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ॐ नमः शिवायः

सात चीजें जो क्वांटम भौतिकी के दृष्टिकोण से आपकी कंपन आवृत्ति को प्रभावित करती हैं।

क्वांटम भौतिकी में कंपन का मतलब है कि सब कुछ ऊर्जा है। हम कुछ निश्चित आवृत्तियों पर जीवंत प्राणी हैं। प्रत्येक कंपन एक भावना के बराबर है और दुनिया में "कंपन", कंपन (Vibrations) की केवल दो प्रजातियां हैं, सकारात्मक और नकारात्मक। कोई भी भावना आपको एक कंपन को प्रसारित करती है जो सकारात्मक या नकारात्मक हो सकती है।

🌺 1--विचार🌺
प्रत्येक विचार ब्रह्मांड के लिए एक आवृत्ति का उत्सर्जन करता है और यह आवृत्ति वापस मूल में जाती है, इसलिए यदि आपके पास नकारात्मक विचार, हतोत्साह, उदासी, क्रोध, भय है, तो यह सब आपके पास आता है। यही कारण है कि यह इतना महत्वपूर्ण है कि आप अपने विचारों की गुणवत्ता का ध्यान रखें और सीखें कि कैसे अधिक सकारात्मक विचारों की खेती करें।

🌺 2--संगति🌺

आपके आसपास के लोग आपकी कंपन आवृत्ति को सीधे प्रभावित करते हैं। यदि आप खुश, सकारात्मक और दृढ़ लोगों के साथ खुद को घेरते हैं, तो आप इस कंपन में भी प्रवेश करेंगे। अब, अगर आप शिकायत करने वाले, गपशप करने वाले और निराशावादी लोगों से घिरे हैं, तो सावधान हो जाइए! वास्तव में, वे आपकी आवृत्ति को कम कर सकते हैं और इसलिए आपको अपने पक्ष में आकर्षण के कानून का उपयोग करने से रोकते हैं। ( Law of attraction)।

🌺 3--संगीत 🌺
संगीत बहुत शक्तिशाली है। यदि आप केवल संगीत सुनते हैं जो मृत्यु, विश्वासघात, उदासी, परित्याग के बारे में बात करता है, तो यह सब उस चीज़ में हस्तक्षेप करेगा जो आप महसूस कर रहे हैं। आपके द्वारा सुने जाने वाले संगीत के बोलों पर ध्यान दें, यह आपकी कंपन आवृत्ति को कम कर सकता है। और याद रखें: आप अपने जीवन में जैसा महसूस करते हैं वैसा ही आकर्षित करते हैं।

🌺 4--जिन चीजों को आप देखते हैं 🌺
जब आप दुर्भाग्य, मृत, विश्वासघात आदि से निपटने वाले कार्यक्रमों को देखते हैं, तो आपका मस्तिष्क इसे एक वास्तविकता के रूप में स्वीकार करता है और आपके शरीर में एक संपूर्ण रसायन विज्ञान जारी करता है, जो आपकी कंपन आवृत्ति को प्रभावित करता है। उन चीजों को देखें जो आपको अच्छा लगता है और आपको उच्च आवृत्ति पर कंपन करने में मदद करता है।

🌺 5--माहौल 🌺
चाहे वह घर पर हो या काम पर, अगर आप गंदे और गंदे माहौल में बहुत समय बिताते हैं, तो यह आपकी कंपन आवृत्ति को भी प्रभावित करेगा। अपने परिवेश को सुधारें, अपने परिवेश को व्यवस्थित करें और साफ करें। ब्रह्मांड दिखाओ कि आप अधिक प्राप्त करने के लिए फिट हैं। आपके पास जो पहले से है उसका ख्याल रखें!

🌺 6--शब्द 🌺
यदि आप चीजों और लोगों के बारे में गलत दावा करते हैं या बोलते हैं, तो यह आपकी कंपन आवृत्ति को प्रभावित करता है। अपनी आवृत्ति को उच्च रखने के लिए, दूसरों के बारे में शिकायत और बुरी बात करने की आदत को खत्म करना आवश्यक है। इसलिए नाटक और धमकाने से बचें। अपने जीवन के विकल्पों के लिए अपनी जिम्मेदारी मान लें!

🌺 7-- अहोभाव 🌺
आभार सकारात्मक रूप से आपकी कंपन आवृत्ति को प्रभावित करता है। यह एक ऐसी आदत है जिसे आपको अब अपने जीवन में एकीकृत करना चाहिए। हर चीज के लिए, अच्छी चीजों के लिए और जिसे आप बुरा मानते हैं, उसके लिए धन्यवाद देना शुरू करें, आपके द्वारा अनुभव किए गए सभी अनुभवों के लिए धन्यवाद। कृतज्ञता आपके जीवन में सकारात्मक चीजों के होने का द्वार खोलती है।

🕉🔱 शिव  पुराण 🔱 श्रीरुद्र  संहिता 🔱🕉🕉🔱 पंचम खण्ड 🔱 सातवाँ अध्याय🔱🕉▶️▶️▶️ देवताओं  द्वारा  शिव स्तवन ◀️◀️सनत्कुमार जी बोल...
16/09/2026

🕉🔱 शिव पुराण 🔱 श्रीरुद्र संहिता 🔱🕉
🕉🔱 पंचम खण्ड 🔱 सातवाँ अध्याय🔱🕉
▶️▶️▶️ देवताओं द्वारा शिव स्तवन ◀️◀️

सनत्कुमार जी बोले ;-
हे व्यास जी! जैसे ही शरणागत भक्तवत्सल भगवान शिव ने देवताओं की प्रार्थना स्वीकार कर तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली का वध करने का मन बनाया, उसी समय देवी पार्वती अपने पुत्र को गोद में लेकर वहां आईं। तब जगज्जननी मां जगदंबा को आता देखकर ब्रह्मा, विष्णु सहित अन्य देवताओं ने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया। अपने पुत्रों को देख भगवान शिव उन्हें प्यार करने लगे। तब देवी पार्वती भगवान शिव को अपने साथ लेकर अपने भवन के भीतर चली गईं। भगवान शिव के इस प्रकार बिना कुछ कहे अपने भवन में चले जाने के कारण सब देवता बहुत दुखी हो गए परंतु उन्होंने वहीं खड़े रहकर भगवान शिव की प्रतीक्षा करने का निर्णय लिया। उस समय वे दैत्यों के भाग्य की प्रशंसा करने लगे। वे सब देवता वहीं शिवजी के भवन के द्वार पर खड़े थे। तभी भगवान शिव के गण ने अपने स्वामी के द्वार के सामने भीड़ जमा देखकर उन पर आक्रमण कर दिया। देवता इस अनजान खतरे से संभल न सके और अपने प्राणों की रक्षा के लिए इधर-उधर दौड़ने लगे। कई साधु और ऋषिगण गिर पड़े। चारों ओर हाहाकार मच गया। तब भयभीत होकर सब देवता भगवान श्रीहरि विष्णु की शरण में गए। देवताओं को समझाते हुए श्रीहरि विष्णु ने कहा, देवताओ तथा मुनिगणो! आप लोग क्यों इतना दुखी हो रहे हैं?

महान पुरुषों की आराधना करने में दुख तो आते ही हैं। इन कष्टों को झेलकर ही भक्त की दृढ़ता बढ़ती है और तब वह अपने आराध्य देवों को प्रसन्न कर पाता है। भगवान शिव तो समस्त गणों के अध्यक्ष तथा परमेश्वर हैं। आप सब मिलकर भगवान आशुतोष की प्रसन्नता के लिए 'ॐ नमः शिवाय । शुभं शुभं कुरु कुरु शिवाय नमः ॐ' मंत्र का एक करोड़ बार जाप करो। वे इससे अवश्य ही प्रसन्न होंगे और हमारा कार्य पूरा करेंगे। भगवान श्रीहरि विष्णु के इन वचनों को सुनकर सभी देवता बहुत प्रसन्न हुए और सहर्ष भगवान शिव की आराधना करने लगे। अपने कार्य की सिद्धि के लिए उन्होंने एक करोड़ बार विष्णुजी द्वारा बताए गए मंत्र का जाप करना आरंभ कर दिया। जैसे ही उनकी यह आराधना संपन्न हुई, भगवान शिव उनके सामने प्रकट हो गए।

भगवान शिव बोले ;- मैं आपकी इस उत्तम आराधना से बहुत प्रसन्न हूं। आप अपना इच्छित वर मांगें। प्रभु के ये वचन सुनकर देवता बोले- हे देवाधिदेव ! हे जगदीश्वर ! आप सबके कल्याणकर्ता हैं। भगवन्, हम पर कृपा कर हमारी रक्षा कीजिए। आप त्रिपुर स्वामियों का वध करके हमें भय से मुक्ति दिलाएं।

तब भगवान शिव देवताओं की प्रार्थना सुनकर पुनः बोले — हे हरे! हे ब्रह्मन्! हे देवगण तथा मुनियो ! जैसा आप चाहते हैं वैसा ही होगा। मैं अवश्य ही आपकी आराधना सफल करूंगा। हे विष्णो! आप इस जगत के पालनकर्ता हैं। इसलिए त्रिपुर विनाश के लिए आप मेरी सहायता करें। मेरे लिए दिव्य रथ, सारथी और धनुष सहित आवश्यक सामग्री की व्यवस्था करें।

