - असाध्य
26. भगवान में विश्वास रखने वाला आस्तिक
27. भगवान में विश्वास न रखने वाला - नास्तिक
28. आशा से अधिक- आशातीत
29. ऋषि की कही गई बात - आर्ष
30. पैर से मस्तक तक - आपादमस्तक
31. अत्यंत लगन एवं परिश्रम वाला - अध्यवसायी
32. आतंक फैलाने वाला - आंतकवादी
33. देश के बाहर से कोई वस्तु मंगाना - आयात
34. जो तुरंत कविता बना सके- आशुकवि
35. नीले रंग का फूल - इन्दीवर
36. उत्तर -पूर्व का कोण - ईशान
37. जिसके हाथ में चक्र हो - चक्रपाणि
38. जिसके मस्तक पर चन्द्रमा हो - चन्द्रमौलि
39. जो दूसरों के दोष खोजे - छिद्रान्वेषी
40. जानने की इच्छा- जिज्ञासा
41. जानने को इच्छुक - जिज्ञासु
42. जीवित रहने की इच्छा - जिजीविषा
43. इन्द्रियों को जीतने वाला- जितेन्द्रिय
44. जीतने की इच्छा वाला - जिगीषु
45. जहाँ सिक्के ढाले जाते हैं - टकसाल
46. जो त्यागने योग्य हो - त्याज्य
47. जिसे पार करना कठिन हो- दुस्तर
48. जंगल की आग - दावाग्नि
49. गोद लिया हुआ पुत्र - दत्तक
50. बिना पलक झपकाए हुए - निर्निमेष
51. जिसमें कोई विवाद ही न हो - निर्विवाद
52. जो निन्दा के योग्य हो - निन्दनीय
53. मांस रहित भोजन- निरामिष
54. रात्रि में विचरण करने वाला- निशाचर
55. किसी विषय का पूर्ण ज्ञाता - पारंगत
56. पृथ्वी से सम्बन्धित - पार्थिव
57. रात्रि का प्रथम प्रहर- प्रदोष
58. जिसे तुरंत उचित उत्तर सूझ जाए - प्रत्युत्पन्नमति
59. मोक्ष का इच्छुक- मुमुक्षु
60. मृत्यु का इच्छुक - मुमूर्षु
61. युद्ध की इच्छा रखने वाला- युयुत्सु
62. जो विधि के अनुकूल है - वैध
63. जो बहुत बोलता हो - वाचाल
64. शरण पाने का इच्छुक - शरणार्थी
65. सौ वर्ष का समय - शताब्दी
66. शिव का उपासक - शैव
67. देवी का उपासक - शाक्त
68. समान रूप से ठंडा और गर्म -समशीतोष्ण
69. जो सदा से चला आ रहा हो-- सनातन
70. समान दृष्टि से देखने वाला - समदर्शी
71. जो क्षण भर में नष्ट हो जाए - क्षणभंगुर
72. फूलों का गुच्छा - स्तवक
73. संगीत जानने वाला -संगीतज्ञ
74. जिसने मुकदमा दायर किया है- वादी
75. जिसके विरुद्ध मुकदमा दायर किया है- प्रतिवादी
76. मधुर बोलने वाला -मधुरभाषी
77. धरती और आकाश के बीच का स्थान - अंतरिक्ष
78. हाथी के महावत के हाथ का लोहे का हुक - अंकुश
79. जो बुलाया न गया हो -अनाहूत
80. सीमा का अनुचित उल्लंघन - अतिक्रमण
81. जिस नायिका का पति परदेश चला गया हो प्रोषित- पतिका
82. जिसका पति परदेश से वापस आ गया हो आगत- पतिका
83. जिसका पति परदेश जाने वाला हो - प्रवत्स्यत्पतिका
84. जिसका मन दूसरी ओर हो -अन्यमनस्क
85. संध्या और रात्रि के बीच की वेला -गोधुलि
86. माया करने वाला -मायावी
87. किसी टूटी - फूटी इमारत का अंश- भग्नावशेष
88. दोपहर से पहले का समय -पूर्वाह्न
89. कनक जैसी आभा वाला -कनकाय
90. हृदय को विदीर्ण कर देने वाला - हृदय विदारक
91. हाथ से कार्य करने का कौशल - हस्तलाघव
92. अपने आप उत्पन्न होने वाला - स्त्रैण
93. जो लौटकर आया है - प्रत्यागत
94. जो कार्य कठिनता से हो सके - दुष्कर
95. जो देखा न जा सके - अलक्ष्य
96. बाएँ हाथ से तीर चला सकने वाला- सव्यसाची
97. वह स्त्री जिसे सूर्य ने भी न देखा हो - असुर्यम्पश्या
98. यज्ञ में आहुति देने वाला - हौदा
99. जिसे नापना सम्भव न हो - असाध्य
100. जिसने किसी दूसरे का स्थान अस्थाई रूप से ग्रहण किया हो - स्थानापन्न

