Tirth purohit pehowa

Tirth purohit pehowa पिहोवा तीर्थ के सम्बंध में जानकारी और

30/10/2025

विधि विधान से पूजा

29/10/2024

दीपावली त्यौहार 1 नवम्बर को ही मनाए

जो विद्वान ब्राह्मण बन्धु ये कह रहे हैं कि दीपावली रात का पर्व है इसलिये 31 अक्टूबर 2024 को दीपावली मनाना उचित है क्योंकि 31 तारीख को रात्रि के समय अमावस्या है तो उनके लिये मै यही कहना चाहता हूँ कि 15 नवम्बर 2020 को अमावस्या सुबह 10 बजकर 36 मिनट तक थी और उसके बाद प्रतिपदा लग गयी थी उसके पश्चात भी दीपावली 15 नवम्बर को ही दीपावली मनाई गयी थी तब प्रतिपदा कहाँ चली गयी थी | और दिनांक 25 अक्टूबर 2022 को भी अमावस्या शाम को 4 बजकर 17 मिनट पर समाप्त हो गयी थी उसके बाद प्रतिपदा लग गयी थी परन्तु उसके बाद भी दीपावली 25 अक्टूबर को ही मनाई गयी थी उस समय प्रतिपदा कहाँ चली गयी थी | इसी प्रकार दिनांक 13 नवम्बर 2023 को भी अमावस्या दोपहर 2 बजकर 56 मिनट तक थी और उसके बाद प्रतिपदा लग गयी थी लेकिन फिर भी दीपावली 13 नवम्बर को ही मनाई गयी थी मै उन लोगों से ये पूछना चाहता हूँ कि उस समय प्रतिपदा कहाँ चली गयी थी |इससे भी यही प्रमाणित होता है कि जो तिथि सूर्योदय के समय रहती है या अपराह्नव्यापिनी होती है वही तिथि पूरे दिन और रात भर मान्य होती है | और 1 नवम्बर 2024 को तो अमावस्या सूर्योदय के समय भी है अपराह्नव्यापिनी भी है सूर्यास्त के समय भी है चंन्द्रोदय के समय भी है और प्रदोषकाल व्यापिनी भी है | जबकि 31 नवम्बर को तो अमावस्या केवल प्रदोषकाल व्यापिनी और रात्रि के समय ही है इसलिये दोनों तारीखों में अगर तुलना की जाये तो 1 नवम्बर 2024 ही श्रेष्ठ है इसलिये दीपावली पर्व 1 नवम्बर 2024 को ही मनाना शास्त्र सम्मत भी है और उचित भी है |
*अतः सभी देशवासियों से ये निवेदन है कि किसी भी प्रकार के भ्रम में न पड़े और भ्रमित करने वालों को जवाब दें 1 नवम्बर 2024 को ही एकमत होकर दीपावली का पर्व मनाएं यह हिन्दुओं का इतना बड़ा और पवित्र त्यौहार है किसी भी प्रकार के भ्रम में पड़कर त्यौहार को न बाटें क्योंकि जो लोग 31 अक्टूबर 2024 को दीपावली मनाने कि बात कह रहे हैं उनके पास में इसका कोई बहुत प्रमाण नहीं है |

27/09/2023

पितरों को भोजन कैसे मिलता है ? इसे अवश्य पढ़िये!!
प्राय: कुछ लोग यह शंका करते हैं कि श्राद्ध में समर्पित की गईं वस्तुएं पितरों को कैसे मिलती है?

कर्मों की भिन्नता के कारण मरने के बाद गतियां भी भिन्न-भिन्न होती हैं। कोई देवता, कोई पितर, कोई प्रेत, कोई हाथी, कोई चींटी, कोई वृक्ष और कोई तृण बन जाता है। तब मन में यह शंका होती है कि छोटे से पिंड से या ब्राह्मण को भोजन करने से अलग-अलग योनियों में पितरों को तृप्ति कैसे मिलती है?
इस शंका का स्कंद पुराण में बहुत सुन्दर समाधान मिलता है

एक बार राजा करंधम ने महायोगी महाकाल से पूछा, 'मनुष्यों द्वारा पितरों के लिए जो तर्पण या पिंडदान किया जाता है तो वह जल, पिंड आदि तो यहीं रह जाता है फिर पितरों के पास वे वस्तुएं कैसे पहुंचती हैं और कैसे पितरों को तृप्ति होती है?'

