BackwardNama

BackwardNama दस का शासन नब्बे पर,नही चलेगा,नही चलेगा।सौ में नब्बे शोषित है,नब्बे भाग हमारा है,धन-धरती और राजपाट में,नब्बे भाग हमारा है।
॥जय संविधान,जय अम्बेडकर॥

14/12/2025

"IAS संतोष वर्मा की बर्खास्तगी के खिलाफ बड़े आंदोलन होंगे और हम बढ़-चढ़कर हिस्सा लेंगे"

-दामोदर सिंह यादव का बड़ा बयान

04/12/2025

"महात्मा फुले का अपमान करने वाले आनंद स्वरूप पर कार्यवाही सरकार करे नहीं तो अम्बेडकरवादी कर देंगे…"
- दामोदर सिंह यादव, आज़ाद समाज पार्टी नेता

"राष्ट्र निर्माण के लिए सकारात्मक सोच जरूरी"राष्ट्रनिर्माण के लिए सकारात्मक सोच पर चर्चा हो रही है और उस चर्चा में 2 मिश...
04/12/2025

"राष्ट्र निर्माण के लिए सकारात्मक सोच जरूरी"

राष्ट्रनिर्माण के लिए सकारात्मक सोच पर चर्चा हो रही है और उस चर्चा में 2 मिश्र, एक मिश्रा और एक त्रिपाठी हैं. जबकि 85% आबादी का कोई प्रतिनिधि नहीं।

जागो बैकवर्ड जागो!!

महाजन कमीशन रिपोर्ट 1983 और ओबीसी आरक्षण का बहुत गहरा और सीधा राजनीतिक कनेक्शन है|यही कारण था कि इस रिपोर्ट को दबाया गया...
03/12/2025

महाजन कमीशन रिपोर्ट 1983 और ओबीसी आरक्षण का बहुत गहरा और सीधा राजनीतिक कनेक्शन है|

यही कारण था कि
इस रिपोर्ट को दबाया गया और कभी सार्वजनिक नहीं होने दिया गया| OBC आरक्षण और बाबरी विध्वंस का राजनीतिक कनेक्शन 1990-92 को समझिए|

अगस्त 1990 में मंडल कमीशन लागू हुआ. वी.पी. सिंह की सरकार ने ओबीसी को 27% आरक्षण लागू किया| इससे इससे पूरे भारत में भयंकर विरोध हुआ, खासकर ऊपरी जातियों सवर्णों में.

छात्रों ने आत्मदाह किए, दंगे हुए, भाजपा-आरएसएस बहुत नाराज़ थी क्योंकि उनका परंपरागत वोट बैंक सवर्ण छिटक रहा था|

मंडल ने जवाब में भाजपा ने कमंडल (राम मंदिर आन्दोलन) को हथियार बनाया. लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा सितम्बर 1990 इसी का हिस्सा थी – इसका मकसद सवर्णों को एकजुट करना और OBC आरक्षण के गुस्से को हिंदुत्व की ओर मोड़ना था|

नतीजा यह हुआ कि →“राम मंदिर के नाम पर – ओबीसी और सवर्ण एक मंच पर आ गए!”

जस्टिस महाजन ने अपनी रिपोर्ट में साफ लिखा कि —
“बाबरी मस्जिद का विध्वंस एक सुनियोजित राजनीतिक साज़िश थी जिसका मुख्य उद्देश्य मंडल कमीशन के OBC आरक्षण के खिलाफ सवर्ण हिंदुओं में पैदा हुए असंतोष को हिंदुत्व के नाम पर एकजुट करना और वोट में बदलना था।”

बाबरी ढहाना सिर्फ धार्मिक मुद्दा नहीं था, बल्कि मंडल ओबीसी आरक्षण का जवाबी हमला था|

रिपोर्ट दबाने की असली वजह यह भी था कि – अगर यह रिपोर्ट 1993 में सार्वजनिक हो जाती तो, साबित हो जाता कि राम मंदिर आन्दोलन का असली मकसद OBC आरक्षण को कमजोर करना था|

जागो बैकवर्ड जागो!!

02/12/2025

जिसको संविधान नहीं मनुस्मृति चाहिए। उठाओ अपना मनुस्मृति और फूटो यहां से। यह देश बाबा साहब के संविधान से चलेगा, तुम्हारी दो कौङी की मनुस्मृति से नहीं।

TMC क्षेत्रीय पार्टी है, इस पार्टी को इलेक्टरोल बॉन्ड के जरिए 1397 करोड़ रुपए मिले.इसके बावजूद Mamta Banerjee दौलत की बे...
29/11/2025

TMC क्षेत्रीय पार्टी है,
इस पार्टी को इलेक्टरोल बॉन्ड के जरिए 1397 करोड़ रुपए मिले.

इसके बावजूद Mamta Banerjee दौलत की बेटी नही हैं.

कारण मनुवादियों की अवधारणा में दौलत की बेटी केवल बहन मायावती हैं.

ब्राह्मण ममता बनर्जी बंगाल का सत्यानाश कर रही है कोई भी ब्राह्मण इसके खिलाफ नहीं बोलेगा क्योंकि ममता बनर्जी ब्राह्मण जाति से आती हैं.

