Aligarian Boy

Aligarian Boy "History, headlines & sports." "From cricket pitches to world affairs legacy in motion."
- "Where history meets today, and sports unite us."
- "Cricket.
(5)

Sports. Current Affairs. History. One voice."
- play, and the power of knowledge."

खलीफा अब्दुल हमीद सानी और फ्रांस के थिएटर का वाकिया!! खलीफा अब्दुल हमीद सानी एक दिन अपने वजीरों और हुकूमत के ओहदेदारों क...
29/09/2026

खलीफा अब्दुल हमीद सानी और फ्रांस के थिएटर का वाकिया!! खलीफा अब्दुल हमीद सानी एक दिन अपने वजीरों और हुकूमत के ओहदेदारों के दरमियान मौजूद थे कि अचानक एक हुकूमती ओहदेदार ने आपको आकर एक ऐसी खबर सुनाई कि आपका रंग गुस्से से लाल हो गया।

हुकूमती ओहदेदार के हाथों में फ्रांस का अखबार मौजूद था जिसमें एक खबर छपी थी कि फ्रांस के एक थिएटर में हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शान में गुस्ताखी का ड्रामा पेश किया जाएगा।

वाकिये की तफसील:

अखबार की खबर: अखबार में इश्तहार छपा था कि एक शख्स ने एक ड्रामा लिखा है जिसमें हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का किरदार भी बनाया है। यह ड्रामा पेरिस के थिएटर में पेश होना था।

खलीफा का जलाल: खलीफा ने अखबार का पेज लेकर ऊंची आवाज में पढ़ना शुरू किया। आपका चेहरा लाल हो चुका था और जिस्म कांप रहा था। आपने फरमाया कि अगर वह मेरे बारे में बकवास करते तो मुझे कोई गम नहीं होता, लेकिन अगर वह मेरे दीन और मेरे रसूल की शान में गुस्ताखी करें तो मैं जीते जी मर जाऊं। मैं तलवार उठा लूंगा, चाहे मेरी गर्दन कट जाए ताकि कल बरोज कयामत रसूलल्लाह के सामने शर्मिंदगी न हो।

फ्रांसीसी सफीर की तलबी: इसी बीच सुल्तान ने फ्रांसीसी सफीर को तलब करने के अहकामात जारी कर दिए। कुछ ही देर में फ्रांसीसी सफीर दरबार में हाजिर था। सुल्तान ने जलाल में फरमाया, हम मुसलमान हैं, अपने रसूल से बहुत ज्यादा मोहब्बत करते हैं। मैं खलीफतुल इस्लाम अब्दुल हमीद खान हूं। अगर तुमने इस ड्रामे को न रोका तो मैं तुम्हारी दुनिया तबाह कर दूंगा।

फ्रांस को पैगाम: फ्रांसीसी सफीर ने कांपते हुए दरबार से निकलकर फौरी तौर पर फ्रांस अपनी हुकूमत को पैगाम भेजा कि अगर यूरोप को अपनी आंखों से जलता हुआ नहीं देखना चाहते तो फौरी तौर पर इस ड्रामे को रोक दो। उस्मानी लश्कर हुक्म के इंतजार में खड़े हैं।

खिलाफत का हुक्मनामा: खलीफा ने अपने मुशीर-ए-खास को तलब करके पूरी खिलाफत में सर्कुलर जारी करने का हुक्म दिया कि फ्रांसीसियों की इस्लाम के खिलाफ कार्रवाइयां हद से आगे बढ़ चुकी हैं। अब हम खिलाफत का परचम बुलंद करने जा रहे हैं।

अंजाम: पूरी दुनिया मुंतजिर थी कि अब क्या होगा। यूरोप कांप उठा और फ्रांस ने घुटने टेक दिए। कुछ देर बाद एक हुकूमती ओहदेदार हंसता हुआ बगैर इजाजत कमरे में दाखिल हुआ और बोला, हुजूर एक खुशखबरी है। फ्रांसीसियों ने उस ड्रामे को ही नहीं रोका बल्कि उस थिएटर को हमेशा के लिए बंद कर दिया है।