सनत्कुमार जी बोले ;– मुने! भगवान शिव की इच्छा जानकर सब देवता बहुत प्रसन्न हुए तथा शिवजी की आज्ञानुसार समस्त युद्ध सामग्री की व्यवस्था करने लगे। मुने! देवताओं द्वारा शिवजी को प्रसन्न करने के लिए एक करोड़ बार जपा गया यह मंत्र महान पुण्यदायी है। यह शिवजी को तुरंत प्रसन्न करने वाला तथा भक्ति-मुक्ति के मार्ग पर ले जाने वाला है । यह मंत्र शिवभक्तों की सभी कामनाओं और इच्छाओं को पूरा करता है। इस मंत्र से धन, यश की प्राप्ति होती है और आयु में वृद्धि होती है। यह निष्काम मनुष्यों के लिए मोक्ष प्राप्ति का साधन है। जो मनुष्य भक्तिभाव और शुद्ध हृदय से इस मंत्र को जपता है, उसकी सभी अभिलाषाएं भक्तवत्सल कल्याणकारी भगवान शिव अवश्य ही पूरी करते हैं ।

हे शिव ! हे शंकर ! हे महादेव ! हे शम्भो ❤
कोटि - कोटि प्रणाम! हर - हर - महादेव 🙏
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संक्षिप्त श्रीस्कन्द महापुराणसंक्षिप्त श्रीस्कन्द महापुराण 〰️〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️〰️(आवन्त्य खण्ड)अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्यसौभाग्य आ...
16/09/2026

संक्षिप्त श्रीस्कन्द महापुराण

संक्षिप्त श्रीस्कन्द महापुराण
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(आवन्त्य खण्ड)

अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य

सौभाग्य आदि तीर्थों की महिमा, अर्जुन को इन्द्र से सूर्यप्रतिमा की प्राप्ति तथा अवन्ती में उसकी स्थापना और उनके दर्शन का माहात्म्य...(भाग 4)
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उन्हें आप ही शरण देनेवाले हैं। सम्पूर्ण जगत्में आपके समान दयालु दूसरा कोई नहीं है। एकमात्र आपमें ही की हुई भक्ति पूर्णतः सफल होती है। आपकी शरणमें आ जानेपर मनुष्योंको रोग, व्याधिका कष्ट कैसे हो सकता है? देव! आप देखा करते हैं कि कौन कुष्ठरोगसे पीड़ित है, किसे शत्रु और रोग आदि सता रहे हैं, कौन पंगु, अन्ध और जड़ है, किनके पैर गल गये हैं और कौन निर्धन तथा निष्क्रिय हो गया है। इस प्रकार निरीक्षण करके आप कृपापूर्वक प्राणियोंकी उन-उन दोषोंसे रक्षा करते हैं। आपकी जैसी परोपकारपूर्ण चेष्टा देखी जाती है, वैसी और किसमें है? धर्म सेवित होनेपर परलोकमें फल देनेके लिये उपस्थित होता है। देवता उपासना करनेपर कालान्तरमें वरदान देते हैं। परंतु प्रणतवत्सल ! आप कल्याणकामी पुरुषोंद्वारा सेवित होनेपर तत्काल ही उन्हें अभीष्ट फल प्रदान करते हैं। यदि मनुष्योंने एक बार भी किसी प्रकार आपको मस्तक झुकाया है अथवा भुवनेश्वर! अन्तकालमें भी जिसने आपका चिन्तन किया है, वे संसारमें पापी होनेपर भी निष्पाप हो गये हैं और उन्होंने शुद्धचित्त होकर पुण्यात्माओंकी गति प्राप्त कर ली है। सुरश्रेष्ठ ! जब आप उदय लेने लगते हैं, उस समय देवनदी गंगाके खिले हुए स्वर्णकमलोंसे निकले हुए झुंड-के-झुंड भ्रमर उनकी स्वर्णमयी धूलिसे अनुरंजित होकर उड़ते हैं। भगवन् ! आप अपने किरणसमूहरूपी चरणोंके द्वारा समुद्रके मध्यमें स्थित होकर समस्त जीवोंके जीवनकी रक्षाके उद्देश्यसे तात्त्विक उपायका चिन्तन करनेके लिये मानो तपस्या करते हैं। तीनों लोकोंमें आपके समान दूसरा कौन है? सदा वेदके मार्गमें तत्पर रहनेवाले उदारबुद्धि ऋषि-मुनियोंद्वारा आपके गुणोंकी स्तुति नहीं की जा सकती। आप ही विष्णु हैं, आप ही चन्द्रमा हैं, आप ही दैत्योंका मान मर्दन करनेवाले स्वामिकार्तिकेय हैं। आप ही धनाध्यक्ष कुबेर हैं, आप ही काल हैं। आप ही ब्रह्मा हैं और आप ही पर्वत, मिट्टी, जलके आश्रय तथा अग्नि हैं। आप ही ब्राह्मणोंके जपनेयोग्य ॐकार हैं। आप ही वहाँ समुद्र हैं। आप ही यम, रुद्र, इन्द्र और मेघ हैं। आप ही व्रत, यम तथा नियम हैं और आप ही यह सम्पूर्ण जगत् हैं। त्रिपुरमथन! गोपते! सुराधीश ! भगवन्! आपका मुख कमलके समान सुन्दर है। आप सम्पूर्ण देवताओंके गुरु हैं, तीनों लोकोंमें आपके समान गुणवान् कौन है? आदित्य ! भास्कर ! दिवाकर! सप्ताश्ववाहन ! मार्तण्ड ! सूर्य ! हरिदश्व ! पतंग ! भानो! अश्रान्तवाहन ! आकाशस्वरूप ! अंशुमालिन् ! लोकनाथ ! यह दास आपकी शरणमें आया है। जगत्प्रदीप ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। ब्रह्मण्य! सत्य ! शुभ ! मंगल! लोकनाथ ! आकाशकमल ! ईश! मुनिसंस्तुत ! विश्वमूर्ते ! आर्तजनोंका शोक नाश करनेवाले! सेवकोंका पालन करनेवाले ! भगवन्! आप अपनी शरणमें आये हुए मुझपर प्रसन्न होइये। देव! आज मैंने मस्तकपर अंजलि बाँधे हुए दोनों हाथोंसे नमस्कारपूर्वक बड़े भक्ति-भावसे आपका स्तवन किया है, इसलिये प्रभो! आप मेरे ऊपर सौम्य रूप हो जाइये और मेरी बुद्धिको धर्ममें लगाइये। जो सम्पूर्ण जगत्के एकमात्र नेत्र हैं, वेदत्रयीमय हैं अथवा त्रिभुवनस्वरूप हैं, त्रिगुणात्मक शरीर धारण करने वाले हैं और समस्त विश्व की उत्पत्ति, पालन तथा संहार के हेतु हैं, उन ब्रह्मा, विष्णु, शिवरूप भगवान् सूर्यको

सूर्यदेव बोले- उत्तम व्रतका पालन करनेवाले अर्जुन ! मैं तुम्हारे इस स्तोत्रसे इस समय सन्तुष्ट हूँ, अतः तुम्हारे मनमें जो भी इच्छा हो, पूर्तिके लिये यत्नपूर्वक वर दूँगा।

अर्जुनने कहा- प्रभो! मेरे लिये यही सबसे उत्तम वर है कि आप इस विग्रहमें सदा स्थित रहें। जो मनुष्य आपको प्रणाम करके भक्तिपूर्वक आपकी स्तुति करें, उनको आप मनोवांछित वस्तु प्रदान करें। सूर्यदेवने कहा- अर्जुन ! जो भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करके इस स्तोत्रद्वारा मेरी स्तुति करेंगे उनके पास कभी धन-सम्पत्तिकी कमी नहीं होगी।

क्रमशः...
शेष अगले अंक में जारी
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आनन्दरामायणम्〰️〰️🌼🌼〰️〰️श्रीसीतापतये नमःश्रीवाल्मीकि महामुनि कृत शतकोटि रामचरितान्तर्गतं ('ज्योत्स्ना' हृया भाषा टीकयाऽटी...
16/09/2026

आनन्दरामायणम्
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श्रीसीतापतये नमः

श्रीवाल्मीकि महामुनि कृत शतकोटि रामचरितान्तर्गतं ('ज्योत्स्ना' हृया भाषा टीकयाऽटीकितम्)

(राज्यकाण्डम्) (पूर्वार्द्धम्)

नवमः सर्गः

(राम द्वारा प्लक्षादि छः द्वीपों की विजय)...(दिन 365)
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वहाँ एक विशाल काय शाल्मली (सेमर) का वृक्ष था। इसीलिए वह देश शाल्मली द्वीप के नाम से विख्यात था। वहाँ चन्द्रदेव सबके आराध्य देवता हैं और वहाँ के निवासी चन्द्रमा की ही उपासना करते हैं। पीछे जिन द्वीपों का जो विस्तार कह आये हैं, उन्हींके अनुसार वह भी विस्तृत था। वहाँ के जो देश हैं. उनको बतलाता हूँ ॥ २१ ॥ २२ ॥

मेरु के पूर्व ओर से लेकर क्रमशः सब देशों का नाम कहूँगा। जैसे-सुरोचन, सौमनस्य, रम-गक, देववर्ष, पारिभद्र, आप्यायन और अविज्ञात ये सात देश उस द्वीप में हैं ॥ २३ ॥ २४ ॥

वहाँ पर अनूमती, सिनीवाली, सरस्वती, कुहू, रजनी, नन्दा और राका ये नदियाँ हैं ॥ २५ ॥

शतश्टङ्ग, वामदेव, कुन्द, कुमुद, पुष्पवर्ष, सहस्रश्रुति और स्वरस ये उस देश के सात पर्वत हैं, जो उसकी सीमा का काम कर रहे हैं। इन सातों देशों के राजाओं को राम ने जीत लिया ॥ २६ ॥ २७ ॥.

