11/06/2026
🙏🏻 जय श्रीहरिः 🙏 जय श्रीकृष्ण 🙏
🌷 मीरा चरित, विस्तार से (भाग 74) 🌷
मीराबाई के जीवन का यह भाग
उनकी अनन्य भक्ति, विरह की चरम अवस्था
और संसार से विरक्ति का वर्णन करता है।
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इस समय तक मीरा अपना सर्वस्व श्रीकृष्ण को समर्पित कर चुकी हैं और वे सांसारिक बंधनों को पीछे छोड़ चुकी हैं।
इस अध्याय की प्रमुख बातें और घटनाक्रम निम्नलिखित हैं:
विरह और व्याकुलता:
मीरा अपने प्राण-प्रियतम के वियोग में दिन-रात व्याकुल हैं। उनकी आँखों से अनवरत अश्रुधारा बहती है और वे हर क्षण अपने 'गिरधर' को पुकारती रहती हैं।
जोगिया (योगी) का भाव:
मीरा के पदों में विरह का दर्द छलक उठता है। वह कहती हैं कि 'जोगिया' (कृष्ण) से प्रीत करने पर केवल दुःख ही मिलता है। उनकी यह दशा हो गई है कि रात-दिन उन्हें चैन नहीं पड़ता और प्रभु के दर्शन के बिना उनके प्राण छटपटाने लगते हैं।
प्रकृति के माध्यम से पुकार:
मीरा पूर्णिमा के उमड़ते सागर को देखकर उससे भी अपने मन की व्यथा साझा करती हैं। वे समुद्र की विशालता और अपनी तड़प की तुलना करती हैं।
पूर्ण समर्पण:
मीरा राजसी ठाठ-बाट, आभूषणों और लोक-लाज का पूरी तरह त्याग कर चुकी हैं। वे संतों की संगति में भजन-कीर्तन में मग्न रहती हैं।
मीरा का एक प्रसिद्ध भजन जो इस भाव को व्यक्त करता है:
जोगिया से प्रीत कियाँ दुःख होई ।
प्रीत कियाँ सुख ना मोरी सजनी जोगी मीत न होई ।
रात दिवस कल नाहिं परत है तुम मिलियाँ बिन मोई ।।
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🌿 द्वारिका में मीरा घंटों सागर के तट पर खड़ी रहती। सागर की उत्ताल तरंगे उसे विभोर कर देती , किन्तु प्रिय - विरह उन्हें चैन न लेने देता । मीरा को वृन्दावन की उन रात्रियों का स्मरण हो आता , जब वह ललिता जू के संग गोवर्धन गिरि के कुञ्जों , यमुना पुलिन और वृंदा वीथियों में श्री श्यामसुन्दर की लीला दर्शन करती हुईं घूमती थी। मीरा सोचती ," वृन्दावन पहुँच कर तो लगता था , बस गन्तव्य आ गया। अब कहीं नहीं जाना , कुछ देखना सुनना बाकी नहीं रहा। किन्तु धणी का धणी कौन है ? अब ये द्वारिकाधीश कहाँ परदेस जा बसे कि प्राणों की पुकार सुनते ही नहीं , मेरे ह्रदय का क्रन्दन उन्हें क्यों सुनाई नहीं देता !! हाय यह मेरे प्राण इस पिण्ड ( शरीर ) में क्यों अटके हुए है ?? न तो प्रभु स्वयं दर्शन देते है और न ही कोई संदेश भिजवाते है !! क्यूँ न मैं कटारी ले कर स्वयं को समाप्त कर लूँ ?? बस एक बार आपके दर्शन की लालसा ने ही मेरे प्राण बाँध रखे है !!!"
🌿 मीरा की व्याकुलता दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जाती थी। और उसे शांत करने का एक ही उपाय था - सत्संग। संतों के दर्शन कर उनमें मानों नये प्राणों का संचार हो जाता था। वे स्वयं कहती......
🌿 श्याम बिन दुख: पावाँ सजनी कौन म्हाँने धीर बँधावे।........................................