यह सुनकर खलीफा अब्दुल हमीद की आंखें नम हो गईं और जुबान से सिर्फ अल्हम्दुलिल्लाह निकला। उस वक्त मिस्र और अल्जीरिया में लोग खुशी के मारे सड़कों पर निकल आए थे। यह वो वक्त था जब खिलाफत-ए-उस्मानिया की हैबत से यूरोप के मरकज हिल जाया करते थे।

---
अस्वीकरण: यह पोस्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी पर आधारित है, कृपया आधिकारिक स्रोतों से पुष्टि करें।

चीन के किंगहाई प्रोविंस में मुस्लिम आबादी: एक जानकारीये चीन के किंगहाई प्रोविंस का है जिसमें 17.55% मुस्लिम हैं।महत्वपूर...
29/09/2026

चीन के किंगहाई प्रोविंस में मुस्लिम आबादी: एक जानकारी
ये चीन के किंगहाई प्रोविंस का है जिसमें 17.55% मुस्लिम हैं।

महत्वपूर्ण नोट:

1) रकबे के हिसाब से चौथा बड़ा प्रोविंस: किंगहाई रकबे के अनुसार चीन का चौथा बड़ा प्रोविंस है।

2) सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले प्रोविंस: किंगहाई से ज्यादा मुस्लिम सिर्फ 2 प्रोविंस में रहते हैं -
a) सिक्यांग में 55% है, ये चीन का सबसे बड़ा प्रोविंस है जो रकबे में इंडिया का आधा से थोड़ा ज्यादा है और,
b) निंगजिया हुई ऑटोनोमस रीजन में है वहाँ 37% मुस्लिम रहते हैं।

3) हुई मुस्लिम बहुसंख्यक: किंगहाई के 17.55% मुस्लिम में ज्यादातर हुई 16% मुस्लिम हैं और कुछ तिब्बतन मुस्लिम हैं जो तिब्बत में बौद्ध द्वारा की गई हिंसा के बाद और कई पहले भी आए थे।

4) धार्मिक छूट का इतिहास: हुई मुस्लिम में इस तरह टोपी आम जीवन का हिस्सा है। चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने आज तक एक ही धार्मिक समूह से माफी मांगी है और कानून के विरुद्ध जाकर रिलिजन को न सिर्फ फॉलो बल्कि रिलिजियस स्कूल और सभी तरह की छूट दी है। ये सब कम्युनिस्ट सरकार से लड़कर, आंख में आंख मिलाकर लिया है। Shadian Incident को गूगल कर लें, जो माओ के बदतरीन दौर में 1974 में हुआ था जिसके लिए बाद में चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने माफी मांगा था। तब से हुई मुस्लिम को पूरी तरह से हर चीज की छूट है जो किसी भी धार्मिक समूह को नहीं है। इसलिए बाइबिल गिने चुने चर्च में ही मिल सकता है, ऑनलाइन या दुकान पर नहीं मिलता है लेकिन कुरान शरीफ के साथ ऐसी कोई पाबंदी नहीं है।

5) नाम में मा: हुई लोग अपने नाम में आमतौर पर मा लगाते हैं जिसका मतलब मोहम्मद होता है।

---
अस्वीकरण: यह पोस्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी पर आधारित है, कृपया आधिकारिक स्रोतों से पुष्टि करें।

क्या आप जानते हैं कि झज्जर जिले के मांडोठी गांव की हमीदा बानो भारत की पहली महिला पहलवान थीं।हमीदा एक पहलवानी करने वाले प...
29/09/2026

क्या आप जानते हैं कि झज्जर जिले के मांडोठी गांव की हमीदा बानो भारत की पहली महिला पहलवान थीं।

