Green Left 19

Green Left 19 पर्यावरण, विज्ञान, शिक्षा, राजनीति, स्वास्थ्य, संस्कृति, अंतरराष्ट्रीय और खेल की ख़बरें

30/03/2026

क्या देश में सवाल पूछना अपराध बनता जा रहा है?

कारवां मैगजीन के कंटेंट क्रिएटर मुकेश पर 50 करोड़ की मानहानि नोटिस और FIR, फिर मॉलिटिक्स, नेशनल दस्तक, राजीव निगम और 4PM चैनल पर कार्रवाई, क्या यह संयोग है या पैटर्न? सवाल उठाने वालों पर नोटिस, दबाव और रोक।

जब आलोचना अपराध बन जाए और सिर्फ प्रशंसा बचे, तो यह लोकतंत्र नहीं। असहमति का जवाब दमन नहीं, बहस होनी चाहिए।

#अभिव्यक्ति_की_आजादी

25/03/2026

झारखंड में छात्रों और शिक्षाविदों की कई वर्षों से चली आ रही मांगों के बाद झारखंड सरकार ने NET के तर्ज़ पर JPSC के माध्यम से JET परीक्षा आयोजित करने हेतु अगस्त 2025 में विज्ञापन प्रकाशित किया। इसमें यह उल्लेख किया गया कि झारखंड में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति के लिए अभ्यर्थियों को पात्र माना जाएगा। इसके साथ ही उन्हें कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पीएचडी में प्रवेश के लिए भी योग्य माना जाएगा।

परीक्षा की पूर्व निर्धारित तिथि 29 मार्च 2026 थी, जिसे 19 मार्च के विज्ञापन के आधार पर बदलकर संभावित तिथि 26 अप्रैल कर दिया गया है। इससे झारखंड के छात्रों पर मानसिक दबाव बढ़ेगा और उन्हें परीक्षा में शामिल होने के लिए लंबा इंतजार भी करना पड़ेगा।

अब हम सभी की मांग है कि परीक्षा को तय समय पर आयोजित किया जाए, ताकि झारखंड के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के हजारों सृजित खाली पदों पर नियुक्ति की जा सके। इसके साथ ही, शोध करने के लिए लंबे समय से इंतजार कर रहे छात्रों को पीएचडी में प्रवेश का अवसर मिल सके।

21/03/2026

हर वर्ष राज्य स्तर पर "यूथ विधानसभा" और राष्ट्रीय स्तर पर "यूथ पार्लियामेंट" आयोजित किए जाते हैं। इनमें ऐसे छात्रों का चयन किया जाता है, जो समाज में सच बोलने का साहस नहीं जुटा पाते। उनके भाषणों को सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से वायरल किया जाता है, जो कहीं-न-कहीं उन मुद्दों को कमजोर करते हुए दिखते हैं, जिन पर देश के आम युवा सड़कों पर संघर्ष कर सच्चाई सामने लाते हैं। इसके विरोध में, भावनात्मक रूप से प्रभावित कर दूसरे मुद्दों की ओर ध्यान भटकाने का प्रयास किया जाता है, जिससे वास्तविक सच्चाई पूरी तरह दब जाती है।

#युवा_विधानसभा #युवा_संसद

देखिए, किस तरह का खेल खेला जा रहा हैपहले पेड़ और जंगल बचाने के नाम परपेड़ों पर सरकारी मुहर लगी,और आम लोगों से कहा गया -ग...
13/03/2026

देखिए, किस तरह का खेल खेला जा रहा है

पहले पेड़ और जंगल बचाने के नाम पर
पेड़ों पर सरकारी मुहर लगी,
और आम लोगों से कहा गया -
गैस का इस्तेमाल करो।

लोगों ने माना,
चूल्हों की आग छोड़
गैस की लौ अपना ली।

जब गैस की आदत पड़ गई,
तब धीरे-धीरे
पेड़ और जंगल कटने लगे।

तब तक
लोगों का रिश्ता
पेड़ों और जंगलों से टूट चुका था,
इसलिए
उन्हें बचाने की लड़ाई में
कोई खड़ा नहीं हुआ।