साध संगत में भूल न जावे मूरख जनम गमावे।
मीरा तो प्रभु थाँरी सरणाँ जीव परम पद पावे॥
🌿 कभीकभी तो मीरा श्रीकृष्ण के विरह में यूँ अचेत हो जाती , मानों देह में प्राण ही न हो। दासियाँ रो उठती , किन्तु मंगला धीर धरकर कीर्तन करने को कहती।उनके संकीर्तन से वह सचेत तो हो जाती , पर उसकी पीड़ा देख वे पछताने लगती कि जब तक वह अचेत थी , पीड़ा भी शांत थी। शायद मूर्छा में प्रभु दर्शन का सुख पा रही हों !! सचेत होने पर वे कभी नील वर्ण सागर को अपना प्रियतम जानकर मिलने के लिए दौड़ पड़ती। और कभी गगन के नीले रंगों में घनश्याम को पकड़ने दोनों हाथ उठाकर उछल पड़ती। दिन तो जैसे तैसे साधु-संग ,भजन-कीर्तन में निकल जाता , किन्तु रात तो बैरिन ही होकर आती। मंगला बारम्बार समझाती ," बाईसा हुकम ! द्वारिकाधीश पधारते ही होंगे ! वे आपसे कैसे दूर रह सकते है ?आप थोड़ा धीरज धारण करें !"
🌿 मीरा प्रभु के विरह में उस मीन की तरह तड़फती , जिसे जल से बाहर निकाल दिया हो - " मंगला ! अब मैं उनके बिना कैसे रहूँ ? मेरा पल पल युग के समान बीत रहा है ? क्या उन्हें मेरी इस पीड़ा का अहसास भी है ?? मिलकर बिछुड़ना तो उनका खेल है ,पर मैं क्या करूँ ?? मैं चाहती तो हूँ कि वह जैसे , जिस हाल मैं मुझे रखें , उनकी प्रसन्नता में प्रसन्न रहूँ , किन्तु ......यह देह....... देह ही तो बाधा है !! पापी प्राण इतना कष्ट पाते हैं , पर देह का मोह छोड़कर निकलते क्यों नहीं???"
🌿 तुमरे कारण सब सुख छोड़या ,
अब मोहि क्यूँ तरसावौ हौ।
विरह व्यथा लागी उर अन्तर ,
सो तुम आय बुझावौ हौ ॥
🌿 अब छोड़त नहीं बणै प्रभुजी ,
हँसकर तुरत बुलावौ जी।
मीरा दासी जनम जनम की ,
अंग से अंग लगावौ जी ॥
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🌿 मीरा का प्राण प्रियतम श्री श्यामसुन्दर के लिए विरह प्रति दिन बढ़ता ही जा रहा था। एक दिन वह अचेत पड़ी थी। मुखाकृति भी पहचान में नहीं आती थी। मुख से झाग और आँखों से पानी निकल रहा था ।मीरा की तप्तकांचन वर्ण देह झुलसी कुमुदिनी के समान हो गई थी , पर सम्पूर्ण देह ऐसी फूली - सी लगती थी - जैसे उसमें पानी सा भर गया हो। मुख से भी अस्पष्ट स्वर निकलता । मीरा की ऐसी दशा देख दासियाँ अतिशय व्याकुल थीं - वे सब प्रयत्न करके भी स्थिति को संभाल पाने में असहाय थी।
🌿 सब मिल कर रोते हुए कण्ठ से प्रार्थना कर रही थी ," हे द्वारिका नाथ ! आपके भरोसे पर हम द्वारिका आई .....पर आप तो हमारी सुध ही नहीं ले रहे। हम तो जनम से अभागण है - जो ऐसी स्वामिनी पाकर भी न तो तुम्हारी भक्ति कर पाई और न ही हमसे इनकी उचित सेवा ही बन पड़ रही है ।इतने पर भी , हे जगन्नाथ ! किसी जन्म में हमसे भूल से भी कोई पुण्य बन गया हो तो कृपा कर हमारी स्वामिनी को दर्शन दो .......दर्शन दो ! हम असहायों का इस परदेस में तुम्हारे सिवा अब कौन अपना है जिसे हम अपना दुख बताये ?" यूँ प्रार्थना करते करते वे फूट फूट कर रो पड़ी।
🌿 उसी समय द्वार पर स्वर सुनाई दिया ," अलख !!"
