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समुद्र मंथन कहाँ हुआ था.?यदि स्थूल दृष्टि से देखा जाय तो शायद अरब सागर में कहीं। लेकिन ऐसा नहीं है। किसी भी घटना के सही ...
10/01/2026

समुद्र मंथन कहाँ हुआ था.?

यदि स्थूल दृष्टि से देखा जाय तो शायद अरब सागर में कहीं। लेकिन ऐसा नहीं है। किसी भी घटना के सही स्थान का पता करने हेतु उस समय की भौगौलिक स्थिति का पता होना भी जरूरी है।
ग्रंथों में गहरे घुसेंगे तो पता चलेगा कि बिहार, बंगाल, झारखण्ड, उड़ीसा आदि समुद्र मंथन के समय जलमग्न थे। और उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से भी उस समय थे नहीं।समुद्रमंथन का समय भागीरथी के प्रादुर्भाव से भी बहुत पहले का है। उस समय हिमालय से निकलने वाली नदियाँ बहुत थोड़ी ही भूमि का निर्माण कर पाई थी। नदियाँ ही भूमि का निर्माण करती हैं।
राष्ट्र के पिता पर्वत हैं तो माता नदियाँ। अभी भी सबसे प्रसिद्ध डेल्टा सुंदरवन इसी निर्माण का प्रमाण है। कथा है कि जब समुद्रमंथन की बात उठी तो मंदार पर्वत की मथानी तो बना ली गई, कूर्मावतार ने आधार भी दे दिया, लेकिन मथानी की रस्सी कहाँ से लाएँ।उस समय सर्वसम्मति बनी कि हिमालय की कंदराओं में आराम कर रहे नागराज वासुकि से ही यह काम करवाया जा सकता है। उनसे बड़ी रस्सी जैसी कोई वस्तु तीनों लोग और चौदहों भुवन में नहीं हैं।अब समस्या थी कि उन्हें लाए कौन? इतने बड़े थे कि लहरिया स्टाइल में रेंगते तो टकराने लगते। इसलिये अधिकतर समय आराम ही करते थे। इस पर कैलाशपति उठे और वासुकि को अपनी कलाई में लपेट कर चल दिये। नागराज को लाकर के भोलेनाथ एक स्थान पर बैठ गए।जब मंथन प्रारम्भ हुआ तो नागराज को पीड़ा होने लगी। इधर से देवता खींचें, उधर से असुर खींचें, बीच में मंदराचल चुभे। क्षुब्ध होकर नागराज ने फुफकारना शुरू कर दिया।अब सोचिये कि जिस नाग को एक पर्वत के चारों तरफ लपेट दिया गया, वह कितना बड़ा होगा। नागराज के फुफकारने से समस्त सृष्टि में जहर फैलने लगा। हाहाकार मच गया।एक तरफ तो देवता और असुर भाग खड़े हुए और दूसरी तरह नागराज निढाल होकर फुफकारते रह गए। अब करें तो करें क्या?
देवताओं की सभा बिठाई गई। प्रश्न उठा कि इस हलाहल को कौन पियेगा?
विष्णु भगवान ने भोले बाबा के चरण धर लिये कि बाबा आप ही पी सकते हैं।जो भोले होते हैं, उनके हिस्से ही जहर आता है। बाबा उठे और पहले जहर पिया और फिर वासुकि का उपचार किया। तब तक तो धन्वंतरि निकले भी नहीं थे। उनसे भी पुराने वैद्य हैं, "वैद्यनाथ।बाबा ने हलाहल पी तो लिया लेकिन उसका ताप असह्य हो गया। वहीँ एक स्थान देखकर बैठ गए। मंथन शुरू हो गया। मंथन से निकले चन्द्रमा के एक टुकड़े को तोड़ कर निकाला गया और उसे भगवान के सर के ठीक ऊपर स्थापित किया गया। उस टुकड़े से निरंतर शीतल जल महादेव के सर पर गिरता रहता है।
यह क्षेत्र कहाँ है जहाँ मंथन हुआ था? बिहार के बाँका जिले में स्थित मंदार पर्वत के आसपास का क्षेत्र ही मंथन का स्थान है। आज भी झारखण्ड, बंगाल, उड़ीसा और बिहार की भूमि में खनिजों का प्रचुर भण्डार है।सबका केंद्र मंदार पर्वत ही है। मंदार में अब भी समुद्र मंथन से निकली निधियाँ छिपी हुई हैं। भोलेनाथ नागराज को पहुँचाने के बाद जिस स्थान पर बैठे थे, वह स्थान है वासुकीनाथ। जिस स्थान पर नागराज का उपचार करने व विष ग्रहण करने के बाद बैठे थे, वह स्थान है वैद्यनाथ धाम, देवघर में।कहते हैं चाँद का वह टुकड़ा जो उनके सर पर लगाया गया था, आज भी लगा है और उससे निरंतर जल टपकता रहता है। वह टुकड़ा भोलेनाथ के ठीक ऊपर मंदिर के शिखर के नीचे लगा है। नाम है - चंद्रकांत मणि।
("शिवः अविनाशी च सत्यं शाश्वतम्")
भगवान शिव ही अविनाशी और शास्वत है।
जयति जयति जय पुण्य सनातन संस्कृति,जयति जयति जय पुण्य भारतभूमि,सदासुमङ्गल जय जय श्री राम! हर हर महादेव!!
जय सिया राम

03/01/2026

.🌞🪷❤️💙💛🪷🌞
कभी-कभी जीवन ऐसा मोड़ ले लेता है, जहाँ सब कुछ होते हुए भी मन खाली हो जाता है। घर वही होता है, रिश्ते वही होते हैं, पर भीतर सबकुछ टूट चुका होता है।
इंसान पूछता है —“मैंने क्या गलती की थी?”और उत्तर मिलता है —“तुमने कुछ भी गलत नहीं किया, तुम बस इंसान हो।”

यहीं से रामायण शुरू होती है, किसी कथा की तरह नहीं, एक आईने की तरह।
1. पहला मंत्र है- शांति परिस्थिति बदलने से नहीं, बल्कि दृष्टि बदलने से आती है।
भगवान राम को 14 वर्ष का वनवास मिला। राज्य छिन गया, सिंहासन चला गया, पर उन्होंने कभी शिकायत नहीं की।
क्यों?
क्योंकि उन्होंने जीवन से लड़ना नहीं, जीवन को समझना सीख लिया था।
रामायण सिखाती है कि समय ने तुमसे क्या छीना है, ये मत देखो, तुम्हारे भीतर क्या बचा है, ये देखो।

