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Kissa मैं कहानी फुर्सत का हूं और जमाना जल्दी में है

11/03/2026

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ये निशानी है उस प्रेम की। वहीं प्रेम जिसके बारे में कहा जाता है कि प्रेम भूख प्यास से ऊपर की चीज है पर यहां सारी थ्योरी ...
14/01/2026

ये निशानी है उस प्रेम की।

वहीं प्रेम जिसके बारे में कहा जाता है कि प्रेम भूख प्यास से ऊपर की चीज है पर यहां सारी थ्योरी धरी की धरी रह जाती है बिहार जो ठहरा ।
वैसे बिहार के बारे में एक प्रसिद्ध कहावत है "Bihar is not for beginners" इसे चरितार्थ किए हैं दशरथ मांझी।

दशरथ मांझी महज एक व्यक्ति नहीं वो एक महापुरुष हैं जिन्होंने विषम परिस्थितियों के बावजूद पहाड़ को महज एक छेनी हथौड़े से अकेले 20 वर्षों के कड़ी मेहनत से काट कर रास्ता बना दिए । पर ऐसा नहीं था कि रास्ता नहीं था, रास्ता तो था पर पहाड़ के उस पर जाने के लिए 3 से 4 किलोमीटर कि दुरी तय करनी पड़ती थी, पहाड़ काटने से ये दूरी कम हो गई महज कुछ मीटर। पर लौटते हैं मूल बात पर, जैसा कि नाम से प्रतीत हो रहा है दशरथ मांझी जो मांझी (मुसहर) समुदाय से आते हैं इस समुदाय में जिजीविषा के लिए आज भी लोग मजदूरी पर निर्भर हैं खैर एक दिन दशरथ मांझी पहाड़ के उस पार कुछ काम कर रहे थे, उन्हीं के लिए उनकी पत्नी (फगुनिया) खाना और पानी लेकर जा रही थी, पहाड़ को पार करते वक्त उनका पैर फिसल गया और उनकी मौत हो गई। इस मौत से दशरथ मांझी आहत हुए और प्रतिशोध में जिस कारण उनकी पत्नी की मौत हुई उस कारण को ही खत्म कर दिए, उस पहाड़ को ही काट डाला। इस दौरान कई बार खनन विभाग ने उन्हें तंग किया, तो ग्रामीणों ने उन्हें यातनाएं दी पागल तक घोषित कर दिया, और बचा कुछ कसर प्रकृति ने पूरा कर दिया, कई बार आकाल भी आया लोग गांव छोड़कर जाने लगे फिर भी दशरथ मांझी अड़े रहे और पहाड़ तोड़कर ही छोड़े, और कहावत प्रसिद्ध हुआ "जबतक तोड़ेंगे नहीं तबतक छोड़ेंगे नहीं"। पहाड़ काटने से दूरियां घटी रस्ते सुगम हुए अब सरकार द्वारा रोड भी बनाया गया है।

वैसे मुहब्बत की निशानी तो ताजमहल भी है पर ताजमहल तो शहंशाह शाहजहां में बेगम मुमताज के याद में बनवाया था जो एक मकबरा है । उसने खुद नहीं बनाया था मजदूर बनाए थे पर दशरथ मांझी ने खुद 20 वर्षों में इसे तोड़ा।

ये जगह वजीरगंज के गहलौर में है। जिस जगह पर ये स्थित है वो आज भी सुखे का मार झेल रहा है, गर्मी के दिनों में स्थित और भयावह हो जाती है, यहां गरीबी आज भी चरम सीमा पर है। मैंने उसे बड़ी नजदीक से देखा।

खैर जब भी बात होगी मेहनत, गरीबी, मोटीवेशन या मुहब्बत जुआं पर एक हीं नाम होगा दशरथ मंझी।

07/01/2026

मैं कहानी फुर्सत का हूं और जमाना जल्दी में है

Saurabh Dwivedi         किस्सा में आज बात करेंगे सौरभ द्विवेदी का, इसमें ये भी बात होगी कि वो बाकी से अलग क्यों हैं, और ...
07/01/2026

Saurabh Dwivedi



किस्सा में आज बात करेंगे सौरभ द्विवेदी का, इसमें ये भी बात होगी कि वो बाकी से अलग क्यों हैं, और वो अब कहां हैं।