" हे भगवान ! अब इस राजनगरी में कौन निरगुनिया आ गया ?" कहते हुए चमेली ने स्वागत के लिए द्वार खोला। उसने देखा - " यह तो आलौकिक साधु है। भगवा वस्त्र धारण किये ,सोलह - सत्रह वर्ष का साँवला सिलौना किशोर। " चमेली ठगी सी कुछ क्षण उसका तेजस्वी मुख दर्शन करती रही ।फिर प्रणाम कर खोये से स्वर में बोली - "पधारे भगवन ! आसन ग्रहण करें। आज्ञा करें , क्या सेवा करूँ ?"
" देवी ! तुम्हारा मुख म्लान है। कोई विपत्ति हो तो कहो। " सन्यासी ने स्निग्ध स्वर में कहा।
" आप हमारी क्या सहायता करेंगे , आप तो स्वयं बालक हैं ! हमारी विपत्ति असीम है !! और द्वारिकाधीश के अतिरिक्त उसका समाधान किसी के पास नहीं!!! " चमेली ने उदास और झुँझलाते हुए स्वर में कहा। तभी मंगला बाहर आई और सन्यासी को एकटक सी देखने लगी।
" क्या कोई नियम है कि सन्यासी को वृद्ध ही होना चाहिए अथवा यह कि ज्ञान बड़े - बूढ़ों की ही बपौती है ?" सन्यासी ने हँसते हुये कहा।
मंगला आगे बढ़ बात संभालते हुये बोली," नहीं प्रभु ! इसका ऐसा आशय नहीं था। वास्तव में हमारी स्वामिनी बहुत अस्वस्थ है और हम सब उनके जीवन से निराश है। बस मन व्यथित होने से किंकर्तव्यविमूढ़ हो रही है। हमसे कुछ अपराध हुआ हो तो क्षमा कीजिए। और भीतर पधार प्रसाद ग्रहण करें। "
🌿 " तुम्हारे दुख का कारण तुम्हारी स्वामिनी का रोग है । देखिए , जिस घर से मैं भिक्षा लूँ ,उस घर के लोग दुखी - व्यथित हो, यह मैं सह नहीं पाता।मैं केवल उन रूग्ना को देखना चाहता हूँ। यदि मेरी शक्ति की परिधि में हुआ तो अवश्य ही.......". यति ने वाक्य अधूरा छोड़ दिया।
''पधारें प्रभु !" मंगला नें उन्हें भीतर आने का संकेत किया।
योगी नें भीतर प्रवेश किया। मीरा को देख कर वह मुस्कुराया और सिर पर हाथ रख कुछ बड़बड़ाया।
आश्चर्य और प्रसन्नता से सबने देखा कि - मीरा की फूली हुई देह धीरेधीरे सामान्य होने लगी ।दो तीन घड़ी पश्चात ही मीरा उठ कर बैठ गयीं। जोगी ने सिरसे हाथ हटाकर स्निग्ध सवर में पूछा - "क्या हो गया तुम्हें ?"
यह कह यति खिलखिला कर हँस पड़ा।
🌿 मीरा किसी अपरिचित लेकिन अपनत्व से परिपूर्ण स्वर एवं स्पर्श को पा चौंक उस किशोर योगी को देखने लगी। यह......यह हँसी तो ब्रज में कई बार देखी सुनी है। मीरा के मुख से अनायास ही निकला ," श्याम .......सुन्दर !!!"
जोगी फिर हँसा ," नहीं ! मैं रमता जोगी। जैसा भेस , वैसी बात ! किन्तु देवी ! केवल मेरा वर्ण , मेरी सूरत आपके स्वामी से मिलती है , मैं वह हूँ नहीं। "
मीरा की आशा से चमक पड़ी आँखों में से फिर आँसू ढलक पड़े........