2. दूसरा मंत्र — सेवा अहंकार का सबसे बड़ा उपचार है।
हनुमान जी के पास सब कुछ था —विद्या, शक्ति, बुद्धि, गति। फिर भी उन्होंने कहा —“मैं कुछ नहीं, सब कुछ राम हैं।”
यही कारण है कि आज भी जब कोई टूट जाता है, तो वह रामजी को नहीं, हनुमानजी को पुकारता है।

रामायण कहती है — तुम जितना खुद को बड़ा मानोगे, उतना अकेले ही रह जाओगे, और जितना खुद को साधारण मानोगे, उतना महान बनोगे।

3. तीसरा मंत्र — सीता धैर्य की नहीं, आत्मबल की मूर्ति हैं।
सीता माता ने अग्नि में प्रवेश किया। पर उनके मन में कभी द्वेष नहीं आया। उन्होंने यह नहीं पूछा —“मेरे साथ ही ऐसा क्यों किया जा रहा है ?” उन्होंने यह सोचा —“शायद इसी से मैं और दृढ़ बनूँ।”
आज जब कोई स्त्री टूटती है, तो रामायण उसे चुपचाप कहती है —
“तू सीता जैसी मजबूत है, तू हारने के लिए बनी ही नहीं।”

4. चौथा मंत्र — क्रोध में लिया गया निर्णय जीवन को जलाता है।
रावण बहुत ज्ञानी था, पर उसने क्रोध में एक निर्णय लिया और उसका पूरा जीवन भस्म हो गया।
रामायण सिखाती है —“क्रोध बुद्धि से तेज होता है, और बुद्धिहीन शक्ति विनाश का कारण बनती है।”
जो व्यक्ति गुस्से को जीत लेता है, वह आधी युद्ध-भूमि वहीं जीत चुका होता है।

5. पाँचवाँ मंत्र — जीवन की असली सुंदरता शोर में नहीं, मौन में छुपी होती है
आज हम हर पल भाग रहे हैं —फोन के पीछे, पैसों के पीछे, लोगों की राय के पीछे।

लेकिन रामायण धीरे से कहती है —“जब तुम रुकते हो, तभी तुम खुद से मिलते हो।” श्रीराम का वनवास एक सजा नहीं था, वह आत्म-खोज का रास्ता था।

रामायण कोई धार्मिक पुस्तक नहीं, यह टूटी हुई आत्माओं का पुनर्निर्माण ग्रंथ है।
यह हमें यह नहीं सिखाती कि दुनिया कैसे बदली जाए। यह सिखाती है कि खुद को कैसे संभाला जाए।
🙏🙏🌹🌹*🙏🏻🌞🪷🪷🌞🙏🏻*

*💥 #संसार में सुखी कौन है...... बहुत ही ज्ञानवर्धक लेख जरूर पढे।*➖➖➖➖➖➖➖➖*आत्म का कल्याण मनुष्य के मन और विचारों पर निर्...
02/01/2026

*💥 #संसार में सुखी कौन है...... बहुत ही ज्ञानवर्धक लेख जरूर पढे।*
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*आत्म का कल्याण मनुष्य के मन और विचारों पर निर्भर है !*
*जब तक मन साफ नहीं,भक्ति का भी कोई महत्व नहीं।*
*जैसे पानी के हिलते रहने से उसमें सूर्य का प्रतिबिम्ब दिखाई नहीं पड़ता है,*
*उसी प्रकार जब तक मन में कामनाओं और वासनाओं की चंचलता रहती है, तब तक उसमें ईश्वर का प्रतिबिम्ब नहीं ठहर सकता है।*
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एक बार एक राजा विदेश को गया। जब उसने वापस देश लौटने का विचार बनाया तो घर में अपनी चारों रानियों को अलग-अलग पत्र लिखकर पूछा कि विदेश से उनकी आवश्यकता की कौन सी वस्तु उनके लिए लाई जाय? उनमें से तीन रानियों ने अपने पसंद की वस्तु लिखकर वापस राजा के पास पत्र भिजवा दिये, किन्तु जो सबसे छोटी रानी थी, उसने सिर्फ 1 लिखकर पत्र वापस भिजवा दिया। राजा ने चारों चिट्ठियों को पढ़ा । किसी रानी ने वस्त्र लिखे थे, किसी ने आभूषण लिखे थे, किसी ने खाने पीने की वस्तु लिखी थीं। राजा विदेश से वापस आया और जिस रानी ने जो वस्तु लिखी थी, वह उसके पास पहुंचा दी। सबसे छोटी रानी ने 1 लिखकर पत्र भेजा था, राजा इसका आशय नहीं समझ पाया। वह छोटी रानी के महल में गया और पूछा -- प्रिये! आपने 1 लिखकर हमें विस्मय में डाल दिया। आप इसका आशय स्पष्ट करें । रानी ने कहा-- महाराज ! मुझे तो किसी सांसारिक वस्तु की आवश्यकता नहीं थी, मुझे तो एक आप ही चाहिए थे, वो मिल गये हैं । राजा रानी के अतिशय प्रेम को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। छोटी रानी ने माया को नहीं चाहा, बल्कि मायापति को चाहा तो उसे राजा मिल गये🔹🔹🔹🔹🔹🔹
ऐसे ही जो संसार की माया चाहता है, वह सांसारिक पदार्थों में सुख को खोजता रहता है, किन्तु उसे मृग-मरीचिका की भाँति संसार में सुख नहीं मिलता है, क्योंकि सांसारिक पदार्थ नाशवान् हैं । संसार के भोगों से हमारी कभी तृप्ति नहीं हो सकती।
भर्तृहरि जी कहते हैं💠🔹💠

भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः
तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः।
कालो न यातो वयमेव याताः
तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः
🔹💠🔹💠🔹💠🔹💠
अर्थात् 'हमने विषयों को कभी नहीं भोगा, बल्कि विषयों ने ही हमें भोग लिया। हमने तपस्या भी नहीं की, चिन्तन में ही समय को गँवा दिया। हमसे कभी काल भी व्यतीत न हुआ, बल्कि हम ही उल्टे व्यतीत हो गये। फिर भी हमारी तृष्णाओं का अन्त नहीं हुआ और देखते-देखते हम बूढ़े हो गये।'🔹🔹🔹🔹🔹
तात्पर्य यह है कि मनुष्य जब तक नश्वर भोगों में सुख खोजेगा, तब तक उसको कभी स्वप्न में भी विश्राम नहीं मिलेगा। एक परमात्मा का आश्रय लेने से ही उसे शान्ति का सुगम मार्ग दिखलाई पड़ेगा।
संतप्रवर पूज्य रामचन्द्र🙏 केशव डोंगरे जी महाराज कहते थे🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹
💗लक्ष्मी 💗अकेली आती है तो रुलाती है, किन्तु जब ठाकुर जी साथ आते हैं तभी वह हमें प्रसन्नता देती है ।
जैसे शून्य के पीछे एक नहीं हो तो कितने भी शून्य लगा दें, उनका महत्व नहीं है, ऐसे ही जीवन में जब तक परमात्मा का स्थान नहीं है, तब तक समस्त भोग पदार्थ हमें नाश की ओर ले जाने वाले ही होंगे।
🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹
दीन कहे धनवान सुखी🤗,
धनवान कहे सुखी राजा हमारा
राजा कहे महाराजा सुखी💠
महाराजा कहे सुखी इन्द्र प्यारा
इन्द्र कहे ब्रह्मा हैं सुखी🤗
और ब्रह्मा कहे सुखी 💠पालनहारा 💠
🙏विष्णु🙏कहें एक भक्त सुखी,
बाकी सब दुखिया है संसारा।।
🌷नारायण नारायण 🌷
🙏🏻लक्ष्मीनारायण भगवान की जय 🙏🏻

