25/07/2026
केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय और में व्यापक बदलाव से यह प्रमाणित हो गया है की सरकार सिर्फ ताकत और हिंसा की भाषा ही समझती है। जो सुधारात्मक कदम अभी आनन -फानन में उठाये जा रहे हैं, क्या वे पेपर लीक के तत्काल बाद नहीं उठाये जा सकते थे ? पेपर लीक से निराश करीब दो दर्जन छात्रों ने ख़ुदकुशी की, तब भी सरकार नहीं जगी। अगर छात्रों -युवाओं का देशव्यापी इतना बड़ा आंदोलन और हिंसक घटनाएं नहीं हुई होतीं तो क्या सरकार ऐसा करती ? कदापि नहीं। जब स्थिति सरकार के नियंत्रण से बाहर जाती दिखी तब उसकी तंद्रा टूटी।
सोनम वांगचुक नई दिल्ली में जंतर मंतर पर अनशन पर बैठे तब भी सरकार नहीं जगी। जब काक्रोच जनता पार्टी की अपील पर 20 जुलाई को छात्र पुलिस की लाठियां खाते संसद भवन तक पहुंच गए, तब सरकार के होश फाख्ता हो गए। प्रधानमंत्री को संसद के पिछले दरवाजे से बाहर ले जाया गया। सरकार डरी हुई थी। पता नहीं छात्रों के इस उबाल के बारे में सरकार के पास एजेंसियों की कोई फीड बैक थी या नहीं। सरकार कैसे काम करती है यह घटना इसकी बानगी भर है।
ऐसा ही व्यापक जनांदोलन कुछ वर्ष पहले अन्ना हज़ारे और बाबा रामदेव के नेतृत्व में हुआ था। अन्ना भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए लोकपाल कानून लाने की मांग को लेकर रामलीला मैदान में अनशन पर बैठ गए थे। देश भर के सेलिब्रिटीज उनके समर्थन में सड़कों पर उतर आये थे। वह स्वतः स्फूर्त आंदोलन था। अभी की तरह वह आंदोलन हिंसक नहीं था। बहुत अनुशासित था। उसमें पूरा देश उमड़ पड़ा था। केजरीवाल उसी आंदोलन की देन हैं।
तब दिल्ली में कांग्रेस की सरकार थी। उस सरकार की यह खासियत थी कि उसने आरंभ से ही आंदोलनकारियों से संवाद शुरू कर दिया था। बाबा रामदेव को आंदोलन में शामिल होने से रोकने के लिए अनेक मंत्री प्रयासरत थे। यह अलग बात है कि वे बाबा को मना नहीं पाए। बाद में वह सरकार भी दमन पर उतर आई और पुलिसबल के सहारे आंदोलन को समाप्त करना चाहा लेकिन वह उल्टा पड़ गया। जब आंदोलन को कुचलने के तमाम प्रयास विफल रहे तब हार कर सरकार ने अन्ना की मांग मानी गई ।
इससे स्पष्ट होता है की सरकार चाहे किसी पार्टी की हो, उसका स्वभाव एक जैसा होता है। यानी जबतक सरकार को अपनी कुर्सी पर खतरा नहीं दिखता और उसकी फजीहत नहीं होती तब तक वह न्यायोचित मांग भी नहीं मानती। ऐसा नहीं है की यह प्रवृत्ति केवल सरकार के स्तर पर है, स्थानीय प्रशासन भी इसी राह चलता है।
आवेदन पर आवेदन देते रहिये कोई ध्यान नहीं देता। हां, उपद्रव शुरू कर दीजिये तो तुरंत सभी दौड़े आएंगे। लोकतंत्र के लिए यह प्रवृत्ति घातक है। हर किसी की बात सुनी जानी चाहिए और उसका समाधान होना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता तो हमें लोकतांत्रिक कल्याणकारी राज्य कहलाने का कोई हक़ नहीं है।
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साभार ~ #प्रवीणबागी