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🌿 *द्वारिका में , मीरा का श्री कृष्ण दर्शन के लिए विरह दिन प्रतिदिन बढ़ने से उनकी दासियाँ मीरा की असमान्य शारीरिक स्थिति को ले अत्यंत चिन्तित थी। एक दिन एक साँवरे नवकिशोर योगी के स्पर्श से और मन्त्र उच्चारण से मीरा स्वस्थता लाभ करती है ।मीरा को जोगी की हँसी और छवि में ठाकुर जी की ही अनुभूति होती है।*
🌿 *मीरा के पूछने पर जोगी सज़ग होकर बोला ," देवी ! मेरी सूरत आपके स्वामी से मिलती है , पर मैं वह नहीं ! यह तो माया एवं आपका प्रेम है देवी, जो आपको सर्वत्र प्रभु ही दिखाई देते है। पर , एक बात है कि आप सचमुच ही बडभागी हैं । आपकी व्याकुलता ने प्रभु को व्यथित कर दिया हैं । वे आपसे मिलने को वैसे ही व्याकुल हैं, जैसे आप व्याकुल हो रही हैं ।वे सर्वेश्वर, दयाधाम अपने जनों की पीड़ा सह नहीं पाते।'' कहते-कहते यति की आँखे भर आयी।*
*"आप..........आप कौन हैं......... मेरे उपकारी ??'' मीरा ने चकित, दुखित, पर प्रसन्न स्वर में पूछा ।*
*'' मैं उनका निजी सेवक .....!!.... प्रभु ने आपके लिए सन्देश पठाया हैं। '*
*'' क्या ? क्या कहा मेरे स्वामी ने ?............ क्या फरमाया हैं ? मेरे लिए कोई आदेश दिया है क्या प्रभु ने ? ''........कहते ही मीरा की आँखों से अश्रुधारा बह निकली । और कहा - '' क्या कहूँ ! मुझ अभागिन से उनकी आज्ञा का पालन पूरी तरह से नहीं हो पा रहा। मैं उनका वियोग प्रसन्न मन से नहीं झेल पा रही। निश्चय तो यही किया था कि जब स्वामी की आज्ञा शिरोधार्य की तो मुझे उसे प्रसन्न मुद्रा से निभाना भी चाहिए , पर बताओ , विरह में कैसे कोई प्रसन्न रह सकता है ?? पर...... मेरी बात छोड़े ....... मुझे कहिये , क्या सन्देश हैं प्रियतम का ? .....वे यदि न आना चाहे ,आने में कोई कष्ट हो ...........,बाधा हो तो कभी न आये ......मैं ऐसे ही जीवन के दिन पूरे कर लूँगी....... और फिर जीवन होता ही कितना हैं ??"*
🌿 *मीरा ने यति से स्नानकर प्रसाद पाने की प्रार्थना की ।और पीछे खड़े हुए सेवक वर्ग की ओर देख कर बोली - '' ये सब भी न जाने मेरी चिन्ता में कब से उपवास कर रहे हैं।"*
*मीरा एकदम से उठने लगी तो दोनों ओर से केसर और मंगला ने थाम लिया । चमेली शीघ्रतापूर्वक रसोई में चली गयी और किशन यति की सेवा में लगा । भोजन विश्राम के पश्चात मीरा ने यति के चरणों में प्रणाम किया - '' देव ! आप जो भी हो , आपने मुझे सांत्वना प्रदान की हैं। आप मेरे पति का सन्देश लेकर पधारे हैं, अतः आप मेरे पूज्य हैं। यधपि मेरे प्राण मेरे प्रियतम का सन्देश सुनने को आकुल हैं , फिर भी कोई सेवा स्वीकार करने की कृपा करे तो सेविका कृतार्थ होगी। ''*
*''सेवक की क्या सेवा देवी .......? स्वामी की प्रसन्नता ही उसका वेतन भी हैं और सेवा ही व्यसन ! आपकी यदि कोई इच्छा हो तो पूर्ण कर मैं स्वयं को बड़भागी अनुभव करूँगा ।''*
*अंधे को क्या चाहिये भगवन ! दो आँखे और चातक क्या चाहे - दो बूंद स्वाति जल !! मेरे आराध्य की चर्चा कर मुझे शीतलता प्रदान करे । क्या प्रभु कभी इस सेविका को याद करते हैं ?......क्या कभी दर्शन देकर कृतार्थ करने की चर्चा भी करते हैं?......*