और ना ही कोई मीडिया कर्मी ममता से कहेगा कि आप ब्राह्मण होकर देश का सत्यानाश क्यों कर रही है?

मनुवाद अपने जाति के नेताओं की रक्षा करता है और OBC SC ST नेताओं को बदनाम करता है.

यही मनुवाद है,यही जातिवाद है

जागो बैकवर्ड जागो!!

पश्चिम बंगाल में आप क्षत्रिय + OBC व दलित समाज का स्थिति को देखें📍पश्चिम बंगाल में अब तक 8 मूख्यमंत्री हुए हैं।ब्राम्हण ...
28/11/2025

पश्चिम बंगाल में आप क्षत्रिय + OBC व दलित समाज का स्थिति को देखें📍

पश्चिम बंगाल में अब तक 8 मूख्यमंत्री हुए हैं।

ब्राम्हण मुख्यमंत्री :-👇

1. प्रफुल्ल चंद्र सेन - 5 वर्ष
2. अजय कुमार मुखर्जी - 2 वर्ष
3. सिध्दार्थ शंकर रे - 5 वर्ष
4. बुद्धदेव भट्टाचार्य - 11 वर्ष
5. ममता बनर्जी - 14 वर्ष से कान्टीन्यू

कायस्थ मुख्यमंत्री -

1. डॉ बिधान चंद्र राय 14 वर्ष
2. ज्योति बसु - 23 वर्ष

यादव (अहीर) मुख्यमंत्री -

1. सबसे पहले मुख्यमंत्री डॉ प्रफुल्ल चंद्र घोष लगभग 1 वर्ष

राजपूत मुख्यमंत्री - 00

अन्य OBC मुख्यमंत्री - 00

दलित मुख्यमंत्री - 00

मुस्लिम मुख्यमंत्री - 00

आइए अब पश्चिम बंगाल में ब्राम्हण ममता बनर्जी जी के कार्यकाल की वर्तमान स्थिति दिखाते है

पश्चिम बंगाल विधानसभा :-👇

नेता सदन- ममता बनर्जी
उपनेता सदन- शोभनदेब चटर्जी
विधानसभा अध्यक्ष- बीमन बनर्जी
विधानसभा उपाध्यक्ष- अशीष बनर्जी

ममता दीदी के स्वजातिय की वहां के मंत्रीमंडल में हिस्सेदारी:-👇

कैबिनेट मंत्री - 4
राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार- 2
राज्यमंत्री - 3

तृणमूल कांग्रेस बंगाल प्रदेश अध्यक्ष- ऋताव्रता बनर्जी
राष्ट्रीय महासचिव- अभिषेक बनर्जी (कुल-3) मुख्य सलाहकार मुख्यमंत्री- अलापन बंदोपाध्याय

सचिवों की सूची :-👇

मुख्य सचिव- मनोज पंत
मुख्य सचिव गृह- नंदिनी चक्रवर्ती
उपभोक्ता मामला- अत्रि भट्टाचार्य
पर्यावरण- प्रभात मिश्रा
वित्त- हरि कृष्ण द्विवेदी (ACS)
उच्चतर शिक्षा- आर.एस. शुक्ला (ACS)
गृह- अलापन बंदोपाध्याय (ACS)
उद्योग- अलापन बंदोपाध्याय (ACS)
जमीन/जमीन सुधार- मनोज पंत (ACS)
लघु उद्योग- राजन पांडे
संसदीय कार्य- अलापन बंदोपाध्याय (ACS) सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन- हरि कृष्ण द्विवेदी सार्वजनिक स्वास्थ्य- मनोज पंत (ACS)
पर्यटन- नंदिनी चक्रवर्ती
जल संसाधन - प्रभात मिश्र
राज्य पुलिस सलाहकार- मनोज मालवीय

TMC के कुल राज्यसभा सांसद- 16
मुख्यमंत्री जी के स्वजातीय- 06

TMC के कुल लोकसभा सांसद - 29 मुख्यमंत्री जी के स्वजातीय- 09

बंगाल में TMC के कुल विधायक- 229 टोटल विधायक अपर कास्ट (ब्राह्मण, कायस्थ बहुलता)-112

बंगाल के विभिन्न विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की सूची-- (मुख्यमंत्री जी के स्वजातियों का जलजला है)

रविंद्र भारती विश्वविद्यालय- शुभ्रो कमल मुखर्जी प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय- नारायण चक्रवर्ती
पश्चिम बंगाल राज्य विश्वविद्यालय- सौरन बंदोपाध्याय
विद्यासागर विश्वविद्यालय- सुशंता चक्रवर्ती
बांकुरा विश्वविद्यालय- देव नारायण बंदोपाध्याय (निवर्तमान)
काजी नाजरुल विश्वविद्यालय- देबाशीष बंदोपाध्याय
गौर बंग विश्वविद्यालय- पवित्र चट्टोपाध्याय
उत्तर बंगाल विश्वविद्यालय- विश्वजीत चटर्जी नेता जी सुभाष चन्द्र बोस विश्वविद्यालय- इंद्रजीत लहिरी
बाबा साहब अंबेडकर विश्वविद्यालय (पश्चिम बंगाल यूनिवर्सिटी आफ टीचर्स ट्रेनिंग)- सोमा बंदोपाध्याय
मौलाना अब्दुल कलाम टेक्नोलॉजी विश्वविद्यालय- तपस चक्रवर्ती

