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Arjun EarthScape जय हिंद वंदे मातरम।।

एक बार पोस्ट जरूर पढ़ना सब समझ में आएगा ☝️फोटो किसी अनजान जगह का है लेकिन जो यहां पर घटना होते हुए दिख रही है इस घटना से...
04/10/2026

एक बार पोस्ट जरूर पढ़ना सब समझ में आएगा ☝️

फोटो किसी अनजान जगह का है लेकिन जो यहां पर घटना होते हुए दिख रही है इस घटना से हम अनजान नहीं हैं।
इसलिए हमने इस पर अपने विचार रखे हैं।

"मेरा यह पोस्ट पढ़ने वाले सभी मित्रों से अनुरोध है कि इस विषय पर थोड़ी गंभीरता से विचार करें और इसे समझने का प्रयास करें।
​हम और आप सभी इंसान हैं। क्या कभी आपने इस बात पर गौर किया है कि 'देव' और 'दैत्य' दो बिल्कुल अलग-अलग प्रवृत्तियां हैं? दैत्य वह होता है जो राक्षसी प्रवृत्ति का होता है, जिसे दूसरों को कष्ट देकर और हिंसा फैलाकर खुशी मिलती है। इसके विपरीत, देव (देवता) हमेशा दयालु, परोपकारी और सबकी रक्षा करने वाले होते हैं। देवता कभी किसी को कष्ट में नहीं देख सकते, उनके लिए संसार का हर प्राणी—चाहे वह इंसान हो या कोई मूक जीव-जंतु—एक समान होता है।
​इसके बावजूद, यदि कोई दैत्यों या राक्षसों जैसी प्रवृत्ति अपनाकर हिंसा और खून-खराबे को बढ़ावा दे, और ऐसे कृत्यों को देवी-देवताओं के नाम से जोड़े, तो क्या यह उन देवताओं के वास्तविक स्वरूप से मेल खाता है? सोचिए, जो पूजा-पाठ और परंपराएं दया और करुणा के बजाय किसी बेकसूर बेजुबान की जान लेने पर आधारित हों, वे किसी देवता की हो सकती हैं या फिर किसी आसुरी प्रवृत्ति की?
​अब समय आ गया है कि हम अपनी अंतरात्मा को जगाएं, नकारात्मकता का त्याग करें और सकारात्मकता के मार्ग पर सोच-विचार करें। आइए, धर्म के नाम पर चल रहे इस पाखंड को पहचानें और अपनी सच्ची सनातन संस्कृति को बचाएं।"

आज हम अध्याय 1 (अर्जुनविषादयोग) के अंतिम श्लोक, यानी श्लोक 41 से 45 प्रस्तुत कर रहे हैं।​इन श्लोकों में अर्जुन अपने तर्क...
04/10/2026

आज हम अध्याय 1 (अर्जुनविषादयोग) के अंतिम श्लोक, यानी श्लोक 41 से 45 प्रस्तुत कर रहे हैं।
​इन श्लोकों में अर्जुन अपने तर्क को पूर्ण करते हैं और युद्ध से पूरी तरह विरत (अलग) हो जाते हैं।

श्रीमद्भागवत गीता — अध्याय 1 (अर्जुनविषादयोग) [श्लोक 41 से 45]
​श्लोक 41:
​वर्णसङ्करो कुलघ्नानां कुलस्य च |
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ||
​अर्थ: वर्णसंकर (अवांछित संतानें) कुलघातियों के लिए और कुल के लिए नरक का कारण बनते हैं, क्योंकि पितरों का पिण्डदान और तर्पण (क्रिया) बंद हो जाता है।
​श्लोक 42:
​दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः |
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ||
​अर्थ: कुलघातियों के इन वर्णसंकर करने वाले दोषों से सनातन कुल-धर्म और जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं।
​श्लोक 43:
​उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन |
नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ||
​अर्थ: हे जनार्दन! हमने ऐसा सुना है कि जिनका कुल-धर्म नष्ट हो जाता है, ऐसे मनुष्यों का निवास निश्चित रूप से नरक में होता है।
​श्लोक 44:
​अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् |
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ||
​अर्थ: अफ़सोस! हम लोग कितने बड़े पाप को करने के लिए तैयार हो गए हैं, जो केवल राज्य और सुख के लोभ से अपने ही स्वजनों को मारने के लिए उद्यत (तैयार) हो गए हैं।
​श्लोक 45:
​यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः |
धार्तराष्ट्रारणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ||
​अर्थ: यदि शस्त्रधारी धृतराष्ट्र के पुत्र (कौरव) रणभूमि में, शस्त्र न चलाने वाले और प्रतिकार न करने वाले मुझ अकेले को मार डालें, तो वह (उनक हाथों मर जाना) मेरे लिए अधिक कल्याणकारी होगा।
​💡
​आज का विचार:
जब मोह और कर्तव्य का संघर्ष चरम पर होता है, तब व्यक्ति अपनों के विरुद्ध खड़े होने से बेहतर खुद का बलिदान देना उचित समझता है। अर्जुन का यह विषाद मनुष्य मात्र की भावनाओं का प्रतीक है।
​🙏 Arjun EarthScape