इसके अनन्तर उस द्वीप के अधीश्वर को जीतकर चार लाख योजन के लगभग लम्बे-चौड़े सुरासमुद्र को लाँधकर वे नुबाहु के पास पहुंचे ॥ २८ ॥

फिर क्षणमात्र में राम आठ लाख योजन विस्तृत समुद्र को लांघकर कुशद्वीप गये। उस द्वीप के समस्त निवासी अग्नि के उपासक हैं ।। २६ ।।

द्वीप के नाम को स्पष्ट करने के लिए वहाँ पर एक कुश का जंगल देवताओं द्वारा लगाया हुआ है। अब वहाँ के जो सात देश हैं, उनको बतलाते हैं-॥ ३० ॥

वसु, वसुदान, दृढ़रुचि, नाभिगुप्त, सत्यव्रत, विविक्त और सातवाँ वामदेव नामक देश है। उन सातों देशों में रसकुल्या, मधुकुल्या, मित्रविन्दा, श्रुतिविन्दा, देवगर्भा, घृतच्युता तथा मन्त्रमाला ये सात नदियां हैं। चतुः शृङ्ग, कपिल, चित्रकूट, देवानीक, ऊध्वंरोमा, द्रविण और चक्र ये सात पर्वत उस द्वीप में हैं ॥ ३१-३४॥

इन सातों देशों के राजाओं को राम ने जीतकर कुशद्वीप के अधिपति महासेन नामक राजा को भी उन्होंने जीत लिया। इससे राम को प्रसन्नता हुई ।॥ ३५ ॥ ३६ ॥

फिर आठ लाख योजन विशाल घृतोद नाम के सागर को पार करके वे अपने देदीप्यमान पुष्पक विमान द्वारा शेश्वद्वीप गये ।। ३७ ।।

कुश द्वीप की अपेक्षा यह द्वीप दुगुना लम्बा-चौड़ा है। वहाँ उस द्वीप का नाम सार्थक करने के लिये एक विशाल औश्व पर्वत है ।। ३८ ।।

क्रमशः...
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श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️।। श्रीहरिः ।।* श्रीगणेशाय नमः *।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।(चैत्ररथपर्व)अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः पुलस्त...
16/09/2026

श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।

(चैत्ररथपर्व)

अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

पुलस्त्य आदि महर्षियों के समझाने से पराशरजी के द्वारा राक्षससत्र की समाप्ति...(दिन 498)
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गन्धर्व उवाच

एवमुक्तः स विप्रर्षिर्वसिष्ठेन महात्मना । न्ययच्छदात्मनः क्रोधं सर्वलोकपराभवात् ।। १ ।।

गन्धर्व कहता है-अर्जुन ! महात्मा वसिष्ठके यों कहनेपर उन ब्रह्मर्षि पराशरने अपने क्रोधको समस्त लोकोंके पराभवसे रोक लिया ।। १ ।।

ईजे च स महातेजाः सर्ववेदविदां वरः । ऋषी राक्षससत्रेण शाक्तेयोऽथ पराशरः ।। २ ।।

तब सम्पूर्ण वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी शक्ति-नन्दन पराशरने राक्षससत्रका अनुष्ठान किया ।। २ ।।

ततो वृद्धांश्च बालांश्च राक्षसान् स महामुनिः । ददाह वितते यज्ञे शक्तेर्वधमनुस्मरन् ।। ३ ।।

उस विस्तृत यज्ञमें अपने पिता शक्तिके वधका बार-बार चिन्तन करते हुए महामुनि पराशर ने राक्षस जाति के बूढ़ों तथा बालकों को भी जलाना आरम्भ किया ।। ३ ।।

न हि तं वारयामास वसिष्ठो रक्षसां वधात् । द्वितीयामस्य मा भाङ्क्ष प्रतिज्ञामिति निश्चयात् ।। ४ ।।

उस समय महर्षि वसिष्ठने यह सोचकर कि इसकी दूसरी प्रतिज्ञा को न तोड़ें, उन्हें राक्षसों के वध से नहीं रोका ।। ४ ।।

त्रयाणां पावकानां च सत्रे तस्मिन् महामुनिः । आसीत् पुरस्ताद् दीप्तानां चतुर्थ इव पावकः ।। ५ ।।

उस सत्रमें तीन प्रज्वलित अग्नियोंके समक्ष महामुनि पराशर चौथे अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ।। ५ ।।

तेन यज्ञेन शुभ्रेण हूयमानेन शक्तिजः । तद्विदीपितमाकाशं सूर्येणेव घनात्यये ।। ६ ।।

(पापी राक्षसोंका संहार करनेके कारण) वह यज्ञ अत्यन्त निर्मल एवं शुद्ध समझा जाता था। शक्तिनन्दन पराशरद्वारा उसमें यज्ञसामग्रीका हवन आरम्भ होते ही (वह इतना प्रज्वलित हो उठा कि) उसके तेजसे सम्पूर्ण आकाश ठीक उसी तरह उद्भासित होने लगा, जैसे वर्षा बीतनेपर सूर्यकी प्रभासे उद्दीप्त हो उठता है ।। ६ ।।

तं वसिष्ठादयः सर्वे मुनयस्तत्र मेनिरे । तेजसा दीप्यमानं वै द्वितीयमिव भास्करम् ।। ७ ।।

उस समय वसिष्ठ आदि सभी मुनियोंको वहाँ तेजसे प्रकाशमान महर्षि पराशर दूसरे सूर्यके समान जान पड़ते थे ।। ७ ।।

ततः परमदुष्प्रापमन्यैऋषिरुदारधी।
समापिपयिषुः सत्रं तमत्रिः समुपागमत् ।। ८ ।।

तदनन्तर दूसरोंके लिये उस यज्ञको बंद करना अत्यन्त कठिन जानकर उदारबुद्धि महर्षि अत्रि स्वयं उस यज्ञको समाप्त करानेकी इच्छासे पराशरके पास आये ।। ८ ।।

तथा पुलस्त्यः पुलहः क्रतुश्चैव महाक्रतुः ।
तत्राजग्मुरमित्रघ्न रक्षसां जीवितेप्सया ।। ९ ।।

शत्रुओंका नाश करनेवाले अर्जुन ! उसी प्रकार पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और महाक्रतुने भी राक्षसोंके जीवनकी रक्षाके लिये वहाँ पदार्पण किया ।। ९ ।।

पुलस्त्यस्तु वधात् तेषां रक्षसां भरतर्षभ ।
उवाचेदं वचः पार्थ पराशरमरिंदमम् ।। १० ।।

भरतकुलभूषण कुन्तीकुमार! उन राक्षसोंका विनाश होता देख महर्षि पुलस्त्यने शत्रुसूदन पराशरसे यह बात कही- ।। १० ।।

कच्चित् तातापविघ्नं ते कच्चिन्नन्दसि पुत्रक । अजानतामदोषाणां सर्वेषां रक्षसां वधात् ।। ११ ।।

'तात! तुम्हारे इस यज्ञमें कोई विघ्न तो नहीं पड़ा? बेटा! तुम्हारे पिताकी हत्याके विषयमें कुछ भी न जाननेवाले इन सभी निर्दोष राक्षसोंका वध करके क्या तुम्हें प्रसन्नता होती है? ।। ११ ।।

प्रजोच्छेदमिमं मह्यं न हि कर्तुं त्वमर्हसि । नैष तात द्विजातीनां धर्मो दृष्टस्तपस्विनाम् ।। १२ ।।

'वत्स! मेरी संततिका तुम्हें इस प्रकार उच्छेद नहीं करना चाहिये। तात! यह हिंसा तपस्वी ब्राह्मणोंका धर्म कभी नहीं मानी गयी ।। १२ ।।

शम एव परो धर्मस्तमाचर पराशर । अधर्मिष्ठं वरिष्ठः सन् कुरुषे त्वं पराशर ।। १३ ।।

'पराशर! शान्त रहना ही (ब्राह्मणोंका) श्रेष्ठ धर्म है, अतः उसीका आचरण करो। तुम श्रेष्ठ ब्राह्मण होकर भी यह पापकर्म करते हो? ।। १३ ।।