🕉 हरिओम तत सत 🕉
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🙏🏻🙏🏻 धर्म यानि क्या 🙏🙏मनुष्य का सच्चा मित्र धर्म ही है। जब कोई साथ नहीं देता, तब धर्म ही साथ देता है। यदि धन-संपत्ति नष्...
12/05/2026

🙏🏻🙏🏻 धर्म यानि क्या 🙏🙏
मनुष्य का सच्चा मित्र धर्म ही है। जब कोई साथ नहीं देता, तब धर्म ही साथ देता है। यदि धन-संपत्ति नष्ट हो जाए तो चिंता नहीं करनी चाहिए, किन्तु धर्म का नाश कभी नहीं होने देना चाहिए। सभी सुखों का साधन धन मानना अज्ञान है; धर्म ही वास्तविक सुख का साधन है। मानव-सृष्टि के संचालन हेतु भगवान ने जो विधि-विधान बनाए हैं, वही धर्म है।

धर्म का आरम्भ सत्य से होकर आत्मसमर्पण पर समाप्त होता है :—

१.) सत्य — सत्य ही ईश्वर का स्वरूप है। धर्म की गति अत्यन्त सूक्ष्म है। सत्य वह साधन है, जिसका आश्रय ग्रहण करने वाला सत्यनारायण में लीन होता है। जिससे सर्वकल्याण हो, ऐसा विवेकयुक्त वचन ही सत्य है :—“सत्यं भूतहितं प्रोक्तम्।”

२.) दयाभाव — जहाँ तक संभव हो, दूसरों का भला करना चाहिए। “तुलसी दया न छाँड़िए जब लग घट में प्राण।”

३.) पवित्रता — पावित्र्य सभी का धर्म है। आजकल शरीर को तो शुद्ध किया जाता है, किन्तु मन को नहीं। मन एवं चित्त की शुद्धि अत्यन्त आवश्यक है। मृत्यु के पश्चात मन ही साथ जाता है, अतः इसे शुद्ध रखने का सतत प्रयास करना चाहिए।

४.) तपश्चर्या — विचार, वाणी और आचरण को शुद्ध रखना ही तपश्चर्या है।

५.) तितिक्षा — भगवद्-कृपा से जो दुःख प्राप्त हो, उसे सहन करते हुए शत्रु के प्रति भी सद्भाव बनाए रखना ही तितिक्षा है।

६.) अहिंसा — मन, वचन और कर्म से किसी को दुःख न देना ही अहिंसा है।

७.) ब्रह्मचर्य — किसी स्त्री या पुरुष का कामभाव से चिंतन न करना ही सच्चा ब्रह्मचर्य है। कामभाव से युक्त गीतों का श्रवण करना भी ब्रह्मचर्य का भंग है। ब्रह्मचर्य मन को स्थिर करने का साधन है।

८.) त्याग — किसी भी वस्तु का त्याग करना धर्म है।

९.) स्वाध्याय — सद्ग्रंथों का चिंतन और मनन ही स्वाध्याय है, जो सभी का धर्म है।

१०.) आर्जवम् — स्वभाव को सरल रखना ही धर्म है।

११.) संतोष — ईश्वर ने जो और जितना दिया है, उसी में संतुष्ट रहने वाला ही वास्तविक श्रीमंत है; असंतुष्ट रहने वाला दरिद्र है।

१२.) समदृष्टि — सभी के प्रति समभाव रखना ही धर्म है।

१३.) मौन — बिना कारण व्यर्थ न बोलना ही मौन है। मौन से मन को शांति मिलती है एवं मानसिक पापों का शमन होता है।

१४.) आत्मचिंतन — प्रतिदिन चिंतन करें कि “मैं शरीर नहीं, अपितु परमात्मा का अंश हूँ।” जन्म से पूर्व न कोई संबंधी था और न मृत्यु के पश्चात रहेगा; ये संबंध केवल मध्यकाल में ही होते हैं। आत्मस्वरूप को जानने वाला ही सच्चा आनन्द प्राप्त करता है।

१५.) पंचमहाभूतों में ईश्वरभावना — पंचमहाभूतों में ईश्वर की
भावना करना तथा उनका अनुभव करना ही धर्म है।

१६.) कृष्णकथा-श्रवण — कृष्णकथा का श्रवण करना भी सभी का धर्म है।

१७.) कृष्ण-भक्ति — कृष्ण का कीर्तन, स्मरण, सेवा, पूजा, नमस्कार तथा उनके प्रति दास्य, सख्य और आत्मसमर्पण— ये सभी धर्म के अंग हैं।

🕉 हरिओम तत सत 🕉
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