हरिचंद्र गुरुचंद्र विश्वविद्यालय- रुप कुमार

हिंदी विश्वविद्यालय- दामोदर मिश्रा

कन्याश्री विश्वविद्यालय- मीता बनर्जी

अलीपुरद्वार विश्वविद्यालय- रथिन चक्रवर्ती

पश्चिम बंगाल में कुछ नाम व सरनेम अनेक वर्गों में मिलते हैं, इसको लेकर भ्रम हो सकता है, 1-2 नाम व पहचान सुधार योग्य हो सकते हैं,

खैर, पश्चिम बंगाल में जिस प्रकार नैरेटिव बनाया गया है कि सब मु'स्लिम ही है, उन्हें सही आंकड़े देखने चाहिए।

आखिर OBC व दलित बाहुल्य आबादी वाले पश्चिम बंगाल में उन्हें उनका हक कब मिलेगा ??? 😳

जागो बैकवर्ड जागो!!

28/11/2025

कोई राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री बना देने से दलितों का उद्धार नहीं हो जाएगा। एक-एक दलित को जब तक हमारे बराबर का स्टैंड ना मिल जाए तब तक उनका आरक्षण रोकने की क्षमता किसी सरकार में नहीं होनी चाहिए।

#आरक्षण

24/11/2025

आरक्षण को एक ही तरह खत्म किया जा सकता है कि सबसे पहले जातिवाद को खत्म करो। जातिवाद, भेदवाद, छुआछूत यह खत्म करो। और आरक्षण को खत्म करने के लिए जो जितने भी आय के साधन हैं वह समान अनुपात में जितने भी जातियां हैं उन अनुपातों में बांटा जाएं ।

#आरक्षण

उत्तर प्रदेश की रहने वाली उजाला सिंह ने बिहार के एक गरीब लड़की की फर्जी EWS बनवाकर सीट खा ली, उजाला अभी गया जिले में APO...
23/11/2025

उत्तर प्रदेश की रहने वाली उजाला सिंह ने बिहार के एक गरीब लड़की की फर्जी EWS बनवाकर सीट खा ली, उजाला अभी गया जिले में APO के पद पर कार्यरत हैं.

उत्तर प्रदेश की रहने वाली उजाला ने फर्जी तरीके से बिहार के औरंगाबाद जिले से छोटी से पैतृक जमीन दिखा कर फर्जी EWS बनवाया , वरना किसी बाहर स्टेट के बच्चे को बिहार में जनरल कैटेगरी में ही फाइट करना पड़ता , अगर आप मार्कशीट देखेंगे तो पाएंगे कि अगर उजाला ने फर्जी EWS नहीं लगाया होता तो किसी गरीब बच्ची को वो जगह आराम से मिल गई होती , लेकिन रानी साहिबा ने तो बेइमानी करना और प्रजा को ठगना उचित समझा।

आप मैडम का वोटर डिटेल्स देख सकते है जो वाराणसी उत्तर प्रदेश की हैं और ड्राइविंग लाइसेंस तो फर्जी तरीके से नौकरी पाने के बाद 2023 में ही वाराणसी के एड्रेस पर बना है , बिहार के कुछ अधिकारी और मामा जी ( ADJ) साहब उजाला को बचाने में लगे हैं , उजाला के भाई ने भी फर्जी EWS के सहारे BPSC मेंस की परीक्षा इसी वर्ष लिखी है ,नीचे मै और दस्तावेज संलग्न कर रहा हूं।

RSS और भाजपा का यादवों के खिलाफ नैरेटिव युद्ध जारी!!यूपी-बिहार के यादवों तथा सपा-राजद से ऊंची जातियों ( अपरकॉस्ट) और भाज...
23/11/2025

RSS और भाजपा का यादवों के खिलाफ नैरेटिव युद्ध जारी!!

यूपी-बिहार के यादवों तथा सपा-राजद से ऊंची जातियों ( अपरकॉस्ट) और भाजपा को इतनी नफरत क्यों है?

