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25/03/2026

कल बिहार में बारहवीं का रिजल्ट निकला है। कल बिहार के लाखों बच्चों का दाना-पानी अपने गांव-समाज से उठ गया। जनरली भारत के अन्य राज्यों में बेटियां पराइ धन कही जाती है, उन्हें ब्याह के बाद अपना घर जो छोड़ना पड़ता है। बिहार में बेटियों के साथ साथ बेटे भी पराया धन ही होते हैं, 18 वर्ष होते होते बारहवीं के बाद अधिकांशतया बेटों को भी बिहार त्यागना ही पड़ता है। जिसको इंजीनियरिंग, साइंस आदि पढ़ना होता है वो जाते हैं बैंगलोर, जयपुर, भोपाल, नोयडा, पंजाब, भुवनेश्वर। जिन्हें पढ़ना होता है कॉमर्स वो जाते हैं लक्ष्मीनगर, कोलकाता, मुंबई। जो कुछ बच जाते हैं वो बिहार के किसी विश्वविद्यालय में नाम लिखवा कर निकल जाते हैं दिल्ली के मुखर्जीनगर सहित अन्य इलाकों में। वहां पहले तैयारी करते हैं UPSC, BPSC, SSC का और फिर बाद में आरएस अग्रवाल-प्रतियोगिता दर्पण घाँस के बैंक-रेलवे क्लर्क बनने की कोशिश में जवानी बहा देने को मजबूर हो जाते हैं। जो कुछ गिनती के सफ़ल होते हैं, कोचिंग छपाती है उनका इंटरव्यू और लगाती है पोस्टर अपने प्रचार के लिए। लेकिन अधिकतम जो रह जाते हैं असफल उन्हें दिल्ली में ही या किसी अन्य शहर जाना पड़ता है मजदूरी या किसी बेकार नौकरी के लिए।

बारहवीं के बाद जो युवा बिहार छोड़ते हैं, कोई नहीं लौट पाता, कोई नहीं आ पाता वापस बिहार। पहले दोस्त छूटते हैं, फिर संबंध, रिश्तेदारों से अनावश्यक दूरी हो ही जाती है, छूट जाता है अपना पर्व-त्यौहार और छूट जाता है धीरे धीरे गांव की शादी और मरनी-हरनी भी। शुरू में आते हैं आम के मौसम में या छठ-दुर्गापूजा पे। लेकिन फिर नौकरी के कुछ सालों के बाद जब नांगलोई, संगम विहार, बदरपुर, कांदीवली, विरार आदि में कुछ गज़ जमीन खरीद के माचिस सा घर बना लेते हैं तो फिर त्योहारों में भी आना छूट जाता है बिहार। अपनी संस्कृति छूट जाती है, छूट जाती है परंपराएं। अपने घर में भी मैथिली, भोजपुरी, मगही के जगह भाषा हिंदी ही हो जाती है। बच्चे बोलने लगते हैं "मेरे को, तेरे को..." वाली भाषा और बिहार को देखने लगते हैं बैकवर्ड की नजर से। धीरे धीरे लोग छुपाने लगते हैं अपनी पहचान और बताने लगते हैं खुद को दिल्ली का, मुंबई का। मां-बाप जो छूट गए थे गांव में, बुढ़ापे में जब उनसे अब काम नहीं हो पाता तो या तो वो छूट जाते हैं राम भरोसे या मन मार के आ जाते हैं वो भी अपना गांव छोड़के बुढ़ापे में बेटे-पुतोहू के पास। अब तो होने लगा है बुजुर्गों का श्राद्ध और कर्म भी दिल्ली, मुंबई में ही, क्योंकि गांव से अधिक दियाद तो दिल्ली, मुंबई में ही हैं।

कल बारहवीं के परीक्षा पास किए सभी छात्रों को बधाई, शुभकामनाएं। साथ ही गुड बाय, हैप्पी जर्नी। अपना प्रदेश छूटेगा तुम्हारा अभी, शुरू में थोड़ा दर्द होगा, बुरा फील होगा, याद आएगा गांव बार-बार, कुछ दिन तड़पोगे लौट आने को, भगवान से मनाओगे, लेकिन फिर धीरे-धीरे तुम्हारी भावनाएं मरने लगेंगी, धीरे-धीरे शायद फर्क पड़ना बंद हो जाएगा। तुम भी रम जाओगे दुनिया के थपेड़े में...ईश्वर तुम्हें सुखी रखें, कहीं भी रहो, सफल करें... कत्तऊ रहे नंदकेर बालक, गोपीन्हनाथ कहैहौं