शक्तिं चापि हि धर्मज्ञं नातिक्रान्तुमिहार्हसि ।
प्रजायाश्च ममोच्छेदं न चैवं कर्तुमर्हसि ।। १४ ।।

'तुम्हारे पिता शक्ति धर्मके ज्ञाता थे, तुम्हें (इस अधर्मकृत्यद्वारा) उनकी मर्यादाका उल्लंघन नहीं करना चाहिये। फिर मेरी संतानोंका विनाश करना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है ।। १४ ।।

शापाद्धि शक्तेर्वासिष्ठ तदा तदुपपादितम् । आत्मजेन स दोषेण शक्तिर्नीत इतो दिवम् ।। १५ ।।

वसिष्ठकुलभूषण ! शक्तिके शापसे ही उस समय वैसी दुर्घटना हो गयी थी। वे अपने ही अपराधसे इस लोकको छोड़कर स्वर्गवासी हुए हैं (इसमें राक्षसोंका कोई दोष नहीं है) ।। १५ ।।

न हि तं राक्षसः कश्चिच्छक्तो भक्षयितुं मुने । आत्मनैवात्मनस्तेन दृष्टो मृत्युस्तदाभवत् ।। १६ ।।

'मुने ! कोई भी राक्षस उन्हें खा नहीं सकता था। अपने ही शापसे (राजाको नरभक्षी राक्षस बना देनेके कारण) उन्हें उस समय अपनी मृत्यु देखनी पड़ी ।। १६ ।।

निमित्तभूतस्तत्रासीद् विश्वामित्रः पराशर । राजा कल्माषपादश्च दिवमारुह्य मोदते ।। १७ ।।

'पराशर ! विश्वामित्र तथा राजा कल्माषपाद भी इसमें निमित्तमात्र ही थे (तुम्हारे पूर्वजोंकी मृत्युमें तो प्रारब्ध ही प्रधान है)। इस समय तुम्हारे पिता शक्ति स्वर्गमें जाकर आनन्द भोगते हैं ।। १७ ।।

ये च शक्त्यवराः पुत्रा वसिष्ठस्य महामुने । ते च सर्वे मुदा युक्ता मोदन्ते सहिताः सुरैः ।। १८ ।।

'महामुने ! वसिष्ठजीके शक्तिसे छोटे जो पुत्र थे, वे सभी देवताओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक सुख भोग रहे हैं ।। १८ ।।

सर्वमेतद् वसिष्ठस्य विदितं वै महामुने । रक्षसां च समुच्छेद एष तात तपस्विनाम् ।। १९ ।।

निमित्तभूतस्त्वं चात्र क्रतौ वासिष्ठनन्दन । तत् सत्रं मुञ्च भद्रं ते समाप्तमिदमस्तु ते ।। २० ।।

'महर्षे! तुम्हारे पितामह वसिष्ठजीको ये सब बातें विदित हैं। तात शक्तिनन्दन ! तेजस्वी राक्षसोंके विनाशके लिये आयोजित इस यज्ञमें तुम भी निमित्तमात्र ही बने हो (वास्तवमें यह सब उन्हींके पूर्वकर्मोंका फल है)। अतः अब इस यज्ञको छोड़ दो। तुम्हारा कल्याण हो, तुम्हारे इस सत्रकी समाप्ति हो जानी चाहिये' ।। १९-२० ।।

गन्धर्व उवाच

एवमुक्तः पुलस्त्येन वसिष्ठेन च धीमता । तदा समापयामास सत्रं शाक्तो महामुनिः ।। २१ ।।

गन्धर्व कहता है- अर्जुन ! पुलस्त्यजी तथा परम बुद्धिमान् वसिष्ठजीके यों कहनेपर महामुनि शक्तिपुत्र पराशरने उसी समय यज्ञको समाप्त कर दिया ।। २१ ।।

सर्वराक्षससत्राय सम्भृतं पावकं तदा ।
उत्तरे हिमवत्पार्श्वे उत्ससर्ज महावने ।। २२ ।।

सम्पूर्ण राक्षसोंके विनाशके उद्देश्यसे किये जाने वाले उस सत्रके लिये जो अग्नि संचित की गयी थी, उसे उन्होंने उत्तरदिशामें हिमालयके आस-पासके विशाल वनमें छोड़ दिया ।। २२ ।।

स तत्राद्यापि रक्षांसि वृक्षानश्मन एव च ।
भक्षयन् दृश्यते वह्निः सदा पर्वणि पर्वणि ।। २३ ।।

वह अग्नि आज भी वहाँ सदा प्रत्येक पर्वके अवसरपर राक्षसों, वृक्षों और पत्थरोंको जलाती हुई देखी जाती है ।। २३ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वण्यौर्वोपाख्याने अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १८० ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें और्वोपाख्यानविषयक एक सौ अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १८० ।।

क्रमशः...
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🕉 मशीनों पर स्वास्तिक  बनाना क्यों है जरूरी? 🕉🕉 देवशिल्पी प्रजापति विश्वकर्मा की हवन विधि 🕉🕉🟨🕉🟨🕉 🟨🕉🟨🕉🟨 🕉🟨🕉🕉विश्वकर्मा पू...
16/09/2026

🕉 मशीनों पर स्वास्तिक बनाना क्यों है जरूरी? 🕉
🕉 देवशिल्पी प्रजापति विश्वकर्मा की हवन विधि 🕉
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विश्वकर्मा पूजा पर मशीनों पर स्वस्तिक बनाना क्यों है जरूरी?
जानें ‘ॐ’ और ‘शुभ-लाभ’ लिखने की मान्यता
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इस साल 17 सितंबर को विश्वकर्मा पूजा का पर्व श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाएगा। विश्वकर्मा पूजा के दौरान सबसे खास होता है- मशीनों पर स्वस्तिक बनाना। क्या आप जानते हैं कि मशीनों पर स्वस्तिक क्यों बनाया जाता है और इसके अलावा और क्या-क्या बनाया जाता है। आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं और इसके महत्व पर भी प्रकाश डालते हैं।

विश्वकर्मा पूजन के दिन कारखानों, दुकानों, कार्यालयों और अन्य कार्यस्थलों पर मशीनों पर स्वस्तिक बनाने का धार्मिक महत्व है। हिंदू धर्म में स्वस्तिक को सबसे पवित्र और शुभ चिन्ह माना गया है। स्वस्तिक शब्द ‘सु’ और ‘अस्ति’ से मिलकर बना है, जिसका अर्थ होता है ‘शुभ होना’ या ‘कल्याण होना’। किसी भी शुभ काम की शुरुआत स्वस्तिक बनाकर ही की जाती है।

विश्वकर्मा पूजा के दिन मशीनों पर रोली, कुमकुम और सिंदूर से स्वस्तिक बनाने के पीछे कई धार्मिक मान्यताएं हैं। पहला कारण यह है कि स्वस्तिक को भगवान श्री गणेश का प्रतीक माना जाता है। भगवान गणेश प्रथम पूज्य हैं और विघ्नहर्ता हैं। मशीन पर स्वस्तिक बनाने से मशीन के काम में किसी भी प्रकार की बाधा नहीं आती है और काम बिना किसी रुकावट के चलता रहता है।

दूसरा कारण समृद्धि से जुड़ा है। स्वस्तिक को धन की देवी लक्ष्मी का भी प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि जहां स्वस्तिक होता है वहां नकारात्मक ऊर्जा नहीं आती और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है। मशीन पर स्वस्तिक बनाने से कारोबार में वृद्धि होती है और आर्थिक समृद्धि आती है।

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण सुरक्षा है। कारीगर और मजदूर दिन भर मशीनों पर काम करते हैं। मशीन पर स्वस्तिक बनाकर वे अपनी सुरक्षा और मशीन की लंबी उम्र की कामना करते हैं ताकि पूरे साल कोई दुर्घटना न हो।

स्वस्तिक के अलावा भी विश्वकर्मा पूजा के दौरान मशीनों और औजारों पर कई तरह के शुभ चिन्ह बनाए जाते हैं। इसमें से एक ॐ का निशान है। कई जगह मशीनों पर ॐ लिखा जाता है। ॐ को ब्रह्मांड की ध्वनि और सृष्टि की ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। इसे बनाने से मशीन में दैवीय शक्ति का वास होता है।

वहीं, दूसरी जगह शुभ-लाभ भी लिखा जाता है। ये मशीनों, लेथ मशीन, ड्रिल मशीन और मुख्य गेट पर शुभ और लाभ लिखा जाता है। इसका अर्थ होता है कि भगवान विश्वकर्मा की कृपा से काम शुभ हो और उसमें लाभ हो। यह व्यापार में बरकत के लिए लिखा जाता है।

विश्वकर्मा पूजन के दौरान कई लोग कलावा या मौली भी बांधते है और पूजा के बाद मशीनों के हैंडल, स्विच और औजारों पर लाल रंग का कलावा या रक्षा सूत्र बांधा जाता है। इसे रक्षा कवच के रूप में देखा जाता है। इसके साथ ही मान्यता है कि कलावा बांधने से मशीन बुरी नजर से बची रहती है।