_🌷🌷जय_जय_
_श्रीԶเधे_Զเधे🌷🌷_
_जय_श्रीकृष्ण_जी💐👏💖_

_जय श्रीराधेकृष्ण जी🌷🙏💕_

_🙏🌷जय जय श्रीराधेय्य्य्य राधेय्य्य्यय्य्य्य्य्🌷🙏_

_प्रणाम 🙏🙏_

जब भगवान ने खुद ली धन्नाजी की परीक्षा ------- एक बार ठाकुर जी ने खुद ही धन्ना जी की परीक्षा लेनी चाही. , धन्ना जी के गाँ...
02/01/2026

जब भगवान ने खुद ली धन्नाजी की परीक्षा ------- एक बार ठाकुर जी ने खुद ही धन्ना जी की परीक्षा लेनी चाही. , धन्ना जी के गाँव में अकाल पद गया था और फिर भी धन्ना जी पूरे गाँव और साधु संतों को खाना खिला रहे थे और गरीबों में अनाज बाँट रहे थे. लेकिन धीरे धीरे उनका भी भी भण्डार समाप्त होने लगा., उस वक़्त भी धन्ना जी ने इस बात का निर्णय लिया कि जब तक वो सक्षम हैं तब तक उनसे जो हो सकेगा वो करेंगे. उनकी सेवा से प्रसन्ना होकर ठाकुर जी खुद एक संत के रूप में उनके यहाँ आए और एक बीज दिया औ बोले कि इस बीज को जाकर खेत में लगा आओ और उससे जो भी मिलेगा उसे गाँव वालों में बाँट देना. उन्होंने ऐसा ही किया लेकिन गावीं वाले उन्हें पागल कह रहे थे कि इस सूखे में आखिर कौन सी फसल होगी. मगर फसल जब हुई तो लोगों के अस्चर्या का ठिकाना न रहा. कह्तों में फसल लहरा रही थी. एक दिन ऐसा आया जब धन्नाजी खेतों में लगी फसल पक गयी, धन्ना सेठ के खेत में बड़े-बड़े तुम्बा के फल दिख रहे थे. धन्नाजी से सोचा अब दान करने को तो कुछ है नहीं, अब इन तुंबा से कमंडल बनाकर संतो को दिया करेंगे. धन्नाजी खेतों में लगे सभी तुंबा के फल तोड़कर घर ले आये. घर आकर जैसे ही उन्होंने एक तुंबा को कमंडल बनाने के लिए काटा उन्होंने देखा यह तुंबा हीरे मोती, जवाहरात और कीमती रत्नो से भरा हुआ था. तुंबा को कीमती रत्नो से भरा देखकर वे आश्चर्यचकित रह गए. उनके पास तो तुंबा की पूरी फसल थी. उन्होंने देखा सभी तूम्बों में ऐसे ही कीमती रत्न भरे हुए थे. इस चमत्कार को देखने के बाद धन्ना जी को उन संत की याद आयी जिन्होंने उन्हें तुंबा के बीज दिए थे. अब धन्नाजी उस धन से लोगो की सेवा करने लगे, वे फिर से दोनों हाथो से लोगों की मदद करने लगे. उस समय वह अकाल कई वर्षो तक चला, उस समय धन्ना जी ने अपने घर में और आसपास के कई गांवों में लंगर शुरू करवा दिया. आसपास के सैंकड़ों गाँवो के लाखों लोग वर्षों तक धन्नाजी के लंगर में तीनों समय भोजन किया करते थे. धन्ना सेठ ने अपने जीवनकाल में कई मंदिर, बावड़ियां, तालाब और धर्मशालाएं भी बनवाई और हर तरह से साधु-संतो और जरूरतमंद लोगों की मदद की. लोग धन्नाजी को धन्ना सेठ कहकर बुलाने लगे. धन्नाजी जैसा धनी आज तक कोई नहीं हुआ, वे धन और मन दोनों के धनी थे, आज भी उनके ही नाम पर धनी लोगों को धन्ना सेठ की उपमा दी जाती है
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*💐आज की कहानी💐*सुप्रभातम्* 🌅🌄🕉️ *नमस्कार🙏कहानी से सीख की सुप्रभात कहानी में आप सभी का स्वागत है!प्रतिदिन कहानियों का आनं...
30/12/2025

*💐आज की कहानी💐*
सुप्रभातम्* 🌅🌄🕉️
*नमस्कार🙏
कहानी से सीख की सुप्रभात कहानी में आप सभी का स्वागत है!
प्रतिदिन कहानियों का आनंद लेने के लिए*
🙏🙏🙏🙏

* *सास बहू*
*
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💫'बहू कहां मर गई?

अंदर से आवाज- जिंदा हूं माँ जी।

तो फिर मेरी चाय क्यूं अभी तक नहीं आई, कब से पूजा करके बैठी हूं

ला रही हूं माँ जी,

बहू चाय के साथ, भजिया भी ले आयी, सास ने कहा तेल का खिलाकर मरोगी क्या ?