हमीदा एक पहलवानी करने वाले परिवार से ताल्लुक रखती थीं जो कि मूल रूप से मिर्जापुर उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे। इसलिए हमीदा में भी कुश्ती के प्रति प्रेम जाग गया और बन गईं भारत की पहली महिला पहलवान वो भी 1950 के दौर में, जबकि आपने खुद देखा था कि दंगल फिल्म में 90 के दशक में लोग महिला कुश्ती को बुरा मानते थे।

हमीदा बानो की अनोखी कहानी:

जन्म और पृष्ठभूमि: हमीदा बानो का परिवार मूल रूप से मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश से था, जो बाद में हरियाणा के झज्जर जिले के मांडोठी गांव में बस गया। पहलवानों के परिवार में जन्म होने के कारण बचपन से ही अखाड़े की मिट्टी से उनका नाता जुड़ गया।

1950 के दशक में इतिहास रचना: जिस दौर में महिलाओं का घर से बाहर निकलना भी मुश्किल माना जाता था, उस 1950 के दशक में हमीदा ने दंगल में उतरकर कुश्ती लड़ी। वे भारत की पहली महिला पहलवान कहलाईं।

अदम्य साहस की घोषणा: उसी हरियाणा में 40 साल पहले हमीदा ने ये घोषणा कर दी थी कि शादी उसी से करूंगी जो मुझे कुश्ती में हराएगा। यह घोषणा उस समय समाज की रूढ़िवादी सोच के लिए एक बड़ी चुनौती थी।

हमीदा बानो का जीवन आज की महिला पहलवानों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने साबित किया कि हौसला हो तो कोई भी अखाड़ा जीता जा सकता है।

---
अस्वीकरण: यह पोस्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी पर आधारित है, कृपया आधिकारिक स्रोतों से पुष्टि करें।

क्या है इतिहास लद्दाख के उस सरहद का जिसे मुगल बादशाह औरंगजेब ने खिंचा था जिस पर अब चीन अपना हक जता रहा है।मुगल सल्तनत मे...
29/09/2026

क्या है इतिहास लद्दाख के उस सरहद का जिसे मुगल बादशाह औरंगजेब ने खिंचा था जिस पर अब चीन अपना हक जता रहा है।

मुगल सल्तनत में ये जगह लद्दाख के नामग्याल राजवंश का हिस्सा था जो बाल्टिस्तान से लेकर नेपाल तक फैला हुआ था।

इतिहास के अहम पड़ाव:

1682 का तिब्बत-मंगोल हमला: 1682 में तिब्बत के 5वें दलाई लामा ने मंगोल गालदान बोसुग्तु खान के साथ मिलकर लद्दाख पर हमला कर दिया था। नामग्याल राजवंश उस वक्त स्वतंत्र राज्य था मुगलों के अधीन नहीं था।

औरंगजेब से मदद: मंगोल और दलाई लामा की गठबंधन सेना के हमले से बचने के लिए राजा देलेक नामग्याल ने मुगल बादशाह औरंगजेब से मदद मांगी। औरंगजेब ने देलेक नामग्याल की मदद के लिए कश्मीर के मुगल गवर्नर इब्राहिम खान को भेजा। मुगल सेना ने तिब्बत और मंगोल सेना को जंग में हराकर वापस लद्दाख की सीमा से बाहर किया।

तिंगमोसगंग की संधि 1684: इस जंग के बाद तिब्बत और लद्दाख के बीच तिंगमोसगंग की संधि हुई, जिसमें लद्दाख और तिब्बत की सीमा तय की गई। यही लकीर आगे चलकर भारत-तिब्बत सीमा का आधार बनी।

लेह की जामा मस्जिद: जंग के बाद राजा देलेक नामग्याल ने श्रद्धांजलि के रूप में लद्दाख में एक मस्जिद की तामीर करवाई और अपना समर्थन मुगलों को देते हुए राज्य की सुरक्षा के लिए लद्दाख को मुगलों के अधीन कर दिया। राजा नामग्याल द्वारा बनवाई गई लेह की जामा मस्जिद आज भी कायम है और उस दौर के इतिहास की गवाह है।

