16/09/2026
🌷🌷 श्री विश्वकर्मा जयंती - पूजन पद्धति 🌷🌷
▶️ कैसे शुरू हुई विश्वकर्मा पूजा की परंपरा? ◀️
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कैसे शुरू हुई विश्वकर्मा पूजा की परंपरा?
जानें भगवान विश्वकर्मा के जन्म और पौराणिक कथा की कहानी
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हिंदू धर्म में भगवान विश्वकर्मा को निर्माण, शिल्प, वास्तुकला और तकनीकी कला का देवता माना जाता है। हर साल विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर कारीगर, शिल्पकार, इंजीनियर, मजदूर, कारोबारी और औद्योगिक संस्थानों से जुड़े लोग भगवान विश्वकर्मा की आराधना करते हैं।
विश्वकर्मा पूजा की परंपरा सूर्य के कन्या राशि में प्रवेश करने से जुड़ी मानी जाती है। इस अवसर को कन्या संक्रांति कहा जाता है। इसी दिन भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित कर विधि-विधान से पूजा की जाती है। कारखानों, फैक्ट्रियों, दुकानों और औद्योगिक संस्थानों में विशेष आयोजन किए जाते हैं। पूजा के बाद औजारों और मशीनों को भी सम्मानपूर्वक पूजा जाता है। इस दिन मशीनों, औजारों, वाहनों और कार्यस्थल में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की साफ-सफाई कर उनकी पूजा की जाती है। मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने से कार्य में कुशलता, उन्नति और सफलता का आशीर्वाद मिलता है।
कई परंपराओं में विश्वकर्मा पूजा को भगवान विश्वकर्मा के प्राकट्य या जन्म से भी जोड़ा जाता है। हालांकि अलग-अलग धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में उनकी उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग विवरण मिलते हैं।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, सृष्टि के प्रारंभ में भगवान विष्णु क्षीर सागर में शेषनाग की शय्या पर विराजमान थे। उनकी नाभि से कमल प्रकट हुआ और इसी कमल से चार मुख वाले ब्रह्मा जी का प्राकट्य हुआ। भगवान ब्रह्मा से जुड़े वंशक्रम में वास्तुदेव का उल्लेख मिलता है। वास्तुदेव का विवाह अंगिरसी से हुआ और उनसे ऋषि विश्वकर्मा का जन्म माना जाता है।
मान्यता है कि विश्वकर्मा ने अपने पिता वास्तुदेव से वास्तुकला और निर्माण की विद्या प्राप्त की। आगे चलकर वे शिल्प एवं वास्तुकला के महान आचार्य बने। इसी कारण उन्हें देवताओं के दिव्य भवनों और विभिन्न अद्भुत निर्माणों का निर्माता माना गया।
पौराणिक कथाओं में भगवान विश्वकर्मा को कई महत्वपूर्ण दिव्य निर्माणों का श्रेय दिया जाता है। मान्यता है कि उन्होंने भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र, भगवान शिव का त्रिशूल और इंद्र का वज्र जैसे दिव्य अस्त्र तैयार किए थे। इसके अलावा, भगवान कृष्ण की द्वारिका नगरी और पांडवों की इंद्रप्रस्थ नगरी के निर्माण का संबंध भी विश्वकर्मा से जोड़ा जाता है।