बहू ने कहा- ठीक हैं माँ जी ले जाती हूं।

सास ने कहा- रहने दे अब बना दिया हैं तो खा लेती हूं।

सास ने भजिया उठाई और कहा- कितनी गंदी भजिया बनाई हैं तुमने।

बहू- माँ जी मुझे कपड़े धोने हैं मैं जाती हूं।

बहू दरवाजे के पास छिपकर खड़ी हो गयी।

सास भजिया पर टूट पड़ी और पूरी भजिया खत्म कर दी।

बहू मुस्कुराई और काम पर लग गई।

दोपहर के खाने का वक्त हुआ। सास ने फिर आवाज लगाई- कुछ खाने को मिलेगा।

बहू ने आवाज नहीं दी।

सास फिर चिल्लाई- भूखे मारोगी क्या, बहू आयी सामने खिचड़ी रख दी।

सास गुस्से से- ये क्या है, मुझे नहीं खाना इसे। ले जाओ।

बहू ने कहा- आपको डॉक्टर ने दिन में खिचड़ी खाने को कहा है, खाना तो पड़ेगा ही।

सास मुंह बनाते हुए, हाँ तू मेरी माँ बन जा, बहू फिर मुस्कुराई और चली गई।

आज इनके घर पूजा थी

बहू सुबह 4 बजे से उठ गयी। पहले स्नान किया, फिर फूल लाई। माला बनाई। रसोई साफ की। पकवान और भोज बनाया। सुबह के 10 बज गए।

अब सास भी उठ चुकी थी। बहू अब पंडित जी के साथ भगवान के वस्त्र तैयार कर रही थी।

आज ऑफिस की छुट्टी भी थी उनके पति भी घर पर थे।

पूजा शुरू हुई,

सास चिल्लाती बहू ये नहीं है, वो नही है।

बहू दौड़ी-दौड़ी आती और सब करती।

अब दोपहर के 3 बज गये थे, आरती की तैयारी चल रही थी, पंडित जी ने सबको आरती के लिए बुलाया और सबके हाथों में थाली दी, जैसे ही बहू ने थाली पकड़ी, थाली हाथों से गिर पड़ी। शायद भोज बनाते हुए बहू के हाथों मे तेल लगा था, जिसे वो पोंछना भूल गयी थी

सारे लोग तरह-तरह की बातें करने लगे। कैसी बहू है, कुछ नहीं आता। एक काम भी ठीक से नहीं कर सकती। ना जाने कैसी बहू उठा लाए। एक आरती की थाली भी संभाल नहीं सकी

उसके पति भी गुस्सा हो गए पर सास चुप रही। कुछ नहीं कहा। बस यही बोल के छोड़ दिया सीख रही है, सब सीख जाएगी धीरे-धीरे।

अब सबको खाना परोसा जाने लगा, बहू दौड़-दौड़ के खाना देती, फिर पानी लाती। करीब 70- 80 लोग हो गये थे, इधर दो नौकर और बहू अकेली फिर भी वहाँ सारा काम, बहुत ही अच्छे तरीके से करती।

अब उसकी सास और कुछ आसपड़ोस के लोग खाने पर बैठे, बहू ने खाना परोसना शुरू किया, सब को खाना दे दिया गया,

जैसे ही पहला निवाला सास ने खाया- तुमने नमक ठीक नहीं डाला क्या। एक काम ठीक से नहीं करती। पता नहीं मेरे बाद कैसे ये घर संभालेगी।

आस-पड़ोस वालों को तो जानते ही हो ना साहब। वो बस बहाना ढूंढते हैं नुक्स निकालने का। फिर वो सब शुरू हो गये, ऐसा खाना है, ऐसी बहू है, ये वो वगैरहा-वगैरहा। दिन का खाना हो चुका था, अब बहू बर्तन साफ करने नौकरों के साथ लग गई।

रात में जगराता का कार्यक्रम रखा गया था।

बहू ने भी एक दो गीत गाने के लिए स्टेज पर चढ़ी।

सास जोर से चिल्लाई- मेरी नाक मत कटा देना, गाना नहीं आता तो मत गा, वापस आ जा।

बहू मुस्कुराई और गाने लगी।

सबने उसके गाने की तारीफ की, पर सास मुंह फूलाते हुए बोली, इससे अच्छा तो मैं गाती थी जवानी में, तुझे तो कुछ भी नहीं आता। बहू मुस्कुराई और चली गई।

अब रात का खाना खिलाया जा रहा था।

उसके पति के ऑफिस के दोस्त साइड में ही ड्रिंक करने लगे। उसका पति चिल्लाता थोड़ा बर्फ लाओ, तो सास चिल्लाती यहाँ दाल नहीं है, फिर चिल्लाता कोल्ड ड्रिंक नहीं है, पापड़ ले आओ।

इधर-उधर आखिरी में उसके पति की शराब गिर पड़ी उसके एक दोस्त पर और बोलत टूट गई।

पति गुस्से में दो झापड़ अपनी पत्नी को लगाते हुए कहता है- जाहिल कहीं की। देखकर नहीं कर सकती। तुझे इतना भी काम नहीं आता।

सारे लोग देखने लगे। उसकी पत्नी रोते हुए कमरे की तरफ दौड़ी, फिर उसके दोस्तों ने कहा- क्या यार पूरा मूड खराब कर दिया, यहाँ नहीं बुलाया होता, हम कहीं और पार्टी कर लेते। कैसी अनपढ़-गंवार बीवी ला रखी है तूने। उसे तो मेहमानों की इज्जत और काम करना तक नहीं आता, तुमने तो हमारी बेईजती कर दी।

अब आस पड़ोस की औरतों को और बहाना मिल गया था। वो कहने लगीं, देखो क्या कर दिया तुम्हारी बहू ने। कोई काम कीं नही है। मैं तो कहती हूं अपने बेटे की दूसरी शादी करा दो, छुटकारा पाओ इस गंवार से।

सास उठी और अपने बेटे के पास जाकर उसे थप्पड़ मारा और कहा- अरे नालायक, तुमने मेरी बहू को मारा, तेरी हिम्मत कैसे हुई। तेरी टाँग तोड़ दूंगी, उसके बेटे के दोस्त कुछ कहने ही वाले थे कि उसकी माँ ने घूरते हुए- कहा चुप बिल्कुल चुप। यहाँ दारू पीने आये हो, जबकि पता है आज पूजा है और तुम्हें पार्टी करनी है, कैसे संस्कार दिये हैं तुम्हारे, माता-पिता ने।

और किसने मेरी बहू को जाहिल बोला, जरा इधर आओ। चप्पल से मारूंगी अगर मेरी बहू को किसी ने एक शब्द भी कहा तो। अरे पापी, तूने उस लड़की को बस इसलिए मारा कि तेरी शराब टूट गयी, पापी वो बच्ची सुबह चार बजे से उठी है। घर का सारा काम कर रही है। ना सुबह से नाश्ता किया ना दिन का खाना खाया। फिर भी हंसते हुए सबकी बातें सुनते हुए, ताने सुनते हुए घर के काम में लगी रही। तेरे यार दोस्तो को वो अच्छी नहीं लगी। जूते से मारूंगी तेरे दोस्तों को जो कभी उन्होंने ऐसा कहा।

उसके यार दोस्त चुपके से खिसक लिए।

अब सास, बहू के कमरे मे गयी, और बहू का हाथ पकड़कर बाहर लाई। सबके सामने कहने लगी, किसने कहा था अपनी बहू को घर से निकाल के दूसरी बहू ले आना। जरा सामने आओ।

कोई सामने नहीं आया।

फिर सास ने कहा, तुम जानते भी क्या हो इस लड़की के बारें में। ये मेरी "माँ" भी है, बेटी भी।