*आप तो उनके अन्तरंग सेवक जान पड़ते हैं, अतः आपको अवश्य ज्ञात होगा कि उनको कैसे प्रसन्नता प्राप्त होती हैं ? उन्हें क्या रुचता हैं ? कैसे जन उन्हें प्रिय हैं ?? उनका स्वरुप, आभूषण वस्त्र..,उनकी पहनिया (पादुकायें ) ..... उनकी क्रियायें.......उनका हँसना - बोलना ......, भोजन क्या कहूँ उससे सम्बंधित प्रत्येक चर्चा मुझे मधुर पेय-सी लगती हैं - कि जिससे कभी पेट न भरे.....यह पिपासा कभी शांत नहीं होती। कृपा कर बस आप उनकी ही बात सुनाये । "*
🌿 *" देवी ! आपका नाम लेकर मेरे स्वामी एकांत में भी विह्वल हो जाते हैं। उनके वे कमलपत्र से दो नयन भर जाते हैं , कभी-कभी उनसे अश्रु मुक्ता भी ढलक पड़तें हैं। केवल लोक - कल्याण के लिए ही आपको परस्पर वियोग सहना पड़ रहा हैं।''*
*" मैं तो कोई लॊक-कल्याण नहीं करती योगीराज ! मुझे तो आपनी ही व्यथा से अवकाश नहीं हैं। औरों का भला मैं क्या कर पाऊँगी ।"*
🌿 *यति ने मधुर स्वर में कहा - " आप नहीं जानती पर आपकी इस देह से भक्ति भाव-परमाणु विकीर्ण होते हैं। वे ही कल्याण करते हैं। जो आपके पास आते हैं, आपका दर्शन करते हैं, सेवा करते हैं, संभाषण करते हैं, उन सबका कल्याण निश्चित हैं।।आप जिस स्थान का स्पर्श करती हैं, जहाँ थोड़ी देर के लिए भी निवास किया हो , वह स्थान इतना पवित्र हो जाता हैं, कि इसके स्पर्श मात्र से ही लोगो में भगवत्स्मृति जाग्रत हो जाएगी ।'*
🌿 *मीरा ने उन प्रशंसा पूर्ण शब्दों पर ध्यान न देते हुए सहज जिज्ञासा से यति से पूछा ," कोई ऐसा दिन आयेगा कि प्रभु मुझे दर्शन देने पधारेंगे ??? "कहते ही मीरा का गला भर आया और..... और रूँधे हुये कण्ठ से बोली....." मैं अपने विवाह के समय का उनका वह रूप भूल नहीं पाती । उसके बाद तो केवल एक बार ही दर्शन पा सकी ।सारी आयु रोते कलपते ही बीत गयी महाराज !" कहने के साथ ही नेत्रों से आँसुओ की झरी लग गयी...*
🌿 *"क्या कहूँ...... विधाता की गति जानी नहीं जाती । विधाता ने हिरण को इतने दीर्घ ,सुन्दर कजरारे नेत्र तो दिये लेकिन उनका उस वन में क्या प्रयोजन ? बगुले का श्वेत उज्जवल वर्ण होता है तो उसकी कण्ठ ध्वनि विचित्र सी होती है और कोयल चाहे काली होती है पर उसका कण्ठ कितना मधुर होता है !*
*इसी तरह नदी का जल मीठा और निर्मल रहता है तो समुद्र का जल विस्तृत पर खारा होता है! यह तो प्रारब्ध के खेल है कि किसके भाग्य में क्या आता है ? कहीं तो मूर्ख को भी इतना सम्मान और यश मिलता है और कहीं विद्वान को हाथ फैलाना पड़ता है ! इसी तरह महाराज मेरी भक्ति , कीर्ति का मेरे लिए उसका क्या प्रयोजन , जब मेरे प्रभु ने ही अभी मेरी भक्ति को स्वीकार नहीं किया !!!"*
🌿 राम कहिए, गोबिंद कहिये मेरे........राम कहिए, गोबिंद कहिये मेरे।
🌿संतो कर्म की गति न्यारी.संतो
बड़े बड़े नयन दिए मृगनको,
बन बन फिरत उठारी।
🌿उज्जवल बरन दीनि बगलन को,
कोयल करती निठारी।
संतो करम की गति न्यारी...
🌿और नदी पण जल निर्मल कीनी
समुंद्र कर दिनी खारी..संतो कर्म की गति न्यारी...
🌿मुर्ख को तुम राज दीयत हो,
पंडित फिरत भिखारी..