विश्वकर्मा पूजन के दौरान मशीनों पर तिलक और फूल-माला चढ़ाया जाता है। कारीगर सभी मशीनों को अच्छे से साफ करके उन पर हल्दी, कुमकुम और चंदन का तिलक लगाया जाता है। इसके बाद गेंदे या अन्य के फूलों की माला पहनाई जाती है। कई फैक्ट्रियों में मशीनों को नए कपड़े की तरह सजाया भी जाता है। साथ ही कुछ जगहों पर मशीनों पर हाथ की पांचों उंगलियों से रोली और चावल के छापे भी लगाए जाते हैं, जो मां लक्ष्मी के आगमन का प्रतीक होता है।

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🌷🌷 देवशिल्पी प्रजापति विश्वकर्मा हवन विधि 🌷🌷

सर्वप्रथम हवन सामग्री (जंवा,तिल आदि)एकत्र कर शांकल्य बनावे। अब यजमान हवन पात्र में अग्नि डालकर पहले अग्निदेव का स्थापन करेंगे –

अग्नि स्थापन : पुनस्त्वाऽऽदित्या रुद्रा व्वसव: समिन्धताम्पुनर्ब्ब्रह्माणो व्वसुनीथ यज्ञै: ।
घृतेन त्वन्तन्न्वं व्वर्धयस्व सत्त्या: सन्तु यजमानस्य कामा: ॥

अग्नि प्रज्वलित करके अग्निदेव को प्रणाम करें । अब अग्निदेव का पंचोपचार पूजन करे और अग्नि के रक्षार्थ लकड़ी डालकर हवन शुरू करे ।

ॐ पावकान्गयें नम: । इसके बाद
ॐ गं गणपतये स्वाहा । (३ आहुतियाँ )
ॐ सूर्यादि नवग्रहेभ्यों देवेभ्यों स्वाहा । ( १ आहुति )

फिर इन मंत्रो से हवन करें –
ॐ विश्वकर्मणे नमः स्वाहा। ॐ विश्वात्मने नमः स्वाहा।
ॐ विश्वस्माय नमः स्वाहा। ॐ विश्वधाराय नमः स्वाहा।
ॐ विश्वधर्माय नमः स्वाहा। ॐ विरजे नमः स्वाहा।
ॐ विश्वेक्ष्वराय नमः स्वाहा। ॐ विष्णवे नमः स्वाहा।
ॐ विश्वधराय नमः स्वाहा। ॐ विश्वकराय नमः स्वाहा।
ॐ वास्तोष्पतये नमः स्वाहा। ॐ विश्वभंराय नमः स्वाहा।
ॐ वर्मिणे नमः स्वाहा। ॐ वरदाय नमः स्वाहा।
ॐ विश्वेशाधिपतये नमः स्वाहा। ॐ वितलाय नमः स्वाहा।
ॐ विशभुंजाय नमः स्वाहा। ॐ विश्वव्यापिने नमः स्वाहा।
ॐ देवाय नमः स्वाहा। ॐ धार्मिणे नमः स्वाहा।
ॐ धीराय नमः स्वाहा। ॐ धराय नमः स्वाहा।
ॐ परात्मने नमः स्वाहा। ॐ पुरुषाय नमः स्वाहा।
ॐ धर्मात्मने नमः स्वाहा। ॐ श्वेतांगाय नमः स्वाहा।
ॐ श्वेतवस्त्राय नमः स्वाहा। ॐ हंसवाहनाय नमः स्वाहा।
ॐ त्रिगुणात्मने नमः स्वाहा। ॐ सत्यात्मने नमः स्वाहा।
ॐ गुणवल्लभाय नमः स्वाहा। ॐ भूकल्पाय नमः स्वाहा।
ॐ भूलेंकाय नमः स्वाहा। ॐ भुवलेकाय नमः स्वाहा।
ॐ चतुर्भुजय नमः स्वाहा। ॐ विश्वरुपाय नमः स्वाहा।
ॐ विश्वव्यापक नमः स्वाहा। ॐ अनन्ताय नमः स्वाहा।
ॐ अन्ताय नमः स्वाहा। ॐ आह्माने नमः स्वाहा।
ॐ अतलाय नमः स्वाहा। ॐ आघ्रात्मने नमः स्वाहा।
ॐ अनन्तमुखाय नमः स्वाहा। ॐ अनन्तभूजाय नमः स्वाहा।
ॐ अनन्तयक्षुय नमः स्वाहा। ॐ अनन्तकल्पाय नमः स्वाहा।
ॐ अनन्तशक्तिभूते नमः स्वाहा। ॐ अतिसूक्ष्माय नमः स्वाहा।

ॐ त्रिनेत्राय नमः स्वाहा। ॐ कंबीघराय नमः स्वाहा।
ॐ ज्ञानमुद्राय नमः स्वाहा। ॐ सूत्रात्मने नमः स्वाहा।
ॐ सूत्रधराय नमः स्वाहा। ॐ महलोकाय नमः स्वाहा।
ॐ जनलोकाय नमः स्वाहा। ॐ तषोलोकाय नमः स्वाहा।
ॐ सत्यकोकाय नमः स्वाहा। ॐ सुतलाय नमः स्वाहा।
ॐ सलातलाय नमः स्वाहा। ॐ महातलाय नमः स्वाहा।
ॐ रसातलाय नमः स्वाहा। ॐ पातालाय नमः स्वाहा।
ॐ मनुषपिणे नमः स्वाहा। ॐ त्वष्टे नमः स्वाहा।
ॐ देवज्ञाय नमः स्वाहा। ॐ पूर्णप्रभाय नमः स्वाहा।
ॐ ह्रदयवासिने नमः स्वाहा। ॐ दुष्टदमनाथ नमः स्वाहा।
ॐ देवधराय नमः स्वाहा। ॐ स्थिर कराय नमः स्वाहा।
ॐ वासपात्रे नमः स्वाहा। ॐ पूर्णानंदाय नमः स्वाहा।
ॐ सानन्दाय नमः स्वाहा। ॐ सर्वेश्वरांय नमः स्वाहा।
ॐ परमेश्वराय नमः स्वाहा। ॐ तेजात्मने नमः स्वाहा।
ॐ परमात्मने नमः स्वाहा। ॐ कृतिपतये नमः स्वाहा।
ॐ बृहद् स्मणय नमः स्वाहा। ॐ ब्रह्मांडाय नमः स्वाहा।
ॐ भुवनपतये नमः स्वाहा। ॐ त्रिभुवनाथ नमः स्वाहा।
ॐ सतातनाथ नमः स्वाहा। ॐ सर्वादये नमः स्वाहा।
ॐ कर्षापाय नमः स्वाहा। ॐ हर्षाय नमः स्वाहा।
ॐ सुखकत्रे नमः स्वाहा। ॐ दुखहर्त्रे नमः स्वाहा।
ॐ निर्विकल्पाय नमः स्वाहा। ॐ निर्विधाय नमः स्वाहा।
ॐ निस्माय नमः स्वाहा। ॐ निराधाराय नमः स्वाहा।
ॐ निकाकाराय नमः स्वाहा। ॐ महदुर्लभाय नमः स्वाहा।
ॐ निमोहाय नमः स्वाहा। ॐ शांतिमुर्तय नमः स्वाहा।
ॐ शांतिदात्रे नमः स्वाहा। ॐ मोक्षदात्रे नमः स्वाहा।
ॐ स्थवीराय नमः स्वाहा। ॐ सूक्ष्माय नमः स्वाहा।
ॐ निर्मोहय नमः स्वाहा। ॐ धराधराय नमः स्वाहा।
ॐ स्थूतिस्माय नमः स्वाहा। ॐ विश्वरक्षकाय नमः स्वाहा।
ॐ दुर्लभाय नमः स्वाहा। ॐ स्वर्गलोकाय नमः स्वाहा।
ॐ पंचवकत्राय नमः स्वाहा। ॐ विश्वलल्लभाय नमः स्वाहा।

अब अंत में-
ॐ सर्वतोभद्राय नमः स्वाहा । मंत्र से आहुति दे ।

स्विष्टकृत होम : जाने-अनजाने में हवन करते समय जो भी गलती हो गयी हो, उसके प्रायश्चित के रूप में गुड़ व घृत की आहुति दें ।

मंत्र–ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा, इदं अग्नये स्विष्टकृते न मम।।

बलिदान – अब यजमान अपने सामने चौमुखा दिया जलाकर किसी पात्र मे रखे व उड़द, दही को मिलाकर क्षेत्रपाल के लिए बलिदान देवे-

भो ! क्षेत्रपाल रक्ष बलि भक्षबलि अस्य यजमानस्य सकुटुंबस्य आयुःकर्ता,क्षेमकर्ता, शांतिकर्ता, तुष्टि कर्ता, पुष्टि कर्ता, निर्विघ्न कर्ता वर्दोभव॥ ( उड़द, दही को आमपत्र मे लेकर दशों दिशाओ मे रखे)

पूर्णाहुति होम : एक व्यक्ति हाथ में नारियल ले ले व अन्य सभी लोग नारियल का स्पर्श कर लें । जो घी की आहुति डाल रहे थे, वह निम्न मंत्र उच्चारण करते हुए नारियल के ऊपर घी की धारा डालें-

ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पुर्न्मेवावशिष्यते ॥

ॐ शांति: शांति: शांति: ।

भस्मधारणम : यज्ञकुंड से स्त्रुवा (जिससे घी की आहुति दी जा रही थी ) में भस्म लेकर सभी लोग स्वयं को तिलक करें ।

आरती : भगवान विश्वकर्मा जी की आरती करेंगे -

ऊँ जय श्री विश्वकर्मा प्रभु जय श्री विश्वकर्मा ।
सकल सृष्टि के कर्ता रक्षक श्रुति धर्मा ॥

आदि सृष्टि में विधि को, श्रुति उपदेश दिया ।
शिल्प शस्त्र का जग में,ज्ञान विकास किया ॥

ऋषि अंगिरा ने तप से, शांति नही पाई ।
ध्यान किया जब प्रभु का, सकल सिद्धि आई ॥

रोग ग्रस्त राजा ने, जब आश्रय लीना ।
संकट मोचन बनकर, दूर दुख कीना ॥

जब रथकार दम्पती, तुमरी टेर करी ।
सुनकर दीन प्रार्थना, विपत्ति हरी सगरी ॥

एकानन चतुरानन, पंचानन राजे ।
द्विभुज, चतुर्भुज, दशभुज, सकल रूप साजे ॥

ध्यान धरे जब पद का, सकल सिद्धि आवे ।
मन दुविधा मिट जावै, अटल शांति पावे ॥

श्री विश्वकर्मा जी की आरती, जो कोई नर गावे ।
कहत गजानन स्वामी, सुख सम्पत्ति पावै ॥

पुष्पांजलि – पुष्पाञ्जलि अर्पित करे –

ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥

नानासुगन्धिपुष्पाणि यथाकालोद्भवानि च ।
पुष्पाञ्जलिर्मया दत्तो गृहाण परमेश्वर ॥

प्रदक्षिणा- सभी लोग हवनकुंड की ३ परिक्रमा करें –

ॐ ये तीर्थानि प्रचरन्ति सृकाहस्ता निषङ्गिणः ।
तेषा ँ सहस्रयोजनेऽव धन्वानि तन्मसि।

यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च ।
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणया पदे पदे ॥

साष्टांग प्रणाम : सभी साष्टांग प्रणाम करेंगे ।

प्रार्थना : विश्व कल्याण के लिए हाथ जोडकर प्रार्थना करें –

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद दुःखभाग भवेत् ॥

क्षमा प्रार्थना व विसर्जन : पूजन आदि में जो गलतियाँ हो गयी हों , उनके लिए हाथ जोड़कर सभी लोग क्षमा प्रार्थना करें और थोड़े-से अक्षत लेकर देव स्थापन और हवन कुंड में निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करते हुए चढायें–

ॐ आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व देवशिल्पी॥

ॐ मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर।
यत्पूजितं माया देवं परिपूर्ण तदस्तु में ॥

ॐ गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ स्वस्थाने परमेश्वर।
यत्र ब्रम्हादयो देवा: तत्र गच्छ हुताशन ॥

कृतेनानेत विश्वकर्मा पूजन पद्धति
कर्मणा श्रीपरमेश्वर: प्रीयताम्, न मम।।

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🌷🌷 श्री विश्वकर्मा जयंती - पूजन पद्धति 🌷🌷▶️ कैसे शुरू हुई विश्वकर्मा पूजा की परंपरा? ◀️🕉🟨🕉🟨🕉🟨🕉🟨🕉🟨🕉🟨🕉🟨कैसे शुरू हुई विश्व...
16/09/2026

🌷🌷 श्री विश्वकर्मा जयंती - पूजन पद्धति 🌷🌷
▶️ कैसे शुरू हुई विश्वकर्मा पूजा की परंपरा? ◀️
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कैसे शुरू हुई विश्वकर्मा पूजा की परंपरा?
जानें भगवान विश्वकर्मा के जन्म और पौराणिक कथा की कहानी
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हिंदू धर्म में भगवान विश्वकर्मा को निर्माण, शिल्प, वास्तुकला और तकनीकी कला का देवता माना जाता है। हर साल विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर कारीगर, शिल्पकार, इंजीनियर, मजदूर, कारोबारी और औद्योगिक संस्थानों से जुड़े लोग भगवान विश्वकर्मा की आराधना करते हैं।

विश्वकर्मा पूजा की परंपरा सूर्य के कन्या राशि में प्रवेश करने से जुड़ी मानी जाती है। इस अवसर को कन्या संक्रांति कहा जाता है। इसी दिन भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित कर विधि-विधान से पूजा की जाती है। कारखानों, फैक्ट्रियों, दुकानों और औद्योगिक संस्थानों में विशेष आयोजन किए जाते हैं। पूजा के बाद औजारों और मशीनों को भी सम्मानपूर्वक पूजा जाता है। इस दिन मशीनों, औजारों, वाहनों और कार्यस्थल में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की साफ-सफाई कर उनकी पूजा की जाती है। मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने से कार्य में कुशलता, उन्नति और सफलता का आशीर्वाद मिलता है।

कई परंपराओं में विश्वकर्मा पूजा को भगवान विश्वकर्मा के प्राकट्य या जन्म से भी जोड़ा जाता है। हालांकि अलग-अलग धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में उनकी उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग विवरण मिलते हैं।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, सृष्टि के प्रारंभ में भगवान विष्णु क्षीर सागर में शेषनाग की शय्या पर विराजमान थे। उनकी नाभि से कमल प्रकट हुआ और इसी कमल से चार मुख वाले ब्रह्मा जी का प्राकट्य हुआ। भगवान ब्रह्मा से जुड़े वंशक्रम में वास्तुदेव का उल्लेख मिलता है। वास्तुदेव का विवाह अंगिरसी से हुआ और उनसे ऋषि विश्वकर्मा का जन्म माना जाता है।

मान्यता है कि विश्वकर्मा ने अपने पिता वास्तुदेव से वास्तुकला और निर्माण की विद्या प्राप्त की। आगे चलकर वे शिल्प एवं वास्तुकला के महान आचार्य बने। इसी कारण उन्हें देवताओं के दिव्य भवनों और विभिन्न अद्भुत निर्माणों का निर्माता माना गया।

पौराणिक कथाओं में भगवान विश्वकर्मा को कई महत्वपूर्ण दिव्य निर्माणों का श्रेय दिया जाता है। मान्यता है कि उन्होंने भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र, भगवान शिव का त्रिशूल और इंद्र का वज्र जैसे दिव्य अस्त्र तैयार किए थे। इसके अलावा, भगवान कृष्ण की द्वारिका नगरी और पांडवों की इंद्रप्रस्थ नगरी के निर्माण का संबंध भी विश्वकर्मा से जोड़ा जाता है।

पौराणिक कथाओं में पुष्पक विमान और सोने की लंका के निर्माण का उल्लेख भी मिलता है। एक कथा के अनुसार, भगवान शिव के लिए स्वर्ण महल का निर्माण विश्वकर्मा ने किया था। महल की पूजा के बाद रावण ने दक्षिणा के रूप में उसी महल को मांग लिया और उसे अपने अधिकार में ले लिया। इसी वजह से स्वर्ण लंका की कथा भी विश्वकर्मा से जुड़ी मानी जाती है।

प्राचीन समय में शिल्पकारों और निर्माण कार्य से जुड़े लोगों के बीच भगवान विश्वकर्मा की पूजा की परंपरा रही। समय के साथ यह परंपरा बढ़कर कारखानों, कंपनियों, दुकानों और विभिन्न तकनीकी क्षेत्रों तक पहुंच गई। आज विश्वकर्मा पूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि श्रम, कौशल, तकनीक और निर्माण कार्य के प्रति सम्मान का प्रतीक भी मानी जाती है।
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🌷🌷 श्री विश्वकर्मा जयंती पूजन पद्धति 🌷🌷

विश्वकर्मा जी ने ही देवताओं के घर, नगर, अस्त्र-शस्त्र आदि का निर्माण किया था। वे महान शिल्पकार थे। ऋग्वेद में उनका उल्लेख मिलता है। दो बाहु, चार बाहु और दस बाहु वाले तथा एक मुख, चार मुख एवं पंचमुख वाले भगवान विश्वकर्मा के अनेक रूपों का वर्णन पुराणों में मिलता है। इसके अलावा भी इनके पांच स्वरूपों का वर्णन मिलता है-

१- विराट विश्वकर्मा- सृष्टि के रचयिता ।
२- धर्मवंशी विश्वकर्मा- महान् शिल्प विज्ञान विधाता और प्रभात पुत्र।
३- अंगिरावंशी विश्वकर्मा- आदि विज्ञान विधाता वसु पुत्र ।
४- सुधन्वा विश्वकर्म- महान् शिल्पाचार्य विज्ञान जन्मदाता अथवी ऋषि के पौत्र।
५- भृंगुवंशी विश्वकर्मा- उत्कृष्ट शिल्प विज्ञानाचार्य (शुक्राचार्य के पौत्र)।

विश्वकर्मा की उत्पत्ति कैसे हुई?