उत्तर प्रदेश और बिहार में दो सामाजिक समूह ऊंची जातियों और उनके प्रतिनिधि संगठन भाजपा के सबसे अधिक निशाने पर हैं। पहला यादव और दूसरा आंबेडकरवादी दलित। फिलहाल यहां मैं उत्तर प्रदेश-बिहार के यादवों के प्रति इन दोनों प्रदेशों के ऊंची जातियों और वर्तमान में उनके प्रतिनिधि राजनीतिक संगठन भाजपा के नफरत के कारणों को रेखांकित करने की कोशिश कर रहा हूं।

समसामयिक राजनीतिक कारण

पहले राजनीतिक कारणों पर विचार करते हैं। सबसे पहले तात्कालिक राजनीतिक कारण की बात। उत्तर प्रदेश और बिहार में लोकसभा की कुल 120 सीटें हैं। लोकसभा की कुल सीटों का करीब 22 प्रतिशत। इन दोनों राज्यों में सपा और राजद सिर्फ दो पार्टियां ऐसी हैं, जो भाजपा को टक्कर देने की स्थिति में हैं। दोनों का नेतृत्व यादव समुदाय से आए नेताओं के हाथ में है। पिछले लोकसभा चुनाव (2024) में नरेंद्र मोदी को बहुमत से उत्तर प्रदेश में सपा ने दूर कर दिया। भाजपा को सपा ने 80 में 33 सीटों पर समेट दिया। स्पष्ट है कि भाजपा इन दोनों राज्यों में सपा और राजद को पराजित किए बिना केंद्र में अपनी सरकार नहीं बना सकती है। दूसरे शब्दों में कहें तो ये दो पार्टियां भाजपा की केंद्र की सत्ता के मार्ग की सबसे बड़ी अवरोध हैं। यही दो पार्टियां हिंदी पट्टी में भाजपा के करीब पूर्ण वर्चस्व को रोके हुए हैं।

इन दोनों प्रदेशों में ऊंची जातियां अपनी पूरी संख्या और ताकत के साथ भाजपा के साथ खड़ी हैं। पिछले लोकसभा के चुनावों में उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों के 89 प्रतिशत और राजपूतों के 80 प्रतिशत वोटरों (लोकनीति-सीएसडीएस सर्वे) ने भाजपा को वोट दिया था। इसके बावजूद भी भाजपा सपा से तीन सीट पीछे रह गई और सपा के सहयोग से कांग्रेस भी 6 सीटें जीतने में कामयाब रही। उत्तर प्रदेश में भाजपा की यह पराजय ऊंची जातियों को खुद की पराजय लगी। अयोध्या में भाजपा की हार ने तो उन्हें मर्माहत ही कर दिया था। इसी तरह बिहार में भी ऊंची जातियों का झुकाव भाजपा के प्रति है। बिहार में भाजपा की किसी तरह की जीत ऊंची जातियों को अपनी जीत लगती है। इसी तरह उसकी हार अपनी हार लगती है।

बिहार और उत्तर प्रदेश को छोड़ दिया जाए तो हिंदी पट्टी भाजपा का 2014 के बाद से अभेद्य दुर्ग बनी हुई। मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़ और दिल्ली की लोकसभा की बहुलांश सीटें 2014 के बाद लगातर भाजपा जीत रही है। भले ही इनमें से कुछ राज्यों में कभी-कभी कांग्रेस अपनी सरकार बना लेती है।
उत्तर प्रदेश और बिहार भाजपा के लिए आज भी मुश्किल गढ़ बना हुआ है। इन दोनों राज्यों की विधान सभा चुनावों में भी सपा और राजद के नेतृत्व में बना गठबंधन ही भाजपा के लिए मुश्किल पैदा करता है। 2020 के बिहार विधान सभा चुनाव में राजद के नेतृत्व में बने महागठबंधन ने एनडीए को करीब-करीब हरा ही दिया था। चुनावी और प्रशासनिक तंत्र का इस्तेमाल करके उसे सत्ता से बाहर रखा गया। दोनों गठबंधनों के वोटों में सिर्फ 12 हजार का अंतर था।
साफ है कि यदि कोई पार्टी हिंदी पट्टी और वह भी यूपी और बिहार जैसे बड़ी आबादी वाले राज्य में भाजपा के लिए मुख्य राजनीतिक चुनौती है, तो वह आज की तारीख में सपा और राजद है। चूंकि वह भाजपा के लिए चुनौती हैं, इसलिए नए सिरे से हर तरह के वर्चस्व को स्थापित करने का स्वप्न देख रहे हैं। भाजपा के सबसे स्थायी कोर वोटर ऊंची जातियां यादवों को सबसे बड़ी चुनौती के रूप में देखती हैं। भाजपा और उनके स्थायी कोर वोटर किसी भी तरह इन पार्टियों और इनके नेतृत्व को खत्म या बहुत ही कमजोर कर देना चाहता हैं, क्योंकि इन दोनों पार्टियों ने वोटरों के बड़े हिस्से के राजनीतिक हिंदूकरण को भी कम-से-कम यूपी और बिहार में रोक रखा है। यह हिंदू राष्ट्र की संघ-भाजपा की दीर्घकालिक परियोजना के लिए सबसे बड़ी और ठोस बाधा है।

दूसरा कारण यह है कि यूपी-बिहार की हर क्षेत्रीय पार्टी भाजपा की गोद में बैठ चुकी है सिवाय सपा और राजद के। केवल यही दो पार्टियां हैं, जिनके बारे में भाजपा को यह पता है कि उनके नेता उनकी राजनीतिक गोद में नहीं बैठेंगे और न ही इसकी संभावना लगती है। इसका सबसे बड़ा कारण तो यह है कि इन पार्टियों के बड़े और मजबूत सहयोगी मुस्लिम हैं, जिन्हें भाजपा ने खुल्लम-खुल्ला अपना दुश्मन घोषित कर रखा है। यह बहुत ही मुश्किल है कि सपा और राजद मुसलमानों के बीच अपने मजबूत राजनीतिक आधार को खोकर भाजपा की राजनीतिक गोद में बैठें और उनके साथ गठबंधन करें।