भगवान महाकाल ने बताया कि विश्व नियंता ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि श्राद्ध की सामग्री उनके अनुरूप होकर पितरों के पास पहुंचती है। इस व्यवस्था के अधिपति हैं अग्निष्वात आदि।
पितरों और देवताओं की योनि ऐसी है कि वे दूर से कही हुई बातें सुन लेते हैं, दूर की पूजा ग्रहण कर लेते हैं और दूर से कही गईं स्तुतियों से ही प्रसन्न हो जाते हैं।

वे भूत, भविष्य व वर्तमान सब जानते हैं और सभी जगह पहुंच सकते हैं। 5 तन्मात्राएं, मन, बुद्धि, अहंकार और प्रकृति- इन 9 तत्वों से उनका शरीर बना होता है और इसके भीतर 10वें तत्व के रूप में साक्षात भगवान पुरुषोत्तम उसमें निवास करते हैं इसलिए देवता और पितर गंध व रसतत्व से तृप्त होते हैं। शब्द तत्व से तृप्त रहते हैं और स्पर्श तत्व को ग्रहण करते हैं। पवित्रता से ही वे प्रसन्न होते हैं और वे वर देते हैं।

पितरों का आहार है अन्न-जल का सारतत्व- जैसे मनुष्यों का आहार अन्न है, पशुओं का आहार तृण है, वैसे ही पितरों का आहार अन्न का सारतत्व (गंध और रस) है। अत: वे अन्न व जल का सारतत्व ही ग्रहण करते हैं। शेष जो स्थूल वस्तु है, वह यहीं रह जाती है।

किस रूप में पहुंचता है पितरों को आहार?

नाम व गोत्र के उच्चारण के साथ जो अन्न-जल आदि पितरों को दिया जाता है, विश्वदेव एवं अग्निष्वात (दिव्य पितर) हव्य-कव्य को पितरों तक पहुंचा देते हैं।

यदि पितर देव योनि को प्राप्त हुए हैं तो यहां दिया गया अन्न उन्हें 'अमृत' होकर प्राप्त होता है।

यदि गंधर्व बन गए हैं, तो वह अन्न उन्हें भोगों के रूप में प्राप्त होता है।

यदि पशु योनि में हैं, तो वह अन्न तृण के रूप में प्राप्त होता है।

नाग योनि में वायु रूप से,

यक्ष योनि में पान रूप से,

राक्षस योनि में आमिष रूप में,

दानव योनि में मांस रूप में,

प्रेत योनि में रुधिर रूप में

और मनुष्य बन जाने पर भोगने योग्य तृप्तिकारक पदार्थों के रूप में प्राप्त होता है।

मित्रो , जिस प्रकार बछड़ा झुंड में अपनी मां को ढूंढ ही लेता है, उसी प्रकार नाम, गोत्र, हृदय की भक्ति एवं देश-काल आदि के सहारे दिए गए पदार्थों को मंत्र पितरों के पास पहुंचा देते हैं।
जीव चाहें सैकड़ों योनियों को भी पार क्यों न कर गया हो, तृप्ति तो उसके पास पहुंच ही जाती है।

श्राद्ध में आमंत्रित ब्राह्मण पितरों के प्रतिनिधि रूप होते हैं। एक बार पुष्कर में श्रीरामजी अपने पिता दशरथजी का श्राद्ध कर रहे थे। रामजी जब ब्राह्मणों को भोजन कराने लगे तो सीताजी वृक्ष की ओट में खड़ी हो गईं। ब्राह्मण भोजन के बाद रामजी ने जब सीताजी से इसका कारण पूछा तो वे बोलीं-

'मैंने जो आश्चर्य देखा, उसे मैं आपको बताती हूं। आपने जब नाम-गोत्र का उच्चारण कर अपने पिता-दादा आदि का आवाहन किया तो वे यहां ब्राह्मणों के शरीर में छाया रूप में सटकर उपस्थित थे। ब्राह्मणों के शरीर में मुझे अपने श्वसुर आदि पितृगण दिखाई दिए फिर भला मैं मर्यादा का उल्लंघन कर वहां कैसे खड़ी रहती? इसलिए मैं ओट में हो गई।'

तुलसी से पिंडार्चन किए जाने पर पितरगण प्रलयपर्यंत तृप्त रहते हैं। तुलसी की गंध से प्रसन्न होकर गरुड़ पर आरूढ़ होकर विष्णुलोक चले जाते हैं।

पितर प्रसन्न तो सभी देवता प्रसन्न- श्राद्ध से बढ़कर और कोई कल्याणकारी कार्य नहीं है और वंशवृद्धि के लिए पितरों की आराधना ही एकमात्र उपाय है।

