06/03/2026
बिहार की मौजूदा राजनीति को केवल “नीतीश कुमार की बर्बादी” कहकर समझना शायद पर्याप्त नहीं होगा। अधिक सटीक यह होगा कि इसे उनकी पार्टी और उसके नेतृत्व की क्रमिक कमजोर पड़ती स्थिति के रूप में देखा जाए।
आज जो हालात दिखाई दे रहे हैं, वे किसी एक दिन की उपज नहीं हैं। पिछले दो दशकों में भाजपा-आरएसएस के साथ राजनीतिक साझेदारी ने एक ऐसा ढांचा बनाया, जिसमें एक ओर नीतीश कुमार लंबे समय तक सत्ता में बने रहे, वहीं दूसरी ओर जदयू के भीतर स्वतंत्र और मजबूत नेतृत्व का उभरना लगभग असंभव हो गया।
इस अवधि के दौरान कई ऐसे बुनियादी प्रश्न भी हैं जो लगातार अनसुलझे रहे—जैसे बिहार में बाढ़ और सूखे की स्थायी समस्या का समाधान, सार्वजनिक वित्तपोषित स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण, रोजगारपरक और शोध-आधारित शिक्षा का संकट, तथा निजी शिक्षण संस्थानों के बढ़ते प्रभाव के बीच शिक्षा के बढ़ते बाजारीकरण का सवाल।
इसी के साथ अफसरशाही के विस्तार, भ्रष्टाचार के आरोप, बड़े पैमाने पर पलायन, अस्पतालों के कुप्रबंधन, उद्योग और नवाचार के क्षेत्र में सीमित प्रगति जैसे मुद्दे भी बार-बार उठते रहे हैं। छात्र राजनीति और सामाजिक संगठनों के बीच यह आरोप भी सामने आता रहा है कि अलग-अलग योजनाओं और व्यवस्थाओं के नाम पर छात्राओं की सुरक्षा और गरिमा से जुड़े प्रश्नों को गंभीरता से नहीं लिया गया।
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में यह भी देखने की जरूरत है कि क्या एक नया नैरेटिव तैयार किया जा रहा है, जो इन दीर्घकालिक सवालों को पीछे छोड़कर “सुशासन” की स्थापित छवि को ही आगे रखे। यदि ऐसा होता है, तो इसके राजनीतिक लाभ-हानि का असर सीधे तौर पर बिहार की सत्ता राजनीति पर पड़ेगा, जहाँ भाजपा-आरएसएस की भूमिका भी महत्वपूर्ण बनी हुई है।
ऐसे में सवाल केवल व्यक्तियों का नहीं, बल्कि उस व्यापक राजनीतिक विमर्श का है जिसमें बिहार की नीतियों, उपलब्धियों और विफलताओं का निष्पक्ष मूल्यांकन होना चाहिए।
#नीतीश_कुमार #बिहार_राजनीति