माँ इसलिए मुझे गलत काम करने पर डाँटती हैं और बेटी इसलिए, कभी-कभी मेरी दिल की भावनाएं समझ जाती हैं। मेरी दिन-रात सेवा करती है। मेरे हजार ताने सुनती है पर एक शब्द भी गलत नहीं कहती। ना सामने ना पीठ पीछे,और तुम कहते हो, दूसरी बहू ले आऊं।

याद है ना छुटकी की दादी,

अपनी बहू की करतूत, सास ने गुस्से से पड़ोस की महिला को कहा, अभी पिछले हफ्ते ही तुम्हें मियां-बीवी भूखे छोड़ घूमने चले गये थे। मेरी इसी बहू ने 7 दिनों तक तुम्हारे घर पर खाना-पानी यहाँ तक कि तुम्हारे पैर दबाने जाती थी और तुम इसे जाहिल बोलती हो। जाहिल तो तुम सब हो जो कोयले और हीरे में फर्क नही जानते। अगर आइंदा मेरी बहू के बारे में किसी ने एक लफ्ज भी बोला तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा क्यूंकि ये मेरी बहू नहीं, मेरी बेटी है।

बहू_सिसकियाँ लेते हुये फिर कमरें में चली गई।

सास ने एक प्लेट उठायी और भोजन परोसा और बहू के कमरे में खुद ले गयी, सास को भोजन लाते देखा तो बहू ने कहा- अरे माँ जी आप क्या कर रही हों, मैं खुद ले लेती। सास ने प्यार से ताना मारते हुये कहा, डर मत इसमें जहर नही हैं, मार नहीं डालूंगी तुझे। तुझे नई सास चाहिए होगी, पर मुझे अभी भी तू ही मेरे घर की बहू चाहिए

बहू ने अपनी सास को रोते हुए गले से लगा लिया।

सास भी रो दी पहली बार और कहा- चल खाना खा ले। फिर उसके आंसू पोंछते हुए बोली...... अरे तु मेरी बहु नही मेरी बेटी है......

कुछ रिश्ते बहुत मीठे होते हैं, बस बातें कड़वी होती है.....

बहु को प्यार देकर देखो...वो तुम्हारे परिवार के लिए अपने घर का आँगन छोडकर आती है......

29/12/2025

*भगवानों के वाहन और उनका रहस्य क्या है एवं कौनसी दिशा में मुंह करके करें मंत्र जाप होगा धन लाभ आओ जानें*

यह बात गहराई से समझने योग्य है।

प्रतीकात्मक कारण

भगवानों के वाहन केवल यात्रा का साधन नहीं, बल्कि गहरे आध्यात्मिक प्रतीक हैं।

1. प्रकृति और सृष्टि का संदेश

देवता और उनके वाहन मिलकर यह बताते हैं कि ईश्वर केवल मनुष्य के नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि के रक्षक हैं।

हर पशु-पक्षी भी उनकी शक्ति और प्रेम का हिस्सा है।

2. मानव स्वभाव का प्रतीक

हर वाहन किसी विशेष गुण या प्रवृत्ति का प्रतीक है।

देवता उस पशु पर सवार होकर दिखाते हैं कि मनुष्य यदि अपनी पशु-प्रवृत्तियों को नियंत्रित करे, तो वह दिव्य हो सकता है।

उदाहरण

गणेश जी का वाहन – मूषक (चूहा)
चूहा लालच और चपलता का प्रतीक है।
गणेश जी दिखाते हैं कि ज्ञान और विवेक से लालच पर विजय पाई जा सकती है।

माँ दुर्गा का वाहन – सिंह
सिंह अहंकार और क्रूर शक्ति का प्रतीक है।
माँ दुर्गा उस पर सवार होकर बताती हैं कि अहंकार पर नियंत्रण ही असली शक्ति है।

शिव जी का वाहन – नंदी (बैल)
नंदी धैर्य, सेवा और भक्ति का प्रतीक है।
शिव दिखाते हैं कि सच्चे भक्त को धैर्य और निष्ठा के साथ ईश्वर की सेवा करनी चाहिए।

विष्णु जी का वाहन – गरुड़ (गरुड़ पक्षी)
गरुड़ गति, दृष्टि और आकाश का प्रतीक है।
भगवान विष्णु दिखाते हैं कि धर्म रक्षा के लिए सजग और तीव्र गति से कार्य करना चाहिए।

सरस्वती जी का वाहन – हंस
हंस विवेक और शुद्धता का प्रतीक है।
माँ सरस्वती दिखाती हैं कि ज्ञान वही है जो विवेक और निर्मलता दे।

निष्कर्ष

देवताओं के वाहन पशु-पक्षी इसलिए हैं क्योंकि वे मानव के भीतर छिपी प्रवृत्तियों और गुणों का प्रतीक हैं।
जब मनुष्य इन प्रवृत्तियों पर नियंत्रण पा लेता है, तभी उसका जीवन दैवीय और संतुलित हो जाता है।

“भगवान और उनके वाहन हमें यह सिखाते हैं कि मनुष्य को अपने भीतर की पशु-प्रवृत्तियों पर विजय पाकर ही दिव्यता प्राप्त होती है।”

नजर दोष और हाय से मुक्ति का शास्त्रसम्मत उपाय

(नींबू के टुकड़ों द्वारा)

कई बार जीवन में बिना किसी स्पष्ट कारण के मन अशांत रहने लगता है, काम में ध्यान नहीं लगता, बनते काम अटक जाते हैं और शरीर में अनावश्यक थकान बनी रहती है। शास्त्रों में इसे नजर दोष या हाय का प्रभाव माना गया है।

यह एक सरल, गुप्त और प्रभावी उपाय है, जिसे सदियों से लोक परंपरा और ग्रह सिद्धांतों में मान्यता मिली है।