21/03/2026
27/02/2026

जब मोबाइल में बैलेंस खत्म होता है,
तो आउटगोइंग कॉल बंद होना
एक हद तक समझ में आता है।

लेकिन इनकमिंग कॉल भी बंद कर देना
सीधे-सीधे उस इंसान की आवाज़ छीन लेना है
जो पहले ही संघर्ष में है।

आज मोबाइल सिर्फ कॉल नहीं है,
बल्कि
नौकरी की सूचना,
अस्पताल का फोन,
सरकारी काम,
और आपातकालीन मदद का जरिया है।

अगर आम आदमी की आवाज़ ही बंद कर दी जाए,
तो ये सुविधा नहीं,
सिस्टम की बेरुख़ी कहलाएगी।

सवाल छोटा है,
लेकिन असर बहुत बड़ा।







23/01/2026

उदासी का मौसम

हमने सिर्फ जड़ा गर्मी बरसात का मौसम देखा अनुभव किया ,पर जिंदगी का एक और अनोखा मौसम है यादों का मौसम जो पूरे दिन पूरी रात हर एक पल तरोताजा रहती है यादों के जहान में । कभी कभी लगता है कुछ तो जिंदगी में छूट रहा है पर जो भी छूट रहा है और जो छूटेगा उससे कहीं ज्यादा कुछ हसीन खूबसूरत पल छूट चुका है जिसे भूलना नामुमकिन सा लगता है । ऐसा लगता है जैसे वही समय वही पल ही इस जिंदगी का सबसे बेहतर पल था वो पल फिर कभी जिंदगी के दुबारा नहीं आएगा । Written By Me i.e Technical Kunj

05/07/2025

बीतता समय

समय पल पल बीता जा रहा है ..1-1 सेकेंड जो अभी पास हुआ वो मेरी जिंदगी के आखिरी समय की ओर बढ़ रहा है ।

पुरानी फोटो देख कर याद करता हूं उस गुजरे हुए दिन रात को जिसमे मैने अपनी जिंदगी के कुछ बहुमूल्य जीवन को जी लिया । वो खूबसूरत सा पल अब कभी नहीं आ रहा है , सोचता हु कभी न कभी वो बीते हुए पल जैसा फिर वापस वैसा ही पल आए पर आज मैं 30 साल का हो गया हु अब वो बीता हुआ पल जैसा पल वापस नहीं आ रहा ।

15/11/2024

मेरा हमेशा से यह मानना रहा है कि दुनिया में ‌जितना बदलाव हमारी पीढ़ी ने देखा है वह ना तो हमसे पहले किसी पीढ़ी ने देखा है और ना ही हमारे बाद किसी पीढ़ी के देखने की संभावना लगती है

हम वह आखिरी पीढ़ी हैं जिसने बैलगाड़ी से लेकर सुपर सोनिक जेट देखें हैं.बैरंग ख़त से लेकर लाइव चैटिंग तक देखा है और असंभव लगने वाली बहुत सी बातों को संभव होता देखा है.

● हम वो आखिरी पीढ़ी हैं

जिन्होंने कई-कई बार मिटटी के घरों में बैठ कर परियों और राजाओं की कहानियां सुनीं, जमीन पर बैठ कर खाना खाया है, प्लेट में चाय पी है।

● हम वो आखिरी लोग हैं…

जो मोहल्ले के बुज़ुर्गों को दूर से देख कर, नुक्कड़ से भाग कर, घर आ जाया करते थे. और समाज के बड़े बूढों की इज़्ज़त डरने की हद तक करते थे

● हम वो आखिरी पीढ़ी के लोग हैं

जिन्होंने चिमनी , लालटेन, कम या बल्ब की पीली रोशनी में होम वर्क किया है और चादर के अंदर छिपा कर नावेल पढ़े हैं।

● हम उसी पीढ़ी के लोग हैं…

जिन्होंने अपनों के लिए अपने जज़्बात, खतों में आदान प्रदान किये हैं और उन ख़तो के पहुंचने और जवाब के वापस आने में महीनों तक इंतजार किया है।

● हम उस आखिरी पीढ़ी के लोग हैं

जिन्होंने कूलर, एसी या हीटर के बिना ही बचपन गुज़ारा है। और बिजली के बिना भी गुज़ारा किया है।

जो अक्सर अपने छोटे बालों में, सरसों का ज्यादा तेल लगा कर, स्कूल और शादियों में जाया करते थे।