03/10/2026

Ritu Thakur

आज हम अध्याय 1 (अर्जुनविषादयोग) के श्लोक 36 से 40 प्रस्तुत कर रहे हैं।​यहाँ इन श्लोकों और उनकी सरल हिंदी व्याख्या दी गई ...
03/10/2026

आज हम अध्याय 1 (अर्जुनविषादयोग) के श्लोक 36 से 40 प्रस्तुत कर रहे हैं।
​यहाँ इन श्लोकों और उनकी सरल हिंदी व्याख्या दी गई है:
​श्रीमद्भागवत गीता — अध्याय 1 (अर्जुनविषादयोग) [श्लोक 36 से 40]
​श्लोक 36:
​नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः |
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः ||
​अर्थ: इन आराधनीय (और कुलीन)तार्त्यत: आतताइयों को मारने से हमारे ऊपर ही पाप लगेगा। इसलिए, अपने ही कुटुंब के लोगों को मारना हमारे लिए किसी भी प्रकार से उचित नहीं है।
​श्लोक 37:
​यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः |
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोचे च पातकम् ||
​अर्थ: लोभ के कारण जिनका चित्त भ्रष्ट हो गया है, वे लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष और मित्रों के साथ विरोध करने में लगने वाले पाप को नहीं देखते।
​श्लोक 38:
​कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मात्निवर्तितुम् |
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ||
​अर्थ: कुल के नाश से होने वाले इस बड़े दोष को स्पष्ट रूप से जानने वाले हम लोगों को, हे जनार्दन (कृष्ण)! इस पाप से हटने के लिए क्यों नहीं सोचना चाहिए?
​श्लोक 39:
​कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्मः सनातनाः |
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ||
​अर्थ: कुल के नाश होने से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं, और धर्म के नष्ट हो जाने पर संपूर्ण कुल को अधर्म दबा लेता है।
​श्लोक 40:
​अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः |
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ||
​अर्थ: हे कृष्ण! अधर्म के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ दूषित (भ्रष्ट) हो जाती हैं, और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर (अवांछित संतानें) उत्पन्न होते हैं।
​💡
​आज का विचार:
जब समाज और परिवार की नींव (धर्म और नैतिकता) हिलने लगती है, तो उसका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों पर पड़ता है। अपने मूल संस्कारों को बचाए रखना ही सबसे बड़ा कर्तव्य है।
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🙏जय माता दी 🙏
02/10/2026

🙏जय माता दी 🙏

Alison Variety 🥝 KIWI 🥝
02/10/2026

Alison Variety 🥝 KIWI 🥝

आज हम अध्याय 1 (अर्जुनविषादयोग) के श्लोक 31 से 35 प्रस्तुत कर रहे हैं।​यहाँ इन श्लोकों और उनकी सरल हिंदी व्याख्या दी गई ...
02/10/2026

