04/03/2026
दान, अहंकार और जैन समाज की बदलती मानसिकता
दान का वास्तविक अर्थ है – स्वामित्व का पूर्ण त्याग. जिस वस्तु पर हमारा अधिकार था, उसे बिना किसी अपेक्षा, बिना किसी प्रसिद्धि की इच्छा के छोड़ देना ही दान है. परंतु आज समाज में एक विचित्र प्रवृत्ति दिखाई देती है – दान की वस्तु पर दाता का नाम मोटे अक्षरों में अंकित हो, यह आग्रह रहता है. यदि नाम छूट जाए तो असंतोष उत्पन्न होता है. प्रश्न यह है कि क्या यह दान है या दान के माध्यम से प्रतिष्ठा अर्जित करने का साधन? इस विषय को जैन आगमों के आलोक में समझना आवश्यक है.
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दान का आदर्श स्वरूप वह है जिसमें दाता स्वयं को केवल निमित्त माने. कर्म सिद्धांत के अनुसार पुण्य का लेखा पत्थर की पट....