संतो कर्म की गति न्यारी.....संतो।।
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🌿 यति के वेश में श्री द्वारिकाधीश के दर्शन कर और अगले ही क्षण उनके आलोप हो जाने से व्याकुल मीरा रात दिन सोचती - " कितने ही दिन प्रभु के साथ रही, पर मैं अभागिन उन्हें पहचान नहीं पाई। उन्हें योगी समझकर दूर दूर ही रही। अच्छे से उनके चरणों में शीश भी नहीं निवाया। हे ठाकुर ! करूणा भी करने आये थे तो वह भी छल से.....! अगर स्वयं को प्रकट कर देते तो प्रभु आपकी करूणा में कुछ कमी हो जाती - " वह रोते रोते निहोरा देने लगी ।फिर मीरा के भाव ने करवट बदली और स्वयं की प्रीति में ही कमी पा कर बोली ," हा ! कहतें है कि सच्चा प्रेम तो अंधेरी रात में सौ पर्दों के पीछे भी अपने प्रेमास्पद को पहचान लेता है ।पर मुझ अभागिन में प्रेम होता तो उन्हें पहचानती न ? मुझमें प्रेम पाते तो वह योगी होने का नाटक क्यों करते ?अब मैं क्या करूँ , उन्हें कैसे पाऊँ ? क्या योगी भी एक स्थान पर अधिक देर तक कभी रूककर किसी के अपने हो पायें है ? "
🌿 जोगिया से प्रीत कियाँ दुख होई ।
प्रीत कियाँ सुख न मोरी सजनी जोगी मीत न होई।
रातदिवस कल नहिं परत है तुम मिलियाँ बिन मोई॥
ऐसी सूरत याँ जग माँही फेरि न देखि सोई।
मीरा रे प्रभु कब रे मिलोगे मिलियाँ आनन्द होई ॥
🌿 पूर्णिमा की उज्ज्वल रात्रि है। समुद्र के ज्वार को उमड़ते हुये देख मीरा उससे बातें करने लगी - " हे सागर ! तेरी दशा भी मुझ जैसी ही है।तू कितना भी उमड़े ,उत्ताल लहरें ले ,किन्तु चन्द्र तक की दूरी तय करना तेरे बस की बात नहीं - इसी तरह ,मेरे भी प्राणनाथ मुझसे दूर जा बसे हैं। मैं गुणहीन उन्हें कैसे रिझाऊँ ? पता नहीं , वह धाम कहाँ है जहाँ मेरे प्रभु विराजते है ?"
🌿 मीरा गम्भीर रात्रि में एकटक सागर की तरफ़ देखती रहती - " हे महाभाग्यवान रत्नाकर ! तुम स्वामी को कितने प्रिय हो ? ससुराल होने पर भी वह स्थाई रूप से तुम्हारे यहाँ ही रहना पसन्द करते हैं । इतना ही मानों पर्याप्त न हो , द्वारिका भी तुम्हारे ही बीच बसाई ।अपने प्रभु के प्रति तुम्हारा प्रेम असीमित है। सदा उनसे मिले होने पर भी तुम उनके मधुर नामों का गुणगान करते रहते हो। अहा ! मधुर नाम कीर्तन करते करते , उनके श्यामल स्वरूप का दर्शन करते करते तुम स्वयं उसी वर्ण के हो गये हो !!! तुम धन्य हो ,जो अपने प्रभु के रंग में रच बस गये हो , और मैं अभागिनी अपने प्रियतम के दर्शन से भी वंचित हूँ ।क्या तुम मेरा संदेश मेरे स्वामी तक पहुँचा दोगे ?"
🌿 " उनसे कहना कि एक दिन एक सुन्दर ,सुकुमार किशोर एक दिन ज़रीदार केसरिया वस्त्रों से सुशोभित अपने श्याम कर्ण अश्व पर सवार होकर मेरे पिता के द्वार पर आया था। मण्डप में बैठकर मेरे पिता ने उसके हाथ में मेरा कन्यादान किया। जब एकान्त कक्ष में मैंने उनके दर्शन किए तो..... वह रूप...... वह छवि उसका कैसे वर्णन करूँ ? हे सागर ! तुम्हारी तो फिर भी कोई सीमा ,कोई थाह होगी पर उनके रूप माधुर्य को किसी परिधि किसी उपमा में नहीं बाँधा जा सकता। क्या तुमने उनकी वे रतनारी अखियाँ देखी है ? क्या कभी उस अणियारी चितवन के तुमने दर्शन किये है ? क्या कहा ?? उसी चितवन से ही घायल हो कर रात्रि पर्यन्त हाहाकार करते हो ? सत्य कहते हो भैया !! उनकी मुस्कान से अधिक क्रूर कोई बधिक ( शिकारी ) नहीं सुना जाना ।इनकी चितवन की छुरी भी ऐसी जो उल्टी धार की - कि जो कण्ठ पर चलती ही रहे , छटपटाते युग बीत जायें ,पर न बलि - पशु मरे और न छुरी रूके ............ कहो तो यह कैसा व्यापार है ?"