1962 तक कायम रही लकीर: मुगल सल्तनत में खींची गई सरहद की वो लकीर 1962 तक कायम थी। लेकिन इंडो-चाइना युद्ध में चीन ने भारत के काफी हिस्सों पर कब्जा कर लिया और उसके बाद भी चीन अपनी विस्तारवादी नीति के लिए भारत के हिस्से को अपना बताता रहता है।

लद्दाख का यह इतिहास बताता है कि लद्दाख का भारत से संबंध सदियों पुराना है।

---
अस्वीकरण: यह पोस्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी पर आधारित है, कृपया आधिकारिक स्रोतों से पुष्टि करें।

19 November 636 में सहाबा किराम ने जंगे कादिसिया में फतह पाई थी। ये जंग बहुत फैसलाकुन थी, इससे पूरे इराक में Persian Emp...
29/09/2026

19 November 636 में सहाबा किराम ने जंगे कादिसिया में फतह पाई थी। ये जंग बहुत फैसलाकुन थी, इससे पूरे इराक में Persian Empire का खात्मा हो गया था।

प्रमुख ऐतिहासिक तथ्य:

सिपहसालार: मुस्लिम फौज के सिपहसालार हजरत साद बिन अबी वक़्क़ास रजियल्लाहु अन्हु थे और Persian Empire के रुस्तम। यह जंग हजरत उमर की खिलाफत में लड़ी गई।

छोटी फौज की बड़ी जीत: 30 से 40 हजार की छोटी मुस्लिम फौज ने रुस्तम की तकरीबन 1.5 लाख की फौज को बहुत बुरी शिकस्त दी। रुस्तम भी कत्ल हो गया। जिससे रोमन भी खौफ खाते थे वह महज 3 दिन में मैदान छोड़कर भागा लेकिन मारा गया।

बीमारी में भी नेतृत्व: सबसे हैरानी की बात ये थी कि हजरत साद अरकुन्निसा के दर्द में बीमार थे। जब फारसियों को मालूम हुआ कि मुस्लिम सिपहसालार बीमार है तो उनको बहुत खुशी हुई, लेकिन हजरत साद एक ऊंचे मकान पर चढ़ गए वहीं से फौज को कासिद के जरिए संचालित कर रहे थे। जहाँ से मैदाने जंग पूरा दिख रहा था, मुस्लिम फौज का जो भी हिस्सा कमजोर नजर आने लगता तो एक खत लिखकर नीचे फेंक देते जिसे कासिद उठाकर तेज रफ्तार घोड़े से दूसरे हिस्से के कमांडर के पास ले जाता।

हाथियों का तोड़: इस जंग में ईरानियों ने अपने तमाम हाथियों को इस्तेमाल किया जो भारत से भेजे गए थे, जिससे मुस्लिम फौज का बहुत बड़ा नुकसान हुआ। लेकिन हजरत साद ने इन हाथियों का भी तोड़ ढूंढ लिया। तमाम कपड़ों को इकट्ठा करके कुछ ऐसे लिबास बनाए जो पूरे ऊंट को पहनाया जा सके और ऊंट की पीठ पर कपड़ों का एक कमरा सा बना दिया जिससे ऊंट बहुत भारी और अलग मखलूक ही नजर आती थी। इन ऊंटों को देखकर हाथी घबरा गए, जब इन ऊंटों के अंदर से तीर आने लगे तो हाथियों के खौफ में इजाफा हो गया और भगदड़ मचा दी, जिससे Persian फौज ही कुचलने लगी।

इस जंग के बाद वह कहावत गलत हो गई कि रुस्तम को कोई हरा नहीं सकता और पूरे इराक से Persian हुकूमत का खात्मा हो गया।

---
अस्वीकरण: यह पोस्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी पर आधारित है, कृपया आधिकारिक स्रोतों से पुष्टि करें।