पौराणिक कथाओं में पुष्पक विमान और सोने की लंका के निर्माण का उल्लेख भी मिलता है। एक कथा के अनुसार, भगवान शिव के लिए स्वर्ण महल का निर्माण विश्वकर्मा ने किया था। महल की पूजा के बाद रावण ने दक्षिणा के रूप में उसी महल को मांग लिया और उसे अपने अधिकार में ले लिया। इसी वजह से स्वर्ण लंका की कथा भी विश्वकर्मा से जुड़ी मानी जाती है।
प्राचीन समय में शिल्पकारों और निर्माण कार्य से जुड़े लोगों के बीच भगवान विश्वकर्मा की पूजा की परंपरा रही। समय के साथ यह परंपरा बढ़कर कारखानों, कंपनियों, दुकानों और विभिन्न तकनीकी क्षेत्रों तक पहुंच गई। आज विश्वकर्मा पूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि श्रम, कौशल, तकनीक और निर्माण कार्य के प्रति सम्मान का प्रतीक भी मानी जाती है।
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🌷🌷 श्री विश्वकर्मा जयंती पूजन पद्धति 🌷🌷
विश्वकर्मा जी ने ही देवताओं के घर, नगर, अस्त्र-शस्त्र आदि का निर्माण किया था। वे महान शिल्पकार थे। ऋग्वेद में उनका उल्लेख मिलता है। दो बाहु, चार बाहु और दस बाहु वाले तथा एक मुख, चार मुख एवं पंचमुख वाले भगवान विश्वकर्मा के अनेक रूपों का वर्णन पुराणों में मिलता है। इसके अलावा भी इनके पांच स्वरूपों का वर्णन मिलता है-
१- विराट विश्वकर्मा- सृष्टि के रचयिता ।
२- धर्मवंशी विश्वकर्मा- महान् शिल्प विज्ञान विधाता और प्रभात पुत्र।
३- अंगिरावंशी विश्वकर्मा- आदि विज्ञान विधाता वसु पुत्र ।
४- सुधन्वा विश्वकर्म- महान् शिल्पाचार्य विज्ञान जन्मदाता अथवी ऋषि के पौत्र।
५- भृंगुवंशी विश्वकर्मा- उत्कृष्ट शिल्प विज्ञानाचार्य (शुक्राचार्य के पौत्र)।
विश्वकर्मा की उत्पत्ति कैसे हुई?
ब्रह्मा से धर्म तथा धर्म से वास्तुदेव हुए, जो शिल्पशास्त्र के आदि प्रवर्तक थे। वास्तुदेव और उनकी पत्नि अंगिरसी से विश्वकर्मा उत्पन्न हुए थे। इसके अलावा भी स्कंद पुराण के अनुसार प्रभास और उनकी पत्नि भुवना ब्रह्मवादिनी (जो कि देव गुरु बृहस्पति की बहन थी) से भगवान विश्वकर्मा का जन्म हुआ।
सर्वप्रथम यजमान को पूर्वा या उत्तराभिमुख बैठाकर सामने चौक बनाकर उसके ऊपर गौरी-गणेश, नवग्रह , कलश स्थापित करे । अब
पवित्रीकरण: सबसे पहले यजमान अपने ऊपर और सभी सामाग्री पर पवित्र जल छिढ़के आचार्य मंत्र पढ़े-
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा ।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥
आचमन: निम्न मंत्र पढ़ते हुए तीन बार आचमन करें –
‘ॐ केशवाय नम:, ॐ नारायणाय नम:, ॐ माधवाय नम: ।
फिर यह मंत्र बोलते हुए हाथ धो लें – ॐ हृषीकेशाय नम: ।
तिलक : यजमान को तिलक करें –
ॐ चंदनस्य महत्पुण्यं पवित्रं पापनाशनम ।
आपदां हरते नित्यं लक्ष्मी: तिष्ठति सर्वदा ॥
रक्षासूत्र (मौली) बंधन : हाथ में मौली बाँध लें –