जब आसपास के
लगभग सारे पेड़ और जंगल
गायब हो गए,
तब लोगों को परेशानी में डालने के लिए
युद्ध छेड़ दिया गया,
और सत्ता
चुप्पी साधे बैठी रही।

अब लोगों के पास
न पेड़ हैं,
न जंगल,
न गैस का कनेक्शन

और तब
राष्ट्रवाद और धर्म के शोर में
लोगों ने
कोई समस्या देखनी ही बंद कर दी,
और चारों तरफ
एक गहरी चुप्पी फैल गई।

#कविता #ईरान_इजरायल_अमेरिका_युद्ध

09/03/2026

गीत गाते हुए लोग

गीत गाते हुए लोग
कभी भीड़ का हिस्सा नहीं हुए

धर्म की ध्वजा उठाए लोगों ने
जब देखा
गीत गाते लोगों को
वे खोजने लगे उनका धर्म
उनकी ध्वजा

अपनी खोज में नाकाम होकर
उन्होंने उन लोगों को जंगली कहा
वे समझ नहीं पाए
कि मनुष्य जंगल का हिस्सा है

जंगली समझे जाने वाले लोगों ने
कभी अपना प्रतिपक्ष नहीं रखा

वे गीत गाते रहे
और कभी भीड़ का हिस्सा नहीं बने।
- डॉ. पार्वती तिर्की

#गीत_गाते_हुए_लोग #फिर_उगना #डाॅ_पार्वती_तिर्की

07/03/2026

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिरोध की कविता के माध्यम से अद्वितीय पहचान बनाने वाली कवयित्री जसिंता केरकेट्टा के कविता संग्रह ईश्वर और बाजार से एक महत्वपूर्ण कविता - 'मैं देशहित में क्या सोचता हूँ'

#जसिंता_केरकेट्ट #मैं_देशहित_में_क्या_सोचता_हूं

बिहार की मौजूदा राजनीति को केवल “नीतीश कुमार की बर्बादी” कहकर समझना शायद पर्याप्त नहीं होगा। अधिक सटीक यह होगा कि इसे उन...
06/03/2026

बिहार की मौजूदा राजनीति को केवल “नीतीश कुमार की बर्बादी” कहकर समझना शायद पर्याप्त नहीं होगा। अधिक सटीक यह होगा कि इसे उनकी पार्टी और उसके नेतृत्व की क्रमिक कमजोर पड़ती स्थिति के रूप में देखा जाए।

आज जो हालात दिखाई दे रहे हैं, वे किसी एक दिन की उपज नहीं हैं। पिछले दो दशकों में भाजपा-आरएसएस के साथ राजनीतिक साझेदारी ने एक ऐसा ढांचा बनाया, जिसमें एक ओर नीतीश कुमार लंबे समय तक सत्ता में बने रहे, वहीं दूसरी ओर जदयू के भीतर स्वतंत्र और मजबूत नेतृत्व का उभरना लगभग असंभव हो गया।

इस अवधि के दौरान कई ऐसे बुनियादी प्रश्न भी हैं जो लगातार अनसुलझे रहे—जैसे बिहार में बाढ़ और सूखे की स्थायी समस्या का समाधान, सार्वजनिक वित्तपोषित स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण, रोजगारपरक और शोध-आधारित शिक्षा का संकट, तथा निजी शिक्षण संस्थानों के बढ़ते प्रभाव के बीच शिक्षा के बढ़ते बाजारीकरण का सवाल।

इसी के साथ अफसरशाही के विस्तार, भ्रष्टाचार के आरोप, बड़े पैमाने पर पलायन, अस्पतालों के कुप्रबंधन, उद्योग और नवाचार के क्षेत्र में सीमित प्रगति जैसे मुद्दे भी बार-बार उठते रहे हैं। छात्र राजनीति और सामाजिक संगठनों के बीच यह आरोप भी सामने आता रहा है कि अलग-अलग योजनाओं और व्यवस्थाओं के नाम पर छात्राओं की सुरक्षा और गरिमा से जुड़े प्रश्नों को गंभीरता से नहीं लिया गया।

वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में यह भी देखने की जरूरत है कि क्या एक नया नैरेटिव तैयार किया जा रहा है, जो इन दीर्घकालिक सवालों को पीछे छोड़कर “सुशासन” की स्थापित छवि को ही आगे रखे। यदि ऐसा होता है, तो इसके राजनीतिक लाभ-हानि का असर सीधे तौर पर बिहार की सत्ता राजनीति पर पड़ेगा, जहाँ भाजपा-आरएसएस की भूमिका भी महत्वपूर्ण बनी हुई है।

ऐसे में सवाल केवल व्यक्तियों का नहीं, बल्कि उस व्यापक राजनीतिक विमर्श का है जिसमें बिहार की नीतियों, उपलब्धियों और विफलताओं का निष्पक्ष मूल्यांकन होना चाहिए।

#नीतीश_कुमार #बिहार_राजनीति

22/12/2025

यह राजधानी रांची में स्थित बड़ा तालाब है। आज जिस तरह जैव-विविधता और पहाड़-पठारों को नष्ट करने की साज़िशें मौजूदा पूंजीपरस्त नीतियों और सत्ता-संरक्षण के चलते आगे बढ़ रही हैं, उससे यह आशंका गहरी होती जा रही है कि कहीं एक दिन इस तालाब का रखरखाव भी किसी निजी बिल्डर या पूंजीपति के हवाले न कर दिया जाए।

यदि ऐसा हुआ, तो समझना होगा कि सर्दियों की धूप में उगते सूरज की परछाई देखने, सुबह-शाम टहलने और दोस्तों के साथ बैठकर सुकून भरी बातचीत करने के लिए जहां रोज़ लोग जुटते हैं, वह जगह केवल यादों और इतिहास तक सीमित रह जाएगी, एक ऐसा इतिहास, जहां कभी यह तालाब लोगों के मेल-मिलाप और शांति का सार्वजनिक स्थान हुआ करता था।

#बड़ा_तालाब

कभी केंद्र सरकार तो कभी राज्य सरकार, कथित अतिक्रमण हटाने के नाम पर भूमिहीन गरीबों के घरों पर बुलडोजर चला रही है। सरकार य...
11/12/2025

कभी केंद्र सरकार तो कभी राज्य सरकार, कथित अतिक्रमण हटाने के नाम पर भूमिहीन गरीबों के घरों पर बुलडोजर चला रही है। सरकार यह सर्वे और समीक्षा क्यों नहीं कर पा रही है कि जो लोग भूमिहीन हुए हैं, वे किन परिस्थितियों में यहाँ तक पहुँचे? अधिकांश कथित अवैध बसावट की घटनाएँ शहरों में देखी गई हैं। क्या यह कारण नहीं है कि भूमिहीन, दलित और वंचित समुदायों से आने वाले नागरिक कठोर जातीय, धार्मिक, मनुवादी और सामंती शोषण, अत्याचार तथा अपनी पूर्वजों की जमीन पर दबंगों के कब्ज़े से पीड़ित होकर शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हुए? शहरों में उन्हें रोज़ी-रोटी के लिए स्वरोज़गार और दैनिक काम मिलता है और वे बंधुआ मजदूरी तथा शोषण से भरे ग्रामीण माहौल से निकलकर अपेक्षाकृत मुक्त शहरी परिवेश में अपने-आप को ढालने की कोशिश करते हैं।

निष्कर्ष रूप में आवश्यक है कि भूमिहीनों और गरीबों का व्यापक सर्वेक्षण हो, जिससे विश्वसनीय आँकड़े प्राप्त किए जा सकें। इन्हीं आँकड़ों के आधार पर स्थायी समाधान की दिशा में कदम बढ़ाए जाएँ। भूमिहीनों को जमीन, बेघर लोगों को आवास और सभी को सम्मानजनक रोजगार की गारंटी सुनिश्चित की जाए।