मध्यकाल का प्रथमार्ध मुस्लिम साहित्यकारों, इतिहासकारों और वैज्ञानिकों का सुनहरा दौर था। इस समय लगभग एक दर्जन वैज्ञानिक न...
29/09/2026

मध्यकाल का प्रथमार्ध मुस्लिम साहित्यकारों, इतिहासकारों और वैज्ञानिकों का सुनहरा दौर था। इस समय लगभग एक दर्जन वैज्ञानिक नए नए शोध कर दुनिया को आश्चर्यचकित कर रहे थे। इसमें अल-हैथम पर आप पढ़ चुके हैं, अब जानिए दुनिया की त्रिज्या नापने वाले मुस्लिम वैज्ञानिक अल-बैरूनी के बारे में।

उस मुस्लिम वैज्ञानिक का पूरा नाम अबू रेहान मुहम्मद इब्न अहमद अल-बैरूनी था। वे 9 September 973 को ख्वारिज्म के एक गाँव बैरून में पैदा हुए, ये बहुत बड़े शोधकर्ता और वैज्ञानिक थे। अल-बैरूनी ने गणित, इतिहास के साथ भूगोल में ऐसी पुस्तकें लिखी हैं जिन्हें आज तक पढ़ा जाता है। इतिहास में उन्हें अलबरूनी के नाम से जाना जाता है। उनके ऐतिहासिक तथ्य आज भी इतिहासकारों के बीच बेहद महत्वपूर्ण और सच माने जाते हैं।

प्रमुख उपलब्धियाँ और ऐतिहासिक योगदान:

पृथ्वी की त्रिज्या का मापन: बैरूनी ने ही सबसे पहले पृथ्वी को मापा था। वे 1000 साल पहले पश्चिमी पंजाब के शहर पिंड दादन खान से 22 Kilometer दूर स्थित नंदना में रुके। इसी प्रवास के दौरान उन्होंने पृथ्वी की त्रिज्या को ज्ञात किया, जो आज भी सिर्फ 1 प्रतिशत के कम अंतर के साथ दुरुस्त है। सभी वैज्ञानिक इस बात से हैरत में हैं कि अल-बैरूनी ने आज से 1000 साल पहले जमीन की माप इतनी सटीकता के साथ कैसे कर ली।

पृथ्वी का अपनी धुरी पर घूमना: अल-बैरूनी ने ही बताया कि पृथ्वी अपनी अक्ष पर घूम रही है और ये भी स्पष्ट किया कि फव्वारों का पानी नीचे से ऊपर कैसे जाता है।

कानून-ए-मसूदी: अल-बैरूनी की लिखी पुस्तक कानून मसूद खगोल विज्ञान और गणित की बहुत महत्वपूर्ण पुस्तक है। इस पुस्तक में ऐसे साक्ष्य पेश किए गए हैं जो और कहीं नहीं मिलते।

150 से अधिक पुस्तकें: स्वरूप विज्ञान और गणित में अल-बैरूनी को महारत हासिल थी। इन्होंने भौतिकी, इतिहास, गणित के साथ-साथ धर्म, रसायन और भूगोल पर 150 से अधिक पुस्तकें लिखीं। उनकी बताई त्रिज्या से मैथमेटिक्स की अलजेब्रा यानी बीजगणित में एक नई क्रांति हुई।

अल-बैरूनी का जीवन यह सिखाता है कि सच्चा वैज्ञानिक वह है जो अवलोकन, प्रयोग और गणना से प्रकृति के रहस्यों को उजागर करे।

---
अस्वीकरण: यह पोस्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी पर आधारित है, कृपया आधिकारिक स्रोतों से पुष्टि करें।

एक दिन दूरदर्शन के एक साइंस प्रोग्राम में मैंने सुना था कि फादर ऑफ फोटोग्राफी किसी अलहेजन नाम के मुस्लिम वैज्ञानिक को कह...
29/09/2026

एक दिन दूरदर्शन के एक साइंस प्रोग्राम में मैंने सुना था कि फादर ऑफ फोटोग्राफी किसी अलहेजन नाम के मुस्लिम वैज्ञानिक को कहा जाता है जिन्होंने सबसे पहले मॉडर्न पिनहोल कैमरे के डिजाइन का आइडिया दिया था। पिनहोल कैमरे के आविष्कार का श्रेय अलहेजन को दिया जाता है। ये अलहेजन कौन थे जिन्हें फादर ऑफ फोटोग्राफी का खिताब और कैमरे के आविष्कार का श्रेय दिया जाता है?