यूपी और बिहार में मुस्लिम वोट कमोबेश लंबे समय से इन पार्टियों के साथ लामबंद हैं। मुस्लिम वोटरों को लगता है कि यही पार्टियां मुसलमानों को हर तरह से हाशिए पर ढकेलने वाली और हिंदू राष्ट्र के अभियान में लगी भाजपा को इन प्रदेशों में चुनौती दे सकती हैं और दे रही हैं। यह सच भी है। जहां हिंदू पट्टी के अन्य प्रदेशों में भाजपा मुसलमानों को किनारे लगाने में कामयाब हुई है, वहीं यूपी और बिहार में इन पार्टियों के साथ जुड़कर मुसलमान एक हद तक अपना राजनीतिक वजूद बचाए हुए हैं। इन दोनों प्रदेशों में सपा और राजद के मजबूत वोट बैंक यादवों और मुसलमानों के बीच एक गहरा राजनीतिक गठजोड़ है। मुसलमानों के साथ उनकी इतनी गहरी राजनीतिक गठजोड़ इन प्रदेशों के ऊंची जाति के हिंदुओं और इनके प्रतिनिधि संगठन भाजपा को गहरे स्तर पर चुभता है। उन्हें लगता है कि यदि यह गठजोड़ न होता तो वे इन मुसलमानों को कब का और किनारे लगा चुके होते। ये पार्टियां, इनके कोर वोटर यादव और इनके नेताओं के चलते भाजपा और ऊंची जातियों को सबसे अधिक चुभती हैं।

रामजन्मभूमि आंदोलन और हिंदू राष्ट्र के अभियान के खिलाफ निर्णायक तरीके से खड़ा होना

यादव बिरादरी और इनके नेताओं के खिलाफ भाजपा के नफरत के ऐतिहासिक कारण भी हैं। इनमें से एक बाबरी मस्जिद को राममंदिर घोषित करने के राजनीतिक अभियान की मुखालफत करना है। बाबरी मस्जिद को राममंदिर घोषित करने और उसकी जगह राममंदिर बनाने के भाजपा के राजनीतिक अभियान के मार्ग में जो पार्टी और नेता निर्णायक तरीके से खड़े हुए वे यादव बिरादरी के मुलायम सिंह यादव और लालू यादव थे। मुलायम सिंह को हिंदुओं का हत्यारा तक घोषित कर दिया गया। उन्हें मुल्ला मुलायम नाम ऊंची जातियों और भाजपा ने दिया। कमोबेश यही स्थिति लालू यादव की रही है। उन्होंने राम रथयात्रा लेकर भाजपा के राजनीतिक अभियान पर निकले लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार किया। उनके पूरे अभियान का हर स्तर पर विरोध किया।

हिंदू राष्ट्र और हिंदुत्व के राजनीतिक अभियान के सामने हिंदी पट्टी में दो ही पार्टियां और नेता निर्णायक तरीके से खड़े हुए। सपा-राजद और मुलायम सिंह यादव और लालू यादव। कांग्रेस रामजन्मभूमि अभियान के पूरे दौर में ढुलमुल रही। कांग्रेस की केंद्र में सरकार के दौर में ही बाबरी मस्जिद तोड़ी गई। नरसिम्हा राव की कांग्रेसी सरकार मूकदर्शक सबकुछ देखती रही। मस्जिद को विध्वंस से रोकने के लिए कोई निर्णायक कदम नहीं उठाया। लेकिन पूरे रामजन्मभूमि आंदोलन के दौरान लालू और मुलायम भाजपा-संघ के मार्ग में खड़े रहे। कांटे की तरह चुभते रहे।

निर्णायक तरीके से ऊंची जातियों के राजनीतिक वर्चस्व-नियंत्रण को तोड़ा

एक कारण यह भी कि यूपी-बिहार में मुलायम सिंह यादव और लालू यादव ने ही पहली बार निर्णायक तरीके से ऊंची जातियों के राजनीतिक वर्चस्व-नियंत्रण को तोड़ा। आज भले ही भाजपा के अजय सिंह बिष्ट उर्फ योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में यूपी में राजनीतिक तौर पर ऊंची जातियों के वर्चस्व-नियंत्रण की वापसी हो गई हो और बिहार में इस बार विधान सभा और मंत्रीमंडल गठन में ऊंची जातियों के वर्चस्व में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, लेकिन मुलायम और लालू ही वे पहले नेता रहे, जिन्होंने यूपी-बिहार में ऊंची जातियों के राजनीतिक वर्चस्व को एक लंबे समय के लिए तोड़ दिया था।

