Rashtra Ki Dairy

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"देशप्रेम वह भावना है, जिसमें व्यक्ति अपने देश की उन्नति, सम्मान और हित को सर्वोपरि रखकर निस्वार्थ भाव से उसके लिए समर्पित रहता है।"
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07/09/2026

Nehru Chacha Ke Pyare Bachche ❤️

07/09/2026
07/09/2026

JRD Tata and Indian Airlines

मनमोहन सिंह दुनिया के बड़े अर्थशास्त्रियों में गिने जाते थे और भारत के प्रधानमंत्री भी बने। लेकिन परिवार के मुताबिक घर म...
07/09/2026

मनमोहन सिंह दुनिया के बड़े अर्थशास्त्रियों में गिने जाते थे और भारत के प्रधानमंत्री भी बने। लेकिन परिवार के मुताबिक घर में उनका अंदाज बिल्कुल अलग था।

उन्हें अंडा उबालना नहीं आता था, टीवी चलाना नहीं आता था। वे फाइलों की गठरियां घर लाते और बिस्तर पर पालथी मारकर तकिए पर काम करते रहते।

चलते इतने तेज थे कि साथ चलने वाले पीछे छूट जाते। सोचते समय उंगली नाक पर रखते, दाढ़ी खींचते और खुद से बड़बड़ाते।

लेकिन उनकी जिंदगी में एक बेहद दर्दनाक अध्याय 1984 भी था। जब वे आरबीआई गवर्नर थे, दिल्ली के उनके घर को भीड़ ने घेर लिया। परिवार के लोगों ने बड़ी मुश्किल से उस घर को बचाया और रात में मनमोहन सिंह को चुपचाप हवाई अड्डे तक पहुंचाया।

सालों बाद प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने 1984 के सिख विरोधी दंगों के लिए संसद में देश की ओर से माफी मांगी।

शायद मनमोहन सिंह की सबसे बड़ी खूबी यही थी—व्यक्तिगत दर्द को भी उन्होंने बदले की भावना नहीं, बल्कि जिम्मेदारी में बदलने की कोशिश की।

कल्पना कीजिए....एक सरकार ने जे.आर.डी. टाटा को एयर इंडिया के शीर्ष पद से हटा दिया।लेकिन सरकार के इस फैसले के बाद सत्ता से...
06/09/2026

कल्पना कीजिए....
एक सरकार ने जे.आर.डी. टाटा को एयर इंडिया के शीर्ष पद से हटा दिया।
लेकिन सरकार के इस फैसले के बाद सत्ता से बाहर बैठी इंदिरा गांधी ने उन्हें खुद चिट्ठी लिखी।

आखिर उस चिट्ठी में ऐसा क्या था?

साल था 1978,

देश में जनता पार्टी की सरकार थी और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री थे।
इंदिरा गांधी सत्ता से बाहर थीं।

1 फरवरी 1978 को जे.आर.डी. टाटा को एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस के बोर्ड से हटा दिया गया।

जे.आर.डी. टाटा के लिए यह सिर्फ एक पद का जाना नहीं था।

उन्होंने एयर इंडिया को एक ऐसी पहचान देने में दशकों लगाए थे,
जिस पर भारत गर्व करता था।

और जब यह खबर इंदिरा गांधी तक पहुँची…

उन्होंने 14 फरवरी 1978 को जे.आर.डी. टाटा को अपने हाथ से एक निजी पत्र लिखा।

चिट्ठी की शुरुआत थी—

“Dear Jeh…”

इसके बाद इंदिरा गांधी ने लिखा कि उन्हें यह जानकर बहुत दुख हुआ कि जे.आर.डी. अब एयर इंडिया का हिस्सा नहीं रहे।

लेकिन अगली बात और भी खास थी।

उन्होंने जे.आर.डी. टाटा को सिर्फ एयर इंडिया का चेयरमैन नहीं माना।

उन्होंने उन्हें एयर इंडिया का—

“Founder and Nurturer”

यानी संस्थापक और उसे सँवारने वाला व्यक्ति बताया।

उन्होंने लिखा कि जे.आर.डी. एयर इंडिया की छोटी-से-छोटी चीज पर ध्यान देते थे—
यहाँ तक कि विमान की सजावट और एयर होस्टेस की साड़ियों तक पर।

फिर इंदिरा गांधी ने एक ऐसी बात लिखी,
जो इस पूरे पत्र को खास बना देती है—

“We were proud of you and of the Airline.”