वैसे तो सौरभ द्विवेदी कोई परिचय के मोहताज नहीं हैं, पर जो नहीं जानते उन्हें बता दूं the lallantop के संपादक थे, उन्होंने 5 Jan को lallantop को अलविदा कह दिए।

लौटते हैं मूल बात पर, चर्चा हो रही है सौरभ की तो बता दूं वे इतने चर्चित हैं लल्लनटॉप छोड़ते ही वे ट्रेडिंग स्टार बन गए, सोशल मीडिया पर छ गए।

कुछ लोग उनकी काफी आलोचना कर रहे हैं तो कुछ ने उनको बहुत प्यार दिया। मैं बात ये नहीं करूंगा कि वो कितने अच्छे कितने सच्चे, पत्रकारिता में कितने खरे उतरे, मै बात करूंगा कि वो इतने लोकप्रिय क्यों हुए।

मैं एक बार lallantop शो देख रहा था उसमें वे किसी रेप की घटना पर स्टोरी कर रहे थे, सारी घटना सिलसिलेवार ढंग से प्रस्तुत कर रहे थे, स्टोरी समाप्त हुआ, पर समाप्ति में एक लाइन बोले "सेक्स रजामंदी से की जाए तो बहुत अच्छी चीज है"। इतने कड़वी बात सलीके से कह पाना सब के बस की बात नहीं, यही बात उनको औरों से अलग बनाता है।

अब वे lallantop छोड़ चुके हैं, उनको आज jio hotstar ke webseries "Space Zen Chandrayan" में महज 2 सेकंड के लिए देखा गया। उनकी शानदार सफर के लिए शुभकामनाएं।

यकुम जनवरी है नया साल हैदिसम्बर में पूछूँगा क्या हाल हैअमीर क़ज़लबाशआपका हाल पूछूं, न पूछूं पर अपना हल बता देता हूं। वैस...
07/01/2026

यकुम जनवरी है नया साल है
दिसम्बर में पूछूँगा क्या हाल है

अमीर क़ज़लबाश

आपका हाल पूछूं, न पूछूं पर अपना हल बता देता हूं।

वैसे तो सब दिन खास होता है पर साल का शुरुआती दिन है इसलिए और खास है, पर ये दिन और खास तब हो जाता है जब कुछ सरप्राइज हो। चलिए बिना देर किए बता ही देता हूं कि खास है क्या ?
रोज की तरह आज भी मैं दफ्तर गया, जब घड़ी की सुइयां दो पहर 12 बजने को हुई तो मुझे पोस्टकार्ड मिला । मैने बड़े ध्यान से पढ़ा और खुश हुआ।

अब आप सोच रहे होंगे की पोस्टकार्ड क्या है, तो चलिए आपको बता दूं, यह भारतीय डाक द्वारा जारी किया जाता है। भारत में पोस्टकार्ड की शुरुआत संभवतः 1879 में हुआ। इसका उपयोग छोटे संदेश भेजने के लिए किया जाता है, जिसमें लिफाफे की जरूरत नहीं होती। आमतौर पर डाक से भेजे जानेवाले सभी संदेश को लिफाफे की जरूरत होती है सिवाय पोस्टकार्ड के। यह भारतीय डाक द्वारा सबसे कम खर्च में संदेश भेजने का माध्यम है। समय बदलता गया पोस्टकार्ड की जगह ग्रीटिंगस्कार्ड ने लिया। पर दोनों में कुछ खास अंतर है ग्रीटिंगस्कार्ड प्रकाशक, डिजाइनर, प्रिंटिंग कंपनियां, यहां तक कि खुद बनाते है और लिफाफे में भेज देते है।
पर अब इन दोनों का जमाना लद गया , इनकी जगह अब व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम, ईमेल आदि सोशल साइट्स/प्लेटफार्म ने ले लिया।

पर मजे की बात यह है कि इतने माडर्न होने के बाद डाक विभाग आज भी पोस्टकार्ड जारी करता है। यह संदेश का पारंपरिक माध्यम है, इसे सहेजने की जरूरत है।

नए साल की शुभकामनाएं 🎉🙏

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