आयु: पुत्रान् यश: स्वर्ग कीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियम्।
पशुन् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात्।। (यमस्मृति, श्राद्धप्रकाश)

यमराजजी का कहना है कि श्राद्ध करने से मिलते हैं ये 6 पवित्र लाभ-

श्राद्ध कर्म से मनुष्य की आयु बढ़ती है।

पितरगण मनुष्य को पुत्र प्रदान कर वंश का विस्तार करते हैं।

परिवार में धन-धान्य का अंबार लगा देते हैं।

श्राद्ध कर्म मनुष्य के शरीर में बल-पौरुष की वृद्धि करता है और यश व पुष्टि प्रदान करता है।

पितरगण स्वास्थ्य, बल, श्रेय, धन-धान्य आदि सभी सुख, स्वर्ग व मोक्ष प्रदान करते हैं।

श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करने वाले के परिवार में कोई क्लेश नहीं रहता, वरन वह समस्त जगत को तृप्त कर देता है।

❗जय महादेव❗

05/01/2022
श्राद्ध के लिए सर्वश्रेष्ठ तीर्थ पृथुदक पिहोवा को पवित्र माना जाता है और कुरुक्षेत्र से भी अधिक पवित्र सरस्वती नदी है, स...
29/09/2021

श्राद्ध के
लिए सर्वश्रेष्ठ
तीर्थ पृथुदक पिहोवा को पवित्र माना जाता है और कुरुक्षेत्र से भी अधिक पवित्र सरस्वती नदी है, सरस्वती नदी के भी अनेक तीर्थ हैं, इन सब में पिहोवा तीर्थ सर्वश्रेष्ठ है। सरस्वती के बारे में वामन पुराण में पढ़ने को मिलता है, गंगा, यमुना, नर्मदा, सिंधु इन चारों नदियों के स्नान का फल अकेले पिहोवा में ही प्राप्त हो जाता है।

सरस्वती का जल पीने से मोक्ष की प्राप्ति होती है, मंत्र शास्त्र के अनुसार सरस्वती तीर्थ का जल पीने का इतना महत्त्व है कि, बारह मास तक नियम से जो श्रद्धालु सरस्वती का जल पीता है, उसे उसी प्रकार ही शक्ति की प्राप्ति होती है, जैसे देवगुरु बृहस्पति को हुई थी। वामन पुराण के अनुसार चेताया गया है कि, जिन लोगों ने पिहोवा तीर्थ का नाम नहीं सुना, अपनी आंखों से नहीं देखा, मन से पिहोवा को याद नहीं किया, ऐसे लोगों के पितर पितृलोक में बैठे हुए कहते हैं कि, हमारे पुत्र-पौत्रादिकों ने व्यर्थ में जन्म लिया है।

ऐसी संतानों को धिक्कार है, इसी पिहोवा में गाधि राजा के पुत्र विश्वामित्र ने क्षत्रिय से ब्राह्मण का दर्जा प्राप्त किया, यही वह तीर्थ है, जिसमें मुनिश्रेष्ठ रुषंग ऋषि अपने पुत्रों के साथ गंगा तट हरिद्वार को छोड़कर मोक्ष प्राप्ति के लिए आए थे। इसी तीर्थ में राजा ययाति ने 100 यज्ञ किए थे। यहीं पर देव सेनापति स्वामी कार्तिकेय अपने असंख्य गणों के साथ रात-दिन निवास करते हैं। यहां पर कार्तिकेय का प्राचीन मंदिर है। रुषंग ऋषि ने अपने पुत्रों को पिहोवा का महत्त्व इस प्रकार बताया है,

हे पुत्र्! जो मनुष्य सरस्वती के तट पर स्थित पिहोवा पर जप करते हुए शरीर छोड़ता है, वह जन्म-मरण से रहित होकर मोक्ष को प्राप्त करता है, गंगा के जल में अस्थि प्रवाह से मुक्ति होती है, काशी में देह त्याग से मुक्ति होती है, किंतु पिहोवा तीर्थ में जल, स्थल व अंतरिक्ष आदि पर मृत्यु होने पर भी मोक्ष मिलता है, यानी कि पिहोवा गंगा द्वार से भी अधिक पवित्र व महत्त्वपूर्ण है।

महाभारत, मार्कंडेय पुराण, पद्म पुराण, भागवत पुराण तथा वामन पुराण आदि में जिसे कुरुक्षेत्र भूखंड का हिस्सा माना गया है, इसे सभी प्रकार के दोषों से रहित कहा गया है, पिहोवा को धर्मक्षेत्र की संज्ञा मिली है। वामन पुराण के अनुसार इस तीर्थ की रचना प्रजापिता ने पृथ्वी, जल और वायु के साथ सृष्टि के आरंभ में की थी।