🔸 विधि

एक पीला नींबू लें।

उसे अपने सिर से 7 बार वारें।

अब नींबू को 4 बराबर टुकड़ों में काट लें।

इन टुकड़ों को किसी चौराहे पर चारों दिशाओं में फेंक दें।

ध्यान रहे, पीछे मुड़कर न देखें।

🔸 शास्त्रीय रहस्य

नींबू को शास्त्रों में केतु ग्रह का कारक माना गया है।

इसका खट्टा स्वभाव नकारात्मक ऊर्जा को काटने का कार्य करता है।

यह उपाय बुरी नजर, मानसिक बोझ, भ्रम और Lack of Focus को धीरे-धीरे समाप्त करता है।

विशेष रूप से तब लाभकारी होता है जब बिना कारण मन भारी रहता हो।

🔸 कब करें

मंगलवार या शनिवार

सूर्यास्त के बाद

आवश्यकता अनुसार, रोज नहीं

🔸 सावधानी

उपाय को श्रद्धा और शांति से करें।

इसे अंधविश्वास नहीं, ऊर्जा संतुलन का प्रयोग समझें।

🙏 जब मन हल्का हो जाए, तो ईश्वर का धन्यवाद अवश्य करे

*इस दिशा में मुंह करके करें मंत्र जाप, होगा धन लाभ*
मां धनलक्ष्मी जी चंचला हैं। वे कभी तो बिना कोई कामना किए ही हमारे जीवन में प्रवेश कर जाती हैं और कभी बिना किसी चेतावनी के ही हमें छोड़ देतीं हैं। मां धनलक्ष्मी जी की पूजा धन, वैभव और ऐश्वर्य से परिपूर्ण जीवन जीने के लिए की जाती है। वास्तव में धन तो केवल विभूति मात्र है। कोई व्यक्ति धनवान हो अथवा लक्ष्मीवान हो ये दो अलग-अलग बातें हैं। मां धनलक्ष्मी जी तो केवल श्री हैं।

न तो आर्थिक सुरक्षा और न ही ज्ञान हमें भावनात्मक संतुष्टि उपलब्ध करा सकता है। जीवन में हर सम्पदा या सुविधा होने पर भी यह ज़रूरी नहीं है कि हमारे आपसी संबंध मधुर हों। दुनिया भर के शास्त्र और ज्ञान की बातें पढ़ लेने के बाद भी यदि माता-पिता, संतान, या बंधू-बांधवों से रिश्तों में कड़वाहट हो तो कैसा सुख?

शुक्रवार के दिन हम मां धनलक्ष्मी जी से प्रार्थना करते हैं कि वह हमारे घर पधारें, मगर क्या आपने यह जानना चाहा है कि वह आपके घर निवास करना चाहती हैं या नहीं? शास्त्रों के मतानुसार श्री विष्णु जी मां धनलक्ष्मी जी से पूछते हैं, हे देवी, आप किस घर में निवास करना चाहती हैं?

मां धनलक्ष्मी जी बोली, ”जिस घर में गृहस्थी का कुशल प्रबंध हो, जहां सदा स्वच्छता रहती है, घर के सदस्य मृदुभाषी और सौहार्द बनाए रखने वाले हों, परिवार में बड़े-बूढ़ों की सेवा-सुश्रूषा होती है, जिस घर के द्वार से कोई भूखा-असहाय खाली न लौटे, जहां स्त्रियों का अनादर या शोषण न हो, मैं वहां निवास करना चाहती हूं।”

घर परिवार में र्निवाह करने वाले जातको को सर्वदा कमल के आसन पर विराजित मां धनलक्ष्मी जी की उपासना करनी चाहिए। देवीभागवत में वर्णित है कि कमल के आसन पर विराजित मां धनलक्ष्मी जी की उपासना स्वर्ग के देवता राजा इंद्र ने की थी। मां धनलक्ष्मी जी ने प्रसन्न होकर इंद्र को देवाधिराज का पद दिया था। इंद्र ने मां धनलक्ष्मी जी की आराधना ॐ कमलवासिन्यै नम:’ मंत्र से की थी। यह मंत्र आज भी अचूक है। इसके अतिरिक्त महालक्ष्मी मंत्र ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नम:॥
का जाप भी समान फल का दाता है।

प्रातः काल मे उत्तर दिशा और संध्या वेला में पश्चिम की और मुख करके मां लक्ष्मी कि मूर्ति या श्री यन्त्र के सामने स्फटिक कि माला से मंत्र जाप करेें। जप जितना अधिक हो सके उतना अच्छा है। कम से कम 108 बार 41 दिन तक लगातार अवश्य करें। मां लक्ष्मी कि कृपा से व्यक्ति को धन की प्राप्ति होती है और निर्धनता दूर होती है।

शिवलिंग में "लिंग" शब्द का वास्तव में क्या अर्थ है?

विगत कुछ समय से बहुत ही सुनियोजित ढंग से हमारे धर्मग्रंथों में लिखे तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर कलुषित करने का प्रयास चल रहा है। कुछ चीजें ऐसी भी होती है जिसे लोग ढंग से समझ नहीं पाते और अर्थ का अनर्थ हो जाता है। आज के समय में शिवलिंग की जो एक अवधारणा है वो भी बहुत ही भ्रामक है। तो आइये इस लेख में हम शिवलिंग का वास्तविक अर्थ समझने का प्रयास करते हैं।

शिवलिंग के "शिवलिंग" कहलाने के पीछे कोई रहस्य, कथा या विज्ञान नही है। ये बहुत ही साधारण और सरल चीज है जिसे कुछ मूढ़ लोग मिथ्या प्रचार कर बहुत गलत तरीके से प्रस्तुत करते हैं। यही कारण है कि आज शिवलिंग का नाम आते ही लोग ये सोचते हैं कि इसका अर्थ भगवान शिव का "शिश्न" है। ये अत्यंत ही निंदाजनक और बिलकुल मिथ्या सोच है।

ऐसा इसीलिए क्योंकि आज कल लोगों के लिए "लिंग" का केवल एक ही अर्थ है। कदाचित इसी कारण आज जो शिवलिंग का आकार हमें देखने को मिलता है, उसे भी हम शिश्न से ही जोड़ देते हैं। किन्तु क्या आपने सोचा कि लिंग का वास्तविक अर्थ क्या है?
इसे समझने के लिए हमें केवल थोड़े व्याकरण का ज्ञान होना ही पर्याप्त है।

हम सभी ने बचपन में "पुल्लिंग" एवं "स्त्रीलिंग" के विषय में पढ़ा है। तो क्या जब हम स्त्रीलिंग कहते हैं तो उसका अर्थ "स्त्रियों का शिश्न" होता है? नही ना। ये बहुत साधारण सी बात है। यहाँ लिंग का वास्तविक अर्थ है "प्रतीक"। पुल्लिंग पुरुषों का प्रतीक है और स्त्रीलिंग का अर्थ है स्त्रियों का प्रतीक। ठीक उसी प्रकार शिवलिंग का अर्थ है शिव का प्रतीक, ना कि उनका शिश्न।

अब यहाँ एक प्रश्न और भी आता है कि देवता तो कई हैं फिर शिवलिंग की आवश्यकता क्यों पड़ी? विष्णुलिंग या ब्रह्मलिंग की क्यों नही? इसका उत्तर शिव महापुराण में दिया गया है जो शंकर को शिव से अलग करता है। यही कारण है कि हमारे ग्रंथों में शिवलिंग का ही वर्णन है शंकरलिंग अथवा महेश्वरलिंग का नही।

