05/04/2026
देखिए आपलोग हमारे पूर्वज किस तरह से खुद को मजबूत हर क्षेत्र में किए थे हमलोग को भी ऐसे ही मजबूत होना है हमारा समाज ज्ञान, त्याग, संघर्ष और इतिहास की मजबूत उदाहरण है। हम किसी के आगे नहीं झुके, हमें अपनी विरासत को संभालना होगा।
भूमिहार सिर्फ एक समाज नहीं बल्कि एक विचारधारा, एक परंपरा और एक जिम्मेदारी का नाम है। भूमिहार शब्द का अर्थ है भूमि का स्वामी या वह जो भूमि से जीवन यापन करता है, लेकिन हमारी असली पहचान सिर्फ जमीन से नहीं बल्कि ज्ञान, धर्म, साहस और समाज सेवा से बनी है।हमारा समाज मुख्य रूप से बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड की पवित्र धरती पर बसा है। प्राचीन काल से ही हम मगध साम्राज्य की धरती पर विद्वानों, गुरुओं, योद्धाओं और प्रशासकों के रूप में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आए हैं।इतिहास गवाह हैभूमिहार समाज ने हमेशा शिक्षा, धर्म और राष्ट्र सेवा को प्राथमिकता दी। हमारे पूर्वजों ने समाज को दिशा देने का काम किया। जब देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा था तब भी हमारे समाज के लोगों ने स्वतंत्रता आंदोलन और समाज सुधार में बढ़-चढ़कर भाग लिया।शौर्य और स्वाभिमान की पहचान भूमिहार society को हमेशा स्वाभिमान और साहस के लिए जाना गया है। हमने कभी अन्याय के सामने झुकना नहीं सीखा और हमेशा सत्य और न्याय के साथ खड़े रहे।समाज सेवा की परंपरा
18वीं और 19वीं शताब्दी में जब हमारा समाज जमींदारी व्यवस्था में प्रभावशाली था, तब भी हमारे पूर्वजों ने केवल संपत्ति इकट्ठा नहीं की बल्कि समाज के विकास में योगदान दिया:स्कूल और कॉलेज बनवाए,मंदिरों और धर्मस्थलों का निर्माण कराया,गरीब और किसानों की सहायता की,सामाजिक एकता को मजबूत किया
किसान आंदोलन में योगदान महान संत और किसान नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती ने बिहार प्रांतीय किसान सभा की स्थापना कर किसानों को उनका हक दिलाने के लिए ऐतिहासिक आंदोलन चलाया। उनका संघर्ष आज भी प्रेरणा देता है कि समाज के लिए लड़ना ही सच्ची सेवा है।राजनीति और प्रशासन में योगदान बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिंह (श्री बाबू) ने बिहार के विकास की मजबूत नींव रखी। उनका नेतृत्व आज भी बिहार के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाता है।हमारी असली पहचान क्या है?हमारी पहचान सिर्फ जाति नहीं है, बल्कि शिक्षा, न्याय, समाज की रक्षा और सभी वर्गों की मदद करना ही हमारी असली परंपरा है।
हमारी विरासत हमें सिखाती है कि ब्राह्मण होना सिर्फ पूजा करना नहीं बल्कि समाज को सही रास्ता दिखाना, जरूरतमंद की मदद करना और अन्याय के खिलाफ खड़ा होना है।हम भगवान परशुराम को अपना आदर्श मानते हैं, जो ज्ञान और शस्त्र दोनों के प्रतीक हैं।
आज के समय में भी भूमिहार समाज शिक्षा, सेना, प्रशासन, राजनीति, व्यापार और समाज सेवा के क्षेत्र में देश का नाम रोशन कर रहा है। हमें अपने इतिहास पर गर्व है लेकिन उससे भी ज्यादा जिम्मेदारी है कि हम आने वाली पीढ़ी को शिक्षा, संस्कार और एकता की ताकत दें।
जय भगवान परशुराम,जय भूमिहार समाज,जय हिंद
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