ऐसा नहीं है कि मुलायम सिंह यादव और लालू यादव के पहले निम्न जातियों से आने वाला इन प्रदेशों में कोई मुख्यमंत्री नहीं बना, लेकिन वे मुख्यमंत्री निर्णायक तरीके से अपनी-अपनी पार्टियों और सरकारों के प्रमुख नहीं थे। वे इस स्थिति में नहीं थे कि जिसे चाहें टिकट दें, विधायक बनाएं, विधान परिषद सदस्य बनाएं, राज्यसभा सदस्य बनाएं और अपने मंत्रिमंडल में रखें। कोई दूसरा उनकी पार्टी या सरकार में उनके ऊपर सुप्रीमो नहीं था। ये दोनों पहले ऐसे मुख्यमंत्री थे, जो अपने मर्जी से काम कर सकते थे, निर्णय ले सकते थे, जिन पर ऊंची जातियों का कोई सीधा नियंत्रण नहीं था।
सीधे शब्दों में कहें तो इन दोनों नेताओं और इनकी पार्टियों ने यूपी-बिहार में पहली बार राजनीति पर ऊंची जातियों के राजनीतिक नियंत्रण और वर्चस्व को खत्म किया। इस ‘अपराध’ के लिए इन दोनों प्रदेशों की ऊंची जातियों ने इन्हें कभी माफ नहीं किया। भले ही यूपी में सपा-बसपा के प्रतिद्वंद्विता काल में ऊंची जातियां कभी सपा या बसपा के साथ गोलबंद हुई हों और सपा ने उन्हें खुश रखने के लिए दलितों के विरोध में कई काम किए। लेकिन ज्योंही ऊंची जातियों को भाजपा के रूप में मजबूत विकल्प मिला, वह सपा-बसपा को छोड़कर पूरी तरह भाजपा के साथ हो गईं।

नफरत के सामाजिक कारण-

यूपी-बिहार, विशेषकर यूपी के यादवों ने सिर्फ प्रदेश के स्तर पर ऊंची जातियों के राजनीतिक नियंत्रण-वर्चस्व को ही नहीं तोड़ा, बल्कि गांव, कस्बां और छोटे शहरों में नीचे के स्तर में भी ऊंची जातियों को राजनीतिक के साथ सामाजिक चुनौती दी। गांवों में ऊंची जातियों के लोग यदि किसी जाति से डरते हैं, तो वह यादव बिरादरी है। वे विभिन्न कारणों से इस स्थिति में थे कि वे ऊंची जातियों के गांवों के दंबगों-बाहुबली या इलाके बाहुबली से टकरा सकते थे। उन्हें धूल भी चटा सकते थे और कई बार चटाया भी। गांवों में प्रधानी के चुनाव में या सदस्य के चुनाव में, जिला पंचायतों के चुनाव में, नगरपालिका के चुनाव में और यहां तक कि महानगर पालिका के चुनाव में भी उन्हें चुनौती दी और पराजित भी किया। भारतीय समाज की प्राथमिक ईकाई गांवों में यादवों ने ही सबसे अधिक निर्णायक चुनौती अपरकॉस्ट को दी। उनकी मनबढ़ई का उसी भाषा-लहजे और तरीके से जवाब दिया।

हालांकि आंबेडकरवादी वैचारिकी से लैस दलित वैचारिक-सांस्कृतिक तौर ऊंची जातियों के लिए हमेशा सबसे बड़ी चुनौती रहे हैं और आज भी हैं, लेकिन उनकी भौतिक स्थिति (आर्थिक स्थिति) या कहिए कि मसल पॉवर कभी ऐसी नहीं रही कि वह ऊंची जातियों को आमने-सामने के स्थानीय टकराहट में निर्णायक चुनौती दे पाएं। लंबे समय तक दलित अपनी रोजी-रोटी के लिए और काम-धाम के लिए अपरकॉस्ट पर निर्भर थे और आज भी काफी हद तक निर्भर हैं। लेकिन यादव एक हद तक की खेती-बाड़ी और पशुपालन के चलते ऊंची जातियों पर इस कदर आर्थिक तौर निर्भर नहीं थे।

मुलायम सिंह यादव और लालू यादव के राजनीतिक उभार और सरकार में आने के चलते यादवों को काफी ताकत मिली। उन्होंने अपने शक्ति और क्षमता का इस्तेमाल करके ठेके-पट्टे, दुकान-मकान, जमीन-जायजाद, मोटर-ट्रक आदि कारोबार में अपना मजबूत दखल बनाया। ऊंची जातियों के एकछत्र नियंत्रण को आर्थिक तौर पर भी तोड़ा। इस भौतिक और राजनीतिक शक्ति के मेल से यादव इस स्थिति में थे कि वे ऊंची जातियों को आमने-सामने के संघर्ष में चुनौती दे सकें। भले ही कभी जीते तो कभी हार का सामना भी करना पड़ा। लेकिन ऊंची जातियों के लिए वॉकओवर की स्थिति खत्म हो गई।

ऊंची जातियों के वर्चस्व की सामाजिक संरचना को बदलने में यादवों की यूपी-बिहार में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। अब यह नहीं कहा जा सकता है कि इन प्रदेशों के गांवों में ऊंची जातियों का एकछत्र राज्य है। हालांकि इस स्थिति को बनाने और कायम करने में बहुत सारे संगठनों, सामाजिक समूहों और संघर्षों की भूमिका है, लेकिन यादवों ने इसे एक ठोस आधार प्रदान किया।