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वां प्रतिबंध्नामि रक्षे मा चल मा चल ॥
दीप पूजन : दीपक जला लें –
दीपो ज्योति: परं ब्रम्ह दीपो ज्योति: जनार्दन: ।
दीपो हरतु में पापं दीपज्योति: नमोऽस्तु ते ॥
गौरी- गणेश पूजन:
अक्षत-पुष्प लेकर गौरी- गणेशजी का स्मरण करें –
वक्रतुंड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते॥ (अक्षत–पुष्प चढ़ा दें )
कलश पूजन : हाथ में अक्षत-पुष्प लेकर कलश में ‘ॐ’ वं वरुणाय नम:’ कहते हुए वरुण देवता का तथा निम्न मंत्र पढ़ते हुए तीर्थों का आवाहन करें –
गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वति ।
नर्मदे सिंधु कावेरी जलेऽस्मिन सन्निधिं कुरु ॥
(अक्षत–पुष्प कलश के सामने चढ़ा दें )
कलश को तिलक करें , धुप व दीप दिखायें, पुष्प, बिल्वपत्र व दूर्वा, प्रसाद चढायें ।
नवग्रह: अब नवग्रह पूजन करें ।
संकल्प : हाथ में जल, अक्षत व पुष्प लेकर संकल्प करें –
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः…अमुक गोत्र अमुक नाम अहं ममोपात्तदुरितक्षयद्वारा श्रीपरमेश्वर प्रीत्यर्थं ममसम्पूर्ण मनोकामना सिध्यर्थ गौरी-गणेश सहित श्री विश्वकर्मा प्रतिष्ठा पूर्वक पूजनं करिष्ये ।
विश्वकर्मा पूजन प्रारम्भ-
अब विश्वकर्मा जी की प्रतिमा को जिस आसन पर बैठाना हो ,वँहा सुंदर रेशमी वस्त्र बिछाकर मूर्ति को अच्छी तरह से रखदें।
इसके बाद मूर्ति को यजमान दाँये हाथ से स्पर्श करते हुए प्राण प्रतिष्ठा करे । आचार्य मंत्र पढ़े –
ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं षं षं सं हं सः सोऽहं अस्या विश्वकर्मा प्रतिमायाः प्राणा इह प्राणाः । ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं षं षं सं हं सः सोऽहं अस्या विश्वकर्मा प्रतिमायाः जीव इह स्थितः । ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं षं षं सं हं सः सोऽहं अस्या विश्वकर्मा प्रतिमायाः सर्वेन्द्रियाणि वाङ्मन्स्त्वक्चक्षुः श्रोत्राजिह्वाघ्राण पाणिपाद पायूपस्थानि इहैवागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा ।
हॉंथों में पुष्प लेकर प्राणशक्ति का ध्यान करें-
रक्ताम्भोधिस्थपोतोल्लसदरुण सरोजाधिरूढाकराब्जै: पाशंकोदण्डमिक्षुद्भवगुणमणिमय्यंकुशंपञ्चबाणान्।
विभ्राणस्रक्कपालं त्रिनयनलसितापीनवक्षोरूहाढ्यां,देवीबालार्कवर्णभवतु सुखकरीप्राणांशक्ति: परान्न: ॥
पुनः यजमान हाथ में फूल को लेकर निम्न मंत्र द्वारा मूर्ति प्रतिष्ठापित करे-
ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञ ँसमिमं दधातु ।
विश्वे देवास इह मादयन्तामो३ प्रतिष्ठ ॥
एष वै प्रतिष्ठानाम यज्ञो यत्रौतेन यज्ञेन यजन्ते सर्व मे प्रतिष्ठितम्भवति ।।
फूल समर्पित करें ।
इस प्रकार प्राणप्रतिष्ठा कर विश्वकर्मा जी षोडशोपचार से पूजन करें।
ध्यान- अक्षत पुष्प लेकर भगवान विश्वकर्माजी का ध्यान करें-
