24/11/2025
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*🔥 आज की प्रेरणा प्रसंग 🔥*
*🌹 हरी मिर्च वाली अम्मा - एक छोटी-सी मुलाकात, बड़ी-सी सीख 🌹*
ट्रेन से उतरते ही मैंने घर फोन मिलाया- "कुछ लाना तो नहीं है?"
बीवी बोली,"हरी मिर्च ख़त्म हो गई है… एक पाव लेते आना।"
मैंने हँसकर कहा,"ठीक है, ले आता हूँ।"
स्टेशन से बाहर निकलकर मैं सड़क की तरफ चल ही रहा था कि एक बूढ़ी अम्मा दिखाई दीं।फटी-पुरानी साड़ी,माथे पर पसीने की लकीरें, और सामने रखी एक छोटी टोकरी,जिसमें बस कुछ हरी मिर्चें और दो-चार सब्ज़ियाँ थीं।
मैंने पूछा, "अम्मा, हरी मिर्च का क्या भाव है?"
अम्मा बोलीं,"बाबूजी, 20 रुपये पाव…"
मैंने आदतन कहा,"15 लगा लो।"
अम्मा ने धीमी आवाज़ में कहा,
"बाबूजी, 5 रुपये भी मेरे लिए बहुत होते हैं… थोड़ा मुझे भी कमा लेने दो।"
उसके स्वर में कोई तंज नहीं था, बस एक थकान थी,एक उम्मीद थी,और शायद, ज़िंदगी का बोझ भी।
मैं बिना कुछ बोले वहाँ से आगे बढ़ गया। थोड़ा दूर एक बड़ी
दुकान थी,चमचमाती लाइटें, सब्ज़ियाँ सजी हुई, और भीड़ का शोर।
मैंने पूछा—"हरी मिर्च का क्या भाव?
दुकानदार बोला,"30 रुपये पाव, रेट फिक्स है।"
मैंने कहा, "कुछ कम नहीं हो सकता?"
वो बोला,"साहब, यहाँ मोलभाव नहीं चलता।"
अजीब-सी चुभन हुई। जिसके पास सब कुछ है, वह मुझे रेट फिक्स बताता है,और जिसके
पास कुछ भी नहीं…वो अपने हिस्से के 5 रुपये छोड़ने को तैयार नहीं होती।
मैं वापस मुड़ा और उसी अम्मा के पास आ गया।अम्मा ने मुझे देखा, मुस्कुरा दीं-“आ गए बाबूजी? मिर्च ले लीजिए, बहुत ताज़ी हैं…”
मुझे नहीं पता क्यों,लेकिन उनकी मुस्कान में जैसे कोई अनकही कहानी छिपी थी।
मैंने कहा,"अम्मा, दो पाव तौल दो… और भाव की चिंता मत करना।"
अम्मा का चेहरा खिल उठा। जैसे किसी ने उनके मन की धूल झाड़ दी हो।
मिर्च देते हुए वो बोलीं,"बाबूजी, पहले मेरे आदमी की छोटी दुकान थी…अच्छा चलता था।पर बीमारी ने उन्हें तोड़ दिया…और दुकान भी।अब बस ये टोकरी ही है…
इसी से गुज़ारा करती हूँ।"
कहते-कहते उनकी आँखें भर आईं। मेरे मन में कुछ भारी-सा उतर गया।मैंने सौ रुपये निकाले और उनके हाथ पर रख दिए।
अम्मा घबराकर बोलीं "बाबूजी, छुट्टे नहीं हैं मेरे पास।"
मैंने मुस्कुराते हुए कहा,"रहने दीजिए अम्मा।अब से मैं यहीं से सब्ज़ी लिया करूँगा।"
अम्मा कुछ बोली नहीं।बस मुस्कुराईं… और उस मुस्कान में जितनी कृतज्ञता थी,उतनी शायद पूरी ज़िंदगी में किसी ने मुझे नहीं दी थी। उस दिन घर लौटते समय एक बात दिल में साफ हो गई-
हम अमीरों के पास जाकर कीमत नहीं पूछते,पर उन लोगों के सामने मोलभाव करते हैं,जो हर दिन अपने हिस्से की धूप झेलते हुए जीवन का संघर्ष लड़ते हैं।
असल ग़लती हमारी सोच की है।हम चमकदार दूकानों को इज़्ज़त देते हैं,पर मेहनत और सच्चाई से भरी हथेलियों की कीमत भूल जाते हैं।
अब मैं रोज़ उसी अम्मा से सब्ज़ी लेता हूँ। कुछ ही महीनों में उन्होंने थोड़ा-थोड़ा पैसा जोड़कर एक ठेला खरीद लिया।सब्ज़ियाँ भी ज़्यादा लाने लगीं। अब उनकी चाल में आत्मविश्वास है,आँखों में रोशनी है,और चेहरे पर हमेशा मुस्कान।
कभी-कभी लगता है-मैंने सिर्फ़ उनके ठेले को नहीं,उनके मनोबल को खरीद कर लौटा हूँ।और बदले में उन्होंने मुझे एक अनमोल सीख दे दी-"मोलभाव चीज़ों से करो, इंसानों से नहीं।"
*सदैव प्रसन्न रहिये - जो प्राप्त है, पर्याप्त है।*
*जिसका मन मस्त है - उसके पास समस्त है।।*