🌿 " हाँ ....तो मैं तुम्हें बता रही थी कि मैं तो अभी उस रूप माधुरी की मात्र झाँकी ही कर पाई थी कि मुझे अथाह वियोग में ढकेल , मेरे प्रियतम , मेरे हथलेवे का चिन्ह , मेरी माँग का सिन्दूर सब न जाने कहाँ अन्तर्हित हो गये। हे रत्नाकर ! तुम उनसे कहना , मैं तबसे उस चितचोर की राह देख रही हूँ ! मेरा वह किशोर ,सुन्दर शरीर आयु के प्रहार से जर्जर हो गया है ,मेरे घुटनों तक लम्बे कृष्ण केश सफ़ेद हो गये है ,किन्तु आज भी मेरा मन उसी भोली किशोरी की भाँति अपने पति से मिलने की आशा संजोयें बैठा है ।तुम उनसे कहना ......कि यह विषम विरह तो कभी का इस देह को जला कर राख कर देता ,किन्तु दर्शन की आशा रूपी बरखा नेत्रों से झरकर उस विरह अग्नि को शीतल कर देती रही ।तुम उन द्वारिकाधीश मयूर मुकुटी से पूछना , तुमने कहीं उस निष्ठुर पुरूष को कहीं देखा है ? उसकी विरहणी की आँखें पथ जोहते जोहते धुँधलाने लगी है ..... देह जर्जर हो गई है .....आशा की डोर ने ही अब तो श्वासों को बाँध रखा है ..........पर.....अब यह वियोग और नहीं सहा जाता .....सागर से मन की बात करते वह गाने लगी.........
🌿 दूखण....... लागे नैन.....
दरस बिन .....दूखण लागे नैन.....
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🌿 द्वारिका में मीरा को सागर तट पर बैठे रहना , उससे अपने ह्रदय की बातें करना बहुत भाता था। वह घंटों तक समुद्र की लहरों को अपलक निहारा करती। कभी उसे लगता कि समुद्र के बीचोंबीच द्वारिका ऊपर उठ रही है। उसकी परिखा - द्वार से श्याम कर्ण अश्व पर सवार होकर मुस्कराते हुए श्यामसुन्दर पधार रहें है । हीरक जटित ऊँचा मुकुट , जिसमें लगा रत्नमय मयूर पंख अश्व की चाल से झूम जाता है। गले में विविध रत्नहारों के साथ वैजयन्ती पुष्प माल , कमर में बँधा नंदक खड्ग , कमरबन्द की झोली से झाँकता पाञ्चजन्य शंख , घुँघराली काली अलकावलि से आँखमिचौनी खेलते मकराकृत कुण्डल ,बाहों में जड़ाऊ भुजबन्द और करों में रत्न कंकण , केसरिया अंगरखा और वैसी ही धोती , वैसा ही ज़रीदार गुथे हुये मुक्ता का रेशमी दुपट्टा ,जो वायुवेग से पीछे की ओर फहरा रहा है। जैसे ही सागर की तरंगों पर दौड़ता हुआ अश्व आगे आया ,द्वारिकाधीश ने मुस्कराते हुये दाँया हाथ ऊपर उठाया - वैसे ही मीरा उतावली हो सम्मुख दौड़ पड़ी - " स्वामी ! ..... मेरे प्राणनाथ !!! पधार गये आप......??? कहकर वह दौड़ती हुई ही अपने यहाँ गाये जाने वाले लोकगीत गाने लगी........"
🌿केसरिया बालमा हालो नी ,
पधारो म्हाँरो देस.........🌿
🌿 अरे..... मैं केसर के घोल से प्रियतम के पथ का मार्जन करूँ ,याँ मोतियन के चौक पुरा कर उनके स्वागत में रंगोली बनाऊँ ? अरी सखी !! पहले मैं गजमुक्ता के थाल भर कर अपने प्राणधन की नज़र तो उतार लूँ !!! आज बरसों के पश्चात मेरे स्वामी घर पधारे हैं। "
प्राणप्रियतम से मिलने की उत्सुकता में त्वराधिक्य के कारण मीरा जल में जा गिरती ,इसके पूर्व ही घोड़े की लगाम खिंच गई ,घोड़े के आगे के दोनों पैर ऊपर उठ गये। विद्युत की गति से वे अश्व से कूदे ,और दो सशक्त भुजाओं ने मीरा को आगे बढ़कर थाम लिया ।मीरा उनका हाथ पकड़े हुए ही घर आई। आते ही मीरा ने पुकारा..... " ललिता ! देख ,देख प्रभु पधारे हैं ! शीघ्रता पूर्वक भोग की तैयारी कर !! वह हर्ष से बावली होकर गाने लगी...........