भाद्रपदशुभशुक्लपक्षे प्रतिपदाप्रतिशोभितम् मातृभुवने सुतप्रभासे सिद्धिजनकंमोहितम्।
विश्वकर्माविधिविराटं पञ्चमुखप्रभुपूजितम् सर्वकर्मसुवन्दनंकुरु देवशिल्पीध्यायितम्॥
देवशिल्पिन् महाभाग देवनाम् कार्यसाधक। विश्वकर्मन् नमस्तूभ्यं सर्वाभीष्टप्रदायकम्॥
पुष्प विश्वकर्माजी को अर्पित करें ।
आवाहन-पुष्प लेकर विश्वकर्माजी का आवाहन करें-
ॐ दंशपाल महावीर सुचित्रकर्मकारक।
विश्वकृत् विश्वधृक् च त्वं वसना मानदण्डधृक्।
भो विश्वकर्मन्! इहागच्छ इह तिष्ठ,
अत्राधिष्ठानं कुरु कुरु मम पूजा गृहाण॥
आवाहयामि देवेशं विश्वकर्माणमिश्वरम्
मूर्ताऽमूर्तकरं देवं सर्वकर्तारमद्भुतम्।
त्रैलोक्यसूत्रकर्त्तारं द्विभुजं विश्वदर्शितम्
आगच्छ विश्वकर्मस्त्वं यज्ञेऽस्मिन् सन्निधो भव॥
आसन- पुष्प चढ़ावे-
नानारत्नविचित्रकं रमणिकं सिंहासनंतत्रासनं
रत्नसुवर्णयुक्तं मया दत्त देवं प्रतिगृहताम ॥
माणिक्यमञ्जुलमरीचिमनोज्ञपार्श्वं सान्द्रीभवन्मरकतावलिमेचकाभम् ।
मुक्तामणिप्रकरमेदुरितान्तरालं
रत्नासनं तव गृहाणअंगिरा सुतो ॥
पाद्य व अर्ध्य- रजत अथवा ताम्र पात्र में गङ्गाजल, चन्दन, पुष्प लेकर भगवन् का पाँव धुलाये व अर्ध्य प्रदान करें-
इदं पाद्य मया दत्त सर्वसुगंधसंयुक्तम् । गृहीत्वा विश्वकर्मेश प्रसन्नो भव वास्तुज॥
दिव्यौषधिरसोपेतं गन्ध-पुष्पाऽक्षतै: सह।
गृहाणाऽर्ध्यं मया दत्तं विश्वकर्मन् कृपां कुरु॥
आचमन- सुगंधवासितं दिव्यं निर्मलं सलिलं विभो। गृहाणाऽचमनं सौम्य विश्वकर्मन् कृपां कुरु॥
पञ्चामृतस्नान- पञ्चामृत से स्नान कराये-
ॐ पञ्च नद्य: सरस्वतीमपियन्ति सस्रोतस:।
सरस्वती तु पञ्चधा सोऽदेशे भवत्सरित् ॥
पञ्चामृतं मयानीतं पयो दधि घृतं मधु ।
शर्करा च समायुक्तं स्नानार्थं विश्वकर्मन् प्रतिगृह्यताम्॥
शुद्धोदकस्नान–शुद्ध जल से स्नान कराये-
ॐ यक्षकर्दमकाद्यैश्च स्नानं कुरू विश्वकर्मन् ।
अन्त्यं मलहरं शुद्धं सर्वसौगन्ध्य कारकम्॥
गंगाजलं समानीतं सर्वपापहरं शुभम्।
पूतं पयोऽथवा दिव्यं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥
वस्त्र- वस्त्र या मौलीधागा चढ़ाये-
वस्त्रयुग्मं गृहाण त्वमनर्घ्यं रक्तवर्णकम् ।
लोकलज्जाहरं चैव रचनाकर नमोऽस्तु ते ॥
उत्तरीयं सुचित्रं वै नभस्तारांकितं यथा।
गृहाण सर्वसिद्धीश मया दत्तं सुभक्तितः॥
यज्ञोपवीत- यज्ञोपवीत चढ़ाये-
उपवीतं विश्वकर्मन् गृहाण च ततः परम्।
त्रैगुण्यमयरूपं तु प्रणवग्रन्थिबन्धनम् ॥
यज्ञोपवीतं त्रिगुणस्वरूपं सौवर्णमेवं ह्यहिनाथभूतम् ।
भावेन दत्तं धर्मनन्दन तत्वं गृहाण भक्तोद्धृतिकारणाय ॥
अक्षत- अक्षत(पीला चाँवल) समर्पित करे-
ॐ अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रिया अधूषत ।
अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया मती योजान्विन्द्र ते हरी ॥
अक्षताश्च रचनाकर कुङ्कुम्युक्ताः सुशोभिताः ।
मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वर॥
पुष्पमाला- पुष्प और पुष्पमाला समर्पित करें –
गृहाण चम्पकमालतीनि जलपंकजानि स्थलपंकजानि भो विश्वकर्मन् ।
पुष्पोपरि त्वं मल्लिकादि पुष्पाणि नानाविधवृक्षजानि मन्दारशमीदलानि च॥
सौरभाणि सुमाल्यादीनि सुपुष्प रचितानि वै।
मया निवेदितान्यत्र शिल्पाचार्य सुगृह्यताम् ॥
दूर्वा- दूर्वाङ्कुर चढाये-
ॐ काण्डात्काण्डात्प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि।
एवा नो दूर्वे प्र तनु सहस्रेण शतेन च ॥
दूर्वाङ्कुरान् सुहरितानमृतान् मङ्गलप्रदान्।
आनीतांस्तव पूजार्थं गृहाण विश्वकर्मन्॥
तुलसीदल- तुलसीदल चढाये-
ॐ इदं व्विष्णुर्व्विचक्क्रमे ञ्रेधा निदधे पदम्।
समूढमस्य पा सुरे स्वाहा ॥
तुलसीं हेमरूपां च रत्नरूपां च मञ्जरीम्।
भवमोक्षप्रदां तुभ्यमर्पयामि विश्वकर्मन्॥
सिन्दूर अबीर गुलाल अष्टगन्ध – नानापरिमल द्रव्य समर्पित करे –
समायुक्तं गन्धं द्वादशांगेषु ते विश्वकर्मन् लेपयामि सुचित्रवत् ॥
रक्तचन्दनसंयुक्तानथ वा कुंकुमैर्युतान् ।
अक्षतान् शिल्पाचार्य त्वं गृहाण भालमण्डले ॥
धूप – धूप /(दशांग)दे-
दशांग गुग्गुलं धूपं सर्वसौरभकारकम् ।
गृहाण त्वं मया दत्तं अंगिरा सुतो ॥
ॐ धूरसि धूर्व धूर्वन्तं धूर्व तं योऽस्मान् धूर्वति तं धूर्व यं वयं धूर्वामः ।
देवानामसि वह्नितम ँ सस्नितमं पप्रितं जुष्टतमं देवहूतमम् ॥
दीप – दीप दिखाये-
नानाजातिभवं दीप गृहाण देवशिल्पिन्।
अज्ञानमलजं दोषं हरन्तं ज्योतिरूपकम् ॥
दीपं सुवर्त्या युतमादरात्ते दत्तं मया रचनाकर।
गृहाण नानाविधजं घृतादि -तैलादि -संभूतममोघदृष्टे ॥
हस्तप्रक्षालन – ॐ ह्रषिकेशाय नमः’ कहकर हाथ धो ले ।
नैवेद्य –नैवेद्य (प्रसाद) भगवान के आगे निवेदित करे-
चतुर्विधान्नसम्पन्नं मधुरं लड्डुकादिकम्।
नैवेद्यं ते मया दत्त भोजनं कुरू शिल्पी॥
चोष्यैश्च भक्ष्यनिवहैश्च करम्बितं ते
भोज्यं ददामि विश्वकर्मन् दिव्यमन्नम् ॥
‘नैवेद्यान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि’ । (जल समर्पित करे ।)
ऋतुफल- ऋतुफल नारियल अर्पित करे-
दाडिमं खर्जुरं द्राक्षां रम्भादीनि फलानि वै ।
गृहाण देवदेवेश नानामधुरकाणि तु ॥
इदं फलं मया देव स्थापितं पुरतस्तव । तेन मे सफलावाप्तिर्भवेज्जन्मनि जन्मनि ॥
‘फलान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि । (आचमनीय जल अर्पित करे।)
ताम्बूल- सुपारी, इलायची, लौंगसहित पान चढ़ाये-
अष्टांग देव ताम्बूलं गृहाण मुखवासनम्।
असकृद्शिल्पराज त्वं मया दत्तं विशेषतः ॥
पुंगीफल महद्दिव्यं नागवल्लीदलैर्युतम् ।
एलादिचूर्णसंयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम्॥
दक्षिणा – द्रव्य-दक्षिणा चढ़ाये-
दक्षिणां कांचनाद्यां तु नानाधातु समुद्भवाम्।
सौवर्ण -मुद्रादिक रत्नाद्यैः संयुतां गृहाण सकलप्रिय॥
हिरण्यगर्भगर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः ।
अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥
आरती-
भगवान विश्वकर्मा जी की आरती करेंगे -
आरार्तिका कर्पुरकादिभूतामपारदीपां प्रकरोमि पूर्णाम् ।
रचनाकर तां गृहाण ह्यज्ञानध्वान्तौघहरां निजानाम् ॥
ॐ आ रात्रि पार्थिव ँ रजः पितुरप्रायि धामभिः ।
दिवः सदा ँ सि बृहती वि तिष्ठस आ त्वेषं वर्तते तमः ॥
ऊँ जय श्री विश्वकर्मा प्रभु जय श्री विश्वकर्मा ।
सकल सृष्टि के कर्ता रक्षक श्रुति धर्मा ॥
आदि सृष्टि में विधि को, श्रुति उपदेश दिया ।
शिल्प शस्त्र का जग में,ज्ञान विकास किया ॥
ऋषि अंगिरा ने तप से, शांति नही पाई ।
ध्यान किया जब प्रभु का, सकल सिद्धि आई ॥
रोग ग्रस्त राजा ने, जब आश्रय लीना ।
संकट मोचन बनकर, दूर दुख कीना ॥
जब रथकार दम्पती, तुमरी टेर करी ।
सुनकर दीन प्रार्थना, विपत्ति हरी सगरी ॥
एकानन चतुरानन, पंचानन राजे ।
द्विभुज, चतुर्भुज, दशभुज, सकल रूप साजे ॥
ध्यान धरे जब पद का, सकल सिद्धि आवे ।
मन दुविधा मिट जावै, अटल शांति पावे ॥
श्री विश्वकर्मा जी की आरती, जो कोई नर गावे ।
कहत गजानन स्वामी, सुख सम्पत्ति पावै ॥
पुष्पांजलि – पुष्पाञ्जलि अर्पित करे –
ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥
नानासुगन्धिपुष्पाणि यथाकालोद्भवानि च ।
पुष्पाञ्जलिर्मया दत्तो गृहाण परमेश्वर ॥
प्रदक्षिणा- सभी लोग हवनकुंड की ३ परिक्रमा करें –
ॐ ये तीर्थानि प्रचरन्ति सृकाहस्ता निषङ्गिणः ।
तेषा ँ सहस्रयोजनेऽव धन्वानि तन्मसि।
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च ।
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणया पदे पदे ॥
साष्टांग प्रणाम : सभी साष्टांग प्रणाम करेंगे ।
प्रार्थना : विश्व कल्याण के लिए हाथ जोडकर प्रार्थना करें –
सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद दुःखभाग भवेत् ॥
क्षमा प्रार्थना व विसर्जन :
हवन पूजन आदि में जो गलतियाँ हो गयी हों , उनके लिए हाथ जोड़कर सभी लोग क्षमा प्रार्थना करें और थोड़े-से अक्षत लेकर देव स्थापन और हवन कुंड में निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करते हुए चढायें–
ॐ आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व देवशिल्पी॥
ॐ मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर।
यत्पूजितं माया देवं परिपूर्ण तदस्तु में ॥
ॐ गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ स्वस्थाने परमेश्वर।
यत्र ब्रम्हादयो देवा: तत्र गच्छ हुताशन ॥
कृतेनानेत विश्वकर्मा पूजन पद्धति कर्मणा श्रीपरमेश्वर: प्रीयताम्, न मम।।
(आरती के बाद जल गिरा दे ।)
पूजन के बाद विविध प्रकार के औजारों और यंत्रों आदि की पूजा करें। अब श्रीविश्वकर्मा चालीसा व विश्वकर्माष्टकम् का पाठ करें। उसके बाद श्री विश्वकर्मा कथा का श्रवण करें।
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