जबकि महाभारत में लिखा है कि, पिहोवा की आठ कोस भूमि पर बैठ कर ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी। गंगा पुत्र भीष्म पितामह की सद्गति भी पृथुदक में हुई थी। पिहोवा में प्रेत पीड़ा शांत होती है, अकाल मृत्यु होने पर दोष निवारण के लिए पिहोवा में कर्मकांड करवाने की परंपरा है, ऐसा करने से मृतक प्राणी अपगति से सद्गति को प्राप्त हो जाता है, वामन पुराण के अनुसार अति पुरातन काल में भगवान शंकर ने पिहोवा में पधार कर स्नान किया था। यहां पर पिंडदान का बड़ा महत्त्व माना गया है।
इस तीर्थ का नाम राजा पृथु के नाम पर पड़ा। यहीं सरस्वती के तट पर पृथु ने पिता की मृत्यु के बाद उनका अंतिम संस्कार व पिंडदान तथा समस्त प्राणियों को जल प्रदान करके संतुष्ट किया। इसी कारण इस तीर्थ का नाम पृथुदक अथवा पिहोवा पड़ा। महाभारत के अनुसार यहां स्नान व पिंडदान करने से श्रद्धालु व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ का फल तो मिलता ही है, स्वर्ग लोक भी मिल जाता है। पिहोवा के पवित्र सरस्वती सरोवर के तट पर पितरों का पिंडदान किया जाता है। यहीं पर पुरोहित पिंडदान के लिए अनेको वर्षो से निरन्तर कार्ये कर रहे हैं
अलग-अलग घाट के लिए अलग-अलग पंडे हैं। पिंडदान और श्राद्ध कर्म करवाने से लिए ये पूरे साल उपलब्ध रहते हैं। पिहोवा का मुख्य तीर्थ सरस्वती सरोवर है। इसी के जल में लोग नहाते हैं और अस्थि प्रवाह करते हैं। उत्तरी भारत के लोग अपने पितरों की सद्गति के लिए वर्ष भर यहां आते रहते हैं, लेकिन श्राद्ध के दिनों में यहां पिंडदान करना अधिक फलदायी माना गया है। कहा जाता है कि यहां पर किया गया दान पुण्य कार्ये मानव को जीवन मे 13 गुना वृद्धि करके मिलता है

21/09/2021

हिंदू मान्यता के अनुसार भाद्रपद महीने की पूर्णिमा तिथि से पितृपक्ष प्रारंभ हो जाता है। इस वर्ष पितृपक्ष 20 सितंबर सोमवार से प्रारंभ हो चुका है और यह आने वाले 6 अक्टूबर तक चलेगा। पितृपक्ष के इस समय के दौरान लोग अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध कर्म और पूजा-पाठ आदि करते हैं। सनातन धर्म में पितृपक्ष की यह समय अवधि बेहद ही महत्वपूर्ण मानी गई है। ऐसे में अपने इस विशेष ब्लॉग में आज हम जानेंगे पितृपक्ष के दौरान हमें क्या कुछ काम नहीं करने चाहिए, क्या कुछ काम विशेष तौर पर करने चाहिए, साथ ही किन उपायों से हमारे पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और साथ ही जानेंगे किस दिन किस व्यक्ति का श्राद्ध करने का नियम बताया गया है।

श्राद्ध
20 सितंबर 2021 को भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि से श्राद्ध शुरू हो रहे हैं। वहीं पितृपक्ष का समापन बुधवार, 6 अक्टूबर 2021 को आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को होगा।

वैदिक ज्योतिष के अनुसार, जब कन्या राशि में सूर्य प्रवेश करते हैं तो, उसी दौरान पितृ-पक्ष मनाये जाने की मान्यता होती है। कुंडली का पंचम भाव इंसान के पूर्व जन्म में किये गए कामों को दर्शाता है। सूर्य को काल पुरुष की कुंडली में पंचम भाव का स्वामी भी माना गया है। माना जाता है कि यही वजह है कि सूर्य को हमारे कुल का द्योतक माना गया है।

कन्यागते सवितरि पितरौ यान्ति वै सुतान,

अमावस्या दिने प्राप्ते गृहद्वारं �

गुरुपूर्णिमा के पावन पर्व की सभी को हार्दिक बधाई
24/07/2021

गुरुपूर्णिमा के पावन पर्व की सभी को हार्दिक बधाई

14/11/2020

आप सभी धर्म प्रेमियों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं

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