उन्होंने कहा कि भारत उनके योगदान का ऋणी रहेगा।

ध्यान दीजिए…

यह चिट्ठी उस समय लिखी गई थी जब इंदिरा गांधी खुद सत्ता में नहीं थीं।

जे.आर.डी. टाटा ने जवाब दिया।

उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी के शब्दों ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया।

बाद में 1980 में इंदिरा गांधी सत्ता में लौटीं और जे.आर.डी. टाटा को फिर एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस के बोर्ड में शामिल किया गया।

इस कहानी की सबसे बड़ी सीख शायद यही है—

राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हो सकते हैं,
लेकिन देश के निर्माण में किसी व्यक्ति के योगदान का सम्मान उससे बड़ा होता है।

और शायद इसलिए…

एक पुरानी चिट्ठी आज भी इतिहास की एक बड़ी कहानी कहती है।



अगर आपको इतिहास की ऐसी सच्ची और कम सुनी गई कहानियाँ पसंद हैं, तो Follow जरूर करें।

Maa aur Beta ❤️
05/09/2026

Maa aur Beta ❤️

जवाहरलाल नेहरू और डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का संबंध केवल प्रधानमंत्री और उपराष्ट्रपति या राष्ट्रपति का संबंध नहीं था। दो...
05/09/2026

जवाहरलाल नेहरू और डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का संबंध केवल प्रधानमंत्री और उपराष्ट्रपति या राष्ट्रपति का संबंध नहीं था। दोनों के बीच गहरा आपसी सम्मान, विश्वास और बौद्धिक मित्रता थी। नेहरू राधाकृष्णन को एक महान शिक्षक, दार्शनिक और विचारक के रूप में बेहद सम्मान देते थे।

1952 में राधाकृष्णन भारत के पहले उपराष्ट्रपति बने। अगले दस वर्षों तक वे इस पद पर रहे और इस दौरान जवाहरलाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री थे। दोनों के बीच लगातार संवाद और सहयोग बना रहा।

नेहरू ने राधाकृष्णन के बारे में कहा था कि उन्होंने देश की अनेक प्रकार से सेवा की है, लेकिन सबसे बढ़कर वे एक महान शिक्षक हैं, जिनसे देश ने बहुत कुछ सीखा है और आगे भी सीखता रहेगा।

इन दोनों के रिश्ते में केवल गंभीर राजनीति और दर्शन ही नहीं था, बल्कि एक हल्का-फुल्का मानवीय पक्ष भी था।

1953 में बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए एक चैरिटी क्रिकेट मैच आयोजित किया गया। इसमें नेहरू की टीम और उपराष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन की टीम आमने-सामने थीं। नेहरू ने टॉस जीता और पहले बल्लेबाजी करने का फैसला किया। यह प्रसंग बताता है कि उस दौर के शीर्ष नेताओं के बीच सार्वजनिक जीवन के साथ-साथ सहज व्यक्तिगत संबंध भी थे।

राधाकृष्णन ने भी नेहरू के व्यक्तित्व और विचारों को समझने की कोशिश की। बाद में उन्होंने नेहरू पर “On Nehru” नाम से एक पुस्तक भी लिखी, जो 1965 में प्रकाशित हुई।

5 सितंबर को भारत में शिक्षक दिवस मनाया जाता है। यह दिन डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती है, जिनका जन्म 5 सितंबर 1888 को हुआ था।

1962 में जब राधाकृष्णन भारत के राष्ट्रपति बने, तो उनके कुछ छात्रों और मित्रों ने उनका जन्मदिन मनाने की इच्छा जताई। तब उन्होंने सुझाव दिया कि उनके जन्मदिन को व्यक्तिगत उत्सव बनाने के बजाय शिक्षकों को सम्मान देने के दिन के रूप में मनाया जाए।

इसी विचार के बाद भारत में 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाने की परंपरा शुरू हुई।

राधाकृष्णन का मानना था कि शिक्षक केवल बच्चों को पढ़ाने का काम नहीं करते, बल्कि वे समाज और राष्ट्र का भविष्य तैयार करते हैं। उनका विश्वास था कि देश के सबसे अच्छे और प्रतिभाशाली लोगों को शिक्षण के क्षेत्र में आना चाहिए।

उनका पूरा जीवन इस विचार का उदाहरण था। उन्होंने मद्रास, मैसूर और कलकत्ता विश्वविद्यालयों में अध्यापन किया, आंध्र विश्वविद्यालय के कुलपति रहे और ऑक्सफोर्ड में भी दर्शनशास्त्र पढ़ाया। बाद में वे देश के उपराष्ट्रपति और फिर राष्ट्रपति बने।