कैमरा ऑब्स्क्युरा इफेक्ट क्या है?
जब आप सूरज की तेज रोशनी में मौजूद किसी हर तरफ से बंद अंधेरे कमरे में बने एक छेद से आती रोशनी को किसी सरफेस पर डालें और फिर गौर करें तो आपको बाहर की चीजों और चलते फिरते लोगों की बहुत छोटी छोटी और रंगीन परछाइयाँ नजर आती हैं, जैसे आप टीवी की स्क्रीन पर रंगीन तस्वीरें देखते हो ठीक उसी तरह, बस ये परछाइयाँ होती उल्टी हैं। इसे कैमरा ऑब्स्क्युरा इफेक्ट कहा जाता है और इसे बहुत पहले से लोग जानते थे। इस बात की जानकारी पुराने चीनी साहित्य में भी मिलती है, पर ये होता क्यों है और इस प्रक्रिया के पीछे कौन सा साइंटिफिक लॉ काम करता है, इस बात की जानकारी लोगों को नहीं थी।

अलहेजन का महान योगदान:
इस प्रक्रिया के पीछे के पूरे वैज्ञानिक आधार को सबसे पहले मिस्र के मुस्लिम वैज्ञानिक हसन इब्न अल-हैथम उर्फ अलहेजन (965-1040) ने बहुत बेहतर ढंग से अपनी किताबों में डायग्राम बनाकर और प्रयोगों के माध्यम से समझाया।

इब्न हैथम ने ही कैमरा ऑब्स्क्युरा में पिनहोल और फोकल पॉइंट का गणनात्मक संबंध बाकायदा लिखकर समझाया, जिससे लोगों को ये समझ आया कि बड़े कमरे की बजाय बहुत छोटे बक्स के प्रयोग से भी तस्वीर को प्रोजेक्ट किया जा सकता है।

सबसे पहले कैमरा ऑब्स्क्युरा के डार्क रूम में स्क्रीन का प्रयोग करके ज्यादा अच्छी इमेज को उतारने में इब्न हैथम ने ही सफलता पाई थी।

इब्न हैथम के बनाए डायग्राम और प्रयोग जब लैटिन भाषा में अनुदित होकर यूरोप के वैज्ञानिकों तक पहुँचे तो यूरोपीय वैज्ञानिकों ने उन डायग्रामों और गणनाओं के प्रयोगों से छोटे कैमरे बनाने में सफलता प्राप्त की।

पुराने समय की फोटोग्राफी:
पुराने समय में यानी 16वीं शताब्दी और उसके आसपास कैमरा ऑब्स्क्युरा जो एक बक्से के बराबर होता था, उस कैमरे के सहारे तस्वीरें इस तरह बनाई जाती थीं कि बक्से में बने एक छोटे छेद की मदद से मनचाही तस्वीर को कागज पर प्रोजेक्ट कर लिया जाता था और फिर क्योंकि तस्वीर तो एक परछाईं होती थी, और उसे कागज पर प्रिंट करने की तकनीक तब तक थी नहीं, तो उस परछाईं पर एक कलाकार सधे हाथों से पेन चलाकर तस्वीर को ट्रेस कर लिया करता था।

बाद में इब्न हैथम की लेखनियों की सहायता लेकर आधुनिक पिनहोल कैमरा भी ईजाद कर लिया गया और केमिकल्स की मदद से तस्वीरों को प्रिंट करने की तकनीक भी विकसित कर ली गई। अंततः इब्न हैथम फादर ऑफ फोटोग्राफी कहलाए गए।