बौद्धिक वर्चस्व को तोड़ने में भी रही है अहम भूमिका

इतना ही नहीं, ऊंची जातियों के बौद्धिक वर्चस्व को तोड़ने में भी यादवों की एक बड़ी भूमिका रही है और अब भी है। भारतीय समाज का यह जाना-पहचाना सा सच है कि बौद्धिक दुनिया पर ब्राह्मणों के वर्चस्व को सबसे निर्णायक चुनौती फुले, आंबेडकर और पेरियारवादी दलितों-पिछड़ों से ही मिली है। पर अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) के जिस समुदाय से सबसे अधिक बौद्धिक लोग सामने आए, उसमें यादव समुदाय से आए लोग अग्रणी पंक्ति में हैं। विश्वविद्यालयों-महाविद्यालयों और साहित्य-संस्कृति और पत्रकारिता आदि की बौद्धिक दुनिया में यादवों ने ब्राह्मणवादी वैचारिकी के बरक्स बहुजन वैचारिकी या वामपंथी या लोहियावादी वैचारिकी के साथ मजबूत उपस्थिति दर्ज किया। उन्होंने ऊंची जातियों को बौद्धिक तौर पर भी चुनौती दी।

इसके अलावा ब्राह्मणवादी अनुष्ठानों और ब्राह्मण पुरोहितों के साथ यादव का संबंध दूसरे पिछड़ी जाति के किसानों से भिन्न रहा है। उत्तर प्रदेश के गांवों में जैसा मैंने देखा है पिछड़ी जाति के अन्य किसानों की तुलना में यादव बिरादरी ब्राह्मणवादी अनुष्ठानों में ज्यादा धंसी हुई नहीं थी। हिंदू देवी-देवता उस कदर उनके जीवन में नहीं छाए थे, जैसा अन्य किसान समूहों में दिखाई देते हैं। यादव किसी धार्मिक या संस्कारगत अनुष्ठान में ब्राह्मणों को बुलाते थे, लेकिन शेष दिन उनके वर्चस्व को बिलकुल नहीं स्वीकार करते थे। जरूरत पड़ने पर पुरोहित को थप्पड़ भी देते थे। इसकी एक वजह उनका पशुचारक चरित्र है। वे उस तरह से किसान नहीं थे, जैसे अन्य पिछड़ी जातियों का अगड़ा हिस्सा था। शायद इसके चलते भी यादव जल्दी ही ऊंची जातियों के वर्चस्व से मुक्त हो पाए और उसे चुनौती दे पाए। मुलायम सिंह यादव और लालू यादव के राजनीतिक उभार और हिंदुत्व की राजनीति को निर्णायक चुनौती ने यादवों को तेजी से ऊंची जातियों के चंगुल से मानसिक तौर पर बाहर कर दिया। वे स्वतंत्र राजनीतिक-सामाजिक पहलकदमी ले लिए और आर्थिक जीवन में भी ताकतवर बने। यह इसके बावजूद भी कि यादवों के बड़े हिस्से के पास उतनी खेती नहीं थी, जितनी पिछड़े वर्ग के अन्य कई किसान बिरादरियों के पास थी।

वैकल्पिक विमर्श का अभाव- सपा-राजद ( मुलयाम यादव-लालू यादव-अखिलेश-तेजस्वी) की बुनियादी कमजोरी

हालांकि यादव बिरादरी और उनके नेताओं द्वारा ऊंची जातियों के राजनीतिक वर्चस्व को तोड़ने और सामाजिक और एक हद तक आर्थिक वर्चस्व को चुनौती देने की दो बड़ी सीमाएं और कमजोरियां भी दिखती थीं। सबसे बड़ी सीमा यह थी कि इन दोनों राजनीतिक नेताओं (मुलायम सिंह यादव और लालू यादव) के पास ऊंची जातियों के सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक विमर्श के बरक्स कोई वैकल्पिक विमर्श नहीं था। राजनीति में उन्होंने ऊंची जातियों को इन प्रदेशों में अपदस्थ तो किया, लेकिन तमिलनाडु के बहुजन राजनीति (डीएमके या एडीएमके) की तरह वे ऊंची जातियों को सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन में वर्चस्व की स्थिति से बेदखल करने के लिए कोई वैकल्पिक विमर्श और कार्यक्रम प्रस्तुत नहीं कर पाए। इसका एक बड़ा कारण था कि उनकी वैचारिकी की जड़ें फुले, पेरियार और आंबेडकर की कौन कहे, हिंदी पट्टी के जगदेव प्रसाद, रामस्वरूप वर्मा, पेरियार ललई सिंह, त्रिवेणी संघ से भी जुड़ी हुई नहीं थीं। वे तो अपना ठीक से रिश्ता कर्पूरी ठाकुर और मंडल कमीशन से भी नहीं कायम कर पाए। इस वैकल्पिक विमर्श और कार्यक्रम के अभाव के चलते इनकी राजनीतिक पहलकदमी सीमित होती और सिकुड़ती चली गई। इसके चलते ये ऊंची जातियों को चुनौती तो दिए और दे रहे हैं, लेकिन दूसरे पिछड़ों, उसमें अति पिछड़ों और दलितों के साथ कोई मजबूत समता-न्याय और बंधुता आधारित एका नहीं कायम कर पाए। ऊंची जातियों के वर्चस्व को तोड़ने और चुनौती देने की प्रक्रिया में यह बिरादरी और इनका राजनीतिक नेतृत्व गैर-सवर्ण सामाजिक समूहों के साथ वर्चस्व और अधीनता का रिश्ता कायम करने की तरफ बढ़ा। यह जाने हुआ या अनजाने हुआ, लेकिन यह एकहद तक हुआ। इसका फायदा सबसे अधिक ऊंची जातियों ने उठाया, जो पहले ही इनके प्रति नफरत और खुन्नस से भरा हुआ था। अन्य पिछड़े वर्गों की अगड़ी जातियों की बीच की प्रतिद्वंद्विता भी यादवों के खिलाफ माहौल बनाने में भाजपा और ऊंची जातियों की मददगार साबित हुई। यह स्थापित मनोविज्ञान है कि अपने समानधर्मी के आगे बढ़ने से ज्यादा दिक्कत और ज्यादा जलन होती है, भले ही उसको पीछे ढकेलने में वर्चस्वशाली का ही साथ क्यों न देना पड़े। इसका शिकार गैर-यादव ओबीसी जातियां भी हुईं।