इसे समझने के लिए हमें "शिव" और "शंकर" के भेद को समझना होगा। हालाँकि इन दोनों के बीच के अंतर के विषय में एक विस्तृत लेख शीघ्र ही प्रकाशित होगा, किन्तु फिर भी इस लेख में हम इन्होने के मूल अंतर को समझेंगे क्यूंकि शिवलिंग का रहस्य समझने के लिए इन दोनों को जानना आवश्यक है।

संक्षेप में समझें तो शिव स्वयंभू एवं निराकार हैं। उनका कोई रूप नही, वे स्वयं समस्त सृष्टि के प्रतीक हैं। उन्ही को सदाशिव भी कहते हैं। शिव पुराण के अनुसार जब भगवान ब्रह्मा और श्रीहरि विष्णु में प्रतिस्पर्धा हुई तो उनके मध्य अग्नि का एक अनंत रूप प्रकट हुआ। इस कथा के बारे में हम किसी अलग लेख में बात करेंगे किन्तु उस अग्नि स्वरूप शिव ने ही दोनों को आत्मज्ञान प्रदान किया।

पुराणों में शिव के अस्तित्व का वो पहला प्रमाण माना जाता है। उनका वही निराकार रूप शिव अथवा सदाशिव के रूप में जाना जाता है और उन्ही को भगवान ब्रह्मा एवं भगवान विष्णु ने प्रथम बार "शिवलिंग" अर्थात "कल्याण का प्रतीक" कहा। प्रतीक (लिंग) इसी कारण क्योंकि उनका कोई रूप ही नही था। उसी को "ज्योतिर्लिंग" भी कहा गया और आज भी भगवान शिव के प्रमुख प्रतीकों को ज्योतिर्लिंग कहा जाता है। ये कुल १२ हैं जिन्हे द्वादश ज्योतिर्लिंग कहा जाता है।

अब आते हैं शिवलिंग की संरचना पर। ये मुख्यतः दो भागों में बांटा गया है - लिंग एवं पीठ। इसमें लिंग महादेव का प्रतीक है और पीठ आदिशक्ति का। तो इस प्रकार शिवलिंग पुरुष और प्रकृति के एकात्मकता का प्रतीक है। इसमें जो लिंग है उसका आकर वास्तव में बेलनाकार नहीं बल्कि अंडाकार होता है जो ब्रह्माण्ड अथवा हिरण्यगर्भ का प्रतिनिधित्व करता है।

शिवलिंग त्रिदेवों का भी प्रतिनिधित्व करता है। लिंग तो महादेव का प्रतीक है ही, शिवलिंग का जो मूल होता है वो भगवान विष्णु का और आधार परमपिता ब्रह्मा का प्रतीक होता है। तो इस प्रकार एक शिवलिंग ब्रह्मा, विष्णु, महेश, शक्ति, अर्धनारीश्वर, धरा, पृथ्वी, आकाश एवं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का प्रतीक है। इस प्रकार की सम्पूर्णता आपको केवल शिवलिंग में ही देखने को मिल सकती है।

महानारायण उपनिषद के अनुसार शिवलिंग के २२ नाम एवं मन्त्र बताये गए हैं:
निधनपतयेनमः।
निधनपतान्तिकाय नमः।
ऊर्ध्वाय नमः।
ऊर्ध्वलिङ्गाय नमः।
हिरण्याय नमः।
हिरण्यलिङ्गाय नमः।
सुवर्णाय नमः।
सुवर्णलिङ्गाय नमः।
दिव्याय नमः।
दिव्यलिङ्गाय नमः।
भवाय नमः।
भवलिङ्गाय नमः।
शर्वाय नमः।
शर्वलिङ्गाय नमः।
शिवाय नमः।
शिवलिङ्गाय नमः।
ज्वलाय नमः।
ज्वललिङ्गाय नमः।
आत्माय नमः।
आत्मलिङ्गाय नमः।
परमाय नमः।
परमलिङ्गाय नमः।
गोपाल तपाणि उपनिषद में शिवलिंग की महत्ता का अद्भुत वर्णन किया गया है।

तत्र द्वादशादित्या एकादश रुद्रा अष्टौ वसवः सप्त मुनयो ब्रह्मा नारदश्च पञ्च विनायका वीरेश्वरो रुद्रेश्वरोऽम्बिकेश्वरो गणेश्वरो नीलकण्ठेश्वरो विश्वेश्वरो गोपालेश्वरो भद्रेश्वर इत्यष्टावन्यानि लिङ्गानि चतुर्विंशतिर्भवन्ति॥

अर्थात: बारह आदित्य, ग्यारह रुद्र, आठ वसु, सात ऋषि, ब्रह्मा, नारद, पांच विनायक, वीरेश्वर, रुद्रेश्वर, अंबिकेश्वर, गणेश्वर, नीलकण्ठेश्वर, विश्वेश्वर, गोपालेश्वर, भद्रेश्वर और २४ अन्य शिवलिंगों का यहाँ पर वास है।

तो सदैव ये याद रखें कि शिवलिंग का अर्थ होता है "शिव का प्रतीक" ना कि वो जो अधिकांश लोग समझते हैं। आशा है ये जानकारी आपको पसंद आयी होगी। इसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं ताकि शिवलिंग को लेकर जो भ्रामक जानकारी जनमानस में फैली है, वो दूर हो सके।

ॐ नमः शिवाय।

🪯श्री कृष्ण कहते हैं कि सौ बार मंदिर जाओ, हजार बार दीप जलाओ या करोड़ों बार भोजन कराओ,लेकिन अगर आपकी वजह से किसी की आंखों...
26/12/2025

🪯श्री कृष्ण कहते हैं कि सौ बार मंदिर जाओ, हजार बार दीप जलाओ या करोड़ों बार भोजन कराओ,लेकिन अगर आपकी वजह से किसी की आंखों में एक भी बूंद आंसू भी आ जाए तो सब व्यर्थ है
🪯
कहावत है
कि रोओ तो अकेले रोओ।
हंसो तो संभव है कि
कुछ लोग आपके साथ हो लें।
पर आप रोएं ही क्यों ?
रोना परमात्मा का अपमान है।
क्योंकि अस्तित्व रोना जानता ही नहीं।
अस्तित्व केवल
नृत्य जानता है.. उत्सव जानता है।
उसका कसूर भी नहीं है।
हंसिये.. फूल, चाँद तारे
सभी को अपने साथ हंसता पाएंगे।
रोने वाला अकेला रह जाता है।
हंसने वाले के साथ
सारा अस्तित्व हंसने लगता है।
नाचने लगता है

📜 *रामायण चौपाई:*  *“जो शरणागत होय, तासु न त्यागौं,**दोष लाख भए तो भी नहिं भागौं।”* 🌸🙏🌼 *व्याख्या:* यह चौपाई श्रीराम के ...
25/12/2025