---
अस्वीकरण: यह पोस्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी पर आधारित है, कृपया आधिकारिक स्रोतों से पुष्टि करें।

29 May 1453 को उस्मानी साम्राज्य की सेनाओं द्वारा बाइजेंटाइन साम्राज्य की राजधानी कुस्तुन्तुनिया पर अधिकार कर लेने की घट...
29/09/2026

29 May 1453 को उस्मानी साम्राज्य की सेनाओं द्वारा बाइजेंटाइन साम्राज्य की राजधानी कुस्तुन्तुनिया पर अधिकार कर लेने की घटना कुस्तुन्तुनिया विजय कहलाती है। यह एक अति महत्वपूर्ण घटना थी। उस्मानी सेना का सेनापति 21 वर्षीय सुल्तान मेहमद द्वितीय था। यह विजय 7 सप्ताह की घेराबंदी के बाद मिली थी।

इस घटना के फलस्वरूप रोमन साम्राज्य का अंत हो गया जो लगभग 1500 वर्षों से चला आ रहा था।

प्रमुख ऐतिहासिक तथ्य और परिणाम:

21 वर्षीय सेनापति का पराक्रम: उस्मानी सेना का नेतृत्व सुल्तान मेहमद द्वितीय ने किया, जिन्होंने मात्र 21 वर्ष की आयु में इस अभेद्य माने जाने वाले शहर पर विजय प्राप्त की।

7 सप्ताह की ऐतिहासिक घेराबंदी: यह विजय आसान नहीं थी। 7 सप्ताह तक चली कठोर घेराबंदी और विशाल तोपों के प्रयोग के बाद उस्मानी सेनाओं ने शहर की दीवारों को तोड़ने में सफलता पाई।

1500 वर्ष पुराने साम्राज्य का अंत: इस विजय के साथ ही लगभग 1500 वर्षों से चले आ रहे रोमन साम्राज्य का औपचारिक अंत हो गया। इसे ही कई इतिहासकार मध्यकाल की समाप्ति की घटना मानते हैं।

राजधानी का परिवर्तन: इस विजय के बाद उस्मानी साम्राज्य की राजधानी एदिर्न से हटाकर कुस्तुन्तुनिया ला दी गई, जो बाद में इस्तांबुल कहलाई।

यूरोपीय पुनर्जागरण को बल: विजय के पहले और बाद में अनेकों यूनानी एवं अन्य बुद्धिजीवी कुस्तुन्तुनिया छोड़कर भाग निकले। इनमें से अधिकांश इटली जा पहुँचे, जिससे यूरोपीय पुनर्जागरण को बहुत बल मिला और ज्ञान-विज्ञान का नया युग शुरू हुआ।

यह घटना मध्यकालीन इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी। इसने न केवल ईसाई जगत को झकझोर दिया, बल्कि उस्मानी सेनाओं के यूरोप में प्रवेश का मार्ग भी प्रशस्त कर दिया।

---
अस्वीकरण: यह पोस्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी पर आधारित है, कृपया आधिकारिक स्रोतों से पुष्टि करें।

#1453

अब्दुर्रहमान बिन माविया - अंदलुस में उमवी हुकूमत का बानी!! अब्दुर्रहमान बिन माविया 10वें उमवी खलीफा हिशाम बिन अब्दुल मलि...
28/09/2026

अब्दुर्रहमान बिन माविया - अंदलुस में उमवी हुकूमत का बानी!! अब्दुर्रहमान बिन माविया 10वें उमवी खलीफा हिशाम बिन अब्दुल मलिक का पोता और माविया बिन हिशाम का बेटा था।

अब्दुर्रहमान इस्लामी तारीख में कई नामों से जाना पहचाना जाता है, अब्दुर्रहमान बिन माविया, अब्दुर्रहमान अल नासिर, अब्दुर्रहमान अव्वल, अब्दुर्रहमान अल दाखिल।