लेकिन इतने बड़े पदों पर पहुंचने के बाद भी डॉ. राधाकृष्णन की पहचान सबसे पहले एक शिक्षक और दार्शनिक की ही रही।

आज 5 सितंबर 2026 को शिक्षक दिवस के अवसर पर नेहरू और राधाकृष्णन के संबंध की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि राजनीति से ऊपर भी कुछ रिश्ते होते हैं—ज्ञान, विचार, सम्मान और राष्ट्र के प्रति साझा प्रतिबद्धता के रिश्ते।

सभी शिक्षकों को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। 🙏🇮🇳

कपिल देव सिर्फ एक महान क्रिकेटर नहीं थे, बल्कि हिम्मत, मेहनत, जुनून और आत्मविश्वास की जीवंत मिसाल थे।भारत के विभाजन के स...
05/09/2026

कपिल देव सिर्फ एक महान क्रिकेटर नहीं थे, बल्कि हिम्मत, मेहनत, जुनून और आत्मविश्वास की जीवंत मिसाल थे।

भारत के विभाजन के समय उनका परिवार रावलपिंडी से भारत आया। उनके पिता लकड़ी का काम करते थे। एक साधारण परिवार से निकले इस लड़के ने दुनिया को दिखा दिया कि आपकी शुरुआत छोटी हो सकती है, लेकिन आपका सपना कभी छोटा नहीं होना चाहिए।

युवा शिविर में जब उन्हें दो रोटियाँ देकर यह कह दिया गया कि “भारत में फास्ट बॉलर नहीं होते”, तो कपिल ने उस बात को चुनौती की तरह लिया। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी तेज गेंदबाजी को नई पहचान देने में लगा दी।

महज 17 साल की उम्र में हरियाणा के लिए प्रथम श्रेणी क्रिकेट में डेब्यू किया और पहली ही पारी में 6 विकेट झटके। प्रतिभा थी, लेकिन उससे कहीं ज्यादा जुनून और मेहनत थी।

1981 के मेलबर्न टेस्ट में जांघ की मांसपेशी में गंभीर चोट के बावजूद वे मैदान पर उतरे और 5 विकेट लेकर भारत को ऐतिहासिक जीत दिलाई। उनके लिए दर्द से बड़ा देश और टीम का लक्ष्य था।

फिर आया 1983 का वो ऐतिहासिक साल…

जिम्बाब्वे के खिलाफ भारत सिर्फ 17 रन पर 5 विकेट गंवा चुका था। ऐसा लग रहा था कि मैच हाथ से निकल गया। लेकिन कपिल देव ने हार मानने से इनकार कर दिया।

उन्होंने नाबाद 175 रन की अविश्वसनीय पारी खेलकर भारत को संकट से बाहर निकाला। आगे चलकर उसी टीम ने दो बार की विश्व चैंपियन वेस्टइंडीज को हराया और भारत पहली बार विश्व कप चैंपियन बना। 🏆

सिर्फ 24 साल की उम्र में कपिल देव ने भारतीय क्रिकेट का इतिहास बदल दिया।

टेस्ट क्रिकेट में उनके नाम 5,248 रन और 434 विकेट हैं। वे टेस्ट इतिहास के पहले ऐसे खिलाड़ी बने जिन्होंने 400 से अधिक विकेट और 4,000 से अधिक रन दोनों का आंकड़ा हासिल किया।

2002 में उन्हें Wisden Indian Cricketer of the Century चुना गया—भारतीय क्रिकेट के दिग्गज सुनील गावस्कर और सचिन तेंदुलकर को पीछे छोड़कर।

लेकिन कपिल देव की सबसे बड़ी विरासत उनके आंकड़े नहीं हैं।

उनकी सबसे बड़ी विरासत है विश्वास।

उन्होंने एक ऐसे भारत को विश्व कप जिताया, जिसे दुनिया खिताब का दावेदार नहीं मानती थी।

कपिल देव की कहानी हमें सिखाती है—

जब लोग कहें कि “तुम नहीं कर सकते,”
तो बहस मत करो…
बस मेहनत करते रहो।

क्योंकि एक दिन वही लोग, जो आपकी क्षमता पर सवाल उठा रहे थे, आपकी सफलता के लिए तालियां बजाएंगे।

कपिल देव सिर्फ क्रिकेट के नायक नहीं हैं—
वे उस भारतीय आत्मविश्वास के प्रतीक हैं, जिसने दुनिया से कहा:
“हम भी कर सकते हैं।” 🇮🇳🏏

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