📜 *रामायण चौपाई:*

*“जो शरणागत होय, तासु न त्यागौं,*
*दोष लाख भए तो भी नहिं भागौं।”* 🌸🙏

🌼 *व्याख्या:*
यह चौपाई श्रीराम के करुणा और धर्म का मूल सिद्धांत है।
राम कहते हैं — जो भी मेरी शरण में आता है, चाहे उसमें कितने ही दोष क्यों न हों, मैं उसे कभी त्यागता नहीं।
👉 यही कारण है कि विभीषण, जो रावण का भाई था, उसे भी राम ने स्वीकार किया।

👉 यह चौपाई हमें सिखाती है कि *सच्चा धर्म दोष नहीं देखता, भावना देखता है।*

एक बार राजा भोज की पत्नी भोज को स्नान करा रही थी दोनों आनन्द का अनुभव कर रहे थे . भोज बार बार अपनी पत्नी से आग्रह करते क...
24/12/2025

एक बार राजा भोज की पत्नी भोज को स्नान करा रही थी दोनों आनन्द का अनुभव कर रहे थे . भोज बार बार अपनी पत्नी से आग्रह करते कि पानी और डालो इस पर उनकी पत्नी जोर जोर से हंसने लगी . राजा ने पूछा कि तुम क्यों हंस रही हो इस पर उसने कहा कि ये बताने की बात नहीं है . लेकिन राजा अङ गया कि तुम्हें बताना होगा।

तब उसने कहा कि ये बात तुम्हें मैं नहीं मेरी बहन बतायेगी उल्लेखनीय है कि भोज की पत्नी उस ग्यान को जानती थी जिसमें पूर्वजन्म का ग्यान होता है।उसकी बहन भी इस ग्यान को जानती थी पर क्योंकि इस ग्यान का संसार के नातों से कोई सम्बन्ध नहीं होता इसलिये कितना भी सगा हो उसे ये ग्यान नहीं बताते . बताने पर ये ग्यान नियम विरुद्ध हो जाने से चला जाता है।

राजा भोज अपनी भारी जिग्यासा के चलते अपनी साली के घर पहुँचा वहाँ उस वक्त कोई कार्यक्रम चल रहा था ।

अतः राजा बात न पूछ सका फ़िर फ़ुरसत मिलते ही राजा ने वह प्रश्न अपनी साली से कर दिया तब उसने कहा कि तुम्हारी बहन ने कहा है कि बार बार पानी डालने की बात पर हंसने का रहस्य मेरी बहन बतायेगी..तब राजा की साली ने कहा कि आज आधी रात को बच्चे को जन्म देते ही मेरी मृत्यु हो जायेगी इसके अठारह साल बाद मेरे पुत्र जिसका आज जन्म होगा उसकी पत्नी तुम्हें ये राज बतायेगी।

राजा ने बहुत हठ किया पर इससे ज्यादा बताने से उसने इंकार कर दिया .ठीक वैसा ही हुआ पुत्र को जन्म देकर भोज की साली मर गयी..राजा ने अठारह साल तक बेसब्री से इंतजार किया और फ़िर वो दिन आ ही गया जब उस पुत्र का विवाह हुआ राजा उसी बात का इंतजार कर रहा था सो जैसे ही उसे वधू से मिलने का मौका मिला . उसने कहा मैं अठारह साल से इस समय का इंतजार कर रहा हूँ....और भोज ने पूरीबात बता दी।

वधू ने कहा कि पहले तो आप ये बात न ही पूछो तो बेहतर है और अगर पूछते ही हो तो मेरे पति से कभी इसका जिक्र न करना..अन्यथा वो पति धर्म से विमुख हो जायेगा और इससे विधान में खलल पङेगा..राजा मान गया।

तब उस वधू ने कहा कि आज जो मेरा पति है अठारह साल पहले इसे मैंने ही जन्म दिया था ...तुम्हारी पत्नी इस लिये हंस रही थी कि इससे पहले के जन्म में जब तुम उसके पुत्र थे वह तुम्हें बाल अवस्था में नहलाने के लिये पकङती थी तब तुम नहाने से बचने के लिये बार बार भागते थे।

और आज स्वयं तुम पानी डालने को कह रहे थे..इसलिये उस जन्म की बात याद कर वो हस रही थी ..उसने या मैंने उसी समय तुम्हें ये बात इसलिये नहीं बतायी कि वैसी अवस्था में तुम उसे पत्नी मानने के धर्म से विमुख हो सकते थे...यह बात सुनते ही राजा में गहरा वैराग्य जाग्रत हो गया।

यही प्रभु की अजीव लीला है।

23/12/2025

एक जाने-माने स्पीकर ने हाथ में पांच सौ का नोट लहराते हुए अपनी सेमीनार शुरू की. हाल में बैठे सैकड़ों लोगों से उसने पूछा ,” ये पांच सौ का नोट कौन लेना चाहता है?” हाथ उठना शुरू हो गए. फिर उसने कहा ,” मैं इस नोट को आपमें से किसी एक को दूंगा पर उससे पहले मुझे ये कर लेने दीजिये .” और उसने नोट को अपनी मुट्ठी में चिमोड़ना शुरू कर दिया. और फिर उसने पूछा,” कौन है जो अब भी यह नोट लेना चाहता है?” अभी भी लोगों के हाथ उठने शुरू हो गए. “अच्छा” उसने कहा,” अगर मैं ये कर दूं ? ” और उसने नोट को नीचे गिराकर पैरों से कुचलना शुरू कर दिया. उसने नोट उठाई, वह बिल्कुल चिमुड़ी और गन्दी हो गयी थी. ” क्या अभी भी कोई है जो इसे लेना चाहता है?”. और एक बार फिर हाथ उठने शुरू हो गए. ” दोस्तों, आप लोगों ने आज एक बहुत महत्त्वपूर्ण पाठ सीखा है. मैंने इस नोट के साथ इतना कुछ किया पर फिर भी आप इसे लेना चाहते थे क्योंकि ये सब होने के बावजूद नोट की कीमत घटी नहीं, उसका मूल्य अभी भी 500 था. जीवन में कई बार हम गिरते हैं, हारते हैं, हमारे लिए हुए निर्णय हमें मिटटी में मिला देते हैं. हमें ऐसा लगने लगता है कि हमारी कोई कीमत नहीं है. लेकिन आपके साथ चाहे जो हुआ हो या भविष्य में जो हो जाए , आपका मूल्य कम नहीं होता. आप स्पेशल हैं, इस बात को कभी मत भूलिए. कभी भी बीते हुए कल की निराशा को आने वाले कल के सपनों को बर्बाद मत करने दीजिये. याद रखिये आपके पास जो सबसे कीमती चीज है, वो है आपका जीवन 🪸 जय माता दी 🪸🙏💫🌟🌈🎉💖🌸

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