जिन्होंने गुड़ की चाय पी है।

काफी समय तक सुबह काला या लाल दंत मंजन या सफेद टूथ पाउडर इस्तेमाल किया है और कभी कभी तो नमक से या लकड़ी के कोयले से दांत साफ किए हैं।

जिन्होंने चांदनी रातों में, रेडियो पर BBC की ख़बरें, विविध भारती, आल इंडिया रेडियो, बिनाका गीत माला और हवा महल जैसे ❣️🙏

#यादें #बचपन #बीताहुआसमय

14/10/2024

किस्सा सेप्पू का

सेंपू का उपयोग आपने अपनी जिंदगी में कभी न कभी जुल्फे संवारने के जरूर किए होगे । नहाते समय बालों में सेंपु लगाने से बाल चमकीले सुनहरे और पतले सीधे नजर आने लगते है और हवा चलने पर बाल लहराने लगते है ।

पर सोच का विषय है ऐसा क्या हुआ की मुझे सेम्पू पर कुछ लिखने का सोच आया , कुछ घटना जिंदगी के ऐसी हो जाती है जिसे जिंदगी भर भुलाना नामुमकिन सा हो जाता है, सेम्पु की घटना भी कुछ ऐसी ही है जब जब साबुन से नहाता हूं तो किसी की याद नही आती पर जब जब सेंपु बालो में लगाता हूं तो किसी की याद आ जाती है ।

बात उन दिनों की जब हम जवानी में पहला कदम रखे थे महिला मित्र बनाने का प्रचलन शुरू हो गया था । वो रोज चोरी चोरी हमसे मिलने आती थी कभी मेरे घर में तो कभी खेतो मे तो कभी बगीचों में तो कभी नदी के किनारे तो कभी उसके ही घर में तो कभी सुबह सुबह तो कभी दोपहर तो कभी शाम तो कभी आधी रात में ।

जैसे एक लड़का और एक लड़की शादी के बाद रहते है , मिलते है , बात करते है , एक दूसरे की तारीफ करते है ठीक उसी प्रकार का समय बीत रहा था बिना शादी का इन दोनो लड़का लड़की का ।

लड़की खूबसूरत थी गाल खिले खिले लगते थे जैसे बगीचे का ताजा फल लाल हो ,

बोली तो ऐसे बोलती थी की जैसे कोयल बोल रही हो ,

लम्बी लम्बी काली घने सुनहरे बाल तो जैसे उसकी चेहरे की सुंदरता में चार चांद लगा रहे थे।

उसकी चाल , कमर मटका मटका कर चल कर मुझे दीवाना बना दी थी ।

रात के 1 बजे थे काली अंधरी रात में वो चुपके से अपनी घर से निकलकर मेरे घर आई , बल्ब जल रहा था रूम में , खुले बालो में आई थी वो उस दिन ।

वो हमेशा बिना मेकअप और बिना लिपिस्टिक लगाए हुए आती थी न ही कोई सिंगार पहनती थी , सिर्फ बाह में काला धागा बांध हुए रहती थी ।

भगवान ने उसको बनाने में बहुत टाइम दिया था एक एक अंग की खूबसूरती और चमक को ऐसा सजाया था की उसे कभी सिंगार की जरूरत ही न पड़ी ।

रात में वो मेरे रूम में आई और मैंने उससे कहा एक गाना सुनी हो ...ना कजरे की धार ....ना मोतियों की हार...ना कोई किया सिंगार ...फिर भी इतनी सुंदर हो ....

वो मुस्कुराते हुए बोली - हां मुझे पूरा याद है सुनाती हूं ...और वो गाने की आगे की लाइन सुनाने लगी ...

खूबसूरती की तारीफ हो ही रहा था तो मैंने उससे पूछा तुम आज मेकअप कर के आई हो क्या आज तो और खूबसूरत लग रही हो और चेहरा सॉफ्ट भी है फिर वो जो जवाब दी जिसे मैं मरते दम तक न भूलूंगा । मैं अपने आप को पहचानना भूल जाऊंगा पर वो बात नहीं । वो बोली मैं शैंपू से बाल के साथ मुंह भी शैंपू से धोती हूं 😳

14/10/2024

वो क्यों आज याद आई

हां आज फिर याद आई है , जिनसे बिछड़े हुए जमाने हुए है , सालों साल बीत गए है पर आज पता नहीं क्यों आंखों के सामने नजर आ रही है जिनसे मिले, न जाने कितने सावन न जाने कितने बरसात बीत गए है । याद आई तो ठीक है पर आंखों में आशु क्यों लाई है ?

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