750 ईसवी में जब अब्बासियों के हाथों उमवी खिलाफत का खात्मा हुआ तो उमवी खानदान के लोगों को बड़ी हजिमत उठानी पड़ी।

हर तरह की मुसीबतों से पार पाकर जब 20 साला नौजवान शहजादा अब्दुर्रहमान किसी न किसी तरह बचता बचाता सहराओं, दरियाओं, रेगिस्तानों को पार करता फलस्तीन पहुंचा, फलस्तीन से बहर ए रूम के किनारे पर मगरिब की तरफ चलते चलते लीबिया के सहराओं में आ निकला।

इन सहराओं में करीब 2000 मील का सफर तय करके अब्दुर्रहमान अल्जीरिया पहुंचा और अल्जीरिया के साहिल इलाकों में आबाद बर्बर कबीला नफरा में अपने ननिहाल के अजीजों के पास पनाह ली।

लेकिन हुआ फिर वही, अब्बासी हुकूमत के जासूसों ने जिन्हें अब्दुर्रहमान के कत्ल पर तैनात किया गया था, वह मुसलसल उसका पीछा करते रहे और अब्दुर्रहमान को यहां भी चैन नहीं लेने दिया।

754 ईसवी में अब्दुर्रहमान साहिल समंदर, कोह ए अतलस की घाटियों और सहराओं के रास्तों पर चलता रहा।

इस दौरान ना तो उसका इरादा कमजोर हुआ ना सोच में कमी आई। तमाम तरह की मुसीबतों और परेशानियों से निजात पाकर जब शुमाली अफ्रीका में भी अब्दुर्रहमान का पीछा नहीं छोड़ा गया तो उसने अंदलुस की तरफ रुख कर लिया। अंदलुस में भी अब्दुर्रहमान के अजीज व रिश्तेदार रहते थे और वहां मुसलमानों की हुकूमत को करीब हाफ सेंचुरी बीत चुकी थी।

लेकिन अंदलुस की हालत भी खराब थी, मुसलमानों के गिरोह आपस में एक दूसरे के गिरेबान तक पहुंच रहे थे, हुकूमत कमजोर और हुकुमरान आराम पसंद और ख्वाहिशों में मुब्तिला थे।

अंदरूनी और बाहरी साजिशें जोर पर थीं, हुकमरान नींद से जागने को तैयार न थे। अब्दुर्रहमान अल दाखिल ने बर्बर कबीलों को मिलाकर एक फौज तैयार की, मुसलमान सरदारों की हिमायत हासिल की और September 755 में अंदलुस में दाखिल हुआ, यहीं से अब्दुर्रहमान को अब्दुर्रहमान अल दाखिल कहा जाने लगा।

---
अस्वीकरण: यह पोस्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध ऐतिहासिक जानकारी पर आधारित है, कृपया आधिकारिक स्रोतों से पुष्टि करें।

मुसलमानों ने आधी सदी में आधी दुनिया फतह कर ली थीमुसलमानों ने आधी सदी में आधी दुनिया फतह कर लिया था और उनकी सिर्फ एक नस्ल...
28/09/2026

मुसलमानों ने आधी सदी में आधी दुनिया फतह कर ली थी

मुसलमानों ने आधी सदी में आधी दुनिया फतह कर लिया था और उनकी सिर्फ एक नस्ल ने इतनी जीत हासिल की जो रूमी सल्तनत को 8 सदियों में नसीब हुई थी। यह इंसानी तारीख में फतूहात की हैरतनाक दास्तान है।

---
अस्वीकरण: यह पोस्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध ऐतिहासिक जानकारी पर आधारित है, कृपया आधिकारिक स्रोतों से पुष्टि करें।

Address

Perintalmanna
841414

Telephone

+918700873298

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Aligarian Boy posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Business

Send a message to Aligarian Boy:

Shortcuts

Share