🌿 साजन म्हाँरे घर आया हो ।
जुगाँ जुगाँ मग जोवती विरहिणी पिव पाया हो॥
रतन कराँ निछावराँ ले आरती साजाँ हो।
मीरा रे सुख सागराँ म्हाँरे सीस बिराजाँ हो॥
🌿 मिलन की उछाह में वह दिन रात भूल जाती , भूल जाती कि वह साधक वेश में निर्धन जीवन बिता रही है। मीरा सेवक - सेविकाओं को राजसी प्रबन्ध की आज्ञा देतीं। वह कई कई दिनों तक इस आनन्द में निमग्न रहती। अपने प्राण-सखा के साथ वह हँस हँसकर झूले पर बैठी बातें करती न थकती। ऐसे में कोई वृद्ध संत आ जाते तो वह एकदम झूले से उठकर घूँघट डाल तिरछी खड़ी हो जाती ।
" घूँघट किससे किया माँ ? मैं तो आपका बालक हूँ। " वह कहते।
तो मीरा श्यामसुन्दर की ओर ओट करके मुस्कुरा कर लाज भरे नयनों से झूले की तरफ़ संकेत कर देती। इन दिनों घर में एक महोत्सव सा छाया रहता। मीरा के उस भावावेश के आनन्द में सब आनन्दित रहते।
🌿 शंकर और किशन सेठों की दूकान पर काम करने जाते। उन्हें जो वेतन मिलता , उसी से साधु - सेवा और घर खर्च चलता। मीरा नित्य नियमपूर्वक द्वारिकाधीश के मन्दिर में प्रातः-सांय दर्शन भजन करने पधारती। सांयकाल नृत्य-गान अवश्य होता। भजनों की चौपड़ी ललिता चमेली के पास ही रहती। एक दो बार तो वह भावावेश में समुद्र में जा गिरी , सेविकाओं की सावधानी काम आई। उन्होंने समुद्र तट से दूर घर लेकर रहना प्रारम्भ किया। किन्तु मीरा के प्राण तो जैसे समुद्र में ही बसते थे। सूर्योदय ,सूर्यास्त, पूर्णिमा का ज़वार और शुक्ल पक्ष की रात्रियों में सागर दर्शन उन्हें बहुत प्रिय था। कभीकभी तो रात में भजन-कीर्तन का आयोजन भी समुद्र तट पर ही होता।
🌿 एक रात मीरा सागर तट पर बैठी थी। उसके पीछे ही कुछ दूर मंगला और किशन भी शीतल मंद बयार ( पवन ) के झोंकों के कारण नींद लेने लगे ।तभी मीरा ने चौंककर देखा , कि सामने खड़ी एक रूपसी नारी झुककर आदर पूर्वक उसका कर स्पर्श करते हुए धीमे स्वर में बोली ," तनिक मेरे साथ पधारने की कृपा करें !"
मीरा यन्त्रवत सी उठकर चल दी। जल के समीप पहुँच कर उसने अपनी दाहिनी हथेली बढ़ाई ,तो मीरा ने उसका आशय समझ उसका हाथ थाम लिया।उसका हाथ पकड़ वह जल पर भूमि की भांति चलने लगी ।कुछ ही दूर चलने पर मीरा ने देखा कि जल में से द्वारिका की स्वर्ण परिखा ऊपर उठ रही है।द्वार के आसपास का जल शांत था - मीरा ने अनुभव किया कि पाँवो के तले जल की कोमलता तो है पर न तो पाँव डूब रहे है और न ही वस्त्र गीले। समीप पहुँचते ही परिखा के स्फटिक द्वार के स्वर्ण कपाट संगीतमय ध्वनि करते खुल गये ।भीतर प्रवेश करते ही मीरा आश्चर्य से स्तब्ध सी रह गई। भूमि स्वर्णम