एंटी-यादव नॅरेटिव का निहितार्थ

इन कमजोरियों और सीमाओं के बावजूद भी यादव बिरादरी और इनके नेतृत्व वाली पार्टियां (सपा-राजद) ही ऊंची जातियों के राजनीतिक नियंत्रण को खत्म किया था। वे ही आज भी ऊंची जातियों की वर्तमान समय में प्रतिनिधि राजनीतिक पार्टी भाजपा के लिए यूपी-बिहार में सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। वे ही हिंदुत्व की राजनीति के बेलगाम रथ को यूपी-बिहार में रोक देती हैं या रोकने की क्षमता रखती हैं। यादव बिरादरी, मुस्लिम से उनके गठजोड़ और यादवों की नेतृत्व वाली पार्टियों की हिंदुत्व की राजनीति विरोधी इस स्थिति के चलते हिंदू सवर्ण, उसका बौद्धिक-सांस्कृतिक वर्ग और उनकी पार्टी भाजपा यादवों और उनकी पार्टी से इतनी नफरत करती है। उन्हें हर तरह से कमजोर करना चाहती है। यहां तक कि उनके राजनीतिक अस्तित्व खत्म कर देना चाहती है। ऊंची जातियों का पूरा ‘अपरकास्ट इकोसिस्टम’ इनके खिलाफ काम करता है। इन्हें हर तरह से बदनाम करने की कोशिश करता है। इनको अन्य पिछड़े वर्गों, अति पिछड़ों और दलितों से पूरी तरह काट देने की रात-दिन कोशिशें करता है। हालांकि इसमें इनकी अपनी कमजोरियों की भी बड़ी भूमिका है, लेकिन इनके खिलाफ जो यूपी-बिहार में पूरा माहौल खड़ा किया गया है, जो नॅरेटिव रचा गया है और रचा जाता है, इसमें ऊंची जातियों और उसकी पार्टी-संगठन भाजपा-आरएसएस की बड़ी भूमिका है। उन्हें लगता है कि यदि ये दो पार्टियां न होतीं, तो पूरे हिंदी पट्टी पर उनका एकछत्र वर्चस्व होता। यही कारण है कि पूरा का पूरा अपरकास्ट इकोसिस्टम यादवों और उनकी पार्टियों (सपा-राजद) के खिलाफ दिन-रात काम करता है।

( फारवर्ड प्रेस में प्रकाशित)

महाराष्ट्र के ब्राह्मण पंडित गंगाधर नीलकंठ सहस्त्रबुद्धे ने महाड़ सत्याग्रह के दौरान पहली बार मनुस्मृति को आग के हवाले क...
22/11/2025

महाराष्ट्र के ब्राह्मण पंडित गंगाधर नीलकंठ सहस्त्रबुद्धे ने महाड़ सत्याग्रह के दौरान पहली बार मनुस्मृति को आग के हवाले किया—यह सामाजिक क्रांति का ऐतिहासिक क्षण था। इस कार्यक्रम में बाबासाहेब अंबेडकर भी शामिल हुए थे।

प्रगतिशील ब्राह्मणों ने मिलकर यह आयोजन किया, जिसमें बाबासाहेब को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया। वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हवन कुंड में मनुस्मृति की चौपाइयां पढ़कर उसकी प्रतियां जलाई गईं।

पंडित गंगाधर नीलकंठ सहस्त्रबुद्धे के इस विद्रोही और समानता-स्थापित करने वाले आंदोलन की याद में आज भी देशभर में 25 दिसंबर को मनुस्मृति दहन दिवस मनाया जाता है।

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