28/05/2021
झूठ इतनी ज़ोर से बोला गया
कि
सच को चुप होना पड़ा,
आत्मनिर्भरता का ऐसा प्रमाण दिखाया गया
कि
राष्ट्र के भविष्य को सड़कों पे डोलना पड़ा।
लॉकडाउन में रेगिस्तान के आंचलिक रेसिपी 'राबड़ी' हेतु बाजरी मोटा आटा तैयार करते हुए श्रीमती जी।
दोस्तों, ये तस्वीर आत्मनिर्भर मरुभूमि की बुलंद तस्वीर है। यहाँ तैयारी हो रही है राबड़ी के लिये बाजरी पीसने की। मैं ये तो नही कहता कि राबड़ी कोरोना वायरस का इलाज़ है लेकिन प्राकृतिक इम्युनिटी बूस्टर जरूर है। लिक्विड होने के कारण शरीर को संतृप्त रखती है। सुपाच्य है। बाजरी में प्रोटीन, फाइवर, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फास्फोरस, आयरन, कई तरह के एमिनो अम्ल, कार्बोहाइड्रेट होते है। अन्य अनाजों की तरह इससे कैंसर कारक टॉक्सिक नही बनते अतः कैंसर मरीज को इसका सेवन बताया जाता है। यह दिल के मरीजों के लिये भी अच्छा है। हमारा आम भोजन गेँहू जिससे बहुत से लोगों ग्लूटेन एलर्जी की शिकायत होती है लेकिन बाजरे में ये समस्या नही है। बाजरे में अम्लीयता अधिक होने से इसका पथ्य कोविड से लड़ने में सक्षम बनाता है। राबड़ी में दूसरे कॉन्टेंट छाछ और कम मात्रा में मोठ का आटा होता है। मोठ जो दलहन है प्रोटीन तो है ही इसके अलावा इस दलहन में कृमि नाशक तथा ज्वर नाशक का गुण भी होता है। बीकानेर की पहचान स्थानीय मोठ नामक दलहन से ही है। भुजिया, पापड़, बड़ी का यह रॉ मेटेरियल जो है।
राबड़ी दो प्रकार से बनती है। जिनके यहां छाछ भरपूर है वो इसे छाछ में बाजरी का मोटा आटा उबालकर सीधे ही बनाते है। दूसरी होती है 'डोए' वाली राबड़ी। इसमें थोड़ी सी छाछ में बाजरी का आटा और मोठ का आटा अच्छे से मिलाकर धूप में किण्वन हेतु रख दिया जाता हैं। चार छह घण्टे बाद उसमें उबटन पैदा हो जाती है तब उसे उबाल लिया जाता है। अगले दिन उसमें थोड़ा छाछ या दही मिलाकर ठंडा-ठंडा पिया जाता है। इसमें एल्कोहल की सांगोपांग मात्रा बन जाती है लेकिन ये मित्र एल्कोहल है जो पाचन क्षमता बढ़ाता है दिन में अच्छी नींद में सुलाता है यानी लॉकडाउन के नियमो को बनाये रखने में सहायक है। धूप वगैरह में बाहर निकलना भी पड़े तो लू से बचाव का सर्वोत्तम साधन है। इसमें विटामिन सी भी प्राचुर मात्रा में होता है अर्थात इसके सेवन के बाद आपको कोई लिमसी विमसी नही चुसनी।
इसलिये दोस्तो आत्मनिर्भर बनो और सुबह सुबह नाश्ते के रूप दो चार ग्लास राबड़ी सुड़को।