14/01/2026
ये निशानी है उस प्रेम की।
वहीं प्रेम जिसके बारे में कहा जाता है कि प्रेम भूख प्यास से ऊपर की चीज है पर यहां सारी थ्योरी धरी की धरी रह जाती है बिहार जो ठहरा ।
वैसे बिहार के बारे में एक प्रसिद्ध कहावत है "Bihar is not for beginners" इसे चरितार्थ किए हैं दशरथ मांझी।
दशरथ मांझी महज एक व्यक्ति नहीं वो एक महापुरुष हैं जिन्होंने विषम परिस्थितियों के बावजूद पहाड़ को महज एक छेनी हथौड़े से अकेले 20 वर्षों के कड़ी मेहनत से काट कर रास्ता बना दिए । पर ऐसा नहीं था कि रास्ता नहीं था, रास्ता तो था पर पहाड़ के उस पर जाने के लिए 3 से 4 किलोमीटर कि दुरी तय करनी पड़ती थी, पहाड़ काटने से ये दूरी कम हो गई महज कुछ मीटर। पर लौटते हैं मूल बात पर, जैसा कि नाम से प्रतीत हो रहा है दशरथ मांझी जो मांझी (मुसहर) समुदाय से आते हैं इस समुदाय में जिजीविषा के लिए आज भी लोग मजदूरी पर निर्भर हैं खैर एक दिन दशरथ मांझी पहाड़ के उस पार कुछ काम कर रहे थे, उन्हीं के लिए उनकी पत्नी (फगुनिया) खाना और पानी लेकर जा रही थी, पहाड़ को पार करते वक्त उनका पैर फिसल गया और उनकी मौत हो गई। इस मौत से दशरथ मांझी आहत हुए और प्रतिशोध में जिस कारण उनकी पत्नी की मौत हुई उस कारण को ही खत्म कर दिए, उस पहाड़ को ही काट डाला। इस दौरान कई बार खनन विभाग ने उन्हें तंग किया, तो ग्रामीणों ने उन्हें यातनाएं दी पागल तक घोषित कर दिया, और बचा कुछ कसर प्रकृति ने पूरा कर दिया, कई बार आकाल भी आया लोग गांव छोड़कर जाने लगे फिर भी दशरथ मांझी अड़े रहे और पहाड़ तोड़कर ही छोड़े, और कहावत प्रसिद्ध हुआ "जबतक तोड़ेंगे नहीं तबतक छोड़ेंगे नहीं"। पहाड़ काटने से दूरियां घटी रस्ते सुगम हुए अब सरकार द्वारा रोड भी बनाया गया है।
वैसे मुहब्बत की निशानी तो ताजमहल भी है पर ताजमहल तो शहंशाह शाहजहां में बेगम मुमताज के याद में बनवाया था जो एक मकबरा है । उसने खुद नहीं बनाया था मजदूर बनाए थे पर दशरथ मांझी ने खुद 20 वर्षों में इसे तोड़ा।
ये जगह वजीरगंज के गहलौर में है। जिस जगह पर ये स्थित है वो आज भी सुखे का मार झेल रहा है, गर्मी के दिनों में स्थित और भयावह हो जाती है, यहां गरीबी आज भी चरम सीमा पर है। मैंने उसे बड़ी नजदीक से देखा।
खैर जब भी बात होगी मेहनत, गरीबी, मोटीवेशन या मुहब्बत जुआं पर एक हीं नाम होगा दशरथ मंझी।