आज हम अध्याय 1 (अर्जुनविषादयोग) के श्लोक 31 से 35 प्रस्तुत कर रहे हैं।
​यहाँ इन श्लोकों और उनकी सरल हिंदी व्याख्या दी गई है:
​श्रीमद्भागवत गीता — अध्याय 1 (अर्जुनविषादयोग) [श्लोक 31 से 35]
​श्लोक 31:
​न च श्रेयानुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे |
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ||
​अर्थ: हे कृष्ण! युद्ध में अपने ही स्वजनों को मारकर मैं किसी भी प्रकार के कल्याण को नहीं देखता हूँ। न तो मैं विजय चाहता हूँ, और न ही राज्य या सुखों को।
​श्लोक 32-34:
​कि नो राज्‍येन गोविन्द कि भोगैर्जीवितेन वा |
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्‍यं भोगः सुखानि च ||
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्ता धनानि च |
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः |
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः सालाः संबन्धििनस्तथा ||
​अर्थ: हे गोविन्द! हमें ऐसे राज्य से, भोगों से या जीवन से भी क्या लाभ? जिनके लिए हम राज्य, भोग और सुखों की कामना करते हैं, वे ही ये सब आचार्य, पिता, पुत्र, दादा, मामा, ससुर, पोते और अन्य संबंधी अपने प्राणों और धन की आशा को छोड़कर इस युद्ध में खड़े हैं।
​श्लोक 35:
​एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन |
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किनु महीकृते ||
​अर्थ: हे मधुसूदन! भले ही वे मुझे मार डालें, तो भी मैं उन्हें मारना नहीं चाहता—चाहे मुझे तीनों लोकों का राज्य क्यों न मिल जाए, इस पृथ्वी (छोटे से राज्य) के लिए तो कहना ही क्या!
​💡
​आज का विचार:
अपनों के विरुद्ध खड़े होकर प्राप्त किया गया सुख और राज्य भी व्यर्थ है, यदि वहाँ अपनों का रक्त और दुःख शामिल हो। मोह और कर्तव्य की इस दुविधा में ही गीता का ज्ञान प्रकट होता है।
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01/10/2026

शुभ प्रभात मित्रो 🙏

जय श्री राम 🙏

🌟 शुद्ध, ताज़ा और प्राकृतिक कीवी (Fresh Organic Kiwi) 🌟मार्केट में जो Kiwi 🥝 आपको हज़ार से ₹1500/- प्रति किलो मिलता है व...
30/09/2026

🌟 शुद्ध, ताज़ा और प्राकृतिक कीवी (Fresh Organic Kiwi) 🌟
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आज हम अध्याय 1 (अर्जुनविषादयोग) के श्लोक 26 से 30 प्रस्तुत कर रहे हैं।​यहाँ इन श्लोकों और उनकी सरल हिंदी व्याख्या दी गई ...
29/09/2026

आज हम अध्याय 1 (अर्जुनविषादयोग) के श्लोक 26 से 30 प्रस्तुत कर रहे हैं।
​यहाँ इन श्लोकों और उनकी सरल हिंदी व्याख्या दी गई है:
​श्रीमद्भागवत गीता — अध्याय 1 (अर्जुनविषादयोग) [श्लोक 26 से 30]
​श्लोक 26:
​तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितृथ्र्सपितामहान् |
आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा |
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोः उभयोर्मध्ये ||
​अर्थ: तदनंतर पार्थ (अर्जुन) ने दोनों सेनाओं के बीच में स्थित अपने चचेरे भाइयों, ताऊओं, दादाओं, गुरुओं, मामाओं, भाइयों, पुत्रों, पोत्रों, मित्रों, ससुरों और सुहृदों (शुभचिंतकों) को भी वहाँ खड़े देखा।
​श्लोक 27:
​तान् समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् |
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ||
​अर्थ: उन सभी बंधुओं को वहाँ खड़े देखकर कुंतीपुत्र अर्जुन अत्यंत करुणा से भर गए और विषाद (दुःख) करते हुए यह वचन बोले —
​श्लोक 28:
​अर्जुन उवाच |
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् |
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ||
​अर्थ: अर्जुन ने कहा — हे कृष्ण! युद्ध करने के लिए उपस्थित इस अपने जन-समुदाय को देखकर मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं और मेरा मुख सूखा जा रहा है।
​श्लोक 29:
​वेपथुः शशरीरे मे रोमहोर्षश्च जायते |
गाण्डीवं स्रंसते हस्त त्वक्चैव परिदह्यते ||
​अर्थ: मेरे शरीर में कंपन हो रहा है, मेरे रोम खड़े हो रहे हैं, मेरे हाथ से गाण्डीव धनुष फिसल रहा है, और मेरी त्वचा जल रही है।
​श्लोक 30:
​न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः |
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ||
​अर्थ: मैं खड़े रहने में भी असमर्थ हूँ, मेरा मन भ्रमित सा हो रहा है। हे केशव! मैं विपरीत लक्षणों को ही देख रहा हूँ (मुझे इस युद्ध में कोई कल्याण नजर नहीं आ रहा)।
​💡
​आज का विचार:
जब अपने सामने आ जाएं, तो कर्तव्यों और भावनाओं के बीच का संघर्ष व्यक्ति को अंदर से झकझोर देता है। ऐसे कठिन समय में विवेक ही सही मार्ग दिखाता है।
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