#भूमिहीन #बुलडोजर

जब आज संसद में इस पर चर्चा होनी चाहिए थी कि इंडिगो एयरलाइंस की वजह से करोड़ों लोगों की रोज़ी-रोटी और व्यवसाय प्रभावित हु...
09/12/2025

जब आज संसद में इस पर चर्चा होनी चाहिए थी कि इंडिगो एयरलाइंस की वजह से करोड़ों लोगों की रोज़ी-रोटी और व्यवसाय प्रभावित हुए हैं, ऐसी आपातकालीन स्थिति में सरकार और निजी क्षेत्र को कितना नुकसान हुआ है, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की साख पर इसका क्या प्रभाव पड़ा है और विदेशी यात्रियों की सुरक्षा व यात्रा अनुभव को हम कितनी मजबूती से संभाल पाए। तब इन सभी गंभीर मुद्दों पर चर्चा के बजाय संसद में जो सुना और देखा गया, वह समझ से परे है।

क्या हम अपने शिक्षा स्तर को इतना गिरा चुके हैं कि संवैधानिक और लोकतांत्रिक मूल्यों से संचालित आज़ाद देश की पीढ़ियों को ऐसे विषय विद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों में सिखाए जाने के बजाय प्रधानमंत्री को संसद में उनका उल्लेख करना पड़े? और फिर उन बातों का उपयोग वर्तमान समस्याओं को ढकने के लिए किया जाए?

यदि सरकार सचमुच राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत है, तो क्यों न ‘वंदे मातरम’ के रचनाकार, उसके प्रथम प्रकाशन, स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी भूमिका, राजनीतिक मान्यता और संगीत से जुड़े पहलुओं पर एक विशेष गोष्ठी आयोजित की जाए?

असल बात यह है कि जनता के वास्तविक मुद्दों और उनकी परेशानियों के प्रति सरकार की नीयत स्पष्ट नहीं है। इसी कारण वह मूलभूत समस्याओं पर चर्चा करने के बजाय पुराने और अप्रासंगिक मुद्दों को उखाड़ने का प्रयास करती है, जो अब सम्भव नहीं है।

#वंदे_मातरम #इंडिगो #पीएम_मोदी

काॅर्पोरेट देश को किस तरह बर्बाद कर सकता है, इसका बड़ा उदाहरण इंडिगो एयरलाइन से बेहतर और कोई नहीं हो सकता। अब भी सरकार क...
08/12/2025

काॅर्पोरेट देश को किस तरह बर्बाद कर सकता है, इसका बड़ा उदाहरण इंडिगो एयरलाइन से बेहतर और कोई नहीं हो सकता। अब भी सरकार के पास सभी महत्वपूर्ण संस्थाओं को अपने नियंत्रण में रखने का अवसर है। जिन इंडिगो से यात्रा करने वाले यात्री कुछ घंटे सड़क जाम रहने पर देश की जीडीपी गिरने का गणित समझाने लगते थे, वे आज चुप बैठे हैं, जो‌ विरोध का स्वर दिखनी चाहिए थी, वो दिखा नहीं। आप समझ सकते हैं कि देश में हवाई यात्रा लोगों का अंतिम विकल्प होती है। यदि यह एक दिन भी बंद रही, तो जितनी क्षति किसी बड़े सड़कमार्ग के एक वर्ष तक जाम रहने से नहीं पहुँचती, उतनी यह एक ही दिन में पहुँचा देती है।

#इंडिगो_एयरलाइन

बड़ा तालाब और उसके आसपास के दृश्यों की झलकियाँ, रांची। #बड़ा_तालाब  #प्रकृति
17/11/2025

बड़ा तालाब और उसके आसपास के दृश्यों की झलकियाँ, रांची।

#बड़ा_तालाब #प्रकृति

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