08/08/2026
व्यंग्य: क्या हँसाना आसान है?
यह बात तो आप भी ज़रूर मानते होंगे कि अपने मज़ाक और चुटकुलों पर हँसना आसान है, मगर उन पर किसी को हँसाना ज़रा कठिन। क्योंकि पहले तो चुटकुले में वाकई कोई ऐसी बात होनी चाहिए, जो हर किसी को हास्यास्पद लगे, और फिर उसे कहने का लहज़ा लाजवाब और टाइमिंग बिल्कुल चटक होनी चाहिए। तब जाकर सामने वाले को हँसी आए, इसका अनुमान लगाया जा सकता है।
मगर वही मनोरंजक बातें जब एक किताब में लिखीं हों, और उन्हें कहने वाला कोई बढ़िया वाचक सामने न हो बल्कि एक पाठक उसे हाथों में पकड़े पढ़ रहा हो, तो फिर कैसे उसकी हँसी सुनिश्चित की जाए?
श्री हरिशंकर परसाई जैसे गुणवान व्यंग्य लेखक अपनी दिलचस्प बातों को गंभीर साहित्यकार की तरह नहीं, बल्कि साफ़-सरल, बोलचाल की भाषा में रचना करने वाले लेखक के रूप में लिखते थे।
याद करिए ‘निठल्ले की डायरी’ के शुरुआती पृष्ठों में आए काका और निठल्ले के बीच हुई बात को:
मैंने काका से पूछा, “और काका, क्या कर रहे हैं?”
काका ने कहा, “बैठे हैं।”
अगले दिन फिर मैंने काका से पूछा, “क्या हाल है काका?”
काका ने फिर कहा, “बस, बैठे हैं।”
जब भी निठल्ला काका का हाल-समाचार पूछता, तो काका का वही जवाब हाज़िर होता। जब आप बार-बार उनके वही सवाल और वही जवाब पढ़ते हैं, तो आपको स्वतः हँसी आने लगती है, जैसे आप अपने आखों के सामने इन दोनों को देख और सुन सकते हों।
एक बेहतरीन लेखक अपनी कहानियों में किरदारों को इतना सजीव बना देता है, कि आपको ऐसा मालूम होने लगता है कि आप उनकी ही दुनिया में चले गए हैं, और उनके अटपटेपन को भलीभांति समझते हैं।
अगर आपको भी व्यंग्य लिखना पसंद है, तो अपनी बातों को ऐसे लिखिए जैसे कि आपकी कहानी के पात्र पाठक के ठीक सामने हों। इससे आपकी लेखनी बहुत प्रभावशाली और ऊर्जावान होगी।
साहित्य पर ऐसी ही चर्चा के लिए जुड़िए ‘जयराज पब्लिकेशन्स’ से, और जारी रखिए अपना लेखन और पाठन।
जयराज पब्लिकेशन्स
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