11/06/2025
प्यार , दर्द , तड़प और मौत ( Part -1)
( एक नादान प्यार का गहरा छाप )
मेरा नाम रौशन है... मै रोहतास जिले के एक छोटे से गांव का निवासी हूं। यह कहानी मेरे हीं क्लास की एक लड़की की है जिसका नाम शोभा था। शोभा के पिता एक ऐसे व्यक्ति थे जो हमेशा भगवान के पूजा पाठ में व्यस्त रहते थे। वो शोभा को भगवान के बहुत सारे गीत ( भजन ) सुनाते थे। जिसके कारण शोभा रामायण, महाभारत , कृष्ण लीला आदि पुराणों का खूब गीत गाती थी। उसके इतने मधुर स्वर और इतनी अच्छी अच्छी गीतों के कलेक्शन के कारण उससे स्कूल के सभी शिक्षक प्रभावित थे। सभी उसका गीत सुनना चाहते थे। इसलिए शनिवार के दिन लड़का और लड़की पक्ष में अंताक्षरी हुआ करता था।।।।... लड़कों में मै बहुत देर तक लड़कों का इज्जत... कोई भी टूटा फूटा गीत गाकर बचाए रखता था। पर उसकी मधुर स्वर और दैविक गीत तो... उसे पहले हीं हमलोगों से जीता देती थी। ऐसे हीं चलता रहा... एक दिन शोभा और मै स्कूल के चारदीवारी में लगे कुछ पौधों को पानी डाल रहे थे। वो उस वक्त भी एक बहुत सुंदर भजन गुनगुना रही थी। मैने कहा -
मै - तुम कितना सुंदर गाती हो.... दिल करता है कि तुम गुनगुनाती रहो, गाती रहो और मै सुनता रहूं।
शोभा - अच्छा जनाब 🤌🏻 ऐसा नहीं हैं ओके....मेरे से अच्छा आप गाते हो। वैसे कल क्लास क्यों नहीं आए थे???
मै - मै कल बुआ के गांव गया था।
शोभा - क्लास रोज आया कीजिए अच्छा लगता है।
मै - हां मुझे भी... ओके... अब नहीं छोडूंगा क्लास कभी।
फिर हर दिन हमदोनों एकदूसरे का इंतजार करते और एकदूसरे को देखते हीं मुस्कुरा जाते। पता नहीं ये क्या था। लेकिन हम दोनों को एकदूसरे के बिना स्कूल में कुछ भी अच्छा नहीं लगता था। अचानक शोभा लगातार क्लास बंक मारने लगी। मै मुश्किल से हर दिन मन में यह आश लेकर स्कूल जाता की आज आएगी लेकिन वहां उसे ना आना मेरे लिए बड़ा हीं दुख की बात होती थी। फिर 6 घंटा समय काटना बड़ा हीं मुश्किल होता था। एक शाम स्कूल छुट्टी के बाद एक दोस्त के साथ मै बाजार गया जो कि मेरे गांव से 4 किलोमीटर की दूरी पर था। हमलोग साइकिल लेकर बाजार गए और जैसे हीं बाजार में पहुंचे जोरो की बारिश होने लगी। अब हमलोगों के गांव का रास्ता जो कच्चा रास्ता था उसपर पैदल चलना भी मुश्किल था अब उसपर हमलोग साइकिल कैसे चला सकते थे....?
तो पैदल हीं हमलोग साइकिल को डगराते हुए गांव की ओर चल दिए। साइकिल के चक्के में गीली मिट्टी फंस जाती थी जिसके चलते चक्का घसीटाने लगता था। हमलोग चक्के में फंसी मिट्टी को लकड़ी से निकालते और फिर ज्यों का त्यों हो जाता। हमलोग जैसे तैसे जा रहे थे। तबतक आंखों के सामने एक ऐसा दृश्य आया जिसे देखकर पूरा शरीर हीं सुना पड़ गया, धड़कन रुक सी गई । सामने दृश्य यह था कि शोभा की मां और शोभा की भाभी शोभा को दोनों तरफ से सहारा देते हुए ला रही थी। वो दोनों शोभा को सही से ले जाने में सक्षम नहीं थी, शोभा का पैर घसीटा रहा था वो सही से खड़ा भी नहीं हो पा रही थी और बुरी तरह से दर्द में रो रही थी। जब उसने मुझे देखा तो उसने अपने दर्द को काफी कंट्रोल करने की कोशिश की फिर फफक फफक के रोने लगी। इतने में शोभा की मां हमलोग से बोली कि बेटा साइकिल पर बिठाकर इसको बाजार तक छोड़ दीजिए । लेकिन यह भी कर पाना संभव नहीं था , मेरा तो मन था कि मै शोभा को अपने पीठ पर उठाकर पहुंचा दूं बाजार तक लेकिन यह सोच मेरे मन में हीं दबकर रह गया। उधर मेरा दोस्त जो हमदोनों के बारे में नहीं जानता था, उसने बोल दिया कि मिट्टी बहुत गीली है ऐसा कर पाना संभव नहीं है अगर हो पाता तो हमलोग कर देते। ऐसी बात सुनकर वो मेरे तरफ असहाय नजरों से देख रही थी। और हमलोग बिना मदद किए निकल गए । मेरे मन में बार बार ख्याल आ रहा था कि उसकी मदद करने जाऊं, लेकिन उस लड़के के चलते जा ना सका और ऊपर से शाम ढलने को थी घर समय से नहीं पहुंचता तो पापा अलग ही सजा देने को बोल रखे थे । मै मजबूर बार बार पीछे मुड़कर उसे देखता आगे अपने घर की ओर बढ़ रहा था। और यही सोच रहा था कि क्या सोच रही होगी वो मेरे बारे में ...की इतनी कष्ट में वो मेरी मदद नहीं किया .. यही चिंता मुझे खाए जा रही थी। उसके 10 दिन बाद तक वो कभी स्कूल नहीं आई। मै किसी से पूछता भी तो कोई उसके बारे में सही जानकारी नहीं दे पा रहा था। 13वां दिन वो मुझे इस जीवन में अंतिम बार दिखाई दी। उसके अगले दिन हीं वो बेचारी अपनी जान से और इस जहान से हमेशा हमेशा के लिए जा चुकी थी।
आखिर कैसे शोभा इस दुनिया को छोड़ गई अगली पार्ट -2 में पढ़ने को मिलेगा। अगर यह सच्ची कहानी आपको थोड़ा भी heart touching लगा हो तो पेज को लाईक और फॉलो कीजिए। 🙏🏻🙏🏻