ब्रह्मा से धर्म तथा धर्म से वास्तुदेव हुए, जो शिल्पशास्त्र के आदि प्रवर्तक थे। वास्तुदेव और उनकी पत्नि अंगिरसी से विश्वकर्मा उत्पन्न हुए थे। इसके अलावा भी स्कंद पुराण के अनुसार प्रभास और उनकी पत्नि भुवना ब्रह्मवादिनी (जो कि देव गुरु बृहस्पति की बहन थी) से भगवान विश्वकर्मा का जन्म हुआ।

सर्वप्रथम यजमान को पूर्वा या उत्तराभिमुख बैठाकर सामने चौक बनाकर उसके ऊपर गौरी-गणेश, नवग्रह , कलश स्थापित करे । अब

पवित्रीकरण: सबसे पहले यजमान अपने ऊपर और सभी सामाग्री पर पवित्र जल छिढ़के आचार्य मंत्र पढ़े-

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा ।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥

आचमन: निम्न मंत्र पढ़ते हुए तीन बार आचमन करें –

‘ॐ केशवाय नम:, ॐ नारायणाय नम:, ॐ माधवाय नम: ।

फिर यह मंत्र बोलते हुए हाथ धो लें – ॐ हृषीकेशाय नम: ।

तिलक : यजमान को तिलक करें –

ॐ चंदनस्य महत्पुण्यं पवित्रं पापनाशनम ।
आपदां हरते नित्यं लक्ष्मी: तिष्ठति सर्वदा ॥

रक्षासूत्र (मौली) बंधन : हाथ में मौली बाँध लें –

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वां प्रतिबंध्नामि रक्षे मा चल मा चल ॥

दीप पूजन : दीपक जला लें –

दीपो ज्योति: परं ब्रम्ह दीपो ज्योति: जनार्दन: ।
दीपो हरतु में पापं दीपज्योति: नमोऽस्तु ते ॥

गौरी- गणेश पूजन:
अक्षत-पुष्प लेकर गौरी- गणेशजी का स्मरण करें –

वक्रतुंड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोऽस्तु ते॥ (अक्षत–पुष्प चढ़ा दें )

कलश पूजन : हाथ में अक्षत-पुष्प लेकर कलश में ‘ॐ’ वं वरुणाय नम:’ कहते हुए वरुण देवता का तथा निम्न मंत्र पढ़ते हुए तीर्थों का आवाहन करें –

गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वति ।
नर्मदे सिंधु कावेरी जलेऽस्मिन सन्निधिं कुरु ॥

(अक्षत–पुष्प कलश के सामने चढ़ा दें )

कलश को तिलक करें , धुप व दीप दिखायें, पुष्प, बिल्वपत्र व दूर्वा, प्रसाद चढायें ।

नवग्रह: अब नवग्रह पूजन करें ।

संकल्प : हाथ में जल, अक्षत व पुष्प लेकर संकल्प करें –

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः…अमुक गोत्र अमुक नाम अहं ममोपात्तदुरितक्षयद्वारा श्रीपरमेश्वर प्रीत्यर्थं ममसम्पूर्ण मनोकामना सिध्यर्थ गौरी-गणेश सहित श्री विश्वकर्मा प्रतिष्ठा पूर्वक पूजनं करिष्ये ।

विश्वकर्मा पूजन प्रारम्भ-
अब विश्वकर्मा जी की प्रतिमा को जिस आसन पर बैठाना हो ,वँहा सुंदर रेशमी वस्त्र बिछाकर मूर्ति को अच्छी तरह से रखदें।

इसके बाद मूर्ति को यजमान दाँये हाथ से स्पर्श करते हुए प्राण प्रतिष्ठा करे । आचार्य मंत्र पढ़े –

ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं षं षं सं हं सः सोऽहं अस्या विश्वकर्मा प्रतिमायाः प्राणा इह प्राणाः । ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं षं षं सं हं सः सोऽहं अस्या विश्वकर्मा प्रतिमायाः जीव इह स्थितः । ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं षं षं सं हं सः सोऽहं अस्या विश्वकर्मा प्रतिमायाः सर्वेन्द्रियाणि वाङ्मन्स्त्वक्चक्षुः श्रोत्राजिह्वाघ्राण पाणिपाद पायूपस्थानि इहैवागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा ।

हॉंथों में पुष्प लेकर प्राणशक्ति का ध्यान करें-
रक्ताम्भोधिस्थपोतोल्लसदरुण सरोजाधिरूढाकराब्जै: पाशंकोदण्डमिक्षुद्भवगुणमणिमय्यंकुशंपञ्चबाणान्।

विभ्राणस्रक्कपालं त्रिनयनलसितापीनवक्षोरूहाढ्यां,देवीबालार्कवर्णभवतु सुखकरीप्राणांशक्ति: परान्न: ॥

पुनः यजमान हाथ में फूल को लेकर निम्न मंत्र द्वारा मूर्ति प्रतिष्ठापित करे-

ॐ मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञ ँसमिमं दधातु ।
विश्वे देवास इह मादयन्तामो३ प्रतिष्ठ ॥

एष वै प्रतिष्ठानाम यज्ञो यत्रौतेन यज्ञेन यजन्ते सर्व मे प्रतिष्ठितम्भवति ।।

फूल समर्पित करें ।
इस प्रकार प्राणप्रतिष्ठा कर विश्वकर्मा जी षोडशोपचार से पूजन करें।

ध्यान- अक्षत पुष्प लेकर भगवान विश्वकर्माजी का ध्यान करें-

भाद्रपदशुभशुक्लपक्षे प्रतिपदाप्रतिशोभितम् मातृभुवने सुतप्रभासे सिद्धिजनकंमोहितम्।

विश्वकर्माविधिविराटं पञ्चमुखप्रभुपूजितम् सर्वकर्मसुवन्दनंकुरु देवशिल्पीध्यायितम्॥

देवशिल्पिन् महाभाग देवनाम् कार्यसाधक। विश्वकर्मन् नमस्तूभ्यं सर्वाभीष्टप्रदायकम्॥

पुष्प विश्वकर्माजी को अर्पित करें ।
आवाहन-पुष्प लेकर विश्वकर्माजी का आवाहन करें-

ॐ दंशपाल महावीर सुचित्रकर्मकारक।
विश्वकृत् विश्वधृक् च त्वं वसना मानदण्डधृक्।
भो विश्वकर्मन्! इहागच्छ इह तिष्ठ,
अत्राधिष्ठानं कुरु कुरु मम पूजा गृहाण॥
आवाहयामि देवेशं विश्वकर्माणमिश्वरम्
मूर्ताऽमूर्तकरं देवं सर्वकर्तारमद्भुतम्।
त्रैलोक्यसूत्रकर्त्तारं द्विभुजं विश्वदर्शितम्
आगच्छ विश्वकर्मस्त्वं यज्ञेऽस्मिन् सन्निधो भव॥

आसन- पुष्प चढ़ावे-
नानारत्नविचित्रकं रमणिकं सिंहासनंतत्रासनं
रत्नसुवर्णयुक्तं मया दत्त देवं प्रतिगृहताम ॥

माणिक्यमञ्जुलमरीचिमनोज्ञपार्श्वं सान्द्रीभवन्मरकतावलिमेचकाभम् ।
मुक्तामणिप्रकरमेदुरितान्तरालं
रत्नासनं तव गृहाणअंगिरा सुतो ॥

पाद्य व अर्ध्य- रजत अथवा ताम्र पात्र में गङ्गाजल, चन्दन, पुष्प लेकर भगवन् का पाँव धुलाये व अर्ध्य प्रदान करें-

इदं पाद्य मया दत्त सर्वसुगंधसंयुक्तम् । गृहीत्वा विश्वकर्मेश प्रसन्नो भव वास्तुज॥

दिव्यौषधिरसोपेतं गन्ध-पुष्पाऽक्षतै: सह।
गृहाणाऽर्ध्यं मया दत्तं विश्वकर्मन् कृपां कुरु॥
आचमन- सुगंधवासितं दिव्यं निर्मलं सलिलं विभो। गृहाणाऽचमनं सौम्य विश्वकर्मन् कृपां कुरु॥

पञ्चामृतस्नान- पञ्चामृत से स्नान कराये-
ॐ पञ्च नद्य: सरस्वतीमपियन्ति सस्रोतस:।
सरस्वती तु पञ्चधा सोऽदेशे भवत्सरित् ॥

पञ्चामृतं मयानीतं पयो दधि घृतं मधु ।
शर्करा च समायुक्तं स्नानार्थं विश्वकर्मन् प्रतिगृह्यताम्॥

शुद्धोदकस्नान–शुद्ध जल से स्नान कराये-
ॐ यक्षकर्दमकाद्यैश्च स्नानं कुरू विश्वकर्मन् ।
अन्त्यं मलहरं शुद्धं सर्वसौगन्ध्य कारकम्॥

गंगाजलं समानीतं सर्वपापहरं शुभम्।
पूतं पयोऽथवा दिव्यं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥

वस्त्र- वस्त्र या मौलीधागा चढ़ाये-
वस्त्रयुग्मं गृहाण त्वमनर्घ्यं रक्तवर्णकम् ।
लोकलज्जाहरं चैव रचनाकर नमोऽस्तु ते ॥

उत्तरीयं सुचित्रं वै नभस्तारांकितं यथा।
गृहाण सर्वसिद्धीश मया दत्तं सुभक्तितः॥

यज्ञोपवीत- यज्ञोपवीत चढ़ाये-
उपवीतं विश्वकर्मन् गृहाण च ततः परम्।
त्रैगुण्यमयरूपं तु प्रणवग्रन्थिबन्धनम् ॥

यज्ञोपवीतं त्रिगुणस्वरूपं सौवर्णमेवं ह्यहिनाथभूतम् ।
भावेन दत्तं धर्मनन्दन तत्वं गृहाण भक्तोद्धृतिकारणाय ॥

अक्षत- अक्षत(पीला चाँवल) समर्पित करे-

ॐ अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रिया अधूषत ।
अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया मती योजान्विन्द्र ते हरी ॥

अक्षताश्च रचनाकर कुङ्कुम्युक्ताः सुशोभिताः ।
मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वर॥

पुष्पमाला- पुष्प और पुष्पमाला समर्पित करें –
गृहाण चम्पकमालतीनि जलपंकजानि स्थलपंकजानि भो विश्वकर्मन् ।
पुष्पोपरि त्वं मल्लिकादि पुष्पाणि नानाविधवृक्षजानि मन्दारशमीदलानि च॥

सौरभाणि सुमाल्यादीनि सुपुष्प रचितानि वै।
मया निवेदितान्यत्र शिल्पाचार्य सुगृह्यताम् ॥

दूर्वा- दूर्वाङ्कुर चढाये-
ॐ काण्डात्काण्डात्प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि।
एवा नो दूर्वे प्र तनु सहस्रेण शतेन च ॥

दूर्वाङ्कुरान् सुहरितानमृतान् मङ्गलप्रदान्।
आनीतांस्तव पूजार्थं गृहाण विश्वकर्मन्॥

तुलसीदल- तुलसीदल चढाये-
ॐ इदं व्विष्णुर्व्विचक्क्रमे ञ्रेधा निदधे पदम्।
समूढमस्य पा सुरे स्वाहा ॥

तुलसीं हेमरूपां च रत्नरूपां च मञ्जरीम्।
भवमोक्षप्रदां तुभ्यमर्पयामि विश्वकर्मन्॥

सिन्दूर अबीर गुलाल अष्टगन्ध – नानापरिमल द्रव्य समर्पित करे –
समायुक्तं गन्धं द्वादशांगेषु ते विश्वकर्मन् लेपयामि सुचित्रवत् ॥

रक्तचन्दनसंयुक्तानथ वा कुंकुमैर्युतान् ।
अक्षतान् शिल्पाचार्य त्वं गृहाण भालमण्डले ॥

धूप – धूप /(दशांग)दे-
दशांग गुग्गुलं धूपं सर्वसौरभकारकम् ।
गृहाण त्वं मया दत्तं अंगिरा सुतो ॥

ॐ धूरसि धूर्व धूर्वन्तं धूर्व तं योऽस्मान् धूर्वति तं धूर्व यं वयं धूर्वामः ।

देवानामसि वह्नितम ँ सस्नितमं पप्रितं जुष्टतमं देवहूतमम् ॥

दीप – दीप दिखाये-
नानाजातिभवं दीप गृहाण देवशिल्पिन्।
अज्ञानमलजं दोषं हरन्तं ज्योतिरूपकम् ॥

दीपं सुवर्त्या युतमादरात्ते दत्तं मया रचनाकर।
गृहाण नानाविधजं घृतादि -तैलादि -संभूतममोघदृष्टे ॥

हस्तप्रक्षालन – ॐ ह्रषिकेशाय नमः’ कहकर हाथ धो ले ।

नैवेद्य –नैवेद्य (प्रसाद) भगवान के आगे निवेदित करे-

चतुर्विधान्नसम्पन्नं मधुरं लड्डुकादिकम्।
नैवेद्यं ते मया दत्त भोजनं कुरू शिल्पी॥

चोष्यैश्च भक्ष्यनिवहैश्च करम्बितं ते
भोज्यं ददामि विश्वकर्मन् दिव्यमन्नम् ॥

‘नैवेद्यान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि’ । (जल समर्पित करे ।)

ऋतुफल- ऋतुफल नारियल अर्पित करे-

दाडिमं खर्जुरं द्राक्षां रम्भादीनि फलानि वै ।
गृहाण देवदेवेश नानामधुरकाणि तु ॥

इदं फलं मया देव स्थापितं पुरतस्तव । तेन मे सफलावाप्तिर्भवेज्जन्मनि जन्मनि ॥

‘फलान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि । (आचमनीय जल अर्पित करे।)

ताम्बूल- सुपारी, इलायची, लौंगसहित पान चढ़ाये-

अष्टांग देव ताम्बूलं गृहाण मुखवासनम्।
असकृद्शिल्पराज त्वं मया दत्तं विशेषतः ॥

पुंगीफल महद्दिव्यं नागवल्लीदलैर्युतम् ।
एलादिचूर्णसंयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम्॥

दक्षिणा – द्रव्य-दक्षिणा चढ़ाये-
दक्षिणां कांचनाद्यां तु नानाधातु समुद्भवाम्।
सौवर्ण -मुद्रादिक रत्नाद्यैः संयुतां गृहाण सकलप्रिय॥

हिरण्यगर्भगर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः ।
अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥

आरती-
भगवान विश्वकर्मा जी की आरती करेंगे -

आरार्तिका कर्पुरकादिभूतामपारदीपां प्रकरोमि पूर्णाम् ।
रचनाकर तां गृहाण ह्यज्ञानध्वान्तौघहरां निजानाम् ॥
ॐ आ रात्रि पार्थिव ँ रजः पितुरप्रायि धामभिः ।
दिवः सदा ँ सि बृहती वि तिष्ठस आ त्वेषं वर्तते तमः ॥

ऊँ जय श्री विश्वकर्मा प्रभु जय श्री विश्वकर्मा ।
सकल सृष्टि के कर्ता रक्षक श्रुति धर्मा ॥

आदि सृष्टि में विधि को, श्रुति उपदेश दिया ।
शिल्प शस्त्र का जग में,ज्ञान विकास किया ॥

ऋषि अंगिरा ने तप से, शांति नही पाई ।
ध्यान किया जब प्रभु का, सकल सिद्धि आई ॥

रोग ग्रस्त राजा ने, जब आश्रय लीना ।
संकट मोचन बनकर, दूर दुख कीना ॥

जब रथकार दम्पती, तुमरी टेर करी ।
सुनकर दीन प्रार्थना, विपत्ति हरी सगरी ॥

एकानन चतुरानन, पंचानन राजे ।
द्विभुज, चतुर्भुज, दशभुज, सकल रूप साजे ॥

ध्यान धरे जब पद का, सकल सिद्धि आवे ।
मन दुविधा मिट जावै, अटल शांति पावे ॥

श्री विश्वकर्मा जी की आरती, जो कोई नर गावे ।
कहत गजानन स्वामी, सुख सम्पत्ति पावै ॥

पुष्पांजलि – पुष्पाञ्जलि अर्पित करे –
ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥

नानासुगन्धिपुष्पाणि यथाकालोद्भवानि च ।
पुष्पाञ्जलिर्मया दत्तो गृहाण परमेश्वर ॥

प्रदक्षिणा- सभी लोग हवनकुंड की ३ परिक्रमा करें –

ॐ ये तीर्थानि प्रचरन्ति सृकाहस्ता निषङ्गिणः ।
तेषा ँ सहस्रयोजनेऽव धन्वानि तन्मसि।
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च ।
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणया पदे पदे ॥

साष्टांग प्रणाम : सभी साष्टांग प्रणाम करेंगे ।

प्रार्थना : विश्व कल्याण के लिए हाथ जोडकर प्रार्थना करें –

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद दुःखभाग भवेत् ॥

क्षमा प्रार्थना व विसर्जन :
हवन पूजन आदि में जो गलतियाँ हो गयी हों , उनके लिए हाथ जोड़कर सभी लोग क्षमा प्रार्थना करें और थोड़े-से अक्षत लेकर देव स्थापन और हवन कुंड में निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करते हुए चढायें–

ॐ आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व देवशिल्पी॥

ॐ मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर।
यत्पूजितं माया देवं परिपूर्ण तदस्तु में ॥

ॐ गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ स्वस्थाने परमेश्वर।
यत्र ब्रम्हादयो देवा: तत्र गच्छ हुताशन ॥

कृतेनानेत विश्वकर्मा पूजन पद्धति कर्मणा श्रीपरमेश्वर: प्रीयताम्, न मम।।

(आरती के बाद जल गिरा दे ।)
पूजन के बाद विविध प्रकार के औजारों और यंत्रों आदि की पूजा करें। अब श्रीविश्वकर्मा चालीसा व विश्वकर्माष्टकम् का पाठ करें। उसके बाद श्री विश्वकर